Monday, April 16, 2018

धन कमाने वाले प्रायः सभी लोग यह मानते हैं कि *मैंने जो धन कमाया है उस पर सिर्फ मेरा ही अधिकार है ।...

धन कमाने वाले प्रायः सभी लोग यह मानते हैं कि *मैंने जो धन कमाया है उस पर सिर्फ मेरा ही अधिकार है । मेरी इच्छा जहां होगी मैं वहां वैसे उतना खर्च करूंगा ।* यह सोच गलत है । क्योंकि आप जो धन कमाया, वह आप तब कमा पाए , जब बचपन से आपके माता पिता ने आपको पाल-पोसकर खिला-पिलाकर बड़ा किया । आपके गुरुजनों ने आपको अनेक विद्या सिखाईं । अन्य भी अनेक विद्वानों संन्यासियों महात्माओं ने आपको शिक्षा दी । ईश्वर ने भी आपके खाने पीने के लिए तरह तरह के अनाज फल फूल साग सब्जियां और सूर्य चंद्रमा पृथ्वी जल अग्नि इत्यादि पदार्थ बनाए। और इन पदार्थों की सहायता से आप इतने बलवान बुद्धिमान विद्वान धनवान एवं समर्थ बन पाए।

ईश्वर, माता पिता और गुरु जनों के अतिरिक्त, देशभर के लोगों ने भी आपके लिए रेल बनाई सड़क बनाई बिजली बनाई टेलीफोन बनाया कंप्यूटर बनाया टेलीविजन बनाया मोबाइल फोन बनाया जिन पदार्थों की सहायता से आप इतने समर्थ हुए और ₹2 कमा पाए ।

यदि ये सब लोग आपकी सहायता न करते , तो आप कुछ भी नहीं कमा पाते, और ना ही इतने स्वस्थ, बलवान व धनवान होते। इसलिए इन सब का उपकार मानना चाहिए। और इनकी सहायता से जो धन आपने कमाया , उस धन पर इन सब लोगों का भी कुछ हिस्सा अधिकार मानना चाहिए । तथा उनके लिए कुछ खर्च दान आदि भी करना चाहिए। यही बुद्धिमत्ता है और यही न्याय है । -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


from Tumblr https://ift.tt/2viWjhY
via IFTTT

Saturday, April 14, 2018

इतनी सीधी-सरल बात तो सभी समझ सकते हैं कि बच्चों का ज्ञान अनुभव आदि कम होता है। और उनके माता-पिता का...

इतनी सीधी-सरल बात तो सभी समझ सकते हैं कि बच्चों का ज्ञान अनुभव आदि कम होता है। और उनके माता-पिता का ज्ञान अनुभव आदि बच्चों की तुलना में अधिक होता है। संसार में सबसे उत्तम वस्तु है ज्ञान। जिसका ज्ञान शुद्ध है और उसके अनुसार आचरण भी ठीक है , वही व्यक्ति संसार में सुखी हो सकता है ।

तो माता-पिता का ज्ञान बालक के ज्ञान से अधिक है , और यदि आचरण भी वैसा ही हो , तो बालकों को अपने माता-पिता का अनुसरण करना चाहिए।


जो बच्चे अपने माता-पिता के ज्ञान और आचरण को अपना लेते हैं, उनके निर्देश आदेश संदेश का पालन करते हैं , वे संसार में सुखी होते हैं और जीवन में बहुत अच्छा विकास करते हैं ।

जो बच्चे अपने माता पिता की बात नहीं मानते , वे सदा दुखी और परेशान रहते हैं , उनके जीवन का विकास ठीक नहीं होता। और बुढ़ापे में वे खूब पछताते हैं कि हमने अपने माता-पिता के अनुभवों का लाभ नहीं लिया। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


from Tumblr https://ift.tt/2HyQUFX
via IFTTT

Friday, April 13, 2018

कर्मफल का शाश्वत सिद्धांत है कि *जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलेगा*। वास्तव में फल मिलता नहीं है ,...

कर्मफल का शाश्वत सिद्धांत है कि *जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलेगा*।

वास्तव में फल मिलता नहीं है , फल न्याय पूर्वक सोच समझ कर माप तोल कर दिया जाता है। मोटी भाषा में लोग कह देते हैं, वैसा फल मिलेगा ।

कोई नौकर किसी सेठ के यहां नौकरी करता है , तो उसे वेतन मिलता नहीं है, सेठ अपने हाथ से उसे नापतोल कर वेतन देता है। यह उसका कर्म फल है ।


तो जिस व्यक्ति के जीवन में अच्छे गुण हों, उन गुणों के कारण वह अच्छे अच्छे कर्म करता हो , तो निश्चित रुप से उसे अच्छा ही फल मिलेगा , कुछ इस जन्म में और कुछ अगले जन्मों में। जब जिस कर्म का फल प्राप्त होने का समय आएगा , उसी समय उसको फल दिया जाएगा। चाहे समाज और सरकार देवे, चाहे ईश्वर देवे। इसलिए फल प्राप्ति में कभी संशय नहीं करना चाहिए।

लोग फल प्राप्ति में जल्दबाजी करते हैं । ठीक समय की प्रतीक्षा नहीं करते , और चिल्लाने लगते हैं कि अब तक हमें हमारे अच्छे कर्मों का फल नहीं मिला , अब तक हमें अच्छा फल नहीं मिला । यह कोई नहीं कहता कि *अब तक हमें हमारे बुरे कर्मों का दंड क्यों नहीं मिला?*

तो चिंता ना करें अच्छे बुरे सभी कर्मों का फल समय आने पर अवश्य मिलेगा। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


from Tumblr https://ift.tt/2HgBfgP
via IFTTT

*नम्रता और अभिमान* ये दोनों विरोधी तत्व हैं। प्रायः लोग नम्रता की प्रशंसा करते हैं फिर भी उसे जीवन...

*नम्रता और अभिमान* ये दोनों विरोधी तत्व हैं। प्रायः लोग नम्रता की प्रशंसा करते हैं फिर भी उसे जीवन में ला नहीं पाते।

इसी प्रकार से अभिमान की बहुत निंदा करते हैं, फिर भी उसे छोड़ नहीं पाते ।

कोई बात नहीं । किसी भी दोष को छोड़ने के लिए और गुण को धारण करने के लिए बार बार पुरुषार्थ करना चाहिए , चाहे जितनी बार भी असफल हों, तब भी कभी निराश नहीं होना चाहिए , सफलता एक दिन अवश्य मिलेगी ।

तो *नम्रता ही अच्छी है , यही सुखदायक है , समाज में प्रतिष्ठा जनक है । जबकि अभिमान बुद्धि का विनाशक है, दुखदायक है, प्रतिष्ठा को धूल में मिलाने वाला है* ।

ऐसा बार-बार सोचें। ऐसा कुछ प्रयास करने के बाद, आप का अभिमान धीरे-धीरे कम होने लगेगा, और नम्रता बढ़ने लगेगी । तब देखिएगा, जीवन में कितना आनंद होगा। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ।


from Tumblr https://ift.tt/2qu7qP9
via IFTTT

Thursday, April 5, 2018

● सभी स्वाध्यायशील पुस्तक प्रेमियों को एक अनुरोध…नीचे दी जा रही लिंक्स को स्टार ★ करके...

● सभी स्वाध्यायशील पुस्तक प्रेमियों को एक अनुरोध…

नीचे दी जा रही लिंक्स को स्टार ★ करके सुरक्षित रखें। इन सभी लिंक्स में विषयानुरूप और सेंकडो हिंदी - अंग्रेजी पुस्तकें सम्मिलित होने वाली है।
                   👇🏼👇🏼👇🏼

👇🏼 महापुरुषों के जीवन चरित संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1-ZD_Eq-SYkx1UmX4a7693ayD382G0JQv

👇🏼 स्वामी दयानन्द सरस्वती विषयक ग्रन्थ संग्रह संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=16pMp0wlopdqKkApFPYSz_wvGeaNvhhPW

👇🏼 महर्षि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1jC__V4uKRAjqi6SXrYc-aqsqV21CbNd5

👇🏼 खण्डन-मंडन पुस्तक संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1XXBovQ-rqNjKQC4vpgH-pBnIav9jl6J7

👇 श्री कृष्ण विषयक पुस्तक संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1Ex0AZkFUgvNgU6VEG0s2BntIUse_TjKz

👇🏼 वैदिक साहित्य संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1oRxZ4o-d1XZ59sMm4RhJlVZ_JyZxQ479

👇🏼 इस्लाम विषयक खण्डनात्मक पुस्तकें

https://drive.google.com/folderview?id=1MKu2JIZKbCNG_zPf8x7i_rD8n-m2PNJG

👇🏼 ईसाई मत खंडन पुस्तकें

https://drive.google.com/folderview?id=1mPIecrRVKT-SOkMEbvrXWnUHvDIFtCrj

👇🏼 इतिहास विषयक पुस्तक संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1yoJc0hhHt2d9aVMDsZVOZVWTtXQOM9EG

🙏🏻 Read and encourage others to read… स्वयं पढ़े और दूसरों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें।🙏🏻


from Tumblr https://ift.tt/2IvBvW8
via IFTTT

Wednesday, April 4, 2018

लघु आत्म कथा









लघु आत्म कथा


from Tumblr https://ift.tt/2GAhkG7
via IFTTT

Tuesday, April 3, 2018

।।ओ३म्।।सही ‘हनुमान् चालीसा’:-यह नया ‘हनुमान् चालीसा’ लिखने का उद्देश्य केवल यह है कि सभी धर्मप्रेमी...

।।ओ३म्।।

सही ‘हनुमान् चालीसा’:-


यह नया ‘हनुमान् चालीसा’ 

लिखने का उद्देश्य केवल यह है कि सभी धर्मप्रेमी सज्जन महावीर हनुमान् के नाम पर फैल रहे अंधविश्वास,पाखंड और को त्याग कर हनुमान् के यथार्थ चरित्र की विशेषताओं को जान सके, उनके सद्गुणों को अपने जीवनों में धारण कर सकें तथा सच्चे ईश्वरभक्त बनकर अपने जीवनों को सुखी बना सकें।


‘ओ३म्’

‘हनुमान् चालीसा’

करता हूँ वर्णन यहाँ,करके प्रभु का ध्यान।

सुनो वीर हनुमान् का,सुखदाई गुणगान॥


1-पितु पवन थे अंजना माता।

उनके घर जन्मा दुख-त्राता॥


2-चैत्र वदि शुभ अष्टमी आई।

मंगलवार जन्म सुखदाई॥


3-सुन्दरतम हनु अंग सुहाए।

इसीलिए हनुमान् कहाए॥


4-मात-पिता प्रभु के गुण गाते।

बालक को बलवान बनाते॥


5-रवि-सम तेजस्वी मुख पाया।

हृष्ट-पुष्ट सुन्दरतम काया॥


6-ऋषि अगस्त्य के गुरुकुल आए।

वैदिक विद्या पढ़ सुख पाए॥


7-वेद ज्ञान-विज्ञान पढे थे।

सदाचार के पंथ बढ़े थे॥


8-मल्ल-युद्ध गदा थे प्यारे।

नहीं किसी से डरे न हारे॥


9-मात-पिता,गुरु भक्त कहाते।

उठकर प्रात: शीश झुकाते॥


10-शक्ति,शील,सौन्दर्य सारे।

महावीर विनम्र थे प्यारे॥


11-वेद-पाठ सुन्दरतम गाते।

श्रोता मंत्र-मुग्ध हो जाते॥


12-नीति-निपुण,रक्षा सज्जन के।

न्याय करें प्यारे जन-जन के॥


13-संध्या और हवन नित करते।

वेद-ज्ञान,सद्गुण मन धरते॥


14-ब्रह्मचर्य-व्रत जीवन धारे।

सत्य,न्याय,परहित ही प्यारे॥


15-अतुलित बल,यौवन-धन पाया।

संयम का जीवन अपनाया॥


16-परमेश्वर का ध्यान लगाते।

ओम-ओम ही जपते जाते॥


17-प्राण साधना अद्भुत करते।

अनुपम बल तन-मन में भरते॥


18-परमेश्वर का दर्शन पाया।

मानव-जीवन सफल बनाया॥


19-वन-रक्षक अनुपम नर नेता।

सब युद्धों में रहे विजेता॥


20-त्याग तपस्या अनुपम पाए।

सकल विश्व उनके गुण गाए॥


21-मित्र सहायक बनकर आए।

अद्भुत सेना-नायक पाए॥


22-दृढ़ प्रतिज्ञ हनुमान् हमारे।

दुष्ट गदा से रण में मारे॥


23-कभी नहीं विचलित होते थे।

नहीं धीरता को खोते थे॥


24-वेद-ज्ञान के पण्डित भारी।

दिव्य,तपस्वी,शोभा प्यारी॥


25-सन्तजनों की सेवा करते।

उनके सब दु:खों को हरते॥


26-नारी का सम्मान बढ़ाते।

सन्नारी को शीश झुकाते॥


27-रामचन्द्र सुग्रीव मिलाए।

बने सहायक दुख मिटाए॥


28-रामदूत बनकर सुख चाहा।

दिया वचन जो उसे निबाहा॥


29-लाँघ सिन्धु लंका में आए।

सीता को खोजा सुख पाए॥


30-रावण को सब कुछ समझाया।


from Tumblr https://ift.tt/2JfSc9o
via IFTTT

वैदिक दर्शन भाष्यकार – आचार्य उदयवीर शास्त्री जीदर्शन शब्द की व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ – “दृश्यतेऽनेन...

वैदिक दर्शन 

भाष्यकार – आचार्य उदयवीर शास्त्री जी


दर्शन शब्द की व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ – “दृश्यतेऽनेन इति दर्शनम्” से सम्यक दृष्टिकोण ही दर्शन है अर्थात् समग्रता को यथार्थरूप में कहने वाला दर्शन है। जो पदार्थ जैसा है, उसे वैसा ही उपदेश करना सत्य है और यही सत्य दर्शनों द्वारा प्रतिपादित किया गया है। वेद को प्रमाणित मानने वाले छः दर्शन है, इन्हीं को वैदिक दर्शन या षड्दर्शन कहते हैं। ये छः दर्शन है – न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त।


महर्षि दयानन्द जी ने अपने ग्रन्थ “सत्यार्थप्रकाश” में दर्शनों के अध्ययन-अध्यापन की विधि का उल्लेख किया है – 

“तदनन्तर पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त अर्थात् जहाँ तक बन सके, वहाँ तक ऋषिकृत व्याख्यासहित अथवा उत्तम विद्वानों की सरल व्याख्यायुक्त छः शास्त्रों को पढे-पढावें” – सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास3 

इससे दर्शनों के महत्त्व का ज्ञान होता है।


सभी दर्शनों में कुछ समानताएं हैं, जो निम्न प्रकार है – 

1 सभी में वैदिक मङ्गलाचरण ‘अथ’ शब्द से होता है।

2 सभी दर्शनों में प्रथम सूत्र में ही अपना प्रतिपाद्य विषय निश्चित है। 

3 सभी दर्शन उद्देश्य कथन के उपरान्त, उसका लक्षण बताते हैं, पुनः शेष शास्त्र में उसका परीक्षण करते हैं।

4 सभी शास्त्रों की शैली सूत्ररूप अर्थात् संक्षेप में कहने की है।

5 सभी शास्त्र अपने प्रधान विषय का परिज्ञान करने के साथ-साथ अनेक उपविषयों का भी परिज्ञान कराते हैं। 

6 सभी शास्त्र वेदों को प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं।

7 सभी शास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।


इन सभी दर्शनों के अपने-अपने विषय है। जिनका संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जाता है – 

1 मीमांसा दर्शन – इसमें धर्म एवम् धर्मी पर विचार किया गया है। यह यज्ञों की दार्शनिक विवेचना करता है लेकिन साथ-साथ यह अनेक विषयों का वर्णन करता है। इसमें वेदों का नित्यत्व और अन्य शास्त्रों के प्रमाण विषय पर विवेचना प्रस्तुत की गई है। 

2 न्याय दर्शन – इस दर्शन में किसी भी कथन को परखने के लिए प्रमाणों का निरुपण किया है। इसमें शरीर, इन्द्रियों, आत्मा, वेद, कर्मफल, पुनर्जन्म आदि विषयों पर गम्भीर विवेचना प्राप्त होती है। 

3 योग दर्शन – इस दर्शन में ध्येय पदार्थों के साक्षात्कार करने की विधियों का निरुपण किया गया है। ईश्वर, जीव, प्रकृति इनका स्पष्टरूप से कथन किया गया है। योग की विभुतियों और योगी के लिए आवश्यक कर्तव्य-कर्मों का इसमें विधान किया गया है। 

4 सांख्य दर्शन – इस दर्शन में जगत के उपादान कारण प्रकृति के स्वरूप का वर्णन, सत्त्वादिगुणों का साधर्म्य-वैधर्म्य और उनके कार्यों का लक्षण दिया गया है। 

त्रिविध दुःखों से निवृत्ति रूप मोक्ष का विवेचन किया है। 

5 वैशेषिक दर्शन – इसमें द्रव्य को धर्मी मानकर गुण आदि को धर्म मानकर विचार किया है। छः द्रव्य और उसके 24 गुण मानकर उनका साधर्म्य-वैधर्म्य स्थापित किया है। भौत्तिक-विज्ञान सम्बन्धित अनेंको विषयों को इसमें सम्मलित किया गया है। 

6 वेदान्त दर्शन – इस दर्शन में ब्रह्म के स्वरूप का विवेचन किया है तथा ब्रह्म का प्रकृति, जीव से सम्बन्ध स्थापित किया है। उपनिषदों के अनेकों स्थलों का इस ग्रन्थ में स्पष्टीकरण किया गया है।


इन सभी दर्शनों पर सरल और विस्तृत भाष्य आचार्य उदयवीर शास्त्री द्वारा रचित है। यह भाष्य दर्शनों के वास्तविक अभिप्राय को प्रकट करता है। इस भाष्य समुच्चय में प्रत्येक दर्शन भाष्य से पूर्व विस्तृत भूमिका दी गई है और अन्त में सूत्रानुक्रमणिका दी गई है। दर्शनों को आत्मसाद् करने के लिए इस दर्शन समुच्चय को अवश्य प्राप्त कर, अध्ययन करें।


प्राप्ति स्थान - vedrishi.com


from Tumblr https://ift.tt/2uNmlcC
via IFTTT

*विभिन्न रोग और उनका उपचार*1.नीम की लकड़ी कोपानी में घिसकर एक इंच मोटा लेप फोड़े पर लगायें।इससे फोड़ा...

*विभिन्न रोग और उनका उपचार*


1.नीम की लकड़ी कोपानी में घिसकर एक इंच मोटा लेप फोड़े पर लगायें।इससे फोड़ा समाप्त हो जाता है।

2. नकसीर (नाक में से खून का आना) :नीम की पत्तियों और अजवायन को बराबरमात्रा में पीसकर कनपटियों पर लेप करने सेनकसीर का चलना बन्द हो जाता है।

3. बालों का असमय में सफेद होना (पालित्य रोग) :नीम के बीजों के तेल को 2-2 बूंद नाक सेलेने से और केवल गाय के दूध का सेवन करने से पालित्य रोग में लाभ होता है।

4. नीम के तेल को सूंघने से बाल काले हो जाते हैं।नीम के बीजों को भांगरा और विजयसार केरस की कई भावनाएं देकर बीजों का तेलनिकाल लें, फिर इसकी 2-2 बूंदों को नाक से लेने से तथाआहार में केवल दूध और भात खाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं।

5.बालों की रूसी :एक मुट्टी नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकरनहाने से 1 घंटे पहले सिर पर मलने से रूसी मिटजाती है।

6. नीम की निबौलियों को सुखाकरअरीठा के साथ मिलाकर बारीकपीसकर रख लें। इसे 2 चम्मच भर एक गिलास गर्मपानी में घोलकर सिर को धो लेने से सिर कीजूंएं, लीखें, सिर की दुर्गन्ध खत्म होजाती है तथा बाल काले और मुलायम होते हैं।

7. नीम के पत्तों को पीसकर पानीमें उबालकर ठंड़ा होने दें। इसके बाद इसे छानकर इससे सिर को धोलें और बालों को सही तरह से मालिश करें। बालों केसूख जाने पर स्वच्छ एरण्ड का तेल और नारियल का तेल बराबरमात्रा में लेकर इसे मिला लें और इससे सिर कीअच्छी तरह से मालिश करें। इससे सिर कीरूसी मिट जाएगी।


from Tumblr https://ift.tt/2H6t4kv
via IFTTT

➡ *क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:❓❓❓❓❓*1. *लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):*“...

➡ *क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:❓❓❓❓❓*


1. *लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):*

“ वैदिक धर्म और आर्य सभ्यता ही एक दिन दुनिया पर राज करेगी क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है"।


2. *हर्बर्ट वेल्स (1846 - 1946):*

” वेदों का सनातन धर्म का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा तभी एकदिन पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित हो जाएगी और उसी दिन ही दिल शाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी सलाम हो उस दिन “।


3. *अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 - 1955):*

"मैं समझता हूँ कि आर्यों ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो यहूदी न कर सके, वेदों मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है"।


4. *हसटन स्मिथ (1919):*

"जो विश्वास हम पर है और इस हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो वेद आधारित सनातन धर्म है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी"।


5. *माइकल नोस्टरीडाम (1503 - 1566):*

” वैदिक सनातन धर्म ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर आर्य लोगों की राजधानी बन जाएगा"।


6. *बर्टरांड रोसल (1872 - 1970):*

“मैंने वेदों को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है, वैदिक धर्म पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में सनातन धर्म के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि आर्य संस्कृति ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा "।


7. *गोस्टा लोबोन (1841 - 1931):*

” वैदिक धर्म ज्ञान ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार के ही विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ"।


8. *बरनार्डशा (1856 - 1950):*

“सारी दुनिया एक दिन सनातन धर्म स्वीकार कर लेगी, अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी।

पश्चिम एक दिन सनातन धर्म स्वीकार कर लेगा और वेद ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा "।


9. *जोहान गीथ (1749 - 1832):*

"हम सभी को अभी या बाद मे सनातन धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है, मुझे कोई आर्य कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा,

मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ।



*जय आर्य जय वैदिक धर्म*

🙏🏼 *जय आर्यावर्त राष्ट्र की* 🙏


📍📍📍📍📍📍📍📍📍

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩


from Tumblr https://ift.tt/2q1mbJ3
via IFTTT

Saturday, March 31, 2018

Photo




from Tumblr https://ift.tt/2pSz3lI
via IFTTT

व्यक्ति जोश में कभी भी कुछ भी बोल देता है और बाद में पछताता है, कि मैंने किस को क्या बोल दिया ? बाद...

व्यक्ति जोश में कभी भी कुछ भी बोल देता है और बाद में पछताता है, कि मैंने किस को क्या बोल दिया ?

बाद में पश्चाताप न करना पड़े , इसलिए वाणी पर संयम रखें । सोच समझकर बोलें , किसी के बारे में कुछ भी बोलें, तो प्रमाणों से परीक्षा करके बोलें । नापतोल कर बोलें, मीठी भाषा बोलें, सभ्यता पूर्ण भाषा बोलें , कठोर भाषा बोलने पर अथवा गलत विवरण बोलने पर यदि अपना विवरण वापस भी लेना पड़े , तो उसमें कष्ट न हो, इस तरह से बहुत सोच विचार कर बोलना चाहिए ।

क्योंकि लोग आपकी भाषा से ही आपके मन को पहचानेंगे , आपके व्यक्तित्व को पहचानेंगे, आपकी भावनाओं को पहचानेंगे ।

अनेक बार व्यक्ति कहता है , नहीं नहीं , मेरा यह अभिप्राय नहीं था ।

तो जो अभिप्राय था वही शब्द बोलने चाहिएँ थे न !!!

क्योंकि आपके मन के अभिप्राय को आपके शब्दों से ही तो पहचाना जाएगा! मन में अभिप्राय कुछ और हो तथा आपके शब्द कुछ और हों, तो लोग कैसे पहचानेंगे , आप के मन की बात?

शब्दों से ही आपके विचारों की अभिव्यक्ति होती है।

इसलिए बोलने में सदा सावधान रहें। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


from Tumblr https://ift.tt/2uz0ENx
via IFTTT

Thursday, March 29, 2018

आत्माएं सब अनादि हैं। सब की आयु एक समान है। शरीर की आयु के कारण हम किसी को छोटा बड़ा मान लेते हैं ।...

आत्माएं सब अनादि हैं। सब की आयु एक समान है। शरीर की आयु के कारण हम किसी को छोटा बड़ा मान लेते हैं ।

परंतु एक जन्म में प्राप्त किए गुण , दूसरे जन्म में साथ चलते हैं । यदि कोई पिछले जन्म का 80 वर्ष का वृद्ध व्यक्ति अनेक गुण साथ लेकर मरा , तो इस जन्म में 10/15 वर्ष की आयु में उसमें वे गुण विशेष दिखाई देंगे ।

तब कोई सोचे कि मैं तो 40 वर्ष का हूं मैं इस 15 वर्ष के बच्चे से क्यों सीखूं? तो यह उसका सोचना गलत है ।

इस शरीर में वह बच्चा भले ही 15 वर्ष का है परंतु उसमें जो गुण हैं, वे तो उसने पिछले जन्म में 80 वर्ष की आयु तक सीखे थे। इसलिए आयु से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ेगा, बल्कि गुणों से लाभ लेना चाहिए । गुण सीख कर अपनी उन्नति करनी चाहिए ।


from Tumblr https://ift.tt/2pPKCJG
via IFTTT

जीवन में सभी लोग अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मात्रा में सफल होते हैं । परंतु कुछ लोग विशेष ऊंची...

जीवन में सभी लोग अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मात्रा में सफल होते हैं । परंतु कुछ लोग विशेष ऊंची सफलताएं भी प्राप्त करते हैं । आप भी यदि कोई ऐसी ऊंची सफलता प्राप्त करना चाहते हों, तो कर सकते हैं । बस मन में वही एक लक्ष्य हो , तीव्र इच्छा हो, पूरा बल लगाएं , मन में लक्ष्य प्राप्ति का एक पागलपन सा हो , तो फिर सफलता में कोई बाधा नहीं है।


from Tumblr https://ift.tt/2J4mlID
via IFTTT

प्रत्येक व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र है । वह अपनी इच्छा से , अपनी बुद्धि से, अपने संस्कारों से...

प्रत्येक व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र है । वह अपनी इच्छा से , अपनी बुद्धि से, अपने संस्कारों से सारे काम करता है , चाहे वे गलत हों या सही हों । उसको जो सही लगता है वह व्यक्ति उसी काम को करता है , जैसे रावण और दुर्योधन का उदाहरण आप सब जानते हैं ।

फिर जब ईश्वर सबको मन में सुझाव देता है कि बुरे काम मत करो , अच्छे काम करो । बुरे काम करते समय ईश्वर मन में भय शंका लज्जा उत्पन्न करता है । और अच्छे काम करते समय उत्साह आनंद निर्भयता उत्पन्न करता है। बस यहीं तक ईश्वर की सीमा है । इसके बाद व्यक्ति स्वतंत्र है वह ईश्वर का सुझाव माने , या ना माने ।

जो नहीं मानता और बुरे काम करता ही रहता है, तब ईश्वर उसके कर्मानुसार उसे दंड देता है , और उसकी बुद्धि कम कर देता है । उसे चिंता तनाव आदि उत्पन्न कर देता है । ऐसा करने से उसकी बुद्धि का पेच ढीला हो जाता है । और फिर उतनी ही उन्नति कर पाता है जितना उसकी बुद्धि काम करती है ।

तब वह उल्टे सीधे काम करके दंड भोगता है । और बहुत बाद में उसे समझ में आता है कि मुझे अच्छे काम करने चाहिएँ , बुरे नहीं । इस प्रकार से ईश्वर उसका भी सुधार करता है। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


from Tumblr https://ift.tt/2pOEJME
via IFTTT

आपस में अनेक प्रकार के व्यवहार होते रहते हैं । कभी आप किसी पर गुस्सा करते हैं , कभी कोई दूसरा आप पर...

आपस में अनेक प्रकार के व्यवहार होते रहते हैं । कभी आप किसी पर गुस्सा करते हैं , कभी कोई दूसरा आप पर गुस्सा करता है ।

जैसीभी परिस्थिति हो, जब कोई दूसरा आपके साथ दुर्व्यवहार करे , तो उसकी प्रतिक्रिया करने से पहले , कुछ उसकी परिस्थिति को भी समझ लेना चाहिए ।

अनेक बार आप उसकी परिस्थिति समझकर, उसकी मजबूरी जानकर, आप उस पर गुस्सा नहीं करेंगे । और एक नया अपराध करने से बच जाएंगे ।

इसलिए कभी भी जल्दबाजी ना करें । शांति से सोच-समझकर काम करें। आप जीवन में प्रसन्न और आनंदित रहेंगे। यदि बिना सोचे समझे काम करेंगे, तो बाद में पछताएंगे। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


from Tumblr https://ift.tt/2J1LXFS
via IFTTT

यज्ञ बहुत ही पवित्र उत्तम कर्म है । यज्ञ से बड़े-बड़े लाभ होते हैं । प्रदूषण का निवारण , स्वास्थ्य...

यज्ञ बहुत ही पवित्र उत्तम कर्म है । यज्ञ से बड़े-बड़े लाभ होते हैं । प्रदूषण का निवारण , स्वास्थ्य की रक्षा, रोगों से बचाव , शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का बढ़ना , ईश्वर की भक्ति , आध्यात्मिक उन्नति , काम क्रोध लोभ आदि दोषों का घटना, इत्यादि अनेक लाभ होते हैं।

जो लोग यज्ञ करके फिर अपने सांसारिक कार्यों को आरंभ करते हैं , उन कार्यों में सफलता मिलती है। क्योंकि उनके पीछे इस यज्ञ नामक उत्तम कर्म का प्रभाव साथ में जुड़ा होता है ।

इसलिए प्रतिदिन अपने घर में अथवा कार्यालय में यथासंभव यज्ञ का अनुष्ठान अवश्य करें । उसके बाद ही अन्य सांसारिक कार्य आरंभ करें। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


from Tumblr https://ift.tt/2pPKv0I
via IFTTT

ऋग्वेद के अनुसार जो अनाज खेतों मे पैदा होता है, उसका बंटवारा तो देखिए…1- जमीन से चार अंगुल...

ऋग्वेद के अनुसार जो अनाज खेतों मे पैदा होता है, उसका बंटवारा तो देखिए…


1- जमीन से चार अंगुल भूमि का,

2- गेहूं के बाली के नीचे का पशुओं का,

3- पहली फसल की पहली बाली अग्नि की,

4- बाली से गेहूं अलग करने पर मूठ्ठी भर दाना पंछियो का,

5- गेहूं का आटा बनाने पर मुट्ठी भर आटा चीटियों का,

6- चुटकी भर गुथा आटा मछलियों का,

7- फिर उस आटे की पहली रोटी गौमाता की,

8- पहली थाली घर के बुज़ुर्ग़ो की

9- फिर हमारी थाली,

10- आखिरी रोटी कुत्ते की,

ये हमें सिखाती है, हमारी संस्कृति और…


मुझे गर्व है कि मैं इस संस्कृति का हिस्सा हूँ ।

🙏🙏🙏


from Tumblr https://ift.tt/2J5AmFF
via IFTTT

जो व्यक्ति यज्ञ नहीं करता अर्थात शुभ कर्मों का आचरण नहीं करता , तो वह कुछ ना कुछ तो करेगा, खाली तो...

जो व्यक्ति यज्ञ नहीं करता अर्थात शुभ कर्मों का आचरण नहीं करता , तो वह कुछ ना कुछ तो करेगा, खाली तो सारा दिन कोई बैठ नहीं सकता।

यदि शुभ कर्म नहीं करेगा। तो अशुभ कर्म करेगा। यदि अशुभ कर्म करेगा, तो सदा दुखी, खिन्न, परेशान, और भयभीत भी रहेगा

ही। यदि अशुभ कर्म करेगा तो समाज में उसकी प्रतिष्ठा भी नष्ट हो जाएगी, उसका प्रभाव समाप्त हो जाएगा लोग उसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखेंगे। मूर्ख और दुष्ट व्यक्ति के रूप में देखेंगे । इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह सदा अच्छे ही काम करता रहे तथा जिस से समाज में परिवार में उसका उत्तम प्रभाव बना रहे। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


from Tumblr https://ift.tt/2pOEAZC
via IFTTT

भारतीय परंपरा में करोड़ों व्यक्ति स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा रखते हैं । परंतु वे जानते नहीं हैं कि...

भारतीय परंपरा में करोड़ों व्यक्ति स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा रखते हैं । परंतु वे जानते नहीं हैं कि स्वर्ग है क्या ?

“जैसे यहां अच्छे भोग फल मिठाइयां खाना पीना नाच गाना बैंड बाजा धन संपत्ति आदि पृथ्वी पर प्राप्त होती है, बस ऐसा ही स्वर्ग में होता है । और वह स्वर्ग कहीं आसमान है, जो कि मरने के बाद मिलता है ।” इस प्रकार से भारतीय लोगों की मान्यता है ।

यह मानता ठीक नहीं है। वेदो और ऋषियों के अनुसार , यह तो ठीक है कि स्वर्ग में सारे सुख मिलते हैं , और वे मरने के बाद मिलते हैं । परंतु वे सब सुख यहीं इसी पृथ्वी पर ही हैं , आपके हमारे घरों में ही मिलते हैं। आसमान में कोई ऐसा अलग स्थान नहीं है, जहां ऐसा स्वर्ग हो ।

और यदि वहां पर भी ऐसा ही राग रंग हो, तो जैसे लोग यहां भोग कर करके रोगी दुखी और परेशान हो जाते हैं , ऐसे ही उस आसमान वाले स्वर्ग में भी रोगी दुखी और परेशान हो जाएंगे । फिर यहां से उस स्वर्ग में क्या विशेष अंतर हुआ? कुछ नहीं ।

इसलिए स्वर्ग भी यहीं है , नरक भी यहीं है। सब कुछ यहीं है। हां , मोक्ष इन दोनों से अलग है, वहां कोई दुख नहीं होता , क्योंकि वहां भौतिक सुख दुख भोगने का साधन शरीर नहीं होता। ईश्वर की शक्तियों से ईश्वर का आनन्द भोगने को मिलता है। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


from Tumblr https://ift.tt/2J3tWXN
via IFTTT