Saturday, June 10, 2017

ओ३म् “अनादि से अनन्त काल की यात्रा में जीवात्मा कर्मानुसार अनेक प्राणी योनियों में विचरता रहा है और...

ओ३म्
“अनादि से अनन्त काल की यात्रा में जीवात्मा कर्मानुसार अनेक प्राणी योनियों में विचरता रहा है और आगे भी विचरेगा”
………
यदि हम आर्यसमाज की बात न करें और इतर मनुष्यों व समुदायों की बातें करें तो हम देखते हैं कि मनुष्य को जड़ व चेतन का भेद व उसका तत्वार्थ ज्ञात नहीं है। मनुष्य का जन्म होता है, माता-पिता उसका पालन करते हैं, स्कूल व कालेजों में पढ़ने के लिए उसे भेजा जाता है, वहां जो पढ़ाया जाता है वह पढ़ता है, उसके बाद वह अपने भविष्य के कार्य व व्यवसाय को चुनता है और उसके लिए जो करना होता है, उसे करते हुए वह अपने मुकाम व लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है। मुकाम प्राप्त हो जाये तो सुख मिलता है, नहीं तो वह कुछ दुःखी व चिन्ता में रहते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देता है। वृद्धावस्था आती है, कुछ को रोग हो जाते हैं, उपचार चलता है और 50 से 80 के बीच अधिकांश स्त्री व पुरुषों की जीवनलीला समाप्त होकर मृत्यु हो जाती है। यदि इनमें कोई बचता है तो वह कुछ वर्ष बाद चल बसता है। जीवित व मृतक मनुष्य कहां से आये थे यह उन्हें पता नहीं होता। कहां जाना है व मरकर गये, इसका पता न उनको था न माता-पिता व परिवार के लोगों को ही होता है। परिवार के छोटे व बड़े लोग हैं, वह भी अपने कार्यों में लगे हुए सुखों को भोगने की इच्छा रखते हुए व प्रयास करते हुए अपने जीवन को आगे बढ़ाते रहते हैं और जब तक मृत्यु न आये यही क्रम चलता है। प्रायः सभी लोग इसी को जीवन मानते हैं। उनके अनुसार जीवन का और कोई विशेष लक्ष्य आदि नहीं है। वेद से इतर अनेक मत-मतान्तर हैं, सबकी अपनी अपनी मान्यतायें हैं। कुछ बातें सत्य हैं तो बहुत सी मिथ्या व अविवेकपूर्ण भी हैं। वह सब अपने अपने अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

वैदिक धर्मियों के पास सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा दिया गया वेदेां का सत्य ज्ञान है जिसमें मनुष्य जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य को तो बताया ही गया है, उसकी प्राप्ति के साधनों ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र यज्ञ, पितृयज्ञ आदि सहित परोपकार व सेवा आदि के कामों का विधान भी किया गया है। वेदों के अनुसार यह संसार ईश्वर, जीव व प्रकृति इन तीन मौलिक सत्ताओं व तत्वों से मिलकर बना है। ईश्वर व जीव चेतन तत्व हैं। ईश्वर सर्वज्ञ एवं जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वव्यापक है तो जीवात्मा एकदेशी, अल्पपरिमाण, ससीम, कर्मानुसार जन्म व मृत्यु के बन्धनों में बंधा हुआ है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप होने से सदा-सर्वदा आनन्द से युक्त रहता है। वह सर्वान्तर्यामी होने से जीवात्मा के अन्दर व बाहर सर्व़व्यापक है। जीवात्मा सच्चित (सत्य$चेतन) है, आनन्द से युक्त नहीं है जैसा कि ईश्वर है। चेतन सत्ता होने के कारण इसे आनन्द वा सुखों की अभिलाषा रहती है। अज्ञान के कारण यह भौतिक पदार्थों की ओर अपना मुख करता है। भौतिक पदार्थों में सीमित व अल्प मात्रा में सुख हैं। उसी में यह उलज्ञ जाता है। भौतिक सुखों के लिए ही यह धन व द्रव्यों का संग्रह करता है। परिग्रही बनता है। धनोपार्जन व भौतिक सुखों में ऐसा लिप्त होता है कि ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप व इनके गुणों की उपेक्षा कर देता है। जीवात्मा को लक्ष्य का ज्ञान कराने में सबसे बड़ी बाधा मत-मतान्तर हैं। इसका कारण है कि इनमें ईश्वर व जीवात्मा का यथार्थ, तर्क व युक्तिसंगत ज्ञान नहीं है और न ही यह जानना चाहते हैं। इन मत-मतान्तरों की नींव अविद्या पर है। ऐसा नहीं कि सभी मत-मतान्तरों में शत प्रतिशत अविद्या ही हो, किसी में कम व किसी में अधिक भाग अविद्या का है परन्तु इनमें जितनी अविद्या है उसके कारण यह ईश्वर व जीवात्मा को भली प्रकार से जान नहीं पा रहे हैं। यह सभी मत-मतान्तर अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य ‘धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष’ तथा उसके साधनों को जानकर उनकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न नहीं करते क्योंकि उन्हें इनका यथार्थ स्वरूप विदित नहीं है। संसार में अशान्ति का कारण भी अविद्या व मिथ्या ज्ञान ही सिद्ध होता है। यदि यह अविद्या व मिथ्याज्ञान समाप्त हो जाये तो संसार से दुःख व अशान्ति अपने आप दूर हो सकती है। संसार व जीवन विषयक सत्य स्थिति को जानकर कोई मनुष्य किसी के प्रति अन्याय व अत्याचार नही कर सकता। हिंसा व चोरी सहित धन व द्रव्यों का परिग्रह भी नहीं कर सकता। इसका कारण यह है कि उसे ज्ञात हो जाता है कि सृष्टि के सभी पदार्थों ईश्वर ने सभी मनुष्यों व प्राणियों के लिए बना रखे हैं और इन पर सबका समान अधिकार है। ईश्वर की आज्ञा ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ है कि मनुष्यों को सभी सांसारिक पदार्थों का भोग त्यागपूर्वक करना है। नहीं करेंगे तो दण्डनीय होंगे। यह दण्ड मनुष्य को इस जन्म व परजन्म में कब कैसे ईश्वर से प्राप्त होगा उसका ज्ञान ईश्वर ने आवश्यक न समझ कर वेदों में नहीं दिया है। फिर भी हम अपने अपने विवेक से व शास्त्रों में ऋषियों द्वारा किये गये विवेचन को पढ़कर कुछ कुछ जान सकते हैं।

ईश्वर, जीव व प्रकृति तीनों अनादि, अनुत्पन्न, सनातन, सदा रहने वाले, अनन्त काल तक रहने वाले, अमर व अविनाशी मौलिक पदार्थ हैं। ईश्वर अजन्मा होने से उसका जन्म व अवतार कभी नहीं होता। मनुष्य व अन्य प्राणियों के रूप में जीवात्मायें ईश्वरीय व्यवस्था से जन्म लेती हैं। इसका आधार पूर्व जन्म के कर्म होते हैं। ईश्वर हमारे पूर्व के सभी अनन्त जन्मों का साक्षी है। किसी जीवात्मा के जिन कर्मों का भोग करना शेष है, उनमें से कुछ व सभी कर्मों के आधार पर ईश्वर जीव को मनुष्य व अन्य योनियों में पक्षपातरहित होकर जन्म देता है। यही क्रम अनन्त काल तक आगे भी चलना है। इस जन्म में हम मनुष्य बने हैं। हमें अपने जन्म से अब तक घटी प्रायः सभी प्रमुख बातों का किसी का कम व किसी का पूर्ण ज्ञान है। जन्म से पूर्व हम थे या नहीं, थे तो कहां थे और नहीं थे तो इस जन्म में हमारी आत्मा जो कि एक चेतन सत्ता है, जो सुख, दुःख, हानि, लाभ, मान, अपमान, ईष्र्या व द्वेष का अनुभव व व्यवहार करती है, वह कहां से व कैसे इस मानव शरीर में आ गई। इन सभी प्रश्नों का समुचित निभ्र्रान्त उत्तर मत-मतान्तरों के ग्रन्थों व आचार्यों से नहीं मिलता, केवल वेद और वैदिक साहित्य में मिलता है। पुराण आदि ग्रन्थ इस विषय में परस्पर विरोघी व अविश्वसनीय बातें करते हैं। इस जन्म से पूर्व सुख व दुख का अनुभव करने वाली हमारी आत्मा का अस्तित्व नहीं था, इसका किसी के पास कोई भी प्रमाण नहीं है। बिना प्रमाण के ही हम यह मानते रहते हैं कि हमारा अस्तित्व नहीं था। हमें तो यह व्यवहार बुद्धिहीनता व मूर्खता का प्रतीत होता है। हम जीवात्मा के अस्तित्व, उसके स्वरूप, गुण-कर्म-स्वभाव व उत्पत्ति विषयक प्रश्नों को जानने का भी प्रयास नहीं करते। यदि हमारा इस जन्म से पूर्व अस्तित्व न होता अर्थात् हमारा पूर्वजन्म न होता तो संसार के सभी मनुष्य व प्राणियों में, जिनके शरीरों में एक-एक चेतन आत्मा है, किसी भी प्रकार का भेद नहीं होना चाहिये था। सबकी आकृति, प्रकृति, संवेदनायें, ज्ञान व कर्म तथा परिवेश एक जैसे होने चाहिये थे। दो व अधिक मनुष्यों के देश, काल व परिस्थितियों तथा गुण-कर्म व स्वभाव में भेद ‘कर्मफल सिद्धान्त व पूर्वजन्म’ को सिद्ध करता है। हमारा पूर्वजन्म था, हमारे कर्म अलग अलग थे, उसी के अनुसार पुरस्कार व दण्ड स्वरूप हम मनुष्यों व इतर प्राणियों को नाना प्रकार के शरीर व अच्छी-बुरी परिस्थितियां ईश्वर द्वारा हम सभी को दी र्गइं हंै। हमारा कर्तव्य है कि हम ईश्वर, जीव व प्रकृति के स्वरूप पर विचार व चिन्तन-मनन करें। जिन प्रश्नों के उत्तर न मिले उसके लिए हमें सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेद, दर्शन व उपनिषद् आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। अन्धविश्वास के आधार पर किसी ग्रन्थ की कोई बात न मानें। जो तर्क व युक्तिसंगत हो, सृष्टिकर्म के अनुकूल हो तथा जिसे अपनी आत्मा स्वीकार करे, उसी बात को ही मानना चाहिये। ऐसा करके जीवात्मा के सत्य, स्वतन्त्र, अनादि, अनुत्पन्न, जन्म-मरण धर्मा, कर्मानुसार सुख व दुखों को भोगने वाले चेतन स्वरूप का निभ्र्रान्त ज्ञान होता है। ईश्वर व प्रकृति के सत्यस्वरूप सहित अपने लक्ष्य, उसकी प्राप्ति के साधनों व कर्तव्यों का ज्ञान भी हो जाता है।

मनुष्य के रूप में हम विद्यमान है। हमारा अस्तित्व चेतन जीवात्मा व मरणधर्मा शरीर का एक संयुक्त जीवन्त रूप है। सभी लोगों की जीवनयात्रा अनादि काल से चल रही है। लक्ष्य दुःखों से सर्वथा मुक्ति है जिसे मोक्ष कहते हैं। मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर का सत्य ज्ञान व उपासना से उसका साक्षात्कार करना आवश्यक है। साक्षात्कार तभी होता है जब जीवात्मा अपने पूर्व अशुभ कर्मों को प्रायः भोग लेता है और सद्कर्मों को करके आत्मा को पवित्र व दोषरहित कर लेता है। हमें लगता है कि उपासना में देर से सफलता मिलने का एक कारण हमारे जन्म जन्मान्तर के अशुभ कर्म व उनका पूर्णतया भोग कर उन्हें समाप्त करना है। जब तक अशुभ कर्मों का भोग पूरा नहीं होता, प्रयत्न व पुरुषार्थ करने पर भी जीवात्मा को ईश्वर साक्षात्कार नहीं होता। यदि अशुभ कर्म अधिक होंगे तो उपासना आदि साधनों को करने पर भी ईश्वर साक्षात्कार में विलम्ब हो सकता है। अतः मनुष्य जीवन में वेदाध्ययन से सत्य ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर की उपासना व सद्कर्मों पर ध्यान देना चाहिये। अशुभ कर्म पूर्णतः बन्द कर देने चाहिये। ऐसी अवस्था बना लेने पर भी भोग के लिए बचे हुए पूर्व के अशुभ कर्मों के कारण जीवन में दुःख आ सकते हैं। ऐसा होने पर दुःखी न होकर अपने मोक्ष के साधनों के अनुसार कर्तव्य पथ का अनुसरण व अनुगमन करते रहना चाहिये। ईश्वर का साक्षात्कार हो या न हो, हमें लगता है कि शुभ कर्म व उपासना आदि साधनों का सही प्रकार से सेवन करने से हम उपासना व ईश्वर-साक्षात्कार में आगे बढ़ते हैं। इसे जारी रखना चाहिये और स्वयं को ईश्वर में समर्पित रखना चाहिये। ऐसा होने पर हम तीव्र गति से आगे बढ़ सकते हैं। यह विश्वास रखना चाहिये कि हम ईश्वर द्वारा वेदों में कही गई ईश्वर की प्राप्ती की यात्रा पर सही दिशा में चल रहे हैं तो मंजिल कभी न कभी तो आयेगी ही। मंजिल दूर है अतः समय लग सकता है। यह जरूरी नहीं की हमें हमारी मंजिल मोक्ष इसी जन्म में मिल जाये। हमारे ऋषि व विद्वान बताते हैं कि मोक्ष प्राप्ति में अनेक जन्म भी लग सकते हैं। इसके लिए धैर्य की आवश्यकता है। शायद इसी लिए धैर्य को धर्म का प्रथम लक्षण बनाया गया है।

जीवात्मा अनादि काल से जन्म मरण के बंधनों में बंधता व छूटता आ रहा है। हमारा अनेक बार मोक्ष भी हुआ है और अनेकानेक, अनन्त बार जन्म व मरण भी हुआ है। हम संसार में दृष्टिगोचर होने वाली प्रायः सभी योनियों में एक व अनेक बार हम रह आये हैं और आगे भी यह क्रम जारी रहेगा। हम व अन्य कोई जीव दुःख नही चाहता। इन अनचाहे सभी दुःखों से बचने का एकमात्र उपाय केवल मोक्ष के साधनों का सेवन व व्यवहार है। मोक्ष को प्राप्त होकर जीवात्मा बहुत लम्बी अवधि, 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों तक, मुक्ति में दुःखों से सर्वथा मुक्त रहेंगे और ईश्वर के सान्निध्य से उसके आनन्द को भोगेंगे। उसके बाद पुनः जन्म, मरण, पुनर्जन्म होगा और देर में व शीघ्र फिर मुक्ति हो सकती है। यह वेद व शास्त्रों का ज्ञान है। इसमें वेद सहित हमारे दर्शन व उपनिषदकार आप्त ऋषि प्रमाण हैं जो असत्य व अनुचित कथन व शब्द प्रयोग कभी नहीं करते। अतः इस पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिये। हम यह भी बता दें कि हम कोई बड़े साधक नहीं है। हमने जो पढ़ा, विचार किया व हमें उचित लगा, उसे हमने इस लेख में दिया है। हमें लगता है कि हमारे विद्वान हमसे इन विषयों में पूर्णतः व कुछ सीमा तक सहमत होंगे। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य


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Friday, March 17, 2017

-मकर संक्रान्ति मंगलमय हो - जितने समय में पृथिवी सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करती है उतने समय को...

-मकर संक्रान्ति मंगलमय हो -
जितने समय में पृथिवी सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करती है उतने समय को “सौर वर्ष ” कहते हैं । सौर वर्ष में पृथिवी अपनी यह परिक्रमा आकाश में जिस परिधि पर रहकर करती है, उसे “क्रान्तिवृत्त” कहते हैं।इस क्रान्तिवृत्त के १२ भाग कल्पित किये गये हैं और उन १२ भागों के नाम उन-उन स्थानों पर विद्यमान आकाशस्थ नक्षत्रपुञ्जों से मिलकर बनी हुयी आकृति से मिलते जुलते आकार वाले पदार्थों के नाम पर रख लिये गये हैं जो कि इस प्रकार हैं -१मेष , २वृष , ३मिथुन , ४कर्क , ५सिंह , ६कन्या , ७तुला , ८वृश्चिक , ९धनु , १०मकर , ११कुम्भ , १२मीन । ये प्रत्येक भाग वा आकृति"राशि" कहलाते हैं। जब एक राशि से दूसरी राशि में पृथिवी संक्रमण करती है तब उसको “ संक्रान्ति” कहते हैं। पृथिवी के इस संक्रमण को लोक में सूर्य का संक्रमण कहने लगे हैं।पृथिवी के इस संक्रमण में सूर्य ६ महीने क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर उदय होता है तथा ६ मास दक्षिण की ओर निकलता है ।ये ६ -६ महीने की अवधियां उत्तरायण व दक्षिणायन कहलाती हैं। सूर्य की मकरराशि की संक्रान्ति से उत्तरायण व कर्क राशि की संक्रान्ति से दक्षिणायन आरम्भ हो जाता है।
सूर्य के प्रकाशाधिक्य के कारण उत्तरायण को महत्त्व दिया गया है इस कारण उत्तरायण के आरम्भ दिवस को मकर संक्रान्ति पर्व मनाया जाता है। यद्यपि इस समय उत्तरायण परिवर्त्तन , प्रचलन में आ रही मकर संक्रान्ति के दिन नहीं होता है। अयन चलन की गति बराबर पिछली ओर को होते रहने के कारण जो लगभग २२ - २३ दिन का अन्तर आ गया है उसे ठीक कर लेना चाहिये।
जिस प्रकार बाहर के जगत् में सूर्य का उत्तरायण दृष्टिगोचर होता है उसी प्रकार हमारे अभ्यन्तरीण आध्यात्मिक जगत् में भी उत्तरायण हुआ करता है । उत्तरायण कहते हैं ऊपर की ओर गति। गीता में कहा है - “ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था:” अर्थात् सत्त्वगुण में रहने वाले मनुष्य ऊपर जाते हैं। यह मनुष्य के लिये ऊपर को जाना, ज्ञान के प्रकाश के द्वारा सम्भव है। सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक है, इसलिये यह मनुष्य को ज्ञान के सम्बन्ध से जोड़ता है। ज्ञानस्यैव पराकाष्ठा वैराग्यम् ज्ञान की ही पराकाष्ठा को वैराग्य कहा गया है। बस इस वैराग्य रूप ज्ञान के होने पर उन्नति अर्थात् मोक्ष मार्ग की ओर गति का होना आरम्भ हो जाता है।
महाभारत काल के इतिहास पर दृष्टिपात करके देखो कि मृत्यञ्जयी ब्रह्मचारी भीष्म पितामह जब शरशय्या पर आसीन हो गये थे तब उन्होंने कहा था कि जब तक सूर्य उत्तरायण में नहीं जायेगा और सूर्य ही नहीं अपितु वस्तुतः जब तक मेरे जीवन का उत्तरायण काल नहीं आता है तब तक मैं देहत्याग नहीं करूंगा। इसी प्रकार हमें भी तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान आदि योग साधनों के द्वारा अपने जीवन के उत्तरायण का निर्माण करना चाहिये, यही प्रेरणा ग्रहण करना मकर संक्रान्ति पर्व की पर्वता है। जीवन को उत्तर अर्थात् श्रेष्ठ बनाने पर ही देहावसान होने के पश्चात् जीव को श्रेष्ठ नवजीवन रूप सद्गति प्राप्त होती है। परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि मकर संक्रान्ति पर्व आप और हम सबके जीवन के उत्तरायण के लिये प्रेरक बनता हुआ मंगलमय हो। लेखक-विष्णुमित्र वेदार्थी ९४१२११७९६५


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*महर्षि दयानन्द* लिखित ग्रन्थ *सत्यार्थ प्रकाश* ने पौराणिक जगत में हलचल मचा दी थी, महर्षि की मृत्यु...

*महर्षि दयानन्द* लिखित ग्रन्थ *सत्यार्थ प्रकाश* ने पौराणिक जगत में हलचल मचा दी थी, महर्षि की मृत्यु के उपरान्त, पोप कालूराम शास्त्री ने *आर्यसमाज की मौत* नामक पुस्तक लिखी, जिसका उत्तर शास्त्रार्थ महारथी *मनसाराम वैदिक तोप* ने इस पुस्तक *पौराणिक पोल प्रकाश* यहाँ से download कीजिये, कुल 580 पृष्ठों में, 4 भागों में विभाजित:

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-1:* [21 MB]
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आर्यसमाज एक विशुद्ध रूप से गैर राजनैतिक सामाजिक संगठन है जिसकी स्थापना सन् १८७५ मे मानकजी एक पारसी...

आर्यसमाज एक विशुद्ध रूप से गैर राजनैतिक सामाजिक संगठन है जिसकी स्थापना सन् १८७५ मे मानकजी एक पारसी सज्जन के बाग मे हुई और आर्यसमाज के लिए ५००० /- का पहला योगदान मुस्लिम संप्रदाय के मतावलम्बी श्री अल्लाहरखाँ ने दिया था | अनेक पादरी उनके सहयोगी थे | अमर शहीद भगतसिंह के दादा श्री अजीत सिंह सिख संप्रदाय से थे किन्तु महर्षि दयानंद के विचारो से प्रेरित होकर वैदिक धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा रखने लगे | उन्होंने आर्यसमाज के मंत्री के स्वरूप मे पंजाब मे आर्यसमाज के विस्तार हेतु सक्रिय भुमीका निभाई |
लाला लाजपत राय, शहीद चंद्रशेखर आजाद, उधम सिंह, करतार सिंह सराभा, रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, राजेन्द्र लोहड़ी, अश्फाक उल्ला खाँ, शहीद-ए-आजम सरदार भगतसिंह, क्रांतिगुरू श्याम जी कृष्ण वर्मा, भगवती चरण वोहरा, दुर्गा भाभी, स्वामी श्रद्धानंद, वीर सावरकर, मदनलाल धींग्रा को कौन नही जानता? इन सभी ने आर्यसमाज के ही विचारो से प्रेरित होकर माँ भारती को परतंत्रता की बेडीयो से मुक्त कराने हेतु अपणे प्राणो की आहुती दी. |
मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध, परोपकार के लिए सदैव तत्पर आर्यसमाज में आपका स्वागत है |
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र जी एवं योगीराज श्रीकृष्ण चंद्र जी आदी भारतीय संस्कृति के महान प्रेरणास्पद रहे है | महाभारत तथा रामायण इत्यादी ग्रन्थ मनुष्य रचित सच्चे ऐतिहासिक ग्रंथ है तथा मनुष्यों के लिए शिक्षाप्रद है | आर्यसमाज मानता है के ईश्वर एक है जो ईस ब्रम्हांड का रचियता है, वही कर्ता धर्ता है | वह सर्वव्यापक है, निराकार है | वह मनुष्यो के कर्मो का फल देता है (बुरे का बुरा और अच्छे का अच्छा) आर्यसमाज तर्कपूर्ण वैज्ञानिक मान्यताओं को महत्व देता है | आर्यसमाज मानता है के “वेद” ही ईश्वरीय ज्ञान है और सभी ज्ञान का भंडार है | सभी सत्य विद्याओं का पुस्तक है | आर्य समाज शाकाहार को मनुष्य का भोजन मानता है तथा मांसाहार, शराब, सिगरेट आदी व्यसनों को धर्म के विरुद्ध मानता है और इसका कडा विरोध करता है |
आर्य समाज छुआछूत तथा जाति-पाति को मनुष्य के सामाजिक उन्नति में बाधक मानता है | आर्यसमाज संस्कृत को भाषाओं की जननी मानता है तथा मातृभाषा को प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक मानता है | मानव के संपुर्ण जिवन के लिए आर्यसमाज आश्रम व्यवस्था का पुरस्कार करते हुवे (ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) को समाज की उन्नति का आवश्यक साधक मानता है | आर्यसमाज मानता है के कर्म के आधार पर ही वर्ण बने है (ब्राम्हण, क्षत्रीय, वैश्य आदी)
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आर्य समाज का विशालकाय, विश्वव्यापी संगठन निम्न स्वरूप कार्यरत है..
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👉लगभग १०००० आर्यसमाज मंदिर विश्व भर मे स्थापित है
👉लगभग २५०० विज्ञालयो एवं महाविद्यालयों का संचालन जिसमे (डीएवी) यह प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्था भी सम्मिलित है | सरकार के बाद संभवतः यह सब से बडी आर्यसमाज की शैक्षणिक शृंखला है |
👉लगभग ६०० गुरुकुलो (आवासिय) शिक्षण संस्थानों का संचालन |
👉१०,००० से अधिक अनाथ बच्चों का अनाथालयो द्वारा पालन पोषण |
👉२५० से लगभग ५००० लघु स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन द्वारा मनुष्य मात्र की सेवा |
👉आडम्बर और जातिआधारीत बन्धनो से मुक्त हजारों विवाहों का प्रतिवर्ष आयोजन
👉नौजवानों के शारिरिक विकास के लिए आर्य वीर दल द्वारा हजारो व्यायाम शाला का संचालन तथा नैतिक व शारीरिक शिक्षा के लिए हजारो आवासीय निःशुल्क शिबीरो का प्रतिवर्ष आयोजन
👉महिलाओं के लिए लघु उद्योग, वानप्रस्थ आश्रम, संन्यास आश्रम का संचालन
आर्य समाज का विस्तार विश्व के लगभग हर कोने मे हुआ है
१ भारत
२ कनाडा
३ केन्या
४ फ्रांन्स
५ युगाण्डा
६ गयाना
७ त्रीनीडाड
८ सूरीनाम
९ टार्मिनीया
१० नेपाल
११ म्यांमार
१२ बांग्लादेश
१३ सिंगापुर
१४ अमेरिका
१५ इंग्लैंड
१६ मारीशस
१७ पाकिस्तान
१८ हाँलैड
१९ थाईलैंड
२० न्यूजीलैण्ड
२१ आँस्ट्रेलिया
२२ फीजी
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जातिवाद विहीन समाज की स्थापना करना चाहते हो?
अंधविश्वास को दुर करना चाहते हो?
पाखण्ड से समाज को बचाना चाहते हो?
आर्यसमाज आपको आमंत्रित करता है |
अपने निकट के आर्यसमाज से आज ही संबंन्ध स्थापित करे |
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महाराष्ट्र आर्य प्रतिनिधी सभा
आर्य समाज परली बैजनाथ, जिला बीड, महाराष्ट्र - ४३१५१५
. जगदाले रोहित आर्य
आर्यसमाज, परभणी, महाराष्ट्र ४३१ ४०१.
मो ०९९६०९८३९९१.


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न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते...

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।गीता (2/20)
शरीर में 6 विकार होते हैं – उत्पन्न होना,सत्तावाला दीखना,परिवर्तन होना,वृद्धि होना,घटना और नष्ट होना।आत्मा इन विकारों से मुक्त है। यह सनातन है।यह कभी मृत्यु को आलिंगन नहीं करती।जिसका जन्म होता है,उसी की मृत्यु अवश्यंभावी है।आत्मा में संयोग एवं वियोग नहीं होते।
आत्मा स्वतःसिद्ध निर्विकार है।इसकी सत्ता का आरम्भ और अन्त नहीं होता।इसे जन्मरहित कहते हैं।इसका अपक्षय कभी भी नहीं होता।शरीर कुछ आयु पश्चात् घटने लगता है,शक्ति क्षीण होने लगती है,इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं।लेकिन नित्य –तत्त्व आत्मा में किन्चिन्मात्र भी कमी नहीं आती।
आत्मा अनादि है।इस नित्य – तत्त्व में कोई वृद्धि भी नहीं होती।शरीर नश्वर है,जबकि आत्मा अविनाशी है।
शरीर परिवर्तनशील और विकारी होने के कारण आत्मा का अंग नहीं है।
ओम शान्ति


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हर व्यक्ति में ईश्वर को देखें जिसकी भी आये याद, हर व्यक्ति से प्रेम करें नहीं कोई फरियाद / ईश्वर को...

हर व्यक्ति में ईश्वर को देखें जिसकी भी आये याद, हर व्यक्ति से प्रेम करें नहीं कोई फरियाद / ईश्वर को ही याद करते हुए कीजिए सब काज ,वही सबका मित्र है वही सबका नाथ //🕉🕉🕉⛳⛳🕉🕉🕉


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सत्यार्थ प्रकाश ने बदला जीवन || एक किताब जो बदल देगी जीवन! || 1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला...

सत्यार्थ प्रकाश ने बदला जीवन
|| एक किताब जो बदल देगी जीवन! ||
1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला क्रांतिकारी मंगल पांडे स्वामी दयानंद का शिष्य था। मंगल पांडे को चर्बी वाले कारतूस प्रयोग करने के कारण पानी न पिलाने वाले स्वामी दयानंद ही थे। प्रमाण: महान स्वतंत्रता सेनानी आचार्य दीपांकर की पुस्तक पढे: 1857 की क्रांति और मेरठ
2. सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने मरने से पहले गीता और सत्यार्थ प्रकाश के दर्शन किए, जब जेलर ने पूछा इन किताब में क्या है, उसने बताया, गीता मुझे दोबारा जन्म लेने की प्रेरणा देती है और सत्यार्थ प्रकाश स्वदेशी राज्य की प्राप्ति का मार्ग सुझाती है। इसलिए मैं जन्म लेकर दोबारा आउंगा और आजादी प्राप्त करूंगा।
प्रमाण: खुदीराम की जीवनी तेजपाल आर्य की लिखी पढ़े।
और देश के सबसे वृद्ध क्रांतिकारी लाला लाजपत राय पर जब लाठियां बरस रही थी, उनके हाथ में तब भी सत्यार्थ प्रकाश था।
3. पं. मदनमोहन मालवीय जी ने आर्यसमाज का यहां तक विरोध किया कि सनातन धर्म सभा तक बना डाली, लेकिन जब मरने लगे तो काशी के सब पंडित उनके दर्शन करने आए और बोले, महामना जी हमारा मार्गदर्शन अब कौन करेगा? तो मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें सत्यार्थप्रकाश देते हुए कहा, ‘‘सत्यार्थ प्रकाश आपका मार्गदर्शन करेगा।’’
प्रमाण: घोर पौराणिक लेखक अवधेश जी की पुस्तक महामना मालवीय पढ़े, जो हिन्द पॉकेट बुक्स से छपी है।
4. सत्यार्थप्रकाश पढकर एक तांगा चलाने वाला दुनिया में मशालों का शहंशाह बन गया: एमडीएच मशाले और सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर एक पिंक्चर लगानेवाला हीरो ग्रुप का अध्यक्ष बन गया: ओमप्रकाश मूंजाल
5. सत्यार्थ प्रकाश पढकर होमी भाभा ने भारत में परमाणु युग की शुरूआत की और डॉक्टर कलाम ने गीता के साथ-साथ सत्यार्थप्रकाश भी अनेक बार पढा है।
गॉड पार्टिकल और हिग्स बोसोन की खोज के कारण जिन विदेशियों को नोबेल पुरस्कार मिला, जानते हो मेरे पास 1966 की एक हिन्दी पत्रिका नवनीत है, उसमें ये सिद्धांत तब के ही लिखे हैं और वह लेख लिखा हुआ है सत्येंद्रनाथ बोस का, जो आर्य समाज के सदस्य थे और वैज्ञानिक भी, अब इतने दिन बाद पुरस्कार कोई और ले गया। चलो फिर भी विज्ञान में न सही अभी समाज सेवा में कैलासजी को नोबेल मिला, वे भी सत्यार्थ प्रकाश पढने वाले ही हैं और जनज्ञान प्रकाशन की पंडिता राकेश रानी के दामाद हैं। जनज्ञान प्रकाशन ने कभी सबसे सस्ते वेद प्रकाशित किए थे।
6. सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर फीजी, गुयाना, मोरीशस में कई व्यक्ति राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन गए।
7. सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने वाले लाल बहादुर शास्त्री और चौधरी चरण सिंह देश के सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री कहलाए। चरणसिंह की राजनीति कैसी भी रही हो, लेकिन जमींदारी उन्मूलन के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। नेहरूजी सहकारिता के नाम पर हिन्दुस्तान की सारी जमीन रूस को देने वाले थे, ऐसे ही जैसे उन्होंने आजाद भारत में माउंटबेटन को गवर्नर बना दिया। यदि सत्यार्थप्रकाश पढने वाले चरणसिंह न होते तो आज हमारे किसानो के आका रूस के लोग होते और देश रूस का गुलाम होता।
प्रमाण: कमलेश्वर की इंदिरा की जीवनी अंतिम सफर (संपूर्ण मूल संस्करण, क्योंकि यह संक्षिप्त भी है) पुस्तक पढे, कमलेश्वर इंदिरा जी के चहेते थेे, उनकी मौत पर दूरदर्शन से कमेंटरी उन्होंने ही की थी।
8. सत्यार्थप्रकाश जिसने भी पढा, वह शेर बन गया, रामप्रसाद बिस्लिम, श्याम कृष्णवर्मा, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉक्टर हेडेगेवार के पिताश्री बलिराम पंत हेडगेवार जो आर्य समाज के पुरोहित थे आदि और आज के युग में भी शेर ही होते हैं। सुनो कहानी: सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर साहित्यकार तेजपाल सिंह धामा ने भारत माता का नग्न चित्र बनानेवाले एमएफ हुसैन को 15 वर्ष पहले हैदराबाद में पत्रकार सम्मेलन में सबके सामने जोरदार चांटा जडा, अपमानित होकर बेचारे हुसैन देश ही छोड गए और हैदराबाद जैसे मुस्लिम शहर में रंगीला रसूल का पुनः प्रकाशन भी किया और सौ से अधिक पुस्तके आर्य समाज से संबंधित लिखी।
9. सत्यार्थ प्रकाश पर 2008 में प्रतिबंध के लिए जब भारत भर के मुल्ला-मौलवी एकत्र हुए और अदालत में पहुंचे तो फैसला सुनाने वाले जज ने न केवल सत्यार्थ प्रकाश के पक्ष में फैसला दिया वरन स्वयं आर्य समाजी हो गया और मुसलमानो का एक मुस्लिम वकील भी आर्य समाजी बन गया, बेचारे ने भूल से सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन किया था ताकि गलत तथ्य निकाल सके। आर्यसमाज की ओर से यह मुकदमा विमल वधावनजी ने लडा था, विमलजी भी सत्यार्थ प्रकाश पढनेवाले ही हैं।
10. सत्यार्थप्रकाश पढकर ही मुंशी प्रेमचंद भारत के सबसे लोकप्रिय लेखक बने, उनकी धर्मपत्नी ने ही ऐसा लिखा है।
सत्यार्थ प्रकाश से प्रेरणा लो और वेदो की ओर लोटो!


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🕉🙏 ओउम् नमस्ते जी 🕉🙏 🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🕉🙏 दिनांक – 18 दिसम्बर 2016 दिन – रविवार तिथि...

🕉🙏 ओउम् नमस्ते जी 🕉🙏
🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🕉🙏

दिनांक – 18 दिसम्बर 2016
दिन – रविवार
तिथि – पंचमी
नक्षत्र– आश्लेषा
पक्ष– कृष्ण
माह – पौष
ऋतु – हेमन्त
सूर्य – दक्षिणायन
सृष्टि संवत् – 1, 96, 08, 53, 117
कलयुगाब्द – 5118
विक्रम संवत् – 2073
शक संवत् – 1939
दयानंदाब्द – 193

🌷 जो धर्म को त्यागता है , धर्म उसे त्याग देता है ।
🌷 जो समय नष्ट करता है , समय उसे नष्ट कर देता है ।
🌷 जो धर्म का पालन करता है , धर्म उसका पालन करता है ।
🌷 जो ईशवर के आश्रित होकर अपने कर्तव्य का पालन करता है , ईशवर उसका पालन करता है ।
🌷 जो अपनी आत्मा जैसी दुसरे की आत्मा को समझता है , वह किसी से बैरभाव नही रख सकता ।

🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🌷🍃🌷🍃

🌷 यथोद्वरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति ।
तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिन : ।। ( मनु स्मृति )

🌷 अर्थ :- जैसे धान से चावल निकालने वाला छिलके को अलग कर चावलों की रक्षा करता है ।चावलों को टूटने नही देता । वैसे ही राजा रिश्वतखोरों , अन्यायकारियों , चोर बाजारी करने वालों , डाकुओं , चोरों और बलात्कारियों को मारे और बाकी प्रजा की रक्षा करें ।

🌷🍃🌷🍃 ओउम् 🌷🍃🌷🍃 सुदिनम 🌷🍃🌷🍃 सुप्रभातम


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तेरे गिरने में, तेरी हार नहीं । तू आदमी है, अवतार नहीं ।। गिर, उठ, चल, दौड, फिर...

तेरे गिरने में, तेरी हार नहीं ।
तू आदमी है, अवतार नहीं ।।
गिर, उठ, चल, दौड, फिर भाग,
क्योंकि
“जीत” संक्षिप्त है इसका कोई सार नहीं


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🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷ॐ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाआप्नुवन् पूर्वमर्शत्| तद्धावतो अन्यानत्येति...

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷ॐ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाआप्नुवन् पूर्वमर्शत्| तद्धावतो अन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ||~~न्यायदर्शन~यजुर्वेद~४०~४~~पद्यानुवाद~~~~~अद्वितीय निश्चल अकम्पन्, मन से तीव्र है वेगवान| पहले से व्यापक वह ठहरा, देख न पाये अविद्वान्| सब जीवों को धारण कर, सबको नियमों में चलाने वाला| अंतर्यामी घट घट वासी, खुद ही खुद से मिलाने वाला|| आओ विमल प्रशांत बना मन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रभु को ध्यावें| अतुलनीय उस परमेश्वर के, अमृत मोक्षानंद को पावें||👏


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सब कार्य केवल हमारे पुरुषार्थ से सिद्ध नहीं होते । उनकी सिद्धि में ईश्वर की कृपा भी होती है। परंतु...

सब कार्य केवल हमारे पुरुषार्थ से सिद्ध नहीं होते । उनकी सिद्धि में ईश्वर की कृपा भी होती है। परंतु अपना पुरुषार्थ छोडना नहीं चाहिए।


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"ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।"

“ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।”

- ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।
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हिम्मत करके पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..आर्य जयवीर 9416874412 ना तो जनवरी साल का पहला मास है...

हिम्मत करके पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..आर्य जयवीर 9416874412
ना तो जनवरी साल का पहला मास है और ना ही 1 जनवरी पहला दिन ..
जो आज तक जनवरी को पहला महीना मानते आए है वो जरा इस बात पर विचार करिए ..
सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है .. ये क्रम से 9वाँ,10वाँ,11वां और
बारहवाँ महीना है .. हिन्दी में सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है, इसे अग्रेज़ी में sept(सेप्ट) तथा oct(ओक्ट) कहा जाता है .. इसी से september तथा October बना ..
नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के “नव” को ले लिया गया है तथा दस अंग्रेज़ी में “Dec” बन जाता है जिससे
December बन गया ..
ऐसा इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था। इसका एक प्रमाण और है ..
जरा विचार करिए कि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है????
इसका उत्तर ये है की “X” रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना .. चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया ..
इन सब बातों से ये निष्कर्ष निकलता है
की या तो अंग्रेज़ हमारे पंचांग के अनुसार ही चलते थे या तो उनका 12 के बजाय 10 महीना ही हुआ करता था ..
साल को 365 के बजाय 305 दिन
का रखना तो बहुत बड़ी मूर्खता है तो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1 जनवरी को माना लें पर उनका नया बही-खाता 1 अप्रैल से शुरू होता है ..
लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू..
भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था।
इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़
अपना तारीख या दिन 12 बजे
रात से बदल देते है .. दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है तो 12 बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है ??
तुक बनता है भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है, सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त की बेला कही जाती है और यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है.. यानि की करीब 5-5.30 के आस-पास और
इस समय इंग्लैंड में समय 12 बजे के आस-पास का होता है।
चूंकि वो भारतीयों के प्रभाव में थे इसलिए वो अपना दिन भी भारतीयों के दिन से मिलाकर रखना चाहते थे ..
इसलिए उन लोगों ने रात के 12 बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया ..
जरा सोचिए वो लोग अब तक हमारे अधीन हैं, हमारा अनुसरण करते हैं,
और हम राजा होकर भी खुद अपने अनुचर का, अपने अनुसरणकर्ता का या सीधे-सीधी कहूँ तो अपने दास का ही हम दास बनने को बेताब हैं..
कितनी बड़ी विडम्बना है ये .. मैं ये नहीं कहूँगा कि आप आज 31 दिसंबर को रात के 12 बजने का बेसब्री से इंतजार ना करिए या 12 बजे नए साल की खुशी में दारू मत पीजिए या खस्सी-मुर्गा मत काटिए। मैं बस ये कहूँगा कि देखिए खुद को आप, पहचानिए अपने आपको ..
हम भारतीय गुरु हैं, सम्राट हैं किसी का अनुसरी नही करते है .. अंग्रेजों का दिया हुआ नया साल हमें नहीं चाहिये, जब सारे त्याहोर भारतीय संस्कृति के रीती रिवाजों के अनुसार ही मानते हैं तो नया साल क्यों नहीं? जय आर्य जय आर्यव्रत🙏🙏


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मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin qasim): 7वीं सदी के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत के हाथ से...

मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin qasim):

7वीं सदी के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत के हाथ से जाता रहा। भारत में इस्लामिक शासन का विस्तार 7वीं शताब्दी के अंत में मोहम्मद बिन कासिम के सिन्ध पर आक्रमण और बाद के मुस्लिम शासकों द्वारा हुआ। लगभग 712 में इराकी शासक अल हज्जाज के भतीजे एवं दामाद मुहम्मद बिन कासिम ने 17 वर्ष की अवस्था में सिन्ध और बूच पर के अभियान का सफल नेतृत्व किया।

इस्लामिक खलीफाओं ने सिन्ध फतह के लिए कई अभियान चलाए। 10 हजार सैनिकों का एक दल ऊंट-घोड़ों के साथ सिन्ध पर आक्रमण करने के लिए भेजा गया। सिन्ध पर ईस्वी सन् 638 से 711 ई. तक के 74 वर्षों के काल में 9 खलीफाओं ने 15 बार आक्रमण किया। 15वें आक्रमण का नेतृत्व मोहम्मद बिन कासिम ने किया।

मुहम्मद बिन कासिम अत्यंत ही क्रूर यौद्धा था। सिंध के दीवान गुन्दुमल की बेटी ने सर कटवाना स्वीकर किया, पर मीर कासिम की पत्नी बनना नहीं। इसी तरह वहां के राजा दाहिर (679ईस्वी में राजा बने)और उनकी पत्नियों और पुत्रियों ने भी अपनी मातृभूमि और अस्मिता की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी। सिंध देश के सभी राजाओं की कहानियां बहुत ही मार्मिक और दुखदायी हैं। आज सिंध देश पाकिस्तान का एक प्रांत बनकर रह गया है। राजा दाहिर अकेले ही अरब और ईरान के दरिंदों से लड़ते रहे। उनका साथ किसी ने नहीं दिया बल्कि कुछ लोगों ने उनके साथ गद्दारी की।


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રક્ત ટપકતી સો સો ઝોળી સમરાંગણથી આવે, કેસરવરણી સમરસેવિકા કોમલ સેજ બિછાવે; ઘાયલ મરતાં મરતાં રે! માતની...

રક્ત ટપકતી સો સો ઝોળી સમરાંગણથી આવે,
કેસરવરણી સમરસેવિકા કોમલ સેજ બિછાવે;
ઘાયલ મરતાં મરતાં રે!
માતની આઝાદી ગાવે.

કો’ની વનિતા, કો’ની માતા, ભગિનીઓ ટોળે વળતી,
શોણિતભીના પતિ-સુત-વીરની રણશૈયા પર લળતી,
મુખથી ખમા ખમા કરતી
માથે કર મીઠો ધરતી.

થોકે થોકે લોક ઊમટતા રણજોધ્ધા જોવાને,
શાહબાશીના શબદ બોલતા પ્રત્યેકની પિછાને;
નિજ ગૌરવ કેરે ગાને
જખ્મી જન જાગે અભિમાને.

સહુ સૈનિકનાં વહાલાં જનનો મળિયો જ્યાં સુખમેળો,
છેવાડો ને એક્લવાયો અબોલ એક સૂતેલો;
અણપૂછયો અણપ્રીછેલો
કોઇનો અજાણ લાડીલો.

એનું શિર ખોળામાં લેવા કોઇ જનેતા ના’વી;
એને સીંચણ તેલ-કચોળાં નવ કોઇ બહેની લાવી;
કોઇના લાડકવાયાની
ન કોઇએ ખબર પૂછાવી.

ભાલે એને બચીઓ ભરતી લટો સુંવાળી સૂતી,
સન્મુખ ઝીલ્યા ઘાવો મહીંથી ટપટપ છાતી ચૂતી;
કોઇનો લાડકવાયાની
આંખડી અમૃત નીતરતી.

કોઇના એ લાડકવાયાનાં લોચન લોલ બિડાયાં,
આખરની સ્મૃતિનાં બે આંસુ કપોલ પર ઠેરાયાં;
આતમ-દીપક ઓલાયા,
ઓષ્ઠનાં ગુલાબ કરમાયાં.

કોઇનાં એ લાડકડા પાસે હળવે પગ સંચરજો,
હળવે એનાં હૈયા ઊપર કર-જોડામણ કરજો;
પાસે ધૂપસળી ધરજો,
કાનમાં પ્રભુપદ ઉચરજો !

વિખરેલી એ લાડકડાની સમારજો લટ ધીરે,
એને ઓષ્ઠ-કપોલે-ભાલે ધરજો ચુંબન ધીરે;
સહુ માતા ને ભગિની રે !
ગોદ લેજો ધીરે ધીરે !

વાંકડિયા એ ઝુલ્ફાંની મગરૂબ હશે કો માતા,
એ ગાલોની સુધા પીનારા હોઠ હશે બે રાતા;
રે ! તમ ચુંબન ચોડાતાં
પામશે લાડકડો શાતા.

એ લાડકડાની પ્રતિમાનાં છાનાં પૂજન કરતી,
એની રક્ષા કાજ અહર્નિશ પ્રભુને પાયે પડતી;
ઉરની એકાંતે રડતી
વિજોગણ હશે દિનો ગણતી.

કંકાવટીએ આંસુ ઘોળી છેલ્લું તિલક કરંતા,
એને કંઠ વીંટાયા હોશે કર બે કંકણવંતા;
વસમાં વળામણાં દેતા
બાથ ભીડી બે પળ લેતાં.

એની કૂચકદમ જોતી અભિમાનભરી મલકાતી,
જોતી એની રૂધિર-છલક્તી ગજગજ પહોળી છાતી;
અધબીડ્યાં બારણિયાંથી
રડી કો હશે આંખ રાતી.

એવી કોઇ પ્રિયાનો પ્રીતમ આજ ચિતા પર પોઢે,
એકલડો ને અણબૂઝેલો અગન-પિછોડી ઓઢે;
કોઇના લાડકવાયાને
ચૂમે પાવકજ્વાલા મોઢે.

એની ભસ્માંકિત ભૂમિ પર ચણજો આરસ-ખાંભી,
એ પથ્થર પર કોતરશો નવ કોઇ કવિતા લાંબી;
લખજો: ‘ખાક પડી આંહી
કોઇના લાડકવાયાની’.

- ઝવેરચંદ મેઘાણી


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ईश्वर का वैदिक स्वरुप – ईश्वर, जीव और प्रकृति – तीनो कारण स्वयं सिद्ध और अनादि हैं JULY 1, 2015...

ईश्वर का वैदिक स्वरुप – ईश्वर, जीव और प्रकृति – तीनो कारण स्वयं सिद्ध और अनादि हैं JULY 1, 2015 RAJNEESH LEAVE A COMMENT संस्कृत भाषा में परमात्मा = परम + आत्मा तथा जीवात्मा = जीव + आत्मा दो शब्द हैं। परमात्मा शब्द का अर्थ है – सर्वश्रेष्ठ आत्मा और जीवात्मा का अर्थ है प्राणधारी आत्मा आत्मा शब्द दोनों के लिए आता है और बहुधा परम-आत्मा तथा जीव-आत्माओ का भेदभाव किये बिना समस्त जीवनतत्वो के लिए व्यवहृत किया जाता है। परमात्मा और जीवात्माओं के कार्यो में इतनी समानता है [मगर दोनों के कार्य क्षेत्र निसंदेह अत्यंत विभिन्न हैं] की प्रायः इनके सम्बन्ध के विषय में भ्रम हो जाता है और इस भ्रम के कारन दर्शनशास्त्र तथा धर्म दोनों क्षेत्रो में बाल की खाल निकाली जाती है। खासतौर पर ईश्वर को ना मानने वाले लोग मनुष्य को ही “सिद्ध” व “ईश्वर” का दर्ज देकर अपनी अल्पज्ञता के कारण ऐसा विचार लाते हैं – वैदिक ईश्वर का स्वरुप कैसा है और जीव का स्वरुप कैसा है – जब इस प्रकार की चर्चा की जाती है तब आवश्यक हो जाता है इस प्रकृति के बारे में भी कुछ जाना जाए – तो आइये – इस विषय पर कुछ विचार करे – इस कार्यरूप सृष्टि में तीन नियम बहुत ही स्पष्ट रूप से दीखते हैं : पहिला – इस सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ नियमपूर्वक, परिवर्तनशील है। दूसरा – प्रत्येक जाती के प्राणी अपनी जाती के ही अंदर उत्तम, माध्यम और निकृष्ट स्वाभाव से पैदा होते हैं। तीसरा – इस विशाल सृष्टि में जो कुछ कार्य हो रहा है वह सब नियमित, बुद्धिपूर्वक और आवश्यक है। पहिला नियम : सृष्टि नियमपूर्वक परिवर्तनशील है इसका अर्थ जो लोग सृष्टि को स्वाभाविक गुण से परिवर्तनशील मानते हैं वे गलती पर हैं क्योंकि स्वाभाव में परिवर्तन नहीं होता ऐसे लोग भूल जाते हैं की परिवर्तन नाम है अस्थिरता का और स्वाभाव में अस्थिरता नहीं होती क्योंकि उलटपलट, अस्थिर ये नैमित्तिक गुण हैं स्वाभाविक नहीं। इसलिए सृष्टि में परिवर्तन स्वाभाविक नहीं। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है की यदि प्रकृति में परिवर्तन स्वाभाविक माने तो ये अनंत परिवर्तन यानी अनंत गति माननी पड़ेगी और फिर एकसमान अनंत गति मानने से संसार में किसी भी प्रकार से ह्रासविकास संभव नहीं रहेगा किन्तु सृष्टि में बनने और बिगड़ने की निरंतर प्रक्रिया से सिद्ध होता है की सृष्टि का परिवर्तन नैमित्तिक है सवभविक नहीं, इसीलिएि इस परिवर्तनरुपी प्रधान नियम के द्वारा यह सिद्ध होता है की सृष्टि के मूल कारणों में से यह एक प्रधान कारण है जो खंड खंड, परिवर्तन शील और परमाणुरूप से विद्यमान है। परन्तु यह परमाणु चेतन और ज्ञानवान नहीं हैं इसकी बड़ी वजह है की जो भी चेतन और ज्ञानवान सत्ता होगी वो कभी दूसरे के बनाये नियमो में बंध नहीं सकती बल्कि ऐसी सत्ता अपनी ज्ञानस्वतंत्रता से निर्धारित नियमो में बाधा पहुचाती है – जहाँ तक हम देखते हैं परमाणु बड़ी ही सच्चाई से अपना काम कर रहे हैं – जिस भी जगह उनको दूसरे जड़ पदार्धो में जोड़ा गया – वहां आँख बंद करके भी कार्य कर रहे हैं जरा भी इधर उधर नहीं होते इससे ज्ञात होता है की इस सृष्टि का परिवर्तनशील कारण जो परमाणु रूप में विद्यमान है ज्ञानवान नहीं बल्कि जड़ है – इसी जड़, परिवर्तनशील और परमाणु रूप उपादान कारण को माया, प्रकृति, परमाणु मेटर आदि नामो से कहा जाता है और संसार के कारणों में से एक समझा जाता है दूसरा नियम : सभी प्राणियों के उत्तम और निकृष्ट स्वाभाव हैं। अनेक मनुष्य प्रतिभावान, सौम्य और दयावान होते हैं, अनेक मुर्ख उद्दंड और निर्दय होते हैं। इसी प्रकार अनेक गौ, घोडा आदि पशु स्वाभाव से ही सीधे होते हैं और अनेक शेर, आदि क्रोधी और दौड़दौड़कर मारने वाले होते हैं यहाँ देखने वाली बात है की ये स्वभावविरोध शारीरिक यानी भौतिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक है, जो चैतन्य बुद्धि और ज्ञान से सम्बन्ध रखता है। लेकिन ध्यान देने वाली है ये ज्ञान प्राणियों के सारे शरीर में व्याप्त नहीं है, क्योंकि यदि सारे शरीर में ये ज्ञान व्याप्त होता तो किसी का कोई अंग भंग यथा अंगुली, हाथ, पैर आदि कट जाने पर उसका ज्ञानंश कम हो जाना चाहिए लेकिन वस्तुतः ऐसा होता नहीं इसलिए यह निश्चित और निर्विवाद है की ज्ञानवाली शक्ति जो प्राणियों में वास करती है वो पुरे शरीर में व्याप्त नहीं है प्रत्युत वह एकदेशी, परिच्छिन्न और अनुरूप ही है क्योंकि सुक्षतिसूक्ष्म कृमियों में भी मौजूद है दूसरा तथ्य ये भी है की यदि पुरे शरीर में ज्ञानशक्ति मौजूद होती तो जैसे शरीर का आकर बढ़ता है वैसे उस शक्ति को भी बढ़ना पड़ता जबकि ऐसा होता नहीं और ये शक्ति परमाणुओ के संयोग से भी नहीं बनी क्योंकि ऊपर सिद्ध किया गया की ज्ञानवान तत्व, परमाणु संयुक्त होकर नहीं बन सकता और न ही ये हो सकता है की अनेक जड़ और अज्ञानी परमाणु एकत्रित होकर परस्पर संवाद ही जारी रख सकते हो। यदि कोई मनुष्य ब्रिटेन में जिस समय पर गाडी दौड़ा रहा है – तो उसी समय पूरी दुनिया में मौजूद इंसान उस गाडी और मनुष्य को नहीं देख पा रहे इसलिए प्राणियों में मौजूद ज्ञानवान शक्ति, अल्पज्ञ है, एकदेशी है, परिच्छिन्न है। इसलिए इस शक्ति को जीव, रूह और सोल के नाम से जानते हैं। इस विस्तृत सृष्टि में जो कुछ कार्य हो रहा है, वह नियमित, बुद्धिपूर्वक और आवश्यक है। सूर्य चन्द्र और समस्त ग्रह उपग्रह अपनी अपनी नियत धुरी पर नियमित रूप से भ्रमण कर रहे हैं। पृथ्वी अपनी दैनिक और वार्षिक गति के साथ अपनी नियत सीमा में घूम रही है। वर्षा, सर्दी और गर्मी नियत समय में होती है। मनुष्य और पशुपक्ष्यादि के शरीरो की बनावट वृक्षों में फूलो और फलो की उत्पत्ति, बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज का नियम और प्रत्येक जाती की आयु और भोगो की व्यवस्था आदि जितने इस सृष्टि के स्थूल सूक्ष्म व्यवहार हैं, सबमे व्यवस्था, प्रबंध और नियम पाया जाता है। नियामक के नियम का सब बड़ा चमकार तो प्रत्येक प्राणी के शरीर की वृद्धि और ह्रास में दिखलाई देता है। क्यों एक बालक नियत समय तक बढ़ता और क्यों एक जवान धीरे धीरे ह्रास की और – वृद्धावस्था की और बढ़ता जाता है इस बात का जवाब कोई नहीं दे सकता यदि कोई कहे की वृद्धि और ह्रास का कारण आहार आदि पोषक पदार्थ हैं, तो ये युक्तियुक्त और प्रामाणिक नहीं होगा क्योंकि हम रोज देखते हैं एक ही घर में एक ही परिस्थिति में और एक ही आहार व्यवहार के साथ रहते हुए भी छोटे छोटे बच्चे बढ़ते जाते हैं और जवान वृद्ध होते जाते हैं तथा वृद्ध अधिक जर्जरित होते जाते हैं। इन प्रबल और चमत्कारिक नियमो से सूचित होता है की इस सृष्टि के अंदर एक अत्यंत सूक्ष्म, सर्वव्यापक, परिपूर्ण और ज्ञानरूपा चेतनशक्ति विद्यमान है जो अनंत आकाश में फ़ैल हुए असंख्य लोकलोकान्तरो का भीतरी और बाहरी प्रबंध किये हुए हैं। ऐसा इसलिए तार्किक और प्रामाणिक है क्योंकि नियम बिना नियामक के, नियामक बिना ज्ञान के और ज्ञान बिना ज्ञानी के ठहर नहीं सकता। हम सम्पूर्ण सृष्टि में नियमपूर्वक व्यवस्था देखते हैं, इसलिए सृष्टि का यह तीसरा कारण भी सृष्टि के नियमो से ही सिद्ध होता है। इसी को परमात्मा, ईश्वर खुदा और गॉड कहते आदि अनेक नामो से पुकारते हैं हैं जिसका मुख्य नाम ओ३म है। सृष्टि के ये तीनो कारण स्वयंसिद्ध और अनादि हैं। मेरे मित्रो, ज्ञान और विज्ञान की और लौटिए, सत्य और न्याय की और लौटिए वेदो की और लौटिए…. आओ लौट चले वेदो की और।

Read more at Aryamantavya: ईश्वर का वैदिक स्वरुप – ईश्वर, जीव और प्रकृति – तीनो कारण स्वयं सिद्ध और अनादि हैं http://wp.me/p6VtLM-1Wc


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हिन्दू कैसे अपने महापुरुषों का अपमान करते है देखिये - 1⃣क्या...

हिन्दू कैसे अपने महापुरुषों का अपमान करते है देखिये - 1⃣क्या आपने कभी देखा है की सिखों के दस गुरु है उनको कभी मंचों य स्टेजों पर नाचते हुए - 2⃣किसी माई के लाल की हिम्मत नहीं की किसी भी सिख गुरु की कहीं नचवा दे । 3⃣क्यों की सिख अपने गुरुओं का आदर करते है और उनका अपमान बिलकुल भी सहन नहीं कर सकते ।। 4⃣क्या कभी किसी मुश्लिम को उनके गुरु य मोहम्मद य कोई भी उनके नजरों में उनका कोइ महापुरुष य महामानव आपने नाचता हुआ य उसका अपमान होता देखा है । 5⃣क्यों की मुश्लिम भी अपने महापुरुषों की ( उनकी नजरों में ) बेज्जती सहन नहीं कर सकते ,किसी के माई के लाल में हिम्मत नहीं है की कोइ उनके मोहम्मद य किसी और के बारे में कुछ कह दे तलवार चल जाती है । 6⃣ऐसे ही इसाई है
7⃣लेकिन हिन्दू - अपने महापुरुष श्री कृष्ण को स्टेजों पर “ राधा "के साथ ( जबकि राधा के साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं था ) नचवाने में अपनी शान समझते है ,, एक तरफ तो उनको परमात्मा मान कर पूजा करते है और दूसऱी तरफ उनको चोर , रास रचाने वाला , स्त्रियों के कपडे चुराने वाला कहने में अपनी शान समझते है ,,, ऐसे ही शिव जी को अपना परमात्मा बना कर पूजते है , और दूसरी तरफ उनको भंगेड़ी ( भांग पीने वाला ) भी कहने में अपनी शान समझते है ,,,,,, हिन्दुओं ( आर्यो ) कब तक अपने महापुरुषों का अपमान तुम अपने आप ही करते रहोगे ।………………..


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ओ३म् *🌷अण्डा―एक जहर🌷* _(1) अण्डे में कोलिस्ट्रोल की मात्रा अधिक होती है।इसका पीत-भाग कोलिस्ट्रोल...

ओ३म्

*🌷अण्डा―एक जहर🌷*

_(1) अण्डे में कोलिस्ट्रोल की मात्रा अधिक होती है।इसका पीत-भाग कोलिस्ट्रोल का बहुत बड़ा स्रोत है।यह मानव चर्म की परतों में जमा हो धमनियों को सिकुड़ा देता है।परिणामतः दिल का दौरा, लकवा, जेथोमा जैसे भयंकर रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है।"हायपर-कौलिस्टेरोलेमिया" होने पर मनुष्य उच्च रक्तचाप का रोगी बन जाता है।बच्चों के लिए तो यह बिल्कुल भी अनुकूल नहीं है।इसमें सोडियम सॉल्ट की मात्रा अधिक होती है।ब्लडप्रैशर के मरीजों के लिए जहर रुप है।अण्डे के सफेद भाग में नमक और पीले भाग में कोलिस्ट्रोल दोनों ही स्वास्थ्य हेतु घातक हैं।_

_(2) अण्डे में कार्बोहाइड्रेटस बिल्कुल नहीं है।इससे कब्ज, जोडों के दर्द जैसी बीमारियां अनायास हो जाती हैं।अण्डा कफदायक होने से शरीर के पोषक-तत्त्वों को असन्तुलित कर देता है।अण्डे में साल्मोनेला नामक बैक्टीरिया के अतिरिक्त एक नया माइक्रोव बैक्टीरिया भी पाया जाता है।यह आंतों में भयंकर रोग उत्पन्न करता है।अण्डे खाने से गठिया, गाउट जैसी वात-जनित बीमारियाँ हो जाती हैं जो बुढ़ापे में खतरनाक, पीड़ादायक मोड़ ले-लेती हैं।अण्डे में तुरन्त ऊर्जा देने वाले शुगर और स्टार्च नहीं हैं।_

_(3) पोल्ट्री-फार्म की मुर्गियों को रख-रखाव हेतु विभिन्न प्रकार की घातक दवाइयाँ दी जाती हैं, या उनका छिड़काव किया जाता है, परिणामतः वे घातक दवाइयों का बहुत सारा अंश श्वास अथवा मुँह के माध्यम से खाने के संग पेट में पहुँच जाता है।यही कारण है कि कई प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि उनके पेट में डी०डी०टी० जैसा जहर भी पाया जाता है जो खाने वालों के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होता है।जैसे गाय, बैल, भैंसों, सूअर, बकरा आदि को मांसवर्द्धक दावाएँ दी जाती हैं।पोल्ट्री-फार्मों में भी इनका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है।चूजे और गिद्ध को एण्टीबायोटिक्स की हल्की मात्रा वजन वृद्धि हेतु दी जाती है और उनका व्यापारिक शोषण किया जाता है।बुद्धिधारियो ! जरा गम्भीर चिन्तन करें।ऐसे अण्डे, मांस खाने वालों पर इसका क्या दुष्परिणाम होगा?क्या यह मनुष्य समाज पर अभिशाप सिद्ध नहीं होगा ?_

_(4) अण्डे में १३.३ प्रतिशत, हरे चने में २४ तथा मूंगफली में ३१.५ प्रतिशत और सोयाबीन में ४३.२ प्रतिशत प्रोटीन होता है।एक अण्डे से ८६.५ प्रतिशत कैलोरिज़ मिलती है जबकि गेहूं के आटे से १७६.५ प्रतिशत कैलोरिज प्राप्त होती है।अण्डे कोई कैल्शियम का स्रोत भी नहीं हैं।एक अण्डे में ३० मि०ग्रा० कैल्शियम मिलता है जो कि लगभग १५ पैसे में उपलब्ध हो जाता है, इसके विपरित ७५ ग्राम सरसों की भाजी में ३० मि०ग्रा० कैल्शियम सस्ते भाव में प्राप्त हो सकता है।दूध और अण्डे को समान मानना बहुत भारी भूल सिद्ध होगी।अण्डे में विटामिन बी-२, बी-१२, तथा कैल्शियम होते हैं।अण्डे को पकाने में या तलने में बी-१, बी-२, पच्चीस प्रतिशत तक नष्ट हो जाता है और बी-१२ भी अंशतः नष्ट हो जाता है।_

_(5) भारतीय धर्म, संस्कृति अण्डे,मांस के पक्ष में नहीं है।*अथर्ववेद ८।६।१२ में स्पष्ट है कि―"मैं उन दुष्टों को नष्ट करता हूँ जो अण्डे, मांस खाते हैं।"* अण्डे कई बार एनीमल हायपर सेंसिटिविटि (पाशविक अति संवेदनशीलता) उत्पन्न कर देते हैं।परिणामतः अण्डाहारी बर्बर आदतों से नहीं चूकता। उसकी भावनाओं में जोश ही जोश होता है , होश नहीं।अतः परिणाम बहुत भयंकर भुगतने पड़ते हैं।बाद में तो केवल पछताना ही उसके पास रह जाता है।_

_(6) अण्डा कभी शाकाहारी नहीं होता। यह भ्रामक नामकरण है कि सेये हुए अण्डे का कोई प्राणिक उद्देश्य होता है, अनिषेचित अण्डे का कोई प्राणिक उद्देश्य नहीं होता। इसे अखाद्य मानना चाहिए।_

_सच्चाई तो यह है कि ये मनुष्य के सेवन हेतु नहीं बना।यह तो सेवन करने वाले को ही अप्राकृतिक बना देता है।पश्चिम देशों में अब इसे पौष्टिक आहार की श्रेणी में नहीं रखते।वहाँ इसका प्रयोग निषेध रुप में पाया जा रहा है।यदि चिन्तन करें तो विदित होगा कि मनुष्य मूलतः ‘मस्तिष्क’ है 'पेट’ नहीं।विभिन्न अध्ययन, अनुसन्धान स्पष्ट करते हैं कि अण्डाहारी का मस्तिष्क तानाशाही, अशालीनता और अपराधीवृत्ति की और झुक जाता है।भारतीय संस्कृति और सभ्यता में हमारे धार्मिक ग्रन्थ मनुष्य को यही चेतावनी देते आए हैं कि" जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन, जैसा पीए पानी, वैसी बोले वाणी" । अर्थात् तामसिक पाशविक भोजन मानव की वृद्धि और विकास नहीं बल्कि उसके अधोपतन का कारण बनता है।_


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દુશ્મની માં ખાનદાની નું ઉત્કૃષ્ઠ ઉદાહરણ:– સત્યઘટના છે: - ગોંડલ રાજાના કુંવર, સંગ્રામજીના...

દુશ્મની માં ખાનદાની નું ઉત્કૃષ્ઠ ઉદાહરણ:–

સત્યઘટના છે: -

ગોંડલ રાજાના કુંવર, સંગ્રામજીના દિકરા, નામ એનુ પથુભા. નાની ઉંમર એમની. કોઈ કામ સબબ એમને કુંભાજીની દેરડી કેવાય છે ત્યા જવાનુ બનેલું. એટલે ૨૫-૩૦ ઘોડેસવારોની સાથે પોતે નીકળ્યા.

એમા કુકાવાવના પાદરમા પહોચ્યા. ઘોડાઓ નદિમા પાણી પીએ છે.

કુંવર (માણસોને) : હવે દેરડી કેટલુ દુર છે?

માણસો : કેમ કુંવરસાબ?

કુંવર : મને ભુખ બહુ લાગી છે.

માણસો : બાપુ, હવે દેરડી આ રહ્યુ, અહિથી ૪ માઇલ દેરડી આઘુ છે, આપણે ઘોડા ફેટવીએ એટલે હમણા આપણે ન્યા પોગી જાઈ અને ત્યા ડાયરો ભોજન માટે આપણી વાટ જોતો હશે.

કુંવર : ના, મારે અત્યારે જ જમવુ છે.

આ તો રાજાનો કુંવર એટલે બાળહઠ ને રાજહઠ બેય ભેગા થ્યા.

એટલામા કુકાવાવનો એક પટેલ ખેડુત પોતાનુ બળદગાડું લઈને નીકળ્યો ને એણે કુંવરની વાત સાંભળી એટલે આડા ફરીને રામ રામ કર્યા ને કિધુ કે, “ખમ્મા ઘણી બાપુને, આતો ગોંડલનું જ ગામ છે ને, પધારો મારા આંગણે.”

કુંવર અને માણસો પટેલની ઘરે ગ્યા.

ઘડિકમા આસન નખાઇ ગ્યા, આ બાજુ ધિંગા હાથવાળી પટલાણીયુ એ રોટલા ઘડવાના શરૂ કરી દિધા, રિંગણાના શાક તૈયાર થઈ ગ્યા, મરચાના અથાણા પીરસાણા અને પોતાની જે કુંઢિયુ બાંધેલી એની તાજી માખણ ઉતારેલી છાશું પીરસાણી.

કુંવર જમ્યા ને મોજના તોરા મંડ્યા છુટવા કે શાબાશ મારો ખેડુ, શાબાશ મારો પટેલ અને આદેશ કર્યૌ કે બોલાવો તલાટીને, ને લખો, “કે હુ કુવર પથુભા કુકાવાવમા પટેલે મને જમાડ્યો એટલે હું પટેલને ચાર સાતીની ઉગમણા પાદરની જમીન આપુ છું.” ને નિચે સહિ કરી ને ઘોડે ચડિને હાલતા થ્યા.

કુંવર ગયા પછી તલાટી જે વાણિયો હતો તે ચશ્મામાંથી મરક મરક દાંત કાઢવા લાગ્યો ને પટેલને કિધુ કે, “પટેલ, આ દસ્તાવેજને છાશમા ઘોળીને પી જાવ. આ ક્યા ગોંડલનુ ગામ છે કે કુંવર તમને જમીન આપી ને વ્યા ગ્યા.”આ તો કાઠી દરબાર જગા વાળા નુ ગામ છે.

પટેલને બિચારાને દુઃખ બહુ લાગ્યુ અને આખુ ગામ પટેલની મશ્કરી કરવા લાગ્યુ.

પટેલને ધરતી માર્ગ આપે તો સમાઈ જવા જેવુ થ્યુ. પણ એક વાત નો પોરસ છે કે કુંવરને મે જમાડ્યા.

ઉડતી ઉડતી એ વાત જેતપુર દરબાર જગાવાળાને કાને પડી.

એમણે ફરમાન કીધુ
કે -“બોલાવો પટેલને અને એને કેજો કે સાથે દસ્તાવેજ પણ લાવે.”

પટેલ બીતા-બીતા જેતપુર કચેરીમા આવે છે.

જગાવાળા : પટેલ, મે સાંભળ્યુ છે કે મારા દુશ્મન ગોંડલના કુંવર પથુભા કુકાવાવ આવ્યાતા ને તમે એને જમાડ્યા. સાચું ?

પટેલ : હા બાપુ, એમને ભુખ બહુ લાગીતી એટલે મે એને જમાડ્યા.

જગાવાળા : હમ્મ્મ્મ અને એણે તમને ચાર સાતીની જમીન લખી આપી એય સાચું ?

પટેલ : હા બાપુ એને એમ કે આ ગોંડલનુ ગામ છે એટલે આ દસ્તાવેજ લખી આપ્યો.

ત્યારે જગાવાળાએ પોતાના માણસોને કિધુ કે - તાંબાના પતરા પર આ દસ્તાવેજમા જે લખેલ છે એ લખો અને નીચે લખો કે, “મારા પટેલે મારા દુશ્મનને જમાડ્યો એટલે મારી વસ્તીએ મને ભુંડો નથી લાગવા દિધો. એટલે હું જગાવાળો, જેતપુર દરબાર, પટેલને બીજી ચાર સાતીની જમીન આપુ છુ અને આ આદેશ જ્યા સુધી સુર્યને ચાંદો તપે ત્યા સુધી મારા વંશ વારસોએ પાળવાનો છે અને જે નહિ પાળે એને ગૌહત્યાનુ પાપ છે”
એમ કહીને નીચે જગાવાળાએ સહિ કરિ નાખી,

અને એક પત્ર ગોંડલ લખ્યો કે, “સંગ્રામજીકાકા તારો કુંવર તો દેતા ભુલ્યો, કદાચ આખુ કુકાવાવ લખી દિધુ હોત ને તોય એય પટેલ ને આપી દેત.”

આ વાતની ખબર સંગ્રામસિંહજીને પડતા એને પણ પોરસના પલ્લા છુટવા માંડ્યા કે “વાહ જગાવાળા શાબાશ બાપ! દુશ્મન હોય તો આવો. જા બાપ તારે અને મારે કુકાવાવ અને બીજા ૧0 ગામનો જે કજિયો ચાલે છે
તે તને માંડિ દવ છું…!“

આનુ નામ દુશ્મન કેવાય, આને જીવતરના મુલ્ય કેવાય.
વેરથી વેર ક્યારેય શમતુ નથી એને આમ મિટાવી શકાય,
આવા અળાભીડ મર્દો આ ધરતિમા જન્મ્યા.

ધન્ય છે…

” આપણી સંસ્કૃતિ અને આપણો વારસો “


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*मधुमेह पर राजयोग का प्रयोग* *✿>>*♛ मैं एक चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ परम् पिता परमात्मा मेरे...

*मधुमेह पर राजयोग का प्रयोग*

*✿>>*♛ मैं एक चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ परम् पिता परमात्मा मेरे परम चिकित्सक है। पवित्रता, शान्ति और शक्ति की किरणें परमात्मा से उतारकर मुझ आत्मा पर पढ़ रही है। मैं आत्मा परमात्मा की शक्तिशाली किरणों से भरपूर हो रही हूँ। अब इन अद्भुत किरणों को मैं अपने शरीर के भीतर प्रवाहित कर रही हूँ। ये किरणे पेट के वरिष्ठ भाग में स्थित पैंक्रियास ग्रंथि पर पढ़ रही है अब मैं इनके अलौकिक प्रभाव को देख रही है। मेरे पैंक्रियास के अंदर बिता सेल्स जो की लगभग नष्ट हो चुके थे अब उनका निर्माण होना शुरू हो रहा है। इन नवनिर्मित बीटा सेल्स से आवश्यक मात्रा में इन्सुलिन बनता जा रहा है ..। फिर से मेरी एक एक कोशिका के भीतर ग्लूकोस बड़ी आसानी से पहुँच रहा है। मेरा इन्सुलिन रजिस्ट्रेशन भी अब खत्म हो रहा है। ग्लूकोस हर कोशिका के अंदर जा कर पर्याप्त शक्ति का संचार कर रही है। अब मैं आत्मा देख रही हूँ की कैसे मेरे रक्त में ग्लूकोस की मात्रा का स्तर सामान्य होता जा रहा है। मेरा हर अंग परमात्मिक प्रकाश से प्रभावित हो स्वस्थ होता जा रहा है। मधुमेह से ग्रस्त सभी विकृतियां दूर हो रही हैं। मेरे रक्त में वसा की मात्रा भी संतुलित हो रही है। मैं अपने शरीर को अब स्वस्थ रूप में अब देख रही हूँ, ईश्वर के शक्तिशाली प्रकम्पन से आत्मा के साथ साथ शरीर भी सतोप्रधान और पावन होता जा रहा है। अब मैं स्वयं को एवेरहेल्थी महसूस कर रही हूँ और सुखद जीवन जीने का मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है।

*अभ्यास*

रोज़ाना सुबह और शाम कम से कम 5 मिनट करें। इससे तन और मन दोनों स्वस्थ होते जा रहे हैं।


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सत्संग का महत्व नियमित सत्संग में आने वाले एक आदमी नें जब एक बार सत्संग में यह सुना कि जिसने जैसे...

सत्संग का महत्व

नियमित सत्संग में आने वाले एक
आदमी नें जब एक बार सत्संग में
यह सुना कि जिसने जैसे कर्म किये
हैं उसे अपने कर्मो अनुसार वैसे ही
फल भी भोगने पड़ेंगे । यह सुनकर
उसे बहुत आश्चर्य हुआ अपनी आशंका
का समाधान करने हेतु उसने सतसंग
करने वाले संत जी से पूछा….. अगर
कर्मों का फल भोगना ही पड़ेंगा तो
फिर सत्संग में आने का किया फायदा
है…..?
संत जी नें मुसकुरा कर उसे देखा
और एक ईंट की तरफ इशारा
कर के कहा की तुम इस ईंट को छत
पर ले जा कर मेरे सर पर फेंक दो ।
यह सुनकर वह आदमी बोला संत जी
इससे तो आपको चोट लगेगी दर्द होगा ।
मैं यह नहीं कर सकता…..
संत ने कहा….अच्छा, फिर उसे उसी
ईंट के भार के बराबर का रुई का
गट्ठा बांध कर दिया और कहा अब
इसे ले जाकर मेरे सिर पे फैंकने से
भी कया मुझे चोट लगेगी….??
वह बोला नहीं…..
संत ने कहा…..
बेटा इसी तरह सत्संग में आने से
इन्सान को अपने कर्मो का बोझ
हल्का लगने लगता है और वह हर
दुःख तकलीफ को परमात्मा की
दया समझ कर बड़े प्यार से सह
लेता है ।
सत्संग में आने से इन्सान का मन
निरमल होता है और वह मोह माया
के चक्कर में होने वाले पापों से भी
बचा रहता है और अपने सतगुरु की
मौज में रहता हुआ एक दिन अपने
निज घर सतलोक पहुँच जाता है,
जहाँ केवल सुख ही सुख है….
🙏🙏


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Saturday, January 21, 2017

-मकर संक्रान्ति मंगलमय हो - जितने समय में पृथिवी सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करती है उतने समय को...

-मकर संक्रान्ति मंगलमय हो -
जितने समय में पृथिवी सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करती है उतने समय को “सौर वर्ष ” कहते हैं । सौर वर्ष में पृथिवी अपनी यह परिक्रमा आकाश में जिस परिधि पर रहकर करती है, उसे “क्रान्तिवृत्त” कहते हैं।इस क्रान्तिवृत्त के १२ भाग कल्पित किये गये हैं और उन १२ भागों के नाम उन-उन स्थानों पर विद्यमान आकाशस्थ नक्षत्रपुञ्जों से मिलकर बनी हुयी आकृति से मिलते जुलते आकार वाले पदार्थों के नाम पर रख लिये गये हैं जो कि इस प्रकार हैं -१मेष , २वृष , ३मिथुन , ४कर्क , ५सिंह , ६कन्या , ७तुला , ८वृश्चिक , ९धनु , १०मकर , ११कुम्भ , १२मीन । ये प्रत्येक भाग वा आकृति"राशि" कहलाते हैं। जब एक राशि से दूसरी राशि में पृथिवी संक्रमण करती है तब उसको “ संक्रान्ति” कहते हैं। पृथिवी के इस संक्रमण को लोक में सूर्य का संक्रमण कहने लगे हैं।पृथिवी के इस संक्रमण में सूर्य ६ महीने क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर उदय होता है तथा ६ मास दक्षिण की ओर निकलता है ।ये ६ -६ महीने की अवधियां उत्तरायण व दक्षिणायन कहलाती हैं। सूर्य की मकरराशि की संक्रान्ति से उत्तरायण व कर्क राशि की संक्रान्ति से दक्षिणायन आरम्भ हो जाता है।
सूर्य के प्रकाशाधिक्य के कारण उत्तरायण को महत्त्व दिया गया है इस कारण उत्तरायण के आरम्भ दिवस को मकर संक्रान्ति पर्व मनाया जाता है। यद्यपि इस समय उत्तरायण परिवर्त्तन , प्रचलन में आ रही मकर संक्रान्ति के दिन नहीं होता है। अयन चलन की गति बराबर पिछली ओर को होते रहने के कारण जो लगभग २२ - २३ दिन का अन्तर आ गया है उसे ठीक कर लेना चाहिये।
जिस प्रकार बाहर के जगत् में सूर्य का उत्तरायण दृष्टिगोचर होता है उसी प्रकार हमारे अभ्यन्तरीण आध्यात्मिक जगत् में भी उत्तरायण हुआ करता है । उत्तरायण कहते हैं ऊपर की ओर गति। गीता में कहा है - “ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था:” अर्थात् सत्त्वगुण में रहने वाले मनुष्य ऊपर जाते हैं। यह मनुष्य के लिये ऊपर को जाना, ज्ञान के प्रकाश के द्वारा सम्भव है। सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक है, इसलिये यह मनुष्य को ज्ञान के सम्बन्ध से जोड़ता है। ज्ञानस्यैव पराकाष्ठा वैराग्यम् ज्ञान की ही पराकाष्ठा को वैराग्य कहा गया है। बस इस वैराग्य रूप ज्ञान के होने पर उन्नति अर्थात् मोक्ष मार्ग की ओर गति का होना आरम्भ हो जाता है।
महाभारत काल के इतिहास पर दृष्टिपात करके देखो कि मृत्यञ्जयी ब्रह्मचारी भीष्म पितामह जब शरशय्या पर आसीन हो गये थे तब उन्होंने कहा था कि जब तक सूर्य उत्तरायण में नहीं जायेगा और सूर्य ही नहीं अपितु वस्तुतः जब तक मेरे जीवन का उत्तरायण काल नहीं आता है तब तक मैं देहत्याग नहीं करूंगा। इसी प्रकार हमें भी तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान आदि योग साधनों के द्वारा अपने जीवन के उत्तरायण का निर्माण करना चाहिये, यही प्रेरणा ग्रहण करना मकर संक्रान्ति पर्व की पर्वता है। जीवन को उत्तर अर्थात् श्रेष्ठ बनाने पर ही देहावसान होने के पश्चात् जीव को श्रेष्ठ नवजीवन रूप सद्गति प्राप्त होती है। परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि मकर संक्रान्ति पर्व आप और हम सबके जीवन के उत्तरायण के लिये प्रेरक बनता हुआ मंगलमय हो। लेखक-विष्णुमित्र वेदार्थी ९४१२११७९६५


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Tuesday, January 10, 2017

*महर्षि दयानन्द* लिखित ग्रन्थ *सत्यार्थ प्रकाश* ने पौराणिक जगत में हलचल मचा दी थी, महर्षि की मृत्यु...

*महर्षि दयानन्द* लिखित ग्रन्थ *सत्यार्थ प्रकाश* ने पौराणिक जगत में हलचल मचा दी थी, महर्षि की मृत्यु के उपरान्त, पोप कालूराम शास्त्री ने *आर्यसमाज की मौत* नामक पुस्तक लिखी, जिसका उत्तर शास्त्रार्थ महारथी *मनसाराम वैदिक तोप* ने इस पुस्तक *पौराणिक पोल प्रकाश* यहाँ से download कीजिये, कुल 580 पृष्ठों में, 4 भागों में विभाजित:

*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-1:* [21 MB]
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*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-2:* [20 MB]
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*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-3:* [34 MB]
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*पौराणिक पोल प्रकाश, भाग-4:* [34 MB]
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Monday, January 2, 2017

आर्यसमाज एक विशुद्ध रूप से गैर राजनैतिक सामाजिक संगठन है जिसकी स्थापना सन् १८७५ मे मानकजी एक पारसी...

आर्यसमाज एक विशुद्ध रूप से गैर राजनैतिक सामाजिक संगठन है जिसकी स्थापना सन् १८७५ मे मानकजी एक पारसी सज्जन के बाग मे हुई और आर्यसमाज के लिए ५००० /- का पहला योगदान मुस्लिम संप्रदाय के मतावलम्बी श्री अल्लाहरखाँ ने दिया था | अनेक पादरी उनके सहयोगी थे | अमर शहीद भगतसिंह के दादा श्री अजीत सिंह सिख संप्रदाय से थे किन्तु महर्षि दयानंद के विचारो से प्रेरित होकर वैदिक धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा रखने लगे | उन्होंने आर्यसमाज के मंत्री के स्वरूप मे पंजाब मे आर्यसमाज के विस्तार हेतु सक्रिय भुमीका निभाई |
लाला लाजपत राय, शहीद चंद्रशेखर आजाद, उधम सिंह, करतार सिंह सराभा, रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, राजेन्द्र लोहड़ी, अश्फाक उल्ला खाँ, शहीद-ए-आजम सरदार भगतसिंह, क्रांतिगुरू श्याम जी कृष्ण वर्मा, भगवती चरण वोहरा, दुर्गा भाभी, स्वामी श्रद्धानंद, वीर सावरकर, मदनलाल धींग्रा को कौन नही जानता? इन सभी ने आर्यसमाज के ही विचारो से प्रेरित होकर माँ भारती को परतंत्रता की बेडीयो से मुक्त कराने हेतु अपणे प्राणो की आहुती दी. |
मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध, परोपकार के लिए सदैव तत्पर आर्यसमाज में आपका स्वागत है |
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र जी एवं योगीराज श्रीकृष्ण चंद्र जी आदी भारतीय संस्कृति के महान प्रेरणास्पद रहे है | महाभारत तथा रामायण इत्यादी ग्रन्थ मनुष्य रचित सच्चे ऐतिहासिक ग्रंथ है तथा मनुष्यों के लिए शिक्षाप्रद है | आर्यसमाज मानता है के ईश्वर एक है जो ईस ब्रम्हांड का रचियता है, वही कर्ता धर्ता है | वह सर्वव्यापक है, निराकार है | वह मनुष्यो के कर्मो का फल देता है (बुरे का बुरा और अच्छे का अच्छा) आर्यसमाज तर्कपूर्ण वैज्ञानिक मान्यताओं को महत्व देता है | आर्यसमाज मानता है के “वेद” ही ईश्वरीय ज्ञान है और सभी ज्ञान का भंडार है | सभी सत्य विद्याओं का पुस्तक है | आर्य समाज शाकाहार को मनुष्य का भोजन मानता है तथा मांसाहार, शराब, सिगरेट आदी व्यसनों को धर्म के विरुद्ध मानता है और इसका कडा विरोध करता है |
आर्य समाज छुआछूत तथा जाति-पाति को मनुष्य के सामाजिक उन्नति में बाधक मानता है | आर्यसमाज संस्कृत को भाषाओं की जननी मानता है तथा मातृभाषा को प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक मानता है | मानव के संपुर्ण जिवन के लिए आर्यसमाज आश्रम व्यवस्था का पुरस्कार करते हुवे (ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) को समाज की उन्नति का आवश्यक साधक मानता है | आर्यसमाज मानता है के कर्म के आधार पर ही वर्ण बने है (ब्राम्हण, क्षत्रीय, वैश्य आदी)
.
आर्य समाज का विशालकाय, विश्वव्यापी संगठन निम्न स्वरूप कार्यरत है..
.
👉लगभग १०००० आर्यसमाज मंदिर विश्व भर मे स्थापित है
👉लगभग २५०० विज्ञालयो एवं महाविद्यालयों का संचालन जिसमे (डीएवी) यह प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्था भी सम्मिलित है | सरकार के बाद संभवतः यह सब से बडी आर्यसमाज की शैक्षणिक शृंखला है |
👉लगभग ६०० गुरुकुलो (आवासिय) शिक्षण संस्थानों का संचालन |
👉१०,००० से अधिक अनाथ बच्चों का अनाथालयो द्वारा पालन पोषण |
👉२५० से लगभग ५००० लघु स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन द्वारा मनुष्य मात्र की सेवा |
👉आडम्बर और जातिआधारीत बन्धनो से मुक्त हजारों विवाहों का प्रतिवर्ष आयोजन
👉नौजवानों के शारिरिक विकास के लिए आर्य वीर दल द्वारा हजारो व्यायाम शाला का संचालन तथा नैतिक व शारीरिक शिक्षा के लिए हजारो आवासीय निःशुल्क शिबीरो का प्रतिवर्ष आयोजन
👉महिलाओं के लिए लघु उद्योग, वानप्रस्थ आश्रम, संन्यास आश्रम का संचालन
आर्य समाज का विस्तार विश्व के लगभग हर कोने मे हुआ है
१ भारत
२ कनाडा
३ केन्या
४ फ्रांन्स
५ युगाण्डा
६ गयाना
७ त्रीनीडाड
८ सूरीनाम
९ टार्मिनीया
१० नेपाल
११ म्यांमार
१२ बांग्लादेश
१३ सिंगापुर
१४ अमेरिका
१५ इंग्लैंड
१६ मारीशस
१७ पाकिस्तान
१८ हाँलैड
१९ थाईलैंड
२० न्यूजीलैण्ड
२१ आँस्ट्रेलिया
२२ फीजी
.
जातिवाद विहीन समाज की स्थापना करना चाहते हो?
अंधविश्वास को दुर करना चाहते हो?
पाखण्ड से समाज को बचाना चाहते हो?
आर्यसमाज आपको आमंत्रित करता है |
अपने निकट के आर्यसमाज से आज ही संबंन्ध स्थापित करे |
.
महाराष्ट्र आर्य प्रतिनिधी सभा
आर्य समाज परली बैजनाथ, जिला बीड, महाराष्ट्र - ४३१५१५
. जगदाले रोहित आर्य
आर्यसमाज, परभणी, महाराष्ट्र ४३१ ४०१.
मो ०९९६०९८३९९१.


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Wednesday, December 28, 2016

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते...

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।गीता (2/20)
शरीर में 6 विकार होते हैं – उत्पन्न होना,सत्तावाला दीखना,परिवर्तन होना,वृद्धि होना,घटना और नष्ट होना।आत्मा इन विकारों से मुक्त है। यह सनातन है।यह कभी मृत्यु को आलिंगन नहीं करती।जिसका जन्म होता है,उसी की मृत्यु अवश्यंभावी है।आत्मा में संयोग एवं वियोग नहीं होते।
आत्मा स्वतःसिद्ध निर्विकार है।इसकी सत्ता का आरम्भ और अन्त नहीं होता।इसे जन्मरहित कहते हैं।इसका अपक्षय कभी भी नहीं होता।शरीर कुछ आयु पश्चात् घटने लगता है,शक्ति क्षीण होने लगती है,इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं।लेकिन नित्य –तत्त्व आत्मा में किन्चिन्मात्र भी कमी नहीं आती।
आत्मा अनादि है।इस नित्य – तत्त्व में कोई वृद्धि भी नहीं होती।शरीर नश्वर है,जबकि आत्मा अविनाशी है।
शरीर परिवर्तनशील और विकारी होने के कारण आत्मा का अंग नहीं है।
ओम शान्ति


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Wednesday, December 21, 2016

हर व्यक्ति में ईश्वर को देखें जिसकी भी आये याद, हर व्यक्ति से प्रेम करें नहीं कोई फरियाद / ईश्वर को...

हर व्यक्ति में ईश्वर को देखें जिसकी भी आये याद, हर व्यक्ति से प्रेम करें नहीं कोई फरियाद / ईश्वर को ही याद करते हुए कीजिए सब काज ,वही सबका मित्र है वही सबका नाथ //🕉🕉🕉⛳⛳🕉🕉🕉


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Sunday, December 18, 2016

सत्यार्थ प्रकाश ने बदला जीवन || एक किताब जो बदल देगी जीवन! || 1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला...

सत्यार्थ प्रकाश ने बदला जीवन
|| एक किताब जो बदल देगी जीवन! ||
1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला क्रांतिकारी मंगल पांडे स्वामी दयानंद का शिष्य था। मंगल पांडे को चर्बी वाले कारतूस प्रयोग करने के कारण पानी न पिलाने वाले स्वामी दयानंद ही थे। प्रमाण: महान स्वतंत्रता सेनानी आचार्य दीपांकर की पुस्तक पढे: 1857 की क्रांति और मेरठ
2. सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने मरने से पहले गीता और सत्यार्थ प्रकाश के दर्शन किए, जब जेलर ने पूछा इन किताब में क्या है, उसने बताया, गीता मुझे दोबारा जन्म लेने की प्रेरणा देती है और सत्यार्थ प्रकाश स्वदेशी राज्य की प्राप्ति का मार्ग सुझाती है। इसलिए मैं जन्म लेकर दोबारा आउंगा और आजादी प्राप्त करूंगा।
प्रमाण: खुदीराम की जीवनी तेजपाल आर्य की लिखी पढ़े।
और देश के सबसे वृद्ध क्रांतिकारी लाला लाजपत राय पर जब लाठियां बरस रही थी, उनके हाथ में तब भी सत्यार्थ प्रकाश था।
3. पं. मदनमोहन मालवीय जी ने आर्यसमाज का यहां तक विरोध किया कि सनातन धर्म सभा तक बना डाली, लेकिन जब मरने लगे तो काशी के सब पंडित उनके दर्शन करने आए और बोले, महामना जी हमारा मार्गदर्शन अब कौन करेगा? तो मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें सत्यार्थप्रकाश देते हुए कहा, ‘‘सत्यार्थ प्रकाश आपका मार्गदर्शन करेगा।’’
प्रमाण: घोर पौराणिक लेखक अवधेश जी की पुस्तक महामना मालवीय पढ़े, जो हिन्द पॉकेट बुक्स से छपी है।
4. सत्यार्थप्रकाश पढकर एक तांगा चलाने वाला दुनिया में मशालों का शहंशाह बन गया: एमडीएच मशाले और सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर एक पिंक्चर लगानेवाला हीरो ग्रुप का अध्यक्ष बन गया: ओमप्रकाश मूंजाल
5. सत्यार्थ प्रकाश पढकर होमी भाभा ने भारत में परमाणु युग की शुरूआत की और डॉक्टर कलाम ने गीता के साथ-साथ सत्यार्थप्रकाश भी अनेक बार पढा है।
गॉड पार्टिकल और हिग्स बोसोन की खोज के कारण जिन विदेशियों को नोबेल पुरस्कार मिला, जानते हो मेरे पास 1966 की एक हिन्दी पत्रिका नवनीत है, उसमें ये सिद्धांत तब के ही लिखे हैं और वह लेख लिखा हुआ है सत्येंद्रनाथ बोस का, जो आर्य समाज के सदस्य थे और वैज्ञानिक भी, अब इतने दिन बाद पुरस्कार कोई और ले गया। चलो फिर भी विज्ञान में न सही अभी समाज सेवा में कैलासजी को नोबेल मिला, वे भी सत्यार्थ प्रकाश पढने वाले ही हैं और जनज्ञान प्रकाशन की पंडिता राकेश रानी के दामाद हैं। जनज्ञान प्रकाशन ने कभी सबसे सस्ते वेद प्रकाशित किए थे।
6. सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर फीजी, गुयाना, मोरीशस में कई व्यक्ति राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन गए।
7. सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने वाले लाल बहादुर शास्त्री और चौधरी चरण सिंह देश के सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री कहलाए। चरणसिंह की राजनीति कैसी भी रही हो, लेकिन जमींदारी उन्मूलन के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। नेहरूजी सहकारिता के नाम पर हिन्दुस्तान की सारी जमीन रूस को देने वाले थे, ऐसे ही जैसे उन्होंने आजाद भारत में माउंटबेटन को गवर्नर बना दिया। यदि सत्यार्थप्रकाश पढने वाले चरणसिंह न होते तो आज हमारे किसानो के आका रूस के लोग होते और देश रूस का गुलाम होता।
प्रमाण: कमलेश्वर की इंदिरा की जीवनी अंतिम सफर (संपूर्ण मूल संस्करण, क्योंकि यह संक्षिप्त भी है) पुस्तक पढे, कमलेश्वर इंदिरा जी के चहेते थेे, उनकी मौत पर दूरदर्शन से कमेंटरी उन्होंने ही की थी।
8. सत्यार्थप्रकाश जिसने भी पढा, वह शेर बन गया, रामप्रसाद बिस्लिम, श्याम कृष्णवर्मा, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉक्टर हेडेगेवार के पिताश्री बलिराम पंत हेडगेवार जो आर्य समाज के पुरोहित थे आदि और आज के युग में भी शेर ही होते हैं। सुनो कहानी: सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर साहित्यकार तेजपाल सिंह धामा ने भारत माता का नग्न चित्र बनानेवाले एमएफ हुसैन को 15 वर्ष पहले हैदराबाद में पत्रकार सम्मेलन में सबके सामने जोरदार चांटा जडा, अपमानित होकर बेचारे हुसैन देश ही छोड गए और हैदराबाद जैसे मुस्लिम शहर में रंगीला रसूल का पुनः प्रकाशन भी किया और सौ से अधिक पुस्तके आर्य समाज से संबंधित लिखी।
9. सत्यार्थ प्रकाश पर 2008 में प्रतिबंध के लिए जब भारत भर के मुल्ला-मौलवी एकत्र हुए और अदालत में पहुंचे तो फैसला सुनाने वाले जज ने न केवल सत्यार्थ प्रकाश के पक्ष में फैसला दिया वरन स्वयं आर्य समाजी हो गया और मुसलमानो का एक मुस्लिम वकील भी आर्य समाजी बन गया, बेचारे ने भूल से सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन किया था ताकि गलत तथ्य निकाल सके। आर्यसमाज की ओर से यह मुकदमा विमल वधावनजी ने लडा था, विमलजी भी सत्यार्थ प्रकाश पढनेवाले ही हैं।
10. सत्यार्थप्रकाश पढकर ही मुंशी प्रेमचंद भारत के सबसे लोकप्रिय लेखक बने, उनकी धर्मपत्नी ने ही ऐसा लिखा है।
सत्यार्थ प्रकाश से प्रेरणा लो और वेदो की ओर लोटो!


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Saturday, December 17, 2016

🕉🙏 ओउम् नमस्ते जी 🕉🙏 🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🕉🙏 दिनांक – 18 दिसम्बर 2016 दिन – रविवार तिथि...

🕉🙏 ओउम् नमस्ते जी 🕉🙏
🕉🙏 आपका दिन शुभ हो 🕉🙏

दिनांक – 18 दिसम्बर 2016
दिन – रविवार
तिथि – पंचमी
नक्षत्र– आश्लेषा
पक्ष– कृष्ण
माह – पौष
ऋतु – हेमन्त
सूर्य – दक्षिणायन
सृष्टि संवत् – 1, 96, 08, 53, 117
कलयुगाब्द – 5118
विक्रम संवत् – 2073
शक संवत् – 1939
दयानंदाब्द – 193

🌷 जो धर्म को त्यागता है , धर्म उसे त्याग देता है ।
🌷 जो समय नष्ट करता है , समय उसे नष्ट कर देता है ।
🌷 जो धर्म का पालन करता है , धर्म उसका पालन करता है ।
🌷 जो ईशवर के आश्रित होकर अपने कर्तव्य का पालन करता है , ईशवर उसका पालन करता है ।
🌷 जो अपनी आत्मा जैसी दुसरे की आत्मा को समझता है , वह किसी से बैरभाव नही रख सकता ।

🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🍃🌷🌷🍃🌷🍃

🌷 यथोद्वरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति ।
तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिन : ।। ( मनु स्मृति )

🌷 अर्थ :- जैसे धान से चावल निकालने वाला छिलके को अलग कर चावलों की रक्षा करता है ।चावलों को टूटने नही देता । वैसे ही राजा रिश्वतखोरों , अन्यायकारियों , चोर बाजारी करने वालों , डाकुओं , चोरों और बलात्कारियों को मारे और बाकी प्रजा की रक्षा करें ।

🌷🍃🌷🍃 ओउम् 🌷🍃🌷🍃 सुदिनम 🌷🍃🌷🍃 सुप्रभातम


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Friday, December 16, 2016

तेरे गिरने में, तेरी हार नहीं । तू आदमी है, अवतार नहीं ।। गिर, उठ, चल, दौड, फिर...

तेरे गिरने में, तेरी हार नहीं ।
तू आदमी है, अवतार नहीं ।।
गिर, उठ, चल, दौड, फिर भाग,
क्योंकि
“जीत” संक्षिप्त है इसका कोई सार नहीं


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Wednesday, December 14, 2016

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷ॐ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाआप्नुवन् पूर्वमर्शत्| तद्धावतो अन्यानत्येति...

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷ॐ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाआप्नुवन् पूर्वमर्शत्| तद्धावतो अन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ||~~न्यायदर्शन~यजुर्वेद~४०~४~~पद्यानुवाद~~~~~अद्वितीय निश्चल अकम्पन्, मन से तीव्र है वेगवान| पहले से व्यापक वह ठहरा, देख न पाये अविद्वान्| सब जीवों को धारण कर, सबको नियमों में चलाने वाला| अंतर्यामी घट घट वासी, खुद ही खुद से मिलाने वाला|| आओ विमल प्रशांत बना मन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रभु को ध्यावें| अतुलनीय उस परमेश्वर के, अमृत मोक्षानंद को पावें||👏


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Tuesday, December 13, 2016

सब कार्य केवल हमारे पुरुषार्थ से सिद्ध नहीं होते । उनकी सिद्धि में ईश्वर की कृपा भी होती है। परंतु...

सब कार्य केवल हमारे पुरुषार्थ से सिद्ध नहीं होते । उनकी सिद्धि में ईश्वर की कृपा भी होती है। परंतु अपना पुरुषार्थ छोडना नहीं चाहिए।


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"ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।"

“ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।”

- ईश्वर कभी झूठ नहीं बोलता। ईश्वर की वाणी वेदों को पढें, और भटकने से बचें। सत्य को जानें, सुख से जीएँ।
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हिम्मत करके पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..आर्य जयवीर 9416874412 ना तो जनवरी साल का पहला मास है...

हिम्मत करके पढिऐ फिर HAPPY NEW YEAR मना लेना ..आर्य जयवीर 9416874412
ना तो जनवरी साल का पहला मास है और ना ही 1 जनवरी पहला दिन ..
जो आज तक जनवरी को पहला महीना मानते आए है वो जरा इस बात पर विचार करिए ..
सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है .. ये क्रम से 9वाँ,10वाँ,11वां और
बारहवाँ महीना है .. हिन्दी में सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है, इसे अग्रेज़ी में sept(सेप्ट) तथा oct(ओक्ट) कहा जाता है .. इसी से september तथा October बना ..
नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के “नव” को ले लिया गया है तथा दस अंग्रेज़ी में “Dec” बन जाता है जिससे
December बन गया ..
ऐसा इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था। इसका एक प्रमाण और है ..
जरा विचार करिए कि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है????
इसका उत्तर ये है की “X” रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना .. चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया ..
इन सब बातों से ये निष्कर्ष निकलता है
की या तो अंग्रेज़ हमारे पंचांग के अनुसार ही चलते थे या तो उनका 12 के बजाय 10 महीना ही हुआ करता था ..
साल को 365 के बजाय 305 दिन
का रखना तो बहुत बड़ी मूर्खता है तो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1 जनवरी को माना लें पर उनका नया बही-खाता 1 अप्रैल से शुरू होता है ..
लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू..
भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था।
इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़
अपना तारीख या दिन 12 बजे
रात से बदल देते है .. दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है तो 12 बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है ??
तुक बनता है भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है, सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त की बेला कही जाती है और यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है.. यानि की करीब 5-5.30 के आस-पास और
इस समय इंग्लैंड में समय 12 बजे के आस-पास का होता है।
चूंकि वो भारतीयों के प्रभाव में थे इसलिए वो अपना दिन भी भारतीयों के दिन से मिलाकर रखना चाहते थे ..
इसलिए उन लोगों ने रात के 12 बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया ..
जरा सोचिए वो लोग अब तक हमारे अधीन हैं, हमारा अनुसरण करते हैं,
और हम राजा होकर भी खुद अपने अनुचर का, अपने अनुसरणकर्ता का या सीधे-सीधी कहूँ तो अपने दास का ही हम दास बनने को बेताब हैं..
कितनी बड़ी विडम्बना है ये .. मैं ये नहीं कहूँगा कि आप आज 31 दिसंबर को रात के 12 बजने का बेसब्री से इंतजार ना करिए या 12 बजे नए साल की खुशी में दारू मत पीजिए या खस्सी-मुर्गा मत काटिए। मैं बस ये कहूँगा कि देखिए खुद को आप, पहचानिए अपने आपको ..
हम भारतीय गुरु हैं, सम्राट हैं किसी का अनुसरी नही करते है .. अंग्रेजों का दिया हुआ नया साल हमें नहीं चाहिये, जब सारे त्याहोर भारतीय संस्कृति के रीती रिवाजों के अनुसार ही मानते हैं तो नया साल क्यों नहीं? जय आर्य जय आर्यव्रत🙏🙏


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Sunday, October 30, 2016

मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin qasim): 7वीं सदी के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत के हाथ से...

मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin qasim):

7वीं सदी के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत के हाथ से जाता रहा। भारत में इस्लामिक शासन का विस्तार 7वीं शताब्दी के अंत में मोहम्मद बिन कासिम के सिन्ध पर आक्रमण और बाद के मुस्लिम शासकों द्वारा हुआ। लगभग 712 में इराकी शासक अल हज्जाज के भतीजे एवं दामाद मुहम्मद बिन कासिम ने 17 वर्ष की अवस्था में सिन्ध और बूच पर के अभियान का सफल नेतृत्व किया।

इस्लामिक खलीफाओं ने सिन्ध फतह के लिए कई अभियान चलाए। 10 हजार सैनिकों का एक दल ऊंट-घोड़ों के साथ सिन्ध पर आक्रमण करने के लिए भेजा गया। सिन्ध पर ईस्वी सन् 638 से 711 ई. तक के 74 वर्षों के काल में 9 खलीफाओं ने 15 बार आक्रमण किया। 15वें आक्रमण का नेतृत्व मोहम्मद बिन कासिम ने किया।

मुहम्मद बिन कासिम अत्यंत ही क्रूर यौद्धा था। सिंध के दीवान गुन्दुमल की बेटी ने सर कटवाना स्वीकर किया, पर मीर कासिम की पत्नी बनना नहीं। इसी तरह वहां के राजा दाहिर (679ईस्वी में राजा बने)और उनकी पत्नियों और पुत्रियों ने भी अपनी मातृभूमि और अस्मिता की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी। सिंध देश के सभी राजाओं की कहानियां बहुत ही मार्मिक और दुखदायी हैं। आज सिंध देश पाकिस्तान का एक प्रांत बनकर रह गया है। राजा दाहिर अकेले ही अरब और ईरान के दरिंदों से लड़ते रहे। उनका साथ किसी ने नहीं दिया बल्कि कुछ लोगों ने उनके साथ गद्दारी की।


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રક્ત ટપકતી સો સો ઝોળી સમરાંગણથી આવે, કેસરવરણી સમરસેવિકા કોમલ સેજ બિછાવે; ઘાયલ મરતાં મરતાં રે! માતની...

રક્ત ટપકતી સો સો ઝોળી સમરાંગણથી આવે,
કેસરવરણી સમરસેવિકા કોમલ સેજ બિછાવે;
ઘાયલ મરતાં મરતાં રે!
માતની આઝાદી ગાવે.

કો’ની વનિતા, કો’ની માતા, ભગિનીઓ ટોળે વળતી,
શોણિતભીના પતિ-સુત-વીરની રણશૈયા પર લળતી,
મુખથી ખમા ખમા કરતી
માથે કર મીઠો ધરતી.

થોકે થોકે લોક ઊમટતા રણજોધ્ધા જોવાને,
શાહબાશીના શબદ બોલતા પ્રત્યેકની પિછાને;
નિજ ગૌરવ કેરે ગાને
જખ્મી જન જાગે અભિમાને.

સહુ સૈનિકનાં વહાલાં જનનો મળિયો જ્યાં સુખમેળો,
છેવાડો ને એક્લવાયો અબોલ એક સૂતેલો;
અણપૂછયો અણપ્રીછેલો
કોઇનો અજાણ લાડીલો.

એનું શિર ખોળામાં લેવા કોઇ જનેતા ના’વી;
એને સીંચણ તેલ-કચોળાં નવ કોઇ બહેની લાવી;
કોઇના લાડકવાયાની
ન કોઇએ ખબર પૂછાવી.

ભાલે એને બચીઓ ભરતી લટો સુંવાળી સૂતી,
સન્મુખ ઝીલ્યા ઘાવો મહીંથી ટપટપ છાતી ચૂતી;
કોઇનો લાડકવાયાની
આંખડી અમૃત નીતરતી.

કોઇના એ લાડકવાયાનાં લોચન લોલ બિડાયાં,
આખરની સ્મૃતિનાં બે આંસુ કપોલ પર ઠેરાયાં;
આતમ-દીપક ઓલાયા,
ઓષ્ઠનાં ગુલાબ કરમાયાં.

કોઇનાં એ લાડકડા પાસે હળવે પગ સંચરજો,
હળવે એનાં હૈયા ઊપર કર-જોડામણ કરજો;
પાસે ધૂપસળી ધરજો,
કાનમાં પ્રભુપદ ઉચરજો !

વિખરેલી એ લાડકડાની સમારજો લટ ધીરે,
એને ઓષ્ઠ-કપોલે-ભાલે ધરજો ચુંબન ધીરે;
સહુ માતા ને ભગિની રે !
ગોદ લેજો ધીરે ધીરે !

વાંકડિયા એ ઝુલ્ફાંની મગરૂબ હશે કો માતા,
એ ગાલોની સુધા પીનારા હોઠ હશે બે રાતા;
રે ! તમ ચુંબન ચોડાતાં
પામશે લાડકડો શાતા.

એ લાડકડાની પ્રતિમાનાં છાનાં પૂજન કરતી,
એની રક્ષા કાજ અહર્નિશ પ્રભુને પાયે પડતી;
ઉરની એકાંતે રડતી
વિજોગણ હશે દિનો ગણતી.

કંકાવટીએ આંસુ ઘોળી છેલ્લું તિલક કરંતા,
એને કંઠ વીંટાયા હોશે કર બે કંકણવંતા;
વસમાં વળામણાં દેતા
બાથ ભીડી બે પળ લેતાં.

એની કૂચકદમ જોતી અભિમાનભરી મલકાતી,
જોતી એની રૂધિર-છલક્તી ગજગજ પહોળી છાતી;
અધબીડ્યાં બારણિયાંથી
રડી કો હશે આંખ રાતી.

એવી કોઇ પ્રિયાનો પ્રીતમ આજ ચિતા પર પોઢે,
એકલડો ને અણબૂઝેલો અગન-પિછોડી ઓઢે;
કોઇના લાડકવાયાને
ચૂમે પાવકજ્વાલા મોઢે.

એની ભસ્માંકિત ભૂમિ પર ચણજો આરસ-ખાંભી,
એ પથ્થર પર કોતરશો નવ કોઇ કવિતા લાંબી;
લખજો: ‘ખાક પડી આંહી
કોઇના લાડકવાયાની’.

- ઝવેરચંદ મેઘાણી


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Friday, September 30, 2016

ईश्वर का वैदिक स्वरुप – ईश्वर, जीव और प्रकृति – तीनो कारण स्वयं सिद्ध और अनादि हैं JULY 1, 2015...

ईश्वर का वैदिक स्वरुप – ईश्वर, जीव और प्रकृति – तीनो कारण स्वयं सिद्ध और अनादि हैं JULY 1, 2015 RAJNEESH LEAVE A COMMENT संस्कृत भाषा में परमात्मा = परम + आत्मा तथा जीवात्मा = जीव + आत्मा दो शब्द हैं। परमात्मा शब्द का अर्थ है – सर्वश्रेष्ठ आत्मा और जीवात्मा का अर्थ है प्राणधारी आत्मा आत्मा शब्द दोनों के लिए आता है और बहुधा परम-आत्मा तथा जीव-आत्माओ का भेदभाव किये बिना समस्त जीवनतत्वो के लिए व्यवहृत किया जाता है। परमात्मा और जीवात्माओं के कार्यो में इतनी समानता है [मगर दोनों के कार्य क्षेत्र निसंदेह अत्यंत विभिन्न हैं] की प्रायः इनके सम्बन्ध के विषय में भ्रम हो जाता है और इस भ्रम के कारन दर्शनशास्त्र तथा धर्म दोनों क्षेत्रो में बाल की खाल निकाली जाती है। खासतौर पर ईश्वर को ना मानने वाले लोग मनुष्य को ही “सिद्ध” व “ईश्वर” का दर्ज देकर अपनी अल्पज्ञता के कारण ऐसा विचार लाते हैं – वैदिक ईश्वर का स्वरुप कैसा है और जीव का स्वरुप कैसा है – जब इस प्रकार की चर्चा की जाती है तब आवश्यक हो जाता है इस प्रकृति के बारे में भी कुछ जाना जाए – तो आइये – इस विषय पर कुछ विचार करे – इस कार्यरूप सृष्टि में तीन नियम बहुत ही स्पष्ट रूप से दीखते हैं : पहिला – इस सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ नियमपूर्वक, परिवर्तनशील है। दूसरा – प्रत्येक जाती के प्राणी अपनी जाती के ही अंदर उत्तम, माध्यम और निकृष्ट स्वाभाव से पैदा होते हैं। तीसरा – इस विशाल सृष्टि में जो कुछ कार्य हो रहा है वह सब नियमित, बुद्धिपूर्वक और आवश्यक है। पहिला नियम : सृष्टि नियमपूर्वक परिवर्तनशील है इसका अर्थ जो लोग सृष्टि को स्वाभाविक गुण से परिवर्तनशील मानते हैं वे गलती पर हैं क्योंकि स्वाभाव में परिवर्तन नहीं होता ऐसे लोग भूल जाते हैं की परिवर्तन नाम है अस्थिरता का और स्वाभाव में अस्थिरता नहीं होती क्योंकि उलटपलट, अस्थिर ये नैमित्तिक गुण हैं स्वाभाविक नहीं। इसलिए सृष्टि में परिवर्तन स्वाभाविक नहीं। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है की यदि प्रकृति में परिवर्तन स्वाभाविक माने तो ये अनंत परिवर्तन यानी अनंत गति माननी पड़ेगी और फिर एकसमान अनंत गति मानने से संसार में किसी भी प्रकार से ह्रासविकास संभव नहीं रहेगा किन्तु सृष्टि में बनने और बिगड़ने की निरंतर प्रक्रिया से सिद्ध होता है की सृष्टि का परिवर्तन नैमित्तिक है सवभविक नहीं, इसीलिएि इस परिवर्तनरुपी प्रधान नियम के द्वारा यह सिद्ध होता है की सृष्टि के मूल कारणों में से यह एक प्रधान कारण है जो खंड खंड, परिवर्तन शील और परमाणुरूप से विद्यमान है। परन्तु यह परमाणु चेतन और ज्ञानवान नहीं हैं इसकी बड़ी वजह है की जो भी चेतन और ज्ञानवान सत्ता होगी वो कभी दूसरे के बनाये नियमो में बंध नहीं सकती बल्कि ऐसी सत्ता अपनी ज्ञानस्वतंत्रता से निर्धारित नियमो में बाधा पहुचाती है – जहाँ तक हम देखते हैं परमाणु बड़ी ही सच्चाई से अपना काम कर रहे हैं – जिस भी जगह उनको दूसरे जड़ पदार्धो में जोड़ा गया – वहां आँख बंद करके भी कार्य कर रहे हैं जरा भी इधर उधर नहीं होते इससे ज्ञात होता है की इस सृष्टि का परिवर्तनशील कारण जो परमाणु रूप में विद्यमान है ज्ञानवान नहीं बल्कि जड़ है – इसी जड़, परिवर्तनशील और परमाणु रूप उपादान कारण को माया, प्रकृति, परमाणु मेटर आदि नामो से कहा जाता है और संसार के कारणों में से एक समझा जाता है दूसरा नियम : सभी प्राणियों के उत्तम और निकृष्ट स्वाभाव हैं। अनेक मनुष्य प्रतिभावान, सौम्य और दयावान होते हैं, अनेक मुर्ख उद्दंड और निर्दय होते हैं। इसी प्रकार अनेक गौ, घोडा आदि पशु स्वाभाव से ही सीधे होते हैं और अनेक शेर, आदि क्रोधी और दौड़दौड़कर मारने वाले होते हैं यहाँ देखने वाली बात है की ये स्वभावविरोध शारीरिक यानी भौतिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक है, जो चैतन्य बुद्धि और ज्ञान से सम्बन्ध रखता है। लेकिन ध्यान देने वाली है ये ज्ञान प्राणियों के सारे शरीर में व्याप्त नहीं है, क्योंकि यदि सारे शरीर में ये ज्ञान व्याप्त होता तो किसी का कोई अंग भंग यथा अंगुली, हाथ, पैर आदि कट जाने पर उसका ज्ञानंश कम हो जाना चाहिए लेकिन वस्तुतः ऐसा होता नहीं इसलिए यह निश्चित और निर्विवाद है की ज्ञानवाली शक्ति जो प्राणियों में वास करती है वो पुरे शरीर में व्याप्त नहीं है प्रत्युत वह एकदेशी, परिच्छिन्न और अनुरूप ही है क्योंकि सुक्षतिसूक्ष्म कृमियों में भी मौजूद है दूसरा तथ्य ये भी है की यदि पुरे शरीर में ज्ञानशक्ति मौजूद होती तो जैसे शरीर का आकर बढ़ता है वैसे उस शक्ति को भी बढ़ना पड़ता जबकि ऐसा होता नहीं और ये शक्ति परमाणुओ के संयोग से भी नहीं बनी क्योंकि ऊपर सिद्ध किया गया की ज्ञानवान तत्व, परमाणु संयुक्त होकर नहीं बन सकता और न ही ये हो सकता है की अनेक जड़ और अज्ञानी परमाणु एकत्रित होकर परस्पर संवाद ही जारी रख सकते हो। यदि कोई मनुष्य ब्रिटेन में जिस समय पर गाडी दौड़ा रहा है – तो उसी समय पूरी दुनिया में मौजूद इंसान उस गाडी और मनुष्य को नहीं देख पा रहे इसलिए प्राणियों में मौजूद ज्ञानवान शक्ति, अल्पज्ञ है, एकदेशी है, परिच्छिन्न है। इसलिए इस शक्ति को जीव, रूह और सोल के नाम से जानते हैं। इस विस्तृत सृष्टि में जो कुछ कार्य हो रहा है, वह नियमित, बुद्धिपूर्वक और आवश्यक है। सूर्य चन्द्र और समस्त ग्रह उपग्रह अपनी अपनी नियत धुरी पर नियमित रूप से भ्रमण कर रहे हैं। पृथ्वी अपनी दैनिक और वार्षिक गति के साथ अपनी नियत सीमा में घूम रही है। वर्षा, सर्दी और गर्मी नियत समय में होती है। मनुष्य और पशुपक्ष्यादि के शरीरो की बनावट वृक्षों में फूलो और फलो की उत्पत्ति, बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज का नियम और प्रत्येक जाती की आयु और भोगो की व्यवस्था आदि जितने इस सृष्टि के स्थूल सूक्ष्म व्यवहार हैं, सबमे व्यवस्था, प्रबंध और नियम पाया जाता है। नियामक के नियम का सब बड़ा चमकार तो प्रत्येक प्राणी के शरीर की वृद्धि और ह्रास में दिखलाई देता है। क्यों एक बालक नियत समय तक बढ़ता और क्यों एक जवान धीरे धीरे ह्रास की और – वृद्धावस्था की और बढ़ता जाता है इस बात का जवाब कोई नहीं दे सकता यदि कोई कहे की वृद्धि और ह्रास का कारण आहार आदि पोषक पदार्थ हैं, तो ये युक्तियुक्त और प्रामाणिक नहीं होगा क्योंकि हम रोज देखते हैं एक ही घर में एक ही परिस्थिति में और एक ही आहार व्यवहार के साथ रहते हुए भी छोटे छोटे बच्चे बढ़ते जाते हैं और जवान वृद्ध होते जाते हैं तथा वृद्ध अधिक जर्जरित होते जाते हैं। इन प्रबल और चमत्कारिक नियमो से सूचित होता है की इस सृष्टि के अंदर एक अत्यंत सूक्ष्म, सर्वव्यापक, परिपूर्ण और ज्ञानरूपा चेतनशक्ति विद्यमान है जो अनंत आकाश में फ़ैल हुए असंख्य लोकलोकान्तरो का भीतरी और बाहरी प्रबंध किये हुए हैं। ऐसा इसलिए तार्किक और प्रामाणिक है क्योंकि नियम बिना नियामक के, नियामक बिना ज्ञान के और ज्ञान बिना ज्ञानी के ठहर नहीं सकता। हम सम्पूर्ण सृष्टि में नियमपूर्वक व्यवस्था देखते हैं, इसलिए सृष्टि का यह तीसरा कारण भी सृष्टि के नियमो से ही सिद्ध होता है। इसी को परमात्मा, ईश्वर खुदा और गॉड कहते आदि अनेक नामो से पुकारते हैं हैं जिसका मुख्य नाम ओ३म है। सृष्टि के ये तीनो कारण स्वयंसिद्ध और अनादि हैं। मेरे मित्रो, ज्ञान और विज्ञान की और लौटिए, सत्य और न्याय की और लौटिए वेदो की और लौटिए…. आओ लौट चले वेदो की और।

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Thursday, September 29, 2016

हिन्दू कैसे अपने महापुरुषों का अपमान करते है देखिये - 1⃣क्या...

हिन्दू कैसे अपने महापुरुषों का अपमान करते है देखिये - 1⃣क्या आपने कभी देखा है की सिखों के दस गुरु है उनको कभी मंचों य स्टेजों पर नाचते हुए - 2⃣किसी माई के लाल की हिम्मत नहीं की किसी भी सिख गुरु की कहीं नचवा दे । 3⃣क्यों की सिख अपने गुरुओं का आदर करते है और उनका अपमान बिलकुल भी सहन नहीं कर सकते ।। 4⃣क्या कभी किसी मुश्लिम को उनके गुरु य मोहम्मद य कोई भी उनके नजरों में उनका कोइ महापुरुष य महामानव आपने नाचता हुआ य उसका अपमान होता देखा है । 5⃣क्यों की मुश्लिम भी अपने महापुरुषों की ( उनकी नजरों में ) बेज्जती सहन नहीं कर सकते ,किसी के माई के लाल में हिम्मत नहीं है की कोइ उनके मोहम्मद य किसी और के बारे में कुछ कह दे तलवार चल जाती है । 6⃣ऐसे ही इसाई है
7⃣लेकिन हिन्दू - अपने महापुरुष श्री कृष्ण को स्टेजों पर “ राधा "के साथ ( जबकि राधा के साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं था ) नचवाने में अपनी शान समझते है ,, एक तरफ तो उनको परमात्मा मान कर पूजा करते है और दूसऱी तरफ उनको चोर , रास रचाने वाला , स्त्रियों के कपडे चुराने वाला कहने में अपनी शान समझते है ,,, ऐसे ही शिव जी को अपना परमात्मा बना कर पूजते है , और दूसरी तरफ उनको भंगेड़ी ( भांग पीने वाला ) भी कहने में अपनी शान समझते है ,,,,,, हिन्दुओं ( आर्यो ) कब तक अपने महापुरुषों का अपमान तुम अपने आप ही करते रहोगे ।………………..


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ओ३म् *🌷अण्डा―एक जहर🌷* _(1) अण्डे में कोलिस्ट्रोल की मात्रा अधिक होती है।इसका पीत-भाग कोलिस्ट्रोल...

ओ३म्

*🌷अण्डा―एक जहर🌷*

_(1) अण्डे में कोलिस्ट्रोल की मात्रा अधिक होती है।इसका पीत-भाग कोलिस्ट्रोल का बहुत बड़ा स्रोत है।यह मानव चर्म की परतों में जमा हो धमनियों को सिकुड़ा देता है।परिणामतः दिल का दौरा, लकवा, जेथोमा जैसे भयंकर रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है।"हायपर-कौलिस्टेरोलेमिया" होने पर मनुष्य उच्च रक्तचाप का रोगी बन जाता है।बच्चों के लिए तो यह बिल्कुल भी अनुकूल नहीं है।इसमें सोडियम सॉल्ट की मात्रा अधिक होती है।ब्लडप्रैशर के मरीजों के लिए जहर रुप है।अण्डे के सफेद भाग में नमक और पीले भाग में कोलिस्ट्रोल दोनों ही स्वास्थ्य हेतु घातक हैं।_

_(2) अण्डे में कार्बोहाइड्रेटस बिल्कुल नहीं है।इससे कब्ज, जोडों के दर्द जैसी बीमारियां अनायास हो जाती हैं।अण्डा कफदायक होने से शरीर के पोषक-तत्त्वों को असन्तुलित कर देता है।अण्डे में साल्मोनेला नामक बैक्टीरिया के अतिरिक्त एक नया माइक्रोव बैक्टीरिया भी पाया जाता है।यह आंतों में भयंकर रोग उत्पन्न करता है।अण्डे खाने से गठिया, गाउट जैसी वात-जनित बीमारियाँ हो जाती हैं जो बुढ़ापे में खतरनाक, पीड़ादायक मोड़ ले-लेती हैं।अण्डे में तुरन्त ऊर्जा देने वाले शुगर और स्टार्च नहीं हैं।_

_(3) पोल्ट्री-फार्म की मुर्गियों को रख-रखाव हेतु विभिन्न प्रकार की घातक दवाइयाँ दी जाती हैं, या उनका छिड़काव किया जाता है, परिणामतः वे घातक दवाइयों का बहुत सारा अंश श्वास अथवा मुँह के माध्यम से खाने के संग पेट में पहुँच जाता है।यही कारण है कि कई प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि उनके पेट में डी०डी०टी० जैसा जहर भी पाया जाता है जो खाने वालों के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होता है।जैसे गाय, बैल, भैंसों, सूअर, बकरा आदि को मांसवर्द्धक दावाएँ दी जाती हैं।पोल्ट्री-फार्मों में भी इनका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है।चूजे और गिद्ध को एण्टीबायोटिक्स की हल्की मात्रा वजन वृद्धि हेतु दी जाती है और उनका व्यापारिक शोषण किया जाता है।बुद्धिधारियो ! जरा गम्भीर चिन्तन करें।ऐसे अण्डे, मांस खाने वालों पर इसका क्या दुष्परिणाम होगा?क्या यह मनुष्य समाज पर अभिशाप सिद्ध नहीं होगा ?_

_(4) अण्डे में १३.३ प्रतिशत, हरे चने में २४ तथा मूंगफली में ३१.५ प्रतिशत और सोयाबीन में ४३.२ प्रतिशत प्रोटीन होता है।एक अण्डे से ८६.५ प्रतिशत कैलोरिज़ मिलती है जबकि गेहूं के आटे से १७६.५ प्रतिशत कैलोरिज प्राप्त होती है।अण्डे कोई कैल्शियम का स्रोत भी नहीं हैं।एक अण्डे में ३० मि०ग्रा० कैल्शियम मिलता है जो कि लगभग १५ पैसे में उपलब्ध हो जाता है, इसके विपरित ७५ ग्राम सरसों की भाजी में ३० मि०ग्रा० कैल्शियम सस्ते भाव में प्राप्त हो सकता है।दूध और अण्डे को समान मानना बहुत भारी भूल सिद्ध होगी।अण्डे में विटामिन बी-२, बी-१२, तथा कैल्शियम होते हैं।अण्डे को पकाने में या तलने में बी-१, बी-२, पच्चीस प्रतिशत तक नष्ट हो जाता है और बी-१२ भी अंशतः नष्ट हो जाता है।_

_(5) भारतीय धर्म, संस्कृति अण्डे,मांस के पक्ष में नहीं है।*अथर्ववेद ८।६।१२ में स्पष्ट है कि―"मैं उन दुष्टों को नष्ट करता हूँ जो अण्डे, मांस खाते हैं।"* अण्डे कई बार एनीमल हायपर सेंसिटिविटि (पाशविक अति संवेदनशीलता) उत्पन्न कर देते हैं।परिणामतः अण्डाहारी बर्बर आदतों से नहीं चूकता। उसकी भावनाओं में जोश ही जोश होता है , होश नहीं।अतः परिणाम बहुत भयंकर भुगतने पड़ते हैं।बाद में तो केवल पछताना ही उसके पास रह जाता है।_

_(6) अण्डा कभी शाकाहारी नहीं होता। यह भ्रामक नामकरण है कि सेये हुए अण्डे का कोई प्राणिक उद्देश्य होता है, अनिषेचित अण्डे का कोई प्राणिक उद्देश्य नहीं होता। इसे अखाद्य मानना चाहिए।_

_सच्चाई तो यह है कि ये मनुष्य के सेवन हेतु नहीं बना।यह तो सेवन करने वाले को ही अप्राकृतिक बना देता है।पश्चिम देशों में अब इसे पौष्टिक आहार की श्रेणी में नहीं रखते।वहाँ इसका प्रयोग निषेध रुप में पाया जा रहा है।यदि चिन्तन करें तो विदित होगा कि मनुष्य मूलतः ‘मस्तिष्क’ है 'पेट’ नहीं।विभिन्न अध्ययन, अनुसन्धान स्पष्ट करते हैं कि अण्डाहारी का मस्तिष्क तानाशाही, अशालीनता और अपराधीवृत्ति की और झुक जाता है।भारतीय संस्कृति और सभ्यता में हमारे धार्मिक ग्रन्थ मनुष्य को यही चेतावनी देते आए हैं कि" जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन, जैसा पीए पानी, वैसी बोले वाणी" । अर्थात् तामसिक पाशविक भोजन मानव की वृद्धि और विकास नहीं बल्कि उसके अधोपतन का कारण बनता है।_


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Tuesday, September 27, 2016

દુશ્મની માં ખાનદાની નું ઉત્કૃષ્ઠ ઉદાહરણ:– સત્યઘટના છે: - ગોંડલ રાજાના કુંવર, સંગ્રામજીના...

દુશ્મની માં ખાનદાની નું ઉત્કૃષ્ઠ ઉદાહરણ:–

સત્યઘટના છે: -

ગોંડલ રાજાના કુંવર, સંગ્રામજીના દિકરા, નામ એનુ પથુભા. નાની ઉંમર એમની. કોઈ કામ સબબ એમને કુંભાજીની દેરડી કેવાય છે ત્યા જવાનુ બનેલું. એટલે ૨૫-૩૦ ઘોડેસવારોની સાથે પોતે નીકળ્યા.

એમા કુકાવાવના પાદરમા પહોચ્યા. ઘોડાઓ નદિમા પાણી પીએ છે.

કુંવર (માણસોને) : હવે દેરડી કેટલુ દુર છે?

માણસો : કેમ કુંવરસાબ?

કુંવર : મને ભુખ બહુ લાગી છે.

માણસો : બાપુ, હવે દેરડી આ રહ્યુ, અહિથી ૪ માઇલ દેરડી આઘુ છે, આપણે ઘોડા ફેટવીએ એટલે હમણા આપણે ન્યા પોગી જાઈ અને ત્યા ડાયરો ભોજન માટે આપણી વાટ જોતો હશે.

કુંવર : ના, મારે અત્યારે જ જમવુ છે.

આ તો રાજાનો કુંવર એટલે બાળહઠ ને રાજહઠ બેય ભેગા થ્યા.

એટલામા કુકાવાવનો એક પટેલ ખેડુત પોતાનુ બળદગાડું લઈને નીકળ્યો ને એણે કુંવરની વાત સાંભળી એટલે આડા ફરીને રામ રામ કર્યા ને કિધુ કે, “ખમ્મા ઘણી બાપુને, આતો ગોંડલનું જ ગામ છે ને, પધારો મારા આંગણે.”

કુંવર અને માણસો પટેલની ઘરે ગ્યા.

ઘડિકમા આસન નખાઇ ગ્યા, આ બાજુ ધિંગા હાથવાળી પટલાણીયુ એ રોટલા ઘડવાના શરૂ કરી દિધા, રિંગણાના શાક તૈયાર થઈ ગ્યા, મરચાના અથાણા પીરસાણા અને પોતાની જે કુંઢિયુ બાંધેલી એની તાજી માખણ ઉતારેલી છાશું પીરસાણી.

કુંવર જમ્યા ને મોજના તોરા મંડ્યા છુટવા કે શાબાશ મારો ખેડુ, શાબાશ મારો પટેલ અને આદેશ કર્યૌ કે બોલાવો તલાટીને, ને લખો, “કે હુ કુવર પથુભા કુકાવાવમા પટેલે મને જમાડ્યો એટલે હું પટેલને ચાર સાતીની ઉગમણા પાદરની જમીન આપુ છું.” ને નિચે સહિ કરી ને ઘોડે ચડિને હાલતા થ્યા.

કુંવર ગયા પછી તલાટી જે વાણિયો હતો તે ચશ્મામાંથી મરક મરક દાંત કાઢવા લાગ્યો ને પટેલને કિધુ કે, “પટેલ, આ દસ્તાવેજને છાશમા ઘોળીને પી જાવ. આ ક્યા ગોંડલનુ ગામ છે કે કુંવર તમને જમીન આપી ને વ્યા ગ્યા.”આ તો કાઠી દરબાર જગા વાળા નુ ગામ છે.

પટેલને બિચારાને દુઃખ બહુ લાગ્યુ અને આખુ ગામ પટેલની મશ્કરી કરવા લાગ્યુ.

પટેલને ધરતી માર્ગ આપે તો સમાઈ જવા જેવુ થ્યુ. પણ એક વાત નો પોરસ છે કે કુંવરને મે જમાડ્યા.

ઉડતી ઉડતી એ વાત જેતપુર દરબાર જગાવાળાને કાને પડી.

એમણે ફરમાન કીધુ
કે -“બોલાવો પટેલને અને એને કેજો કે સાથે દસ્તાવેજ પણ લાવે.”

પટેલ બીતા-બીતા જેતપુર કચેરીમા આવે છે.

જગાવાળા : પટેલ, મે સાંભળ્યુ છે કે મારા દુશ્મન ગોંડલના કુંવર પથુભા કુકાવાવ આવ્યાતા ને તમે એને જમાડ્યા. સાચું ?

પટેલ : હા બાપુ, એમને ભુખ બહુ લાગીતી એટલે મે એને જમાડ્યા.

જગાવાળા : હમ્મ્મ્મ અને એણે તમને ચાર સાતીની જમીન લખી આપી એય સાચું ?

પટેલ : હા બાપુ એને એમ કે આ ગોંડલનુ ગામ છે એટલે આ દસ્તાવેજ લખી આપ્યો.

ત્યારે જગાવાળાએ પોતાના માણસોને કિધુ કે - તાંબાના પતરા પર આ દસ્તાવેજમા જે લખેલ છે એ લખો અને નીચે લખો કે, “મારા પટેલે મારા દુશ્મનને જમાડ્યો એટલે મારી વસ્તીએ મને ભુંડો નથી લાગવા દિધો. એટલે હું જગાવાળો, જેતપુર દરબાર, પટેલને બીજી ચાર સાતીની જમીન આપુ છુ અને આ આદેશ જ્યા સુધી સુર્યને ચાંદો તપે ત્યા સુધી મારા વંશ વારસોએ પાળવાનો છે અને જે નહિ પાળે એને ગૌહત્યાનુ પાપ છે”
એમ કહીને નીચે જગાવાળાએ સહિ કરિ નાખી,

અને એક પત્ર ગોંડલ લખ્યો કે, “સંગ્રામજીકાકા તારો કુંવર તો દેતા ભુલ્યો, કદાચ આખુ કુકાવાવ લખી દિધુ હોત ને તોય એય પટેલ ને આપી દેત.”

આ વાતની ખબર સંગ્રામસિંહજીને પડતા એને પણ પોરસના પલ્લા છુટવા માંડ્યા કે “વાહ જગાવાળા શાબાશ બાપ! દુશ્મન હોય તો આવો. જા બાપ તારે અને મારે કુકાવાવ અને બીજા ૧0 ગામનો જે કજિયો ચાલે છે
તે તને માંડિ દવ છું…!“

આનુ નામ દુશ્મન કેવાય, આને જીવતરના મુલ્ય કેવાય.
વેરથી વેર ક્યારેય શમતુ નથી એને આમ મિટાવી શકાય,
આવા અળાભીડ મર્દો આ ધરતિમા જન્મ્યા.

ધન્ય છે…

” આપણી સંસ્કૃતિ અને આપણો વારસો “


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Monday, September 26, 2016

*मधुमेह पर राजयोग का प्रयोग* *✿>>*♛ मैं एक चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ परम् पिता परमात्मा मेरे...

*मधुमेह पर राजयोग का प्रयोग*

*✿>>*♛ मैं एक चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ परम् पिता परमात्मा मेरे परम चिकित्सक है। पवित्रता, शान्ति और शक्ति की किरणें परमात्मा से उतारकर मुझ आत्मा पर पढ़ रही है। मैं आत्मा परमात्मा की शक्तिशाली किरणों से भरपूर हो रही हूँ। अब इन अद्भुत किरणों को मैं अपने शरीर के भीतर प्रवाहित कर रही हूँ। ये किरणे पेट के वरिष्ठ भाग में स्थित पैंक्रियास ग्रंथि पर पढ़ रही है अब मैं इनके अलौकिक प्रभाव को देख रही है। मेरे पैंक्रियास के अंदर बिता सेल्स जो की लगभग नष्ट हो चुके थे अब उनका निर्माण होना शुरू हो रहा है। इन नवनिर्मित बीटा सेल्स से आवश्यक मात्रा में इन्सुलिन बनता जा रहा है ..। फिर से मेरी एक एक कोशिका के भीतर ग्लूकोस बड़ी आसानी से पहुँच रहा है। मेरा इन्सुलिन रजिस्ट्रेशन भी अब खत्म हो रहा है। ग्लूकोस हर कोशिका के अंदर जा कर पर्याप्त शक्ति का संचार कर रही है। अब मैं आत्मा देख रही हूँ की कैसे मेरे रक्त में ग्लूकोस की मात्रा का स्तर सामान्य होता जा रहा है। मेरा हर अंग परमात्मिक प्रकाश से प्रभावित हो स्वस्थ होता जा रहा है। मधुमेह से ग्रस्त सभी विकृतियां दूर हो रही हैं। मेरे रक्त में वसा की मात्रा भी संतुलित हो रही है। मैं अपने शरीर को अब स्वस्थ रूप में अब देख रही हूँ, ईश्वर के शक्तिशाली प्रकम्पन से आत्मा के साथ साथ शरीर भी सतोप्रधान और पावन होता जा रहा है। अब मैं स्वयं को एवेरहेल्थी महसूस कर रही हूँ और सुखद जीवन जीने का मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है।

*अभ्यास*

रोज़ाना सुबह और शाम कम से कम 5 मिनट करें। इससे तन और मन दोनों स्वस्थ होते जा रहे हैं।


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सत्संग का महत्व नियमित सत्संग में आने वाले एक आदमी नें जब एक बार सत्संग में यह सुना कि जिसने जैसे...

सत्संग का महत्व

नियमित सत्संग में आने वाले एक
आदमी नें जब एक बार सत्संग में
यह सुना कि जिसने जैसे कर्म किये
हैं उसे अपने कर्मो अनुसार वैसे ही
फल भी भोगने पड़ेंगे । यह सुनकर
उसे बहुत आश्चर्य हुआ अपनी आशंका
का समाधान करने हेतु उसने सतसंग
करने वाले संत जी से पूछा….. अगर
कर्मों का फल भोगना ही पड़ेंगा तो
फिर सत्संग में आने का किया फायदा
है…..?
संत जी नें मुसकुरा कर उसे देखा
और एक ईंट की तरफ इशारा
कर के कहा की तुम इस ईंट को छत
पर ले जा कर मेरे सर पर फेंक दो ।
यह सुनकर वह आदमी बोला संत जी
इससे तो आपको चोट लगेगी दर्द होगा ।
मैं यह नहीं कर सकता…..
संत ने कहा….अच्छा, फिर उसे उसी
ईंट के भार के बराबर का रुई का
गट्ठा बांध कर दिया और कहा अब
इसे ले जाकर मेरे सिर पे फैंकने से
भी कया मुझे चोट लगेगी….??
वह बोला नहीं…..
संत ने कहा…..
बेटा इसी तरह सत्संग में आने से
इन्सान को अपने कर्मो का बोझ
हल्का लगने लगता है और वह हर
दुःख तकलीफ को परमात्मा की
दया समझ कर बड़े प्यार से सह
लेता है ।
सत्संग में आने से इन्सान का मन
निरमल होता है और वह मोह माया
के चक्कर में होने वाले पापों से भी
बचा रहता है और अपने सतगुरु की
मौज में रहता हुआ एक दिन अपने
निज घर सतलोक पहुँच जाता है,
जहाँ केवल सुख ही सुख है….
🙏🙏


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मॆनॆ ढुंढा अपना शरीर वामॆ पाया अलख अमिर मांइ मॆ ताॆ बन गया फकिर जी ✺प जनमाॆ जनम का मॆल चडिया धॆाबी...

मॆनॆ ढुंढा अपना शरीर
वामॆ पाया अलख अमिर
मांइ मॆ ताॆ बन गया फकिर जी
✺प
जनमाॆ जनम का मॆल चडिया
धॆाबी मीलीया पीर जी
घर्म घाट पॆ दॆ पछाडा
नहाया निरमळ निर
मांइ मॆ ताॆ बन गया फकिर जी
✺र
अल्लाहु का जाप जपीया
तब ताॆ आइ धीर जी
नुरता सुरता ऎक किनी
हुवा मनवा स्थीर
मांइ मॆ ताॆ बन गया फकिर जी
✺ब
बिन बादल ऎक बिजली चमकॆ
जरमर बरसॆ निर जी
अनहद निशदिन नाॆबत बाजॆ
ग्नान घर हॆ गंभीर
मांइ मॆ ताॆ बन गया फकिर जी
✺त
सुरता सुनमॆ आंय ठॆहरी
अवघट घाट कॆ तीर जी
तन काॆ ताॆडा मन काॆ जाॆडा
कंचन हुवा हॆ शरीर
मांइ मॆ ताॆ बन गया फकिर जी
✺
डुंगर चडीया दॆखी मढीया
भया मॆ शुरविर जी
दास सत्तार गुरु क्रिपा सॆ
अमर हुइ जागीर
मांइ मॆ ताॆ बन गया फकिर जी

✺टाइपींग~परबत गाॆरीया✺


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Sunday, September 25, 2016

“अविभक्त; विभक्त जैसे’ -आचार्यश्री राजेष मंत्र: चक्षुर्मुसलं काम उलूखलम्। दितिः...

“अविभक्त; विभक्त जैसे’
-आचार्यश्री राजेष

मंत्र:
चक्षुर्मुसलं काम उलूखलम्।
दितिः शूर्पमदितिः शूर्पग्राही वातोऽपाविनक्।।
(अथर्ववेद 11.3.3,4)

भावार्थ:
ओखली में ड़ालकर धान को मारते जैसे ब्रह्मजिज्ञासु इस ब्राहृाण्ड में ब्रह्म को देखने या समझने का परिश्रम करते है। पृथक करके धान से छिलके को निकालते जैसे सत्त्वबुद्धि द्वारा वह विराट शरीर में से परमात्मा को पृथक करके समझ लेता है।

भाष्य:
भगवद्गीता के क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग के सत्रहवाँ श्लोक में इसी अथर्ववेद मंत्र के बारे में ही बोल दिया है। "दितिः शूर्पं
अदितिः शूर्पग्राही’ ये मंत्रांश गीताश्लोक में "अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव स्थितं’- ऐसा विवरण किया है। "दितिः’ का मतलब विभाजन करने योग्य (विभक्तं) है और अविभजनीय पदार्थों को "अदितिः” शब्द से कहा गया है। ये दोनों शब्द “दो अवखण्डने’ - धातु से निष्पन्न हुआ है। ये मंत्र क्या बता रहा है? मंत्र में से "शूर्पं’ शब्द देखिए, पाणिनीय धातुपाठ में "शूर्प माने’ - ऐसा धात्वर्थ को देख सकता है। परिमेय व्यक्त पदार्थों को शूर्प शब्द से कहा गया तो वे अपरिमेय एवं अव्यक्त ब्रह्म को ही शूर्पग्राही समझना चाहिए। क्योंकि सूर्यचन्द्रादि सब पदार्थ वे प्रभु में ही आधारित हैं। वे ब्रह्म विविध वस्तुओं में विविध रूप में प्रकट होते हैं। ऐसे अविभक्त परमात्मा विभक्त जैसा स्थित है। यही गीता श्लोक में भी कहा जाता है। लेकिन बहुत सारे लोग गीताश्लोक को अपनी-अपनी मनमाने ढंग से व्याख्यान किया है। घट, आकाश आदि उदाहरण लेकर अज्ञानरूपी उपाधी से ब्रह्म जीव हो जाता है- ऐसा कहे गये हैं। ये तो ठीक नहीं, क्योंकि इस अथर्वमंत्रों का पूर्व मंत्र में ऐसा कहा है कि "द्यावापृथिवी श्रोत्रे सूर्याचन्द्रमसावक्षिणी’ - अर्थात् द्युलोक और पृथिवीलोक उनके कानों तथा सूर्यचन्द्रादि उनके आँखें हैं। इससे सुव्यक्त होता है कि इधर प्रपंच रूपी विराट् शरीर का वर्णन किया है, मनुष्य शरीर का नहीं। वेदों पर आधारित किये बिना गीता श्लोकों को भाष्य लिखने पर ही ऐसा खलत अर्थ भगवद्गीता श्लोकों पर आरोपित होता है।


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ओ३म् *🌷ईश्वर का आश्रय ही सबसे बड़ा आश्रय🌷* ईश्वर कहता है― *अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न...

ओ३म्

*🌷ईश्वर का आश्रय ही सबसे बड़ा आश्रय🌷*


ईश्वर कहता है―

*अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न मृत्यवेऽव तस्थे कदा चन ।*
*सोममिन्मा सुन्वतो याचता वसु न मे पूरवः सख्ये रिषाथन ।।*
―(ऋ० १०/४८/५)

*भावार्थ―*मैं परमैश्वर्यवान् सूर्य के सदृश सब जगत् का प्रकाश हूँ। कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूँ।मैं ही जगद्रूप धन का निर्माता हूँ। सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले मुझ ही को जानो। हे जीवो ! ऐश्वर्य-प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझसे माँगो और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत होओ।

कठोपनिषद् में यमाचार्य ने ईश्वर को ही परमाश्रय बताते हुए कहा है―

*एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।*
*एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ।।*
―(कठ० २/१७)

*अर्थात्―*यह आश्रय श्रेष्ठ है, यह आश्रय सर्वोपरि है। इस आलम्बन को जानकर मनुष्य ब्रह्मलोक में आनन्दित होता है।

ईश्वर को परमाश्रय मानने की बात कवि रहीम ने सुन्दर शब्दों में कही है―

*अमरबेलि बिन मूल की, प्रतिपालत है ताहि ।*
*रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि ।।*

*अर्थात्―*जो परमात्मा बिना जड़ की अमरबेल को पालता है, ऐसे प्रभु को छोड़कर तुम किसको खोजते हो? अर्थात् ईश्वर का सहारा पकड़ो, और किसी के सहारे की आवश्यकता नहीं है।

*अतः मनुष्य को ईश्वर पर ही भरोसा रखना चाहिए। बच्चों के समान दिये गये झूठे दिलासों से क्या होता है ?*

भर्तृहरि जी ने इस सनदर्भ में धनवानों के दरवाजे पर जाकर माँगने वालों को एक उपयोगी परामर्श दिया है―

*नायं ते समयो रहस्यमधुना निद्राति नाथो यदि*
*स्थित्वा द्रक्ष्यति कुप्यति प्रभुरिति द्वारेषु येषां वचः ।*
*चेतस्तानपहाय याहि भवनं देवस्य विश्वेशितुर्*
*निर्द्रौर्वारिक निर्दयोक्त्यपरुषं निःसीमशर्मप्रदम् ।।*
―(वै० श० ८५)

*अर्थात्―*जब कोई याचक धनवान् के दरवाजे पर जाता है तो दरबान उससे कहता है कि अभी उनसे मिलने का समय नहीं हैं, वे अभी गुप्त परामर्श कर रहे हैं। अभी स्वामी तो सो रहे हैं। यदि स्वामी ने तुम्हें देख लिया तो क्रोध प्रकट करेंगे। हे मन ! जिनके दरवाजे पर ऐसी बातें सुननी पड़ती हैं तू उनके दरवाजे को छोड़कर उस परमपिता परमात्मा के दरवाजे पर जा जहाँ तुझे कोई दरबान नहीं मिलेगा। वहाँ कठोर बात सुनने को नहीं मिलेगी। परमात्मा का भवन असीम कल्याण का देने वाला है।

*सच्चे विरक्त केवल ईश्वर के आगे ही झुकते हैं। वे संसार के किसी शासक के आगे नहीं झुकते। एक बार लोगों ने सिकन्दर लोधी से सन्त कबीर की शिकायत की कि वे इस्लाम का खण्डन करके अपने सिद्धान्तों का प्रचार करते हैं।सिकन्दर लोधी ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया। सन्त कबीर ने न लोधी का अभिवादन किया न सत्कार। सिकन्दर लोधी ने इसका कारण पूछा। उन्होंने उत्तर दिया कि मैं केवल ईश्वर के आगे ही सिर झुकाता हूँ; अन्य किसी राजा के आगे शीश नहीं झुकाता। बादशाह ने उनके हाथों में हथकड़ी और पाँव में बेड़ी डलवाकर नदी में छुड़वा दिया। सन्त कबीर को कोई हानि नहीं हुई। अन्त में सिकन्दर लोधी को बहुत पश्चात्ताप हुआ। उसने कबीर से क्षमा माँगी।*

*महर्षि दयानन्द भी परमात्मा को परमाश्रय समझते थे। उदयपुर के महाराणा ने जब महर्षि से यह कहा कि “भले ही आप मूर्त्तिपूजा न करें, परन्तु मूर्त्तिपूजा का खण्डन न करें।” तो इस पर महर्षि ने उत्तर दिया, “मैं एक दौड़ लगाऊँ तो भी आपके राज्य को पार कर सकता हूँ, परन्तु यदि जन्म-जन्मान्तर की दौड़ लगाऊँ तो भी परमात्मा के राज्य से बाहर नहीं निकल सकता।बताओ आपकी आज्ञा का पालन करुँ कि ईश्वर की आज्ञा का पालन करुँ ?”*


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दयानंद की गाथा हम आज एक ऋषिराज की पावन कथा सुनाते हैं। आनन्दकन्द ऋषि दयानन्द की गाथा गाते हैं।। हम...

दयानंद की गाथा
हम आज एक ऋषिराज की पावन कथा सुनाते हैं।
आनन्दकन्द ऋषि दयानन्द की गाथा गाते हैं।।
हम कथा सुनाते हैं…..
हम एक अमर इतिहास के कुछ पन्ने पलटाते हैं।
आनन्दकन्द ऋषि दयानन्द की गाथा गाते हैं।
हम कथा सुनाते हैं…..
ऋषिवर को लाख प्रणाम, गुरुवर को लाख प्रणाम।
धर्मधुरन्धर मुनिवर को कोटि-कोटि प्रणाम,
कोटि-कोटि प्रणाम।।
भारत के प्रान्त गुजरात में एक ग्राम है टंकारा।
उस गाँव के ब्राह्मण कुल में जन्मा इक बालक प्यारा।
बालक के पिता थे करसन जी माँ थी अमृतबाई।।
उस दम्पती से हम सबने इक अनमोल निधि पाई।
हम टंकारा की पुण्यभूमि को शीश झुकाते हैं।। 1।।
फिर नामकरण की विधि हुई इक दिन कर्सन जी के
घर।
अमृत बा का प्यारा बेटा बन गया मूलशंकर।।
पाँचवे वर्ष में स्वयं पिता ने अक्षरज्ञान दिया।
आठवें वर्ष में कुलगुरु ने उपवीत प्रदान किया।
इस तरह मूलजी जीवनपथ पर चरण बढ़ाते हैं।। 2।।
जब लगा चौदहवाँ साल तो इक दिन शिवरात्रि
आई।
उस रात की घटना से कुमार की बुद्धि चकराई।।
जिस घड़ि चढ़े शिव के सिर पर चूहे चोरी-चोरी।
मूलजी ने समझी तुरंत मूर्तिपूजा की कमजोरी।
हर महापुरुष के लक्षण बचपन में दिख जाते हैं।। 3।।
फिर इक दिन माँ से पुत्र बोला माँ दुनियाँ है
फानी।
मैं मुक्ति खोजने जाऊँगा पानी है ये जिन्दगानी।।
चुपचाप सुन रहे थे बेटे की बात पिता ज्ञानी।
जल्दी से उन्होंने उसका ब्याह कर देने की ठानी।।
इस भाँति ब्याह की तैयारी करसन जी कराते हैं।।
4।।
शादी की बात को सुनके युवक में क्रान्तिभाव
जागे।
वे गुपचुप एक सुनसान रात में घर से निकल भागे।।
तेजी से मूलजी में आए कुछ परिवर्तन भारी।
दीक्षा लेकर वो बने शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी।।
हम कभी-कभी भगवान की लीला समझ न पाते हैं।।
5।।
फिर जगह-जगह पर घूम युवक ने योगाभ्यास किया।
कुछ काल बाद पूर्णानन्द ने उनको संन्यास दिया।।
जिस दिवस शुद्ध चैतन्य यहाँ संन्यासी पद पाए।
वो स्वामी दयानन्द सरस्वती उस दिन से कहलाए।।
हम जगप्रसिद्ध इस नाम पे अपना हृदय लुटाते हैं।। 6।।
संन्यास बाद स्वामी जी ने की घोर तपश्चर्या।
सच्चे सद्गुरु की तलाश यही थी उनकी दिनचर्या।।
गुजरात से पहुँचे विन्ध्याचल फिर काटा पन्थ बड़ा।
फिर पार करके हरिद्वार हिमालय का रस्ता
पकड़ा।।
अब स्वामीजी के सफर की हम कुछ झलक दिखाते
हैं।। 7।।
तीर्थों में गए मेलों में गए वो गए पहाड़ों में।
जंगल में गए झाड़ी में गए वो गए अखाड़ों में।।
हर एक तपोवन तपस्थलि में योगीराज ठहरे।
पर हर मुकाम पर मिले उन्हें कुछ भेद भरे चेहरे।।
साधू से मिले सन्तों से मिले वृद्धों से मिले स्वामी।
जोगी से मिले यतियों से मिले सिद्धों से मिले
स्वामी।।
त्यागी से मिले तपसी से मिले वो मिले अक्खड़ों से।
ज्ञानी से मिले ध्यानी से मिले वो मिले फक्कड़ों
से।।
पर कोई जादू कर न सका मन पर स्वामी जी के।
सब ऊँची दूकानों के उन्हें पकवान लगे फीके।।
योगी का कलेजा टूट गया वो बहुत हताश हुए।
कोई सद्गुरु न मिला इससे वो बहुत निराश हुए।।
आँखों से छलकते आँसू स्वामी रोक न पाते हैं।। 8।।
इतने में अचानक अन्धकार में प्रकटा उजियाला।
प्रज्ञाचक्षु का पता मिला इक वृद्ध सन्त द्वारा।।
मथुरा में रहते थे एक सद्गुरु विरजानन्द नामी।
उनसे मिलने तत्काल चल पड़े दयानन्द स्वामी।।
आखिर इक दिन मथुरा पहुँचे तेजस्वी संन्यासी।
गुरु के दर्शन से निहाल हुई उनकी आँखे प्यासी।।
गुरु के अन्तर्चक्षुने पात्र को झट पहचान लिया।
उसकी प्रतिभा को पहले ही परिचय में जान
लिया।।
सद्गुरु की अनुमति मांग दयानन्द उनके शिष्य बने।
आगे चलकर के यही शिष्य भारत के भविष्य बने।।
गुरु आश्रम में स्वामी जी ने जमकर अभ्यास किया।
हर विद्या में पारंगत बन आत्मा का विकास
किया।।
जो कर्मठ होते हैं वो मंझिल पा ही जाते हैं।। 9।।
गुरुकृपा से इक दिन योगिराज वामन से विराट बने।
वो पूर्ण ज्ञान की दुनियाँ के अनुपम सम्राट बने।।
सब छात्रों में थे अपने दयानन्द बड़े बुद्धिशाली।
सारी शिक्षा बस तीन वर्ष में पूरी कर ड़ाली।।
जब शिक्षा पूर्ण हुई तो गुरुदक्षिणा के क्षण आए।
मुट्ठीभर लौंग स्वामी जी गुरु की भेंट हेतु लाए।।
जो लौंग दयानन्द लाए थे श्रद्धा से चाव से।
वो लौंग लिए गुरुजी ने बड़े ही उदास भाव से।।
स्वामी ने गुरु से विदा माँगी जब आई विदा घड़ी।
तब अन्ध गुरु की आँख में गंगा-यमुना उमड़ पड़ी।।
वो दृश्य देखकर हुई बड़ी स्वामी को हैरानी।
पर इतने में ही मुख से गुरु के निकल पड़ी वाणी।।
जो वाणी गुरुमुख से निकली वो हम दोहराते हैं।।
10।।
गुरु बोले सुनो दयानन्द मैं निज हृदय खोलता हूँ।
जिस बात ने मुझे रुलाया है वो बात बोलता हूँ।।
इन दिनों बड़ी दयनीय दशा है अपने भारत की।
हिल गईं हैं सारी बुनियादें इस भव्य इमारत की।।
पिस रही है जनता पाखण्डों की भीषण चक्की में।
आपस की फूट बनी है बाधा अपनी तरक्की में।।
है कुरीतियों की कारा में सारा समाज बन्दी।
संस्कृति के रक्षक बनें हैं भक्षक हुए हैं स्वच्छन्दी।।
कर दिया है गन्दा धर्म सरोवर मोटे मगरों ने।
जर्जरित जाति को जकड़ा है बदमाश अजगरों ने।।
भक्ति है छुपी मक्कारों के मजबूत शिकंजों में।
आर्यों की सभ्यता रोती है पापियों के फंदों में।।
गुरु की वाणी सुन स्वामी जी व्याकुल हो जाते हैं।।
12।।
गुरु फिर बोले ईश्वर बिकता अब खुले बजारों में।
आया है भयंकर परिवर्तन आचार-विचारों में।।
हर चबूतरे पर बैठी है बन-ठन कर चालाकी।
उस ठगनी ने है सबको ठगा कोई न रहा बाकी।।
बीमार है सारा देश चल रही है प्रतिकूल हवा।
दिखता है नहीं कोई ऐसा जो इसकी करे दवा।।
हे दयानन्द इस दुःखी देश का तुम उद्धार करो।
मँझधार में है बेड़ा बेटा तुम बेड़ा पार करो।।
इस अन्ध गुरु की यही है इच्छा इस पर ध्यान धरो।
भारत के लिए तुम अपना सारा जीवन दान करो।।
संकट में है अपनी जन्मभूमि तुम जाओ करो रक्षा।
जाओ बेटे भारत के भाग्य का तुम बदलो नक्शा।।
स्वामी जी गुरु की चरणधूल माथे पे लगाते हैं।। 13।।
गुरु की आज्ञा अनुसार इस तरह अपने ब्रह्मचारी।
करने को देश उद्धार चल पड़े बनके क्रान्तिकारी।।
कर दिया शुरु स्वामी जी ने एक धुँआधार दौरा।
हर नगर-गाँव के सभी कुम्भकर्णों को झँकझोरा।।
दिन-रात ऋषि ने घूम-घूम कर अपना वतन देखा।
जब अपना वतन देखा तो हर तरफ घोर पतन देखा।।
मन्दिरों पे कब्जा कर लिया था मिट्टी के
खिलौनों ने।
बदनाम किया था भक्ति को बदनीयत बौनों ने।।
रमणियाँ उतारा करती थी आरती महन्तों की।
वो दृश्य देखती रहती थी टोली श्रीमन्तों की।।
छिप-छिप कर लम्पट करते थे परदे में प्रेमलीला।
सारे समाज के जीवन का ढाँचा था हुआ ढीला।।
यह देख ऋषि सम्पूर्ण क्रान्ति का बिगुल बजाते हैं।।
14।।
क्रान्ति का करके ऐलान ऋषि मैदान में कूद पड़े।
उनके तेवर को देख हो गए सबके कान खड़े।।
इक हाथ में था झंडा उनके इक हाथ में थी लाठी।
वो चले बनाने हर हिन्दू को फिर से वेदपाठी।।
हरिद्वार में कुम्भ का मेला था ऐसा अवसर पाकर।
पाखण्ड खण्डनी ध्वजा गाड़ दी ऋषि ने वहाँ
जाकर।।
फिर लगे घुमाने संन्यासी जी खण्डन का खाण्डा।
कितने ही गुप्त बातों का उन्होंने फोड़ दिया
भाँडा।।
धज्जियाँ उड़ा दी स्वामी ने सब झूठे ग्रन्थों की।
बखिया उधेड़ कर रख दी सारे मिथ्या पन्थों की।।
ऋषिवर ने तर्क तराजू पर सब धर्मग्रन्थ तोले।
वेदों की तुलना में निकले वो सभी ग्रन्थ पोले।।
वेदों की महत्ता स्वामी जी सबको समझाते हैं।।
15।।
चलती थी हुकूमत हर तीरथ में लोभी पण्ड़ों की।
स्वामी ने पोल खोली उनके सारे हथकण्ड़ों की।।
आए करने ऋषि का विरोध गुण्डे हट्टे-कट्टे।
पर अपने वज्रपुरुष ने कर दिए उनके दाँत खट्टे।।
दुर्दशा देश की देख ऋषि को होती थी ग्लानि।
पुरखों की इज्जत पर फेरा था लुच्चों ने पानी।।
बन गए थे देश के देवालय लालच की दुकानें।
मन्दिरों में राम के बैठी थीं रावण की सन्तानें।।
स्वामी ने हर भ्रष्टाचारी का पर्दाफाश किया।
दम्भियों पे करके प्रहार हरेक पाखण्ड का नाश
किया।।
लाखों हिन्दू संगठित हुए वैदिक झंडे के तले।
जलनेवाले कुछ द्वेषी इस घटना से बहुत जले।।
इस तरह देश में परिवर्तन स्वामी जी लाते हैं।। 16।।
कुछ काल बाद स्वामी ने काशी जाने की ठानी।
उस कर्मकाण्ड की नगरी पर अपनी भृकुटि तानी।।
जब भरी सभा में स्वामी की आवाज बुलन्द हुई।
तब दंग हो गए लोग बोलती सबकी बन्द हुई।।
वेदों में मूर्तिपूजा है कहाँ स्वामी ने सवाल किया।
इस विकट प्रश्न ने सभी दिग्गजों को बेहाल
किया।।
काशीवालों ने बहुत सिर फोड़ा की माथापच्ची।
पर अन्त में निकली दयानन्द जी की ही बात
सच्ची।।
मच गया तहलका अभिमानी धर्माधिकारियों में।
भारी भगदड़ मच गई सभी पंडित-पुजारियों में।
इतिहास बताता है उस दिन काशी की हार हुई।
हर एक दिशा में ऋषिराजा की जय-जयकार हुई।।
अब हम कुछ और करिश्में स्वामी के बतलाते हैं।। 17।।
उन दिनों बोलती थी घर-घर में मर्दों की तूती।
हर पुरुष समझता था औरत को पैरों की जूती।।
ऋषि ने जुल्मों से छुड़वाया अबला बेचारी को।
जगदम्बा के सिंहासन पर बैठा दिया नारी को।।
बदकिस्मत बेवाओं के भाग भी उन्होंने चमकाए।
उनके हित नाना नारी निकेतन आश्रम खुलवाए।।
स्वामी जी देख सके ना विधवाओं की करुण व्यथा।
करवा दी शुरु तुरन्त उन्होंने पुनर्विवाह प्रथा।।
होता था धर्म परिवर्तन भारत में खुल्लम-खुल्ला।
जनता को नित्य भरमाते थे पादरी और मुल्ला।।
स्वामी ने उन्हें जब कसकर मारा शुद्धि का चाँटा।
सारे प्रपंचियों की दुनियाँ में छा गया सन्नाटा।।
फिर भक्तों के आग्रह से स्वामी मुम्बई जाते हैं।।
18।।
भारत के सब नगरों में नगर मुम्बई था भाग्यशाली।
ऋषि जी ने पहले आर्य समाज की नींव यहीं
डाली।।
फिर उसी वर्ष स्वामी से हमें सत्यार्थ प्रकाश
मिला।
मन पंछी को उड़ने के लिए नूतन आकाश मिला।।
सदियों से दूर खड़े थे जो अपने अछूत भाई।
ऋषि ने उनके सिर पर इज्जत की पगड़ी बँधवाई।।
जो तंग आ चुके थे अपमानित जीवन जीने से।
उन सब दलितों को लगा लिया स्वामी ने सीने से।।
मुम्बई के बाद इक रोज ऋषि पंजाब में जा निकले।
उनके चरणों के पीछे-पीछे लाखों चरण चले।।
लाखों लोगों ने मान लिया स्वामी को अपना गुरु।
सत्संग कथा प्रवचन कीर्तन घर-घर हो गए शुरु।।
स्वामी का जादू देख विरोधी भी चकराते हैं।।
19।।
पंजाब के बाद राजपूताना पहुँचे नरबंका।
देखते-देखते बजा वहाँ भी वेदों का डंका।।
अगणित जिज्ञासु आने लगे स्वामी की सभाओं में।
मच गई धूम वैदिक मन्त्रों की दसों दिशाओं में।।
सब भेद भाव की दीवारों को चकनाचूर किया।
सदियों का कूड़ा-करकट स्वामी जी ने दूर किया।।
ऋषि ने उपदेश से लाखों की तकदीर बदल डाली।
जो बिगड़ी थी वर्षों से वो तस्वीर बदल ड़ाली।।
फिर वीर भूमि मेवाड़ में पहुँचे अपने ऋषि ज्ञानी।
खुद उदयपुर के राणा ने की उनकी अगुवानी।।
राणा ने उनको देनी चाही एकलिंग जी की गादी।
पर वो महन्त की गादी ऋषि ने सविनय ठुकरा दी।।
इतने में जोधपुर का आमन्त्रण स्वामी पाते हैं।। 20।।
उन दिनों जोधपुर के शासन की बड़ी थी बदनामी।
भक्तों ने रोका फिर भी बेधड़क पहुँच गए स्वामी।।
जसवतसिंह के उस राज में था दुष्टों का बोलबाला।
राजा था विलासी इस कारण हर तरफ था
घोटाला।।
एक नीच तवायफ बनी थी राजा के मन की रानी।।
थी बड़ी चुलबुली वो चुड़ैल करती थी मनमानी।
स्वामी ने राजा को सुधारने किए अनेक जतन।।
पर बिलकुल नहीं बदल पाया राजा का चाल-चलन।।
कुलटा की पालकी को इक दिन राजा ने दिया
कन्धा।
स्वामी को भारी दुःख हुआ वो दृश्य देख गन्दा।।
स्वामी जी बोले हे राजन् तुम ये क्या करते हो।
तुम शेर पुत्र होकर के इक कुतिया पर मरते हो।।
स्वामी जी घोर गर्जन से सारा महल गुँजाते हैं।।
21।।
राजा ने तुरत माफी माँगी होकर के शर्मिन्दा।
पर आग-बबूला हो गई वेश्या सह न सकी निन्दा।।
षडयन्त्र रचा ऋषि के विरुद्ध कुलटा पिशाचिनी ने।
जहरीला जाल बिछाया उस विकराल साँपिनी
ने।।
वेश्या ने ऋषि के रसोइये पर दौलत बरसा दी।
पाकर सम्पदा अपार वो पापी बन गया अपराधी।।
सेवक ने रात में दूध में गुप-चुप संखिया मिला दिया।
फिर काँच का चूरा ड़ाल ऋषिराजा को पिला
दिया।।
वो ले ऋषि ने पी लिया दूध वो मधुर स्वाद वाला।
पर फौरन स्वामी भाँप गए कुछ दाल में है काला।।
अपने सेवक को तुरन्त ही बुलवाया स्वामी ने।
खुद उसके मुख से सकल भेद खुलवाया स्वामी ने।।
पश्चातापी को महामना नेपाल भगाते हैं।। 22।।
आए डाक्टर आए हकीम और वैद्यराज आए।
पर दवा किसी की नहीं लगी सब के सब घबराए।।
तब रुग्ण ऋषि को जोधपुर से ले जाया गया आबू।
पर वहाँ भी उनके रोग पे कोई पा न सका काबू।।
आबू के बाद अजमेर उन्हें भक्तों ने पहुँचाया।
कुछ ही दिन में ऋषि समझ गए अब अन्तकाल आया।।
वे बोले हे प्रभू तूने मेरे संग खूब खेल खेला।
तेरी इच्छा से मैं समेटता हूँ जीवनलीला।।
बस एक यही बिनति है मेरी हे अन्तर्यामी।
मेरे बच्चों को तू सँभालना जगपालक स्वामी।।
जब अन्त घड़ि आई तो ऋषि ने ओ3म् शब्द बोला।
केवल ओम् शब्द बोला।
फिर चुपके से धर दिया धरा पर नाशवान् चोला।।
इस तरह ऋषि तन का पिंजरा खाली कर जाते हैं।।
23।।
संसार के आर्यों सुनो हमारा गीत है इक गागर।
इस गागर में हम कैसे भरें ऋषि महिमा का सागर।।
स्वामी जी क्या थे कैसे थे हम ये न बता सकते।
उनकी गुण गरिमा अल्प समय में हम नहीं गा सकते।।
सच पूछो तो भगवान का इक वरदान थे स्वामी जी।
हर दशकन्धर के लिए राम का बाण थे स्वामी जी।।
प्रतिभा के धनि एक जबरदस्त इन्सान थे स्वामी जी।
हिन्दी हिन्दू और हिन्दुस्थान के प्राण थे स्वामी
जी।।
क्या बर्मा क्या मॉरिशस क्या सुरिनाम क्या
फीजी।
इन सब देशों में विद्यमान् हैं आज भी स्वामी जी।।
केनिया गुआना त्रिनिदाद सिंगापुर युगण्डा।
उड़ रहा सब जगह बड़ी शान से आर्यों का झंड़ा।।
हर आर्य समाज में आज भी स्वामी जी मुस्काते हैं।।
24।।
ओ३म


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