Sunday, February 7, 2016

कहाँ कहाँ रहस्यमयी गुफा/ मंदिर : 1)हिंगलाज माता मंदिर : पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के जिला...

कहाँ कहाँ रहस्यमयी गुफा/ मंदिर :


1)हिंगलाज माता मंदिर : पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के जिला लसबेला में हिंगोल नदी के किनारे पहाड़ी गुफा में स्थित माता पार्वती का हिंगलाज मंदिर अतिप्राचीन है। इसी तरह पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत के शहर नगरपारकर में माता कालिका का एक और प्राचीन और रहस्यमय गुफा मंदिर है.हिंगलाज माता का यह मंदिर माता पार्वती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर के महत्व का उल्लेख देवीभागवत पुराण सहित अन्य पुराणों में भी मिलता है।
भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान के कई ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिरों को नष्ट कर दिया गया। बाद में 1992 में बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद पाकिस्तान में करीब 1,000 मंदिर ध्वस्त किए गए। आज भी अल्पसंख्यक हिन्दू आबादी मंदिरों पर हमलों से परेशान और दुखी हैं, लेकिन पाकिस्तान की सरकार इस पर चुप्पी साधे रखती है। 
2) गोआ गोवा गजह गुफा (बाली, इंडोनेशिया) : इंडोनेशिया के द्वीप बाली द्वीप पर हिन्दुओं के कई प्राचीन मंदिर हैं, जहां एक गुफा मंदिर भी है। इस गुफा मंदिर को गोवा गजह गुफा और एलीफेंटा की गुफा कहा जाता है।19 अक्टूबर 1995 को इसे विश्व धरोहरों में शामिल किया गया। यह गुफा भगवान शंकर को समर्पित है। यहां 3 शिवलिंग बने हैं। देश-विदेश से पर्यटक इसे देखने आते हैं।
3) वराह गुफाएं : तमिलनाडु में चेन्नई के कोरोमंडल के पास महाबलीपुरम में स्थित है वराह गुफा। वराह गुफा में भगवान विष्णु का मंदिर है।चट्टानों को काटकर की गई कलाकारी इतनी सुंदर है कि इसे यूनेस्को की विश्व विरासत का हिस्सा बनाया गया है। वराह गुफा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। इस गुफा के अलावा सित्तनवसल और नार्थमलाई गुफा भी काफी फेमस है।

4) एलीफेंटा की गुफा : मुंबई के गेट वे ऑफ इंडिया से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित एक स्थल है, जो एलीफेंटा नाम से विश्वविख्यात है। यहां पहाड़ को काटकर बनाई गई इन सुंदर और रहस्यमय गुफाओं को किसने बनाया होगा? माना जाता है कि इसे 7वीं व 8वीं शताब्दी में राष्‍ट्रकूट राजाओं द्वारा खोजा गया था। ‘खोजा गया था’ का मतलब यह कि यह उन्होंने बनाया नहीं था। कई हजार वर्षों पुरानी इन गुफाओं की संख्या 7 हैं जिनमें से सबसे महत्‍वपूर्ण है महेश मूर्ति गुफा। एलीफेंटा को घारापुरी के पुराने नाम से जाना जाता है, जो कोंकणी मौर्य की द्वीप राजधानी थी।इसका ऐतिहासिक नाम घारापुरी है। यह नाम मूल नाम अग्रहारपुरी से निकला हुआ है। एलीफेंटा नाम पुर्तगालियों ने दिया है। यहां हिन्दू धर्म के अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। यहां भगवान शंकर की 9 बड़ी-बड़ी मूर्तियां हैं, जो शंकरजी के विभिन्न रूपों तथा क्रियाओं को दिखाती हैं। इनमें शिव की त्रिमूर्ति प्रतिमा सबसे आकर्षक है। यह पाषाण-शिल्पित मंदिर समूह लगभग 6,000 वर्गफीट के क्षेत्र में फैला है।गुफा के मुख्‍य हिस्‍से में पोर्टिको के अलावा 3 ओर से खुले सिरे हैं और इसके पिछली ओर 27 मीटर का चौकोर स्‍थान है और इसे 6 खंभों की कतार से सहारा दिया जाता है। 'द्वारपाल’ की विशाल मूर्तियां अत्‍यंत प्रभावशाली हैं। इस गुफा में शिल्‍पकला के कक्षों में अर्द्धनारीश्‍वर, कल्‍याण सुंदर शिव, रावण द्वारा कैलाश पर्वत को ले जाने, अंधकारी मूर्ति और नटराज शिव की उल्‍लेखनीय छवियां दिखाई गई हैं। इस गुफा संकुल को यूनेस्‍को द्वारा विश्‍व विरासत का दर्जा दिया गया है।

5) महाकाली और कन्हेरी की गुफाएं : मुंबई में कई गुफाएं हैं। उनमें से एलीफेंटा, महाकाली, कन्हेरी और जोगेश्‍वरी की गुफाएं प्रसि‍द्ध हैं। महाकाली की गुफा मुंबई के अंधेरी वेस्ट में बौद्ध मठ के पास है, जबकि कन्हेरी की गुफा मुंबई के पश्चिम में बसे बोरीवली क्षेत्र में स्थित है। इसके अलावा पुणे में पातालेश्वर या पांचालेश्वर गुफा मंदिर और लेनयाद्रि की बौद्ध गुफाएं देखने लायक हैं।
6) अजंता-एलोरा की गुफाएं : यह स्थान महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित है। इसमें अजंता में 29 बौद्ध गुफाएं और कई हिन्दू मंदिर मौजूद हैं। ये गुफाएं अपनी चित्रकारी, गुफाएं और अद्भुत मंदिरों के लिए प्रसिद्ध हैं। ये गुफाएं कई हजार वर्ष पुरानी हैं, लेकिन बौद्ध गुफाएं होने के कारण इनको 2 सदी ईसा पूर्व से 7 शताब्दी ईसा तक का माना जाता रहा है, लेकिन अब नए शोध ने यह धारणा बदल दी है।एलोरा की गुफाएं सबसे प्राचीन मानी जाती हैं। इसमें पत्थर को काटकर बनाई गईं 34 गुफाएं हैं और एक रहस्यमयी प्राचीन हिन्दू मंदिर है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोई मानव नहीं बना सकता और इसे आज की आधुनिक तकनीक से भी नहीं बनाया जा सकता। इस विशालकाय अद्भुत मंदिर को देखने सभी आते हैं। इसका नाम कैलाश मंदिर है। आर्कियोलॉजिस्टों के अनुसार इसे कम से कम 4 हजार वर्ष पूर्व बनाया गया था। 40 लाख टन की चट्टानों से बनाए गए इस मंदिर को किस तकनीक से बनाया गया होगा? यह आज की आधुनिक इंजीनियरिंग के बस की भी बात नहीं है।माना जाता है कि एलोरा की गुफाओं के अंदर नीचे एक सीक्रेट शहर है। आर्कियोलॉजिकल और जियोलॉजिस्ट की रिसर्च से यह पता चला कि ये कोई सामान्य गुफाएं नहीं हैं। इन गुफाओं को कोई आम इंसान या आज की आधुनिक तकनीक नहीं बना सकती। यहां एक ऐसी सुरंग है, जो इसे अंडरग्राउंड शहर में ले जाती है।
औरंगाबाद में पीतलखोरा की गुफाएं भी प्रसिद्ध हैं।

7) अमरनाथ गुफा : जम्मू और कश्मीर में तो अमरनाथ और वैष्णोदेवी की गुफा में हिन्दूजन दर्शन के लिए जाते ही हैं, लेकिन कश्मीर में ऐसी 4 गुफाएं हैं जिनके बारे में कहा जा रहा है कि उनका दूसरा सिरा 4,000 किलोमीटर दूर रूस तक जाता है। इतना ही नहीं, इन गुफाओं के बारे में और भी ऐसे रहस्य हैं जिनकी सच्चाई सदियों बाद भी सामने नहीं आईं।

पीर पंजाल की गुफा : जम्मू-कश्मीर के पीर पंजाल में एक गुफा है, जहां एक शिवलिंग रखा है। इसका नाम पीर पंजाल केव रखा गया है। शिव खाड़ी : जम्मू में ही शिव खाड़ी नामक एक गुफा है।
8) बादामी गुफा : यह सुंदर और नक्काशीदार गुफा कर्नाटक के बादामी में स्थित है। बादामी की 4 गुफाओं में से 2 गुफाएं भगवान विष्णु, 1 भगवान शिव और 1 जैन धर्म से संबंधित बताई जाती हैं। पहाड़ों को काटकर लाल पत्थर से बनाई गई ये गुफाएं अपनी सुंदरता के लिए फेमस हैं। पत्थरों में की गई नक्काशी देखने लायक है।बादामी चालुक्‍यों की राजधानी थी, जो 6-8वीं सदी ईसवी में इस स्‍थान से शासन करते थे। इसे मूलत: वातापी कहा जाता है। 1979 में बादामी में और इसके आसपास खोजी गई गुफाओं, मूर्तियों, अभिलेखों, बिखरे पड़े पुरातत्‍वीय अंशों का संग्रह और परिरक्षण करने के लिए एक मूर्तिशाला के रूप में स्‍थापित किया गया था। बाद में इसे वर्ष 1982 में एक पूर्णरूपेण स्‍थल संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।

9) परशुराम महादेव गुफा मंदिर : अरावली की प्राचीन पहाड़ियों में स्थित एक गुफा मंदिर है जिसे महादेव गुफा मंदिर कहा जाता है। माना जाता है कि इसका निर्माण विष्णु के 6ठे अवतार स्वयं परशुराम ने अपने फरसे से चट्टान को काटकर किया था। इस गुफा मंदिर के अंदर एक स्वयंभू शिवलिंग है। कहते हैं यहां परशुराम के घोर तपस्या की थी। तपस्या के बल पर उन्होंने भगवान शिव से धनुष, अक्षय तूणीर एवं दिव्य फरसा प्राप्त किया था।इस गुफा मंदिर तक जाने के लिए 500 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है, जहां पर विष्णु के 6ठे अवतार परशुराम ने भगवान शिव की कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी।दुर्गम पहाड़ी, घुमावदार रास्ते, प्राकृतिक शिवलिंग, कल-कल करते झरने एवं प्राकृतिक सौंदर्य से ओत-प्रोत होने के कारण भक्तों ने इसे 'मेवाड़ के अमरनाथ’ का नाम दे दिया है।परशुराम महादेव का मंदिर राजस्थान के राजसमंद और पाली जिले की सीमा पर स्थित है। मुख्य गुफा मंदिर राजसमंद जिले में आता है जबकि कुण्ड धाम पाली जिले में आता है। पाली से इसकी दूरी करीब 100 किलोमीटर और विश्वप्रसिद्ध कुम्भलगढ़ दुर्ग से मात्र 10 किलोमीटर है।
10) जोगीमारा गुफा : छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश भारत का सबसे घने जंगलों और नदियों वाला प्रदेश है। यह प्राचीनकाल में दंडकारण्य क्षेत्र का हिस्सा था। यहां भयानक जंगल, वन्यजीव, आदिवासी और प्राकृतिक सुंदरता तो देखने को मिलेगी ही, साथ ही प्राचीन मानव सभ्यता के अवशेष भी मिलेंगे।
गुफाएं तो छत्तीसगढ़ में बहुत हैं, लेकिन सीताबेंग गुफा सरगुजा जिले के अंबिकापुर की रामगढ़ पहाड़ियों में स्थित है। दरअसल, ये 2 गुफाएं हैं- एक सीताबेंग और दूसरी जोगीमारा। यहां तक पहुंचने के लिए आपको प्राकृतिक टनल हतिपल के रास्ते से जाना होगा। छत्तीसगढ़ के पहाड़ी इलाकों और घने जंगल से होते हुए ही आप कैलाश गुफा, दंडक गुफा और कुटुमसर गुफा तक पहुंच सकते हैं। यह कांगड़ वैली के नेशनल पार्क के पास है।
11) बाराबर गुफाएं : ध्यान और तपस्या के लिए बनाई गई इन गुफाओं को देखने दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। बाराबर गुफाएं बिहार के गया जिले में स्थित हैं। गया जिले में और भी कई हिन्दू, जैन और बौद्ध गुफाएं हैं।

ये गुफाएं बाराबर की दो पहाड़ियों में हैं। यहां कुल 4 गुफाएं हैं और नागार्जुन की पहाड़ियों में 3 गुफाएं हैं। ये गुफाएं देश की सबसे प्राचीन गुफाओं में से हैं। यहां कलाकृतियां भी मिलती हैं। इन गुफाओं के अलावा सुदामा और सोनभद्रा भी बिहार की प्रसिद्ध गुफाओं में से एक हैं।
12) बोरा गुफाएं : दक्षिणी राज्य आंध्रप्रदेश में बेलम व बोरा गुफाएं प्रसिद्ध हैं। बोरा गुफाएं विशाखापट्टनम से 90 किलोमीटर की दूरी पर हैं। 10 लाख साल पुरानी इन गुफाओं पर भू-वैज्ञानिकों के शोध कहते हैं कि लाइमस्टोन की ये स्टैलक्टाइट व स्टैलग्माइट गुफाएं गोस्थनी नदी के प्रवाह का परिणाम हैं।गुफाएं अंदर से काफी विराट हैं। अंदर घुसकर वहां एक अलग ही दुनिया नजर आती है। कहीं आप रेंगते हुए मानो किसी सुरंग में घुस रहे होते हैं तो कहीं अचानक आप विशालकाय बीसियों फुट ऊंचे हॉल में आ खड़े होते हैं। विशाखापट्टनम में रुककर भी दिन में गुफाएं देखी जा सकती हैं। इन गुफाओं में आपको प्राचीनकालीन शिवलिंग के दर्शन होंगे जिनकी पूजा आज भी आदिवासी लोग करते हैं।
बेलम गुफाएं : आंध्र के कुरनूल से 106 किलोमीटर दूर बेलम गुफाएं स्थित हैं। मेघालय की गुफाओं के बाद ये भारतीय उपमहाद्वीप की दूसरी सबसे बड़ी प्राकृतिक गुफाएं हैं। इन्हें मूल रूप से तो 1854 में एचबी फुटे ने खोजा था लेकिन दुनिया के सामने 1982 में यूरोपीय गुफा विज्ञानियों की एक टीम ने इन्हें मौजूदा स्वरूप में पेश किया।पहाड़ियों में स्थित बोरा गुफाओं के विपरीत बेलम गुफाएं एक बड़े से सपाट खेत के नीचे स्थित हैं। जमीन से गुफाओं तक 3 कुएं जैसे छेद हैं। इन्हीं में से बीच का छेद गुफा के प्रवेश द्वार के रूप में इस्तेमाल होता है। लगभग 20 मीटर तक सीधे नीचे उतरने के बाद गुफा जमीन के नीचे फैल जाती हैं। इनकी लंबाई 3,229 मीटर है।
मलेशिया : मलेशिया भी पहले हिन्दू राष्ट्र हुआ करता था। वहां कई प्राचीन गुफा मंदिर हैं। उनमें से ही एक माता देवी पार्वती के बेटे और युद्ध के देवता मुरुगन का गुफा मंदिर भी है। उक्त देवता के जन्म अवसार पर थैपुसम नामक उत्सव मनाया जाता है।

300 से अधिक सीढ़ियां चढ़कर इस गुफा मंदिर में जाना होता है। थैपुसम त्योहार हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक 10 महीने में एक बार मनाया जाता है। सामान्य कैलेंडर के अनुसार यह अवसर जनवरी के अंतिम या फरवरी की शुरुआत में आता है। भारत, सिंगापुर, मॉरिशस द्वीप समूह में भी यह उत्सव मनाया जाता है जबकि मलेशिया के उत्तरी राज्य पेनाग में यह उत्सव बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।

यहां गुफा के सामने मुरुगन की विशालकाय मूर्ति लगी है। इस मूर्ति की ऊंचाई 42.7 मीटर ऊंची है।
इसके अलावा पाताल भुवनेश्वर (उत्तराखंड), थ्रिक्कुर महादेव मंदिर (केरल), बाघ गुफाएं (धार, मध्यप्रदेश), उदयगिरि गुफाएं (ओडिशा), बाराबर गुफाएं (बिहार), उंदावली, विजयवाड़ा की गुफा (आंध्रप्रदेश), डुंगेश्वरी गुफा (बिहार), अर्जुन गुफा (कुल्लू, हिमाचल), पीतलखोरा की गुफा (महाराष्ट्र), सोन भंडार गुफा (राजगीर, बिहार) आदि भी दर्शनीय हैं।


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Saturday, February 6, 2016

🍎🍎मोक्ष प्राप्ति के लिए शरीरधारी गुरु की आवश्यकता है वा नहीं ? आवश्यकता है ।🍎🍎 प्रश्न =...

🍎🍎मोक्ष प्राप्ति के लिए शरीरधारी गुरु की आवश्यकता है वा नहीं ? आवश्यकता है ।🍎🍎

प्रश्न = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है या नहीं ?
उत्तर = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है ।
प्रश्न = गुरु किसको बनाया जाये ?
उत्तर = जिसको गुरु के रूप में स्वीकार किया जाये वह वास्तविक गुरु हो। अर्थात् वास्तविक गुरु में निम्नलिखित लक्षण होने चाहियें।

वास्तविक गुरु के लक्षण –
1- वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थोंके पठन पाठन को मुक्ति का साधन मानने वाला हो ।
2- सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी हो।
3- पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा का त्यागी
हो।
4- ईश्वर जीव और प्रकृति को पृथक - पृथक्
मानने वाला हो ।
5- स्वयं अष्टांगयोग का अनुष्ठान करने वाला हो।
6- सकाम कर्मों को छोड़कर निष्काम कर्म करने
वाला हो ।
7- अपनी उन्नति के तुल्य प्राणिमात्र की उन्नति
चाहने वाला हो।
8- पक्षपातरहित न्यायकारी हो।
9- मद्य मांसादि अभक्ष्य खान -पान करने वाला न
हो।
10- मोक्ष की प्राप्ति करने - करवाने को मानव
जीवन का मुख्य लक्ष्य मानने वाला हो ।
11- वेद, दर्शन, उपनिषद् आदि ग्रन्थों में वर्णित
योग विद्या का प्रचार- प्रसार करने वाला हो
इत्यादि ।
किसी व्यक्ति में लम्बे काल तक इन गुणों का परीक्षण करना चाहिए । लम्बे परिक्षण के पश्चात् यदि उस व्यक्ति में उपर्युक्त गुण उपलब्ध हों, तभी उसे गुरु बनाना चाहिये 🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎


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🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 भूपेश आर्य 🌻साधुओं की निकम्मी फौज🌻 भारत की अवनति का एक और कारण है साठ लाख साधुओं की...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

भूपेश आर्य

🌻साधुओं की निकम्मी फौज🌻

भारत की अवनति का एक और कारण है साठ लाख साधुओं की निकम्मी फौज।वैदिक धर्म में सन्यासियों का स्थान बहुत ऊंचा और सम्मानप्रद है।महर्षि दयानन्द के शब्दों में “जैसे शरीर में सिर की आवश्यकता है,वैसे ही आश्रमों में संन्यासाश्रम की आवश्यकता है”, परन्तु आज यह शिरोमणि आश्रम सबसे अधिक दूषित और विकृत हो गया है।आज कहाँ हैं सच्चे सन्यासी?
आज के सन्यासियों की अवस्था तो तुलसीदासजी की इस चौपाई से मिलती-जुलती है-
नारि मुई घर सम्पत्ति नासी।
मूँड मुँडाय भये संन्यासी।

आज सन्यासियों का स्थान टकापन्थी,ढोंगी,दम्भी और पाखण्डियों ने ले लिया है।आज का सन्यासी सर्वत्यागी होने के स्थान पर सर्वग्राही बन गया है।आज का सन्यासी लोकोद्धार के लिए,देश के कल्याण के लिए ,जाति को सन्मार्ग पर लाने के लिए संन्यासी नहीं बनता,वह सन्यासी बनता है अपने घर वालों का पालन-पोषण करने के लिए ,महल और कोठियाँ बनवाने के लिए,अपनी कुण्ठित वासनाओं को शान्त करने के लिए।आज के सन्यासियों के जीवन का तनिक निकट से अध्ययन करें तो पता लगेगा कि किसी ने पच्चीस लाख रुपया जमा किया हुआ है तो किसी ने पचास लाख तथा किसी ने एक करोड़ और किसी ने आश्रम के रुप में करोडों और अरबों की सम्पत्ति इकट्ठी की हुई है।तनिक निकल जाइये हरिद्वार और ऋषिकेश की और,आपको ऐसे सैकड़ों ढोंगी और पाखण्डी साधु मिल जाएँगें।ये ढोंगी और पाखण्डी साधु संसार को उपदेश देते हैं-

रुखी सूखी खायके ठण्डा पानी पीव।
देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जीव।।

जिन गृहस्थों को अपने बच्चों का पालन और पोषण करना होता है,अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा करके ८-१० घण्टे प्रतिदिन दफ्तरों या दुकानों में काम करना होता है वे तो रुखी-सूखी खाकर निर्वाह करें और जो निठल्ले पड़े रहते हैं,वे खूब दूध-मलाई छकें।
क्या सुन्दर उपदेश है।

इन पाखण्डी साधुओं का इनके साथ रहकर निरीक्षण किया जाए तो पता चलेगा कि संसार को ईश्वर भक्ति का उपदेश देने वाले ये दम्भी और पाखण्डी स्वयं एक मिनट भी उपासना नहीं करते।प्रातः उठते ही शौच से निवृत्त हो तेल की मालिश कराते हैं,फिर स्नान कर गर्मियों में बादाम की ठण्ड़ाई पर हाथ साफ करते हैं।सर्दियों में बादाम का हलवा और बादाम-पाक खाते हैं।दोपहर को ऐसा बढ़िया भोजन खाते हैं कि अच्छे अच्छे गृहस्थियों को भी प्राप्त न होता होगा।दो घंटा पश्चात् मौसमी और सन्तरों का रस पीते हैं।शाम को फिर भोजन और रात्रि को दूध।ये तथाकथित सन्यासी दण्ड पेलकर साँड बन रहे हैं और देश पर भार बन रहे हैं।ये ढोंगी साधु दिन भर पड़े हुए खाटों को तोड़ते हैं,न लिखना,न पढ़ना,न स्वाध्याय ,न प्रवचन।

इन सन्यासियों के दिन भर मठों में व्यभिचार होता है।कलकत्ता के हीरालाल गोयन्दका ने जो व्यभिचार किये थे वे किससे छिपे हैं?अभी कुछ समय पूर्व ऋषिकेश के एक महन्त के कमरे में देखा गया कि महन्तजी झूले में झूल रहे हैं।झूले के पास पांच-सात युवतियाँ बैठी हुई हैं,उन सभी ने मेकअप किया हुआ था और साधु जी आनन्द के हिलोरे ले रहे थे।

हे महन्तों और मठाधीशों ! मैं आपसे पूछना चाहता हूं-यदि आपको ये भवन ही खड़े करने थे,यदि सम्पत्ति ही संगृहीत करनी थी,यदि गुलछर्रे ही उड़ाने थे तो आपने सन्यास क्यों लिया?यह काम तो तुम गृहस्थाश्रम में रहकर भी कर सकते थे,फिर इसे त्यागने की क्या आवश्यकता थी?

दीपावली के अवसर पर दिल्ली और नई दिल्ली के मन्दिरों में इतनी मिठाई चढ़ती है कि मिठाइयों के पहाड़ लग जाते हैं,दूसरी और गरीब बच्चे मिठाई के एक कण के लिए रोते और बिलखते हैं।दीपावली के दिन ही क्या साधारण दिनों में भी नई दिल्ली के दो मन्दिरों में इतनी मिठाई चढ़ती है कि पूजारी और उसके बच्चे उस मिठाई को खा नहीं पाते।वह मिठाई पडी पडी सूखती है या उसे कुत्तों को फेंका जाता है।

ये शंकराचार्य और मण्डलेश्वर भी देश के लिए एक भीषण संकट हैं।ये सोने के सिंहासन पर बैठते हैं।हे मण्डलेश्वरों! लोगों को तुम सम्भाव का उपदेश देते हो,संसार के सभी प्राणियों में एकात्मदर्शन की बात करते हो और स्वयं सन्यासियों से अपनी पालकी उठवाते हो।तुम्हें लज्जा आती है या नहीं?

इन महन्तों,मठाधीशों और मण्डलेश्वरों के अतिरिक्त देश में साठ लाख साधुओं की निकम्मी फौज विद्यमान है।इनको साधु कहना तो वस्तुतः ‘साधु’ शब्द का ही अपमान करना है।ये तो स्वादु हैं,ठग हैं।लीजिए इन साधुओं का स्वादुपन देखिये-

एक साधु एक घर में पहुंचकर कहने लगा-“माता! आज तो साधु की इच्छा दूध पीने की है,एक सेर पक्का दूध पिला दे।"स्त्रियों में साधुओं के प्रति भक्तिभाव होता ही है।माता एक बर्तन लेकर अहारे में रक्खी हाँडी से दूध डालने लगी तो उसके साथ मलाई भी आने लगी।माता उस मलाई को बर्तन में गिरने से रोकने लगी,तो साधुजी बोले-"माता! मलाई भी आने दे,हमें स्वाद से क्या मतलब,हम तो मलाई सहित पी लेंगे।” यह है आज के साधुओं का स्वादुपन।

इनकी विद्वत्ता और योग्यता कितनी है,जहाँ तक साधारण साधुओं की बात है,उनकी योग्यता का पता तो निम्न चित्रण से लग जायेगा-

एक सदगृहस्थ ने किसी साधु से कहा-“महाराज! मेरे बच्चे को गायत्री का उपदेश कर दो।”
साधु बोला-“ना महाराज”
“अच्छा यदि गायत्री का उपदेश नह़ी कर सकते तो मेरे बच्चे को कुछ हिन्दी ही पढ़ा दिया करें,”
गृहस्थी ने विनयपूर्वक कहा।
साधु बोला-“ना महाराज ! यदि पढ़ा होता तो सन्यासी क्यों बनता,कमाकर खाता।”
गृहस्थी ने पूछा-“साधुजी ! खीर खाओगे ?”
साधुजी तपाक से बोले-“हाँ महाराज।”

अब जिन साधुओं को बहुत बड़ा विद्वान समझा जाता है उनकी योग्यता भी सुन लीजिए।करपात्री जी और कृष्णबोधाश्रम का कहना है कि"स्त्रियों को गायत्री मन्त्र का जप नहीं करना चाहिये।स्त्री यदि गायत्री का जप करेगी तो विधवा हो जायेगी।"
ऐसा ऊटपटाँग व्याख्यान सुनकर एक देवी करपात्रीजी के पास पहुँची और पूछा-“गायत्री स्त्री थी या पुरुष?”
करपात्रीजी ने कहा-“स्त्री।"तब उस देवी ने कहा-"तो वह स्त्रियों में बैठकर प्रसन्न होगी या पुरुषों में?”
करपात्रीजी देवी का मुँह ताकते रह गये,कोई उत्तर न बन पडा।

आर्यसमाज के अधिकारियों ने शास्त्रार्थ का चैलैन्ज दिया,जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया।

आज साधुओं के स्थान पर दम्भी,पाखण्डी और ठग अधिक हैं।ये अनेक प्रकार से लोगों को ठगते हैं।लोगों की आंखों में धूल झोंककर ये लोग धन बटोरते हैं। और अपना उल्लू सीधा करते हैं।

देश में इस प्रकार के साठ लाख निकम्मे और निठल्ले साधुओं का जमघट है और यह संख्या प्रतिदिन बढ़ रही है।इन साधुओं पर होने वाला वार्षिक व्यय लगभग ४०० करोड़ रुपये है,अर्थात् प्रतिदिन एक करोड़ रुपये से भी अधिक इन पर खर्च होता है फिर देश का सत्यानाश क्यों न हो?


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Thursday, February 4, 2016

🌻🌻ओ३म्🌻🌻 भूपेश आर्य दमा की अद्भुत दवा:- (1) धतूरे का १-१ बीज आठ दिन तक प्रातः पानी से निगल...

🌻🌻ओ३म्🌻🌻

भूपेश आर्य

दमा की अद्भुत दवा:-

(1) धतूरे का १-१ बीज आठ दिन तक प्रातः पानी से निगल लें।दूसरे सप्ताह दो-दो बीज लें।इसी प्रकार प्रति सप्ताह एक-एक बीज बढ़ाते हुए पाँचवें सप्ताह ५-५ बीज प्रतिदिन लें।दमा कितना भी पुराना हो मिट जायेगा।

(2) निर्मली के बत्तीस दानें मिट्टी के बर्तन में पानी में डाल दें।पानी को प्रतिदिन बदल दें।पाँचवे दिन से दो दानें प्रातः और दो दाने सांय लगातार आठ दिन तक सेवन करने से दमा,खाँसी,कालीखाँसी जड़मूल से समाप्त हो जाती हैं।सांस फूलना,खाँसी के कारण रात्रि में नींद न आना,दुर्बलता के कारण चक्कर आना आदि सभी उपद्रव शान्त हो जाते हैं।

नोट-दूध बिल्कुल न पीएँ।
इन बीजों के सेवन से शरीर दिन-पर-दिन स्वस्थ होता जाता है,रक्त शुद्ध होकर नया रक्त बनने लगता है।पेट के कीड़े मर जाते हैं,कब्ज दूर हो जाती है।इन बीजों को चबाकर खाना चाहिये।

(3) मोर के पंखों को जलाकर राख बना लें।इसमें से एक रत्ती (दो ग्रेन) पान में रखकर खिलाया करें।८-१० दिन में रोग का नाम भी नहीं रहेगा।चमत्कारी योग है।


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🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 भूपेश आर्य 🌷आपसी फूट🌷 भारत की अवनति के जहाँ और अनेक कारण हैं वहाँ एक कारण परस्पर की...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

भूपेश आर्य

🌷आपसी फूट🌷

भारत की अवनति के जहाँ और अनेक कारण हैं वहाँ एक कारण परस्पर की फूट भी है।यदि भारतीय राजाओं में,वीर क्षत्रियों में परस्पर फूट न होती तो आज भारत का मानचित्र कुछ और ही होता।आपस की फूट ने भारतवर्ष को पराधीन और परतन्त्र बना दिया।

जब तक सूर्य-चन्द्र आकाश में स्थित हैं,तब तक जयचन्द के देशद्रोह को कौन भूला सकता है?जयचन्द ने मोहम्मद गोरी के साथ मिलकर पृथ्वीराज चौहान के साथ विश्वासघात न किया होता तो क्या मुसलमान भारत में अपना पैर जमा सकते थे?हे जयचन्द ! देशद्रोह करके तुझे क्या मिला?कुछ भी तो नहीं?दूसरे ही वर्ष उसी गोरी ने जयचन्द पर आक्रमण करके कन्नौज की ईंट से ईंट बजा दी।

मानसिंह ने अपनी फूफी का विवाह अकबर के साथ कर दिया और प्रताप का साथ छोड़कर अकबर से मिल गया।इतना ही नहीं,उसने एक बहुत बड़ी सेना लेकर प्रताप के ऊपर आक्रमण भी किया।महाराणा प्रताप का छोटा भाई शक्तिसिंह भी अकबर से जा मिला।महाराणा प्रताप,शक्तिसिंह और मानसिंह तीनों मिलकर अकबर के विरुद्ध मोर्चा लेते तो अकबर को भारत से भागकर ही मुंह छिपाना पड़ता और देहली का सिंहासन राजपूतों के अधिकार में होता।

भारतीय राजाओं की फूट की तो यह अवस्था थी कि जब कोई विदेशी किसी वीर क्षत्रीय पर आक्रमण करता था तो दूसरे राजा मौन बैठे हुए तमाशा देखते थे।प्रत्येक राजा यही सोचता था कि यह आक्रमण मुझ पर थोड़े ही हो रहा है यह तो मेरे पड़ौसी पर है,जब मुझ पर शत्रु आक्रमण करेगा तब देखा जायेगा।परिणामस्वरुप एक-एक करके सभी राजा परास्त हुए।काश ! यदि वीर क्षत्रीय धर्मराज युधिष्ठिर के आदर्श को अपने समक्ष रख लेते तो हमारी यह दुर्गति न होती.

क्या था धर्मराज युधिष्ठिर का आदर्श! पाँचों पांडव द्रौपदी के साथ वनों में भ्रमण कर रहे थे।उनका समाचार जानकर और उन्हें चिढ़ाने के लिए दुर्योधन ने ठाठ-बाट से ,शाही वेश में उनके पास जाने का निश्चय किया,परन्तु मार्ग में चित्रसेन गन्धर्व द्वारा उसे बन्दी बना लिया गया।जब युधिष्ठिर को इस घटना का पता लगा तो उन्होंने भीम और अर्जुन को आदेश दिया कि जाकर दुर्योधन को मुक्त कराओ।
भीम ने कहा-“हमें क्या आवश्यकता है कि हम उसे छुड़ाने जाएँ?वह हमें चिढ़ाने आया था अब अपने किये का फल पा रहा है,उसे वहीं सड़ने दो।"तब युधिष्ठिर ने उसे समझाते हुए कहा-
परस्परं विवादे तु वयं पञ्च शतं च ते।
अन्यैः सह विवादे तु वयं पञ्चशतोत्तरम्।।-(महा० वनपर्व)
यदि हम लोगों की आपस में लड़ाई हो तो हम पाँच हैं और वे सौ हैं,परन्तु यदि किसी दूसरे के साथ युद्ध हो तो हम एक-सौ-पाँच हैं।

इस आदर्श को सम्मुख रखकर यदि क्षत्रीय वीर लड़े होते तो भारत को दुर्गति के ये दिन न देखने पड़ते।

परस्पर की फूट का कैसा दुष्परिणाम होता है इस विषय में ‘कथा-सरिता-सागर’ में एक बहुत ही मार्मिक घटना का उल्लेख है।-

पुत्रक नाम का एक व्यक्ति जंगल में घूम रहा था।घूमते-घूमते एक दिन उसने एक स्थान पर दो पुरुषों को लड़ते हुए देखा।पुत्रक ने उनसे लड़ने का कारण पूछा तो वे बोले-"हम मयासुर के पुत्र हैं और अपने पिता की सम्पत्ति के लिए लड़ रहे हैं।
जो हममें से विजयी होगा,वही उस सम्पत्ति का स्वामी बनेगा।”
पुत्रक ने कहा-“आखिर ऐसी कोन सी सम्पत्ति है,जिसके लिए आप एक दूसरे के प्राण लेने पर उतारु हैं।”
यह सुन उन्होंने दूर रक्खे हुए खड़ाओं के एक जोड़े,एक डण्डे और कटोरे की और संकेत किया और कहा-“यही वह सम्पत्ति है,जिसके लिए हम लड़ रहे हैं।”
पुत्रक ने कहा-“इन साधारण सी वस्तुओं के लिए लड़ना उचित नहीं है।”
तब मयासुर के पुत्रों ने बताया कि यह साधारण सम्पत्ति नहीं है।इन खड़ाओं को पहनकर मनुष्य आकाश में गमन कर सकता हझ।इस डण्ड़े पर जो कुछ लिखा जायेगा वह सत्य हो जायेगा और जिस वस्तु की इच्छा की जाए वह इस कटोरे में उपस्थित हो जाती है।

पुत्रक ने कहा-“कुछ भी हो,इनके लिए आपस में लड़ना ठीक नहीं।तुम दोनों दौड़ लगाओ ,जो तुम दोनों में से आगे निकलेगा वही जीता हुआ माना जायेगा और ये तीनों वस्तुएँ उसे ही मिल जाएँगी।”

पुत्रक की सलाह मानकर दोनों ने दौड़ना आरम्भ कर दिया।पीछे से पुत्रक खड़ाओं को पहन तथा डण्डा और कटोरा हाथ में लेकर आकाश में उड़ गया।

हमें यहाँ कहानी के सत्यासत्य के विवेचन में नहीं जाना।हमें तो केवल कहानी से मिलने वाली शिक्षा पर ध्यान देना है।इस घटना से जो शिक्षा मिलती है,उसे महर्षि दयानन्द के शब्दों में यूँ व्यक्त किया जा सकता है-
“जब आपस में भाई-भाई लड़ते हैं,तभी तीसरा विदेशी आकर पञ्च बनता है।”-सत्यार्थप्रकाश दशमसमुल्लासः

राजपूत परस्पर लड़ते रहे।परिणामस्वरुप मुसलमान और ईसाई हमारे शासक बन गये।

आपस की फूट से नाश सुनिश्चित है।वेद कहता है-

मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम्।-(अथर्व० ६/३२/३)
परस्पर लड़ने वाले मृत्यु का ग्रास बनते हैं,नष्ट और भ्रष्ट हो जाते हैं।

अन्त में महर्षि दयानन्द के कुछ शब्द स्मरण आ रहे हैं,जिनके लिखने का लोभ संवरण नहीं किया जा सकता:-
“आपस की फूट से कौरव-पाण्डव और यादवों का सत्यानाश हो गया सो तो हो गया,परन्तु अब तक भी वही रोग पीछे लगा ह,न जाने यह भयंकर राक्षस कभी छूटेगा वा आर्यों को सब सुखों से छुड़ाकर दुःख सागर में डुबा मारेगा?उसी दुष्ट दुर्योधन ,गोत्र-हत्यारे,स्वदेशविनाशक नीच के दुष्ट मार्ग में आर्य लोग अब तक भी चलकर दुःख बढ़ा रहे हैं।परमेश्वर कृपा करे कि यह राजरोग हम आर्यों से नष्ट हो जाए।”-सत्यार्थप्रकाव दशमसमुल्लासः


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🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 भूपेश आर्य 🌷बौद्ध और जैनधर्म का मिथ्या अहिंसावाद🌷 बौद्ध और जैन मतावलम्बियों का मिथ्या...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

भूपेश आर्य

🌷बौद्ध और जैनधर्म का मिथ्या अहिंसावाद🌷

बौद्ध और जैन मतावलम्बियों का मिथ्या अहिंसावाद भारत की अवनति और विनाश का तीसरा प्रमुख कारण है।

वैदिक साहित्य में अहिंसा का स्थान महत्वपूर्ण है।योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि ने यमों में अहिंसा को सर्वप्रथम स्थान प्रदान किया है,क्योंकि अहिंसा की सिद्धि के बिना उपासना सफल नहीं हो सकती।महाभारतकार। व्यास ने तो यहाँ तक कह दिया है-

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परमो दमः।
अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः।।-(महा० अनु० ११६/२८)
अहिंसा परम धर्म है,अहिंसा परम संयम है,अहिंसा परम दान है और अहिंसा ही परम तप है।

अहिंसा का अर्थ है-वैरत्याग-मन,वचन और कर्म से किसी भी प्राणी के प्रति वैर की भावना न रखना।
वेद में तो इससे भी ऊंची भावना है।वेद भक्त की तो यह प्रार्थना और कामना रहती है-

मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।।-(यजु० ३६/१८)
मैं संसार के सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ।

परन्तु यहाँ एक बात स्मरण रखने योग्य है।यह तो सामान्य उपदेश है।जिस समय गुण्डे और अत्याचारी अबलाओं पर अत्याचार कर रहे हों,जिस समय बलवान् निर्बलों को पीड़ा दे रहे हों,जिस समय शत्रु हमारे राष्ट्र पर आक्रमण कर रहे हों तब हम क्या करें?क्या आततायी,गुण्ड़ों और शत्रुओं से मार खाते हुए,उनसे पिटते हुए ‘अहिंसा परमो धर्म’ की दुहाई देते रहें?नहीं ,कदापि नहीं।

शत्रुओं से हमारा व्यवहार कैसा हो?वेद का स्पष्ट आदेश है-
उत्तिष्ठत सं नह्याध्वमुदाराः केतुभिः सह।
सर्पा इतरजना रक्षांस्यमित्राननु धावत।।-(अथर्व० ११/१०/१)
अर्थ:-हे वीर योद्धाओ! आप अपने झण्डों को लेकर उठ खड़े होओ और कमर कसकर तैयार हो जाओ।जो सर्पों के समान कुटिल हैं,मानव-समाज के शत्रु हैं,राक्षस हैं,ऐसे शत्रुओं पर धावा बोल दो।

वेद में राजा के लिए आज्ञा है-
इन्द्र जहि पुमांसं यातधानमुत स्त्रियं मायया शाशदानाम्।
विग्रीवासो मूरदेवा ऋदन्तु मा ते दृशन्त्सूर्यमुच्चरन्तम्।।-(अथर्व० ८/४/२४)

अर्थ:-हे इन्द्र ! देश के शासक,राजा वा नेता ! डाकु,लुटेरे और हिंसकों की गर्दनों को तलवार से काटकर धड़ से अलग कर दे।ऐसे आततायी चाहे वे स्त्रियाँ हों या पुरुष सबके लिए एक ही दण्ड़ है।दुष्टों के मारने में विलम्ब नहीं करना चाहिये।उनका सफाया इतनी शीघ्र कर देना चाहिये कि वे दूसरे दिन सूर्य का दर्शन न कर सकें।

इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर कहा है-
वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः।
अधमं गमया तमो यो अस्माँ अभिदासति।।-(अथर्व० १/२१/२)
अर्थ:-हे इन्द्र! राजन ! सेना लेकर हम पर आक्रमण करने वाले शत्रुओं का नाश कर।हमारे शत्रुओं को नीचा दिखा।जो हमारा विनाश करना चाहता है,उसे घोर अन्धकार में धकेल दे।

इस प्रकार के शतशः वेदमन्त्र उपस्थित किये जा सकते हैं,परन्तु विस्तार भय से अधिक नहीं लिखते।
वेद की इन्हीं भावनाओं और आदेशों के अनुसार महर्षि मनु ने भी कहा है-

नाततायी वधे दोषः।।-(मनु० ८/३५१)
अर्थात् आततायी का वध करने में कोई दोष नहीं है।इतना ही नहीं मनुजी ने तो यहाँ तक लिख दिया है-

आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।।-(मनु० ८/३५०)
आततायी को बिना विचारे मार देना चाहिये।

यह है अहिंसा और हिंसा के सम्बन्ध में वैदिक विचारधारा।जो इस विचारधारा पर आचरण करते हैं वे फूलते-फलते हैं,जीवन में सुख पाते हैं और सर्वविध उन्नति करते हैं।इस विचारधारा को न अपनाकर,इसके प्रतिकूल चलने पर हानि उठानी पड़ती है।हमारा प्राचीन इतिहास इस बात का साक्षी है।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने वैदिक हिंसा के आदर्श को सम्मुख रखकर गौ और ब्राह्मण के कल्याण के लिए तथा देश की रक्षार्थ ताड़का का वध किया।मारीच और सुबाहु को मारा और अन्त में रावण का काम भी तमाम कर दिया।परिणाम क्या हुआ -ऋषियों की। रक्षा और रामराज्य की स्थापना।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तो वैदिक हिंसा के आदर्श को सम्मुख रखकर शिशुपाल का वध किया,हयग्रीव और निशुम्भ को नष्ट किया तथा जरासन्ध,कर्ण और दुर्योधन को मरवाया।परिणाम क्या हुआ?भारतवर्ष में सहस्रों वर्षों तक अखण्ड़ चक्रवर्ती साम्राज्य की स्थापना हुई।

अब केवल अहिंसा अपनाने के जो भयंकर दुष्परिणाम हुए उनका भी अवलोकन कर लीजिए।भारतवर्ष में महात्माबुद्ध और वर्धमान महावीर दो ऐसे महापुरुष उत्पन्न हुए जिन्होंने केवल अहिंसा को ही परम धर्म माना।इन दोंनो महापुरुषों ने अहिंसा पर बड़ा बल दिया।दोंनो ही महानुभावों ने युद्ध का घोर विरोध किया।उनका कहना था कि “अपनी ही अन्तरात्मा के साथ युद्ध करो ,बाहर के युद्ध से क्या लाभ?”

उच्चावस्था में पहुंचा हुआ योगी ,साधु या महात्मा यदि अपने जीवन में केवल अहिंसा को अपनाए तो जगत् की कोई हानि नहीं।महात्मा बुद्ध और श्री महावीर भी अहिंसा को यदि अपने तक ही सीमित रखते तो देश और जाति की कोई हानि नहीं होती,परन्तु उन्होंने प्रत्येक अवस्था में और प्रत्येक मनुष्य में सामूहिक रुप में अहिंसा की भावना उत्पन्न की,जिसका परिणाम यह हुआ कि करोड़ों क्षत्रीय वीर केवल अहिंसा का आश्रय लेकर बौद्ध भिक्षुक और जैन श्रावक बनकर कायर,डरपोक,भीरु और नपुंसक बन गये।

सन् ६३० में जब प्रसिद्ध चीनी यात्रि ह्वैन्तसांग भारत में आया तो उसने लिखा कि कप्पिश (काफिरस्तान) सारा बौद्ध हो गया था।लम्पाक और नगर (जलालाबाद) में कुछ हिन्दुओं को छोड़कर शेष सारा काबुल बौद्ध हो गया था।बंगाल और बिहार तो बौद्धों के प्रमुख गढ़ बन गये थे।बंगाल और बिहार में जैन और बौद्ध मत का हिंसा के विरूद्ध इतना प्रचार था कि बंगाल और बिहार के निवासी सेना में भरती नहीं होते थे।इस झूठी अहिंसा का परिणाम यह हुआ कि लोगों के जीवन में शत्रुओं के दमन की,देश,जाति और धर्म की रक्षा की भावना नष्ट हो गयी।परिणामस्वरुप देश परतन्त्र और पराधीन हुआ।

इस्लामी आक्रमण आरम्भ हुए।काबुल जो सारा का सारा बौद्ध बन गया था शत्रुओं के आक्रमण का प्रतिशोध न कर सका।मार खाते हुए,पिटते और पददलित होते हुए सारे बौद्ध मुहम्मदी मत में प्रविष्ट हो गये।

जब मोहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया तो वहाँ के बौद्ध भिक्षु धीरे-धीरे मुसलमान बन गये।शिवि (जो अब पाकिस्तान में है और जिसे अब सिबी कहते हैं) पर जब कासिम ने आक्रमण किया तो वहाँ का शूरवीर क्षत्रीय राजा शत्रुओं का मुकाबलि करने के लिए किले पर खड़ा हो गया।नागरिकों ने,जो प्रायः बौद्ध और जैन थे,राजा से प्रार्थना की कि युद्ध करना और शत्रुओं को मारना हमारे धर्म के विरुद्ध है।अतः आप युद्ध न करके शत्रु से सन्धि कर लें।जब वीर वत्सराज ने इनका कायरतापूर्ण परामर्श स्वीकार न किया तो इन्होंने शत्रु को सन्देश भेजा कि यदि तुम बौद्धों को न मारने की प्रतिज्ञा करो तो हम नगर का पिछला द्वार खोल देंगे।कासीम ने स्वीकार कर लिया।बौद्ध-भिक्षुओं ने नगर के पिछले द्वार खोल दिये।कासिम सैंनिकों सहित नगर में प्रविष्ट हो गया।मुसलमान सैनिकों ने थोड़े से बौद्ध-भिक्षुओं को छोड़कर प्रजा को खूब लूटा।अनेक व्यक्तियों को मोत के घाट उतार दिया और शेष सबको दास बना लिया।-
-देखिये History of india by C.V. Vaidya

बिहार में बौद्ध-भिक्षुओं के सैकड़ों विहार (मठ) थे,इस कारण उसका नाम ही 'बिहार’ पड़ गया।इस प्रान्त में नालन्दा और विक्रमशिला बौद्ध भिक्षुओं के दो विश्वविद्यालय थे।उनमें लाखों हस्तलिखित एवं बहुमूल्य ग्रन्थ थे और यहाँ सहस्रों बौद्ध भिक्षु शिक्षा प्राप्त करते थे।सन् ११९७ में मुहम्मद बिन बख्त्यार खिल्जी ने केवल २०० सैनिक लेकर पहले नालन्दा और फिर विक्रमशिला पर आक्रमण किया।बौद्ध भिक्षुओं को जब आक्रमण का पता लगा तो सहस्रों भिक्षु सिर मुँडाकर ,पीले वस्त्र पहनकर,हाथ में माला लिये हुए ,'अहिंसा परमो धर्मः’ और 'नमो बुद्धाय’-का जाप करते हुए धर्मान्ध मुसलमानों से प्रार्थना करने लगे कि हम पर दया करो।मुसलमान सैनिकों ने कई सहस्र भिक्षुओं को गाजर-मूली की भाँति काटकर मृत्यु की गोद में सुला दिया।
नालन्दा का हत्याकाण्ड पूर्ण करके ये मुसलमान विक्रमशिला विश्वविद्यालय में पहुंचे।वहाँ भी यही हुआ।वे भिक्षु जप करते रहे और मुसलमान उन्हें तलवार का निशाना बनाते रहे।बौद्ध भिक्षु बिना किसी प्रकार का प्रतिरोध किये सिर झुकाकर कटते रहे।भिक्षुओं को समाप्त कर बख्त्यार खिल्जी ने उन दोनों विश्वविद्यालयों की लाखों बहुमूल्य पुस्तकों को जलाकर भस्म कर दिया.-देखिये History of india by Elliot

यह है भीरुता की पराकाष्ठा! शत्रु आक्रमण कर रहा है और बौद्ध भिक्षु सिर झुकाये मर और कट रहे हैं।यदि ये सहस्रों भिक्षु बिना अस्त्र-शस्त्रों के लात और घूँसों से भी शत्रु पर आक्रमण करते तो २०० मुसलमानों की बोटी भी देखने में नहीं आती।२०० मुसलमानों ने सहस्रों बौद्धों को सदा के लिए भूमि पर सुला दिया।यह है जैन-बौद्धों की झूठी अहिंसा का दुष्परिणाम।

१५ अगस्त १९४७ को भारत स्वतन्त्र हो गया,भारत को लंगड़ी स्वतन्त्रता मिल गयी।भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया,परन्तु भारत में मुर्दा बौद्धमत को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयत्न आरम्भ हुए।हमारे राष्ट्र-ध्वज में अशोक-चक्र को अपनाया गया।अशोक बौद्ध था,यह तो सर्वविदित ही है।भारतीय संस्कृति और सभ्यता से विमुख पं० जवाहरलाल नेहरु भारत को अवनति के गढ़े में गिराने के लिए जैन और बौद्धों की झूठी अहिंसा,दया और मैत्रीभाव का अन्धानुकरण जीवन भर करते रहे।चीन का उदाहरण हमारे सामने है।
नेहरुजी नरपिशाच चीनी कम्युनिष्टों के प्रति शान्ति और सद्व्यवहार का बर्ताव करते रहे।इतना ही नहीं शान्ति और मैत्री बनाये रखने के लिए उन्होंने तिब्बत में जो सदा से भारत का अंग रहा है,चीन की प्रभुसत्ता स्वीकार करने तक की भयंकर भूल की।चीन ने धीरे-धीरे हमारी १२,००० वर्गमील भूमि अपने अधिकार में ले ली।नेहरूजी ने वैदिक हिंसा को अपनाकर ऐसे दुष्ट और आततायी का सिर नहीं फोड़ा,अपितु 'शान्ति-शान्ति’ ही चिल्लाते रहे।इस शान्ति और सद्भावना का लाभ उठाकर विश्वासघाती चीन ने अक्टूबर सन् १९६२ में भारत पर सशस्त्र आक्रमण कर भारत की २२,००० वर्गमील भूमि हथिया ली।सैकड़ों सैनिक मारे गये।

आज पाकिस्तान आये दिन भारत की सीमाओं पर गोली चलाता है।गोली ही नहीं चलाता वह कच्छ में घुस आया है और अब तो उसने कश्मीर में भी घुसपैठ आरम्भ कर दी है,परन्तु भारत के ये कायर,दब्बू और भीरु शासक केवल विरोध-पत्र भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।
अब तो विरोध-पत्रों से पाकिस्तान की अलमारियाँ भर गयी होंगी,और उनके पास भारत के विरोध-पत्रों को रखने की जगह भी नहीं होगी,अतः विरोध-पत्र न भेजकर अब तो कुछ करने की आवश्यकता है।अब तो गोली का उत्तर गोली से ही देने से देश का कल्याण हो सकता है।

यहाँ हम विवेकानन्द जी के शब्दों में यह कहे बिना नहीं रह सकते-
“अहिंसा परमो धर्मः” बौद्ध धर्म का एक बहुत अच्छा सिद्धान्त है,परन्तु अधिकारी का विचार न करके जबरदस्ती राज्य की शक्ति के बल पर उस मत को सर्वसाधारण पर लादकर बौद्ध धर्म ने देश का सर्वनाश कर दिया है।-विवेकानन्द साहित्य, भाग ६ पृ० १४३

जैन और बौद्धों के झूठे अहिंसावाद से देश का सत्यानाश हुआ है,हो रहा है तथा आगे भी होगा,अतः इसे तिलाञ्जलि देकर और वैदिक अहिंसावाद के अपनाने पर ही देश उन्नति के शिखर पर आरुढ़ होगा।


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🌷🌹🌷🌹ओ३म्🌹🌷🌹🌷 भूपेश आर्य 🌷वेद-विषय 🌷 प्रश्न:-ईश्वरीय ज्ञान वेद की आवश्यकता ही क्या है ? उत्तर:-जब...

🌷🌹🌷🌹ओ३म्🌹🌷🌹🌷

भूपेश आर्य

🌷वेद-विषय 🌷

प्रश्न:-ईश्वरीय ज्ञान वेद की आवश्यकता ही क्या है ?

उत्तर:-जब उस परमपिता परमात्मा ने हमें संसार में भेजा होगा हमारे लिए जहाँ नाना प्रकार के फल ,अन्न-औषधियाँ हमें दी होंगी,क्या यह भी संभव है कि उसने ये नहीं बताया होगा कि फलों का,पशुओं का,अन्न और औषधि का कैसे प्रयोग करना है।क्या हमें ये नहीं बताया जाना चाहिये कि संसार में जा रहे मानव ! तुम्हें यदि सुखी रहना है तो ये सावधानियाँ बरतना या इन कार्यों को करना,ऐसे रहना,ऐसा व्यवहार करना।जब तक साधारण ज्ञान वाला सांसारिक पिता अपनी संतानों के लिए भी ऐसी व्यवस्था करता है तो वह परमकारुणिक प्रभु क्यों न करता ? ईश्वर ने वेद-ज्ञान के द्वारा संसार में आने वाले मनुष्यों को ज्ञान का भंडार सौंप दिया।

मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो दूसरों की नकल से सीखता है।सेना में कवायद होने लगी।एक आदमी सबसे आगे खड़ा कर दिया गया अब जैसे वो करता है सारे सैनिक उसी की नकल कर रहे हैं।बच्चा रोने लगा ,दो दिन,चार दिन का है।माँ दूध पिला रही है,रोना बन्द ही नहीं हो रहा।दादी बताती है इसके पेट में दर्द होगा,अजवायन पकाकर देती है।ये सो गया।पेट में दर्द ही था।अब बड़ा हो गया।माँ दूध तो पिलाती ही है।गर्मी के दिन चमचे से पानी भी मुख में डालती है,बच्चे को आहिस्ता-आहिस्ता अभ्यास से भान होने लगा।

मम कहने पर मुख खोलता है और फिर कुछ उसमें आता है।शान्ति मिलती है।यह मम भी सीख रहा है।पति-पत्नि जब दोनों लड़ते हैं तो उनका लड़ना ये समझता तो नहीं पर सीख जरुर रहा है।जब मुंह में बोलने की शक्ति आयी,बेचैनी हुई तो ये मम और दुदु भी चिल्लाता है।जब मम या दुदु कहने से कोई समझ नहीं पाता,तब यह रोना शुरु करता है और चाहता है उस बेजुबान को समझो।

तुम समझते क्यों नहीं?तुम जो-जो बोलते हो वह सारे शब्द आत्म-सात् करता जाता है।याद करता जाता है,आप समझें या ना समझें,धीरे-धीरे वह वही भाषा बोलने लगता है,जो उसके वातावरण में आसपास के लोग बोलते थे।उसकी माता,बहन,पिता बोलते थे।

यही कारण है कि एक अंग्रेज माँ की सन्तान बचपन से ही अंग्रेजी बोलने लगती है।एक पंजाबी माँ की सन्तान बचपन से ही पंजाबी बोलने लगती है।एक बंगाली मां की सन्तान बचपन से ही बंगला बोलने लगती है।

यदि थोड़ा सा बदल दिया जाए और अंग्रेज माता की संतान किसी पंजाबी लड़की को पालने के लिए दे दें,किसी पंजाबी लड़की की सन्तान को बंगाली लड़की पालने लगे तो पंजाबी की संतान बंगला बोलेगी,अंग्रेज की सन्तान पंजाबी बोलेगी।

इससे यह स्पष्ट हो गया। कि भाषा बच्चे को जन्म से मिलने वाली धरोहर नहीं है।जैसी भाषा उसके सामने आरम्भ से बोली जाती है,बच्चा उसी की नकल करता है,उसी को सीख लेता है,वही बोलना शुरु करता है।

आदि सृष्टि में जब मानव पैदा हुआ होगा तो कोन था जिसकी भाषा की वह नकल करता?कौन था जिसकी भाषा वह सीखता?
कोई पूछे,क्या पशुओं की भाषा ,क्या पक्षियों की भाषा नहीं थी?
थी,परन्तु वह भाषा नहीं है वे तो ध्वनियां-मात्र है।मुर्गा कुकडूं कूं करता है क्या सचमुच कुकडूं कूं करता है या डुडलुं डूं करता है?
जैसे हारमोनियम की ध्वनि में कोई भी गीत गा लो प्रत्येक भाषा के साथ हारमोनियम का स्वर वही गीत गाता मालूम होता है।हारमोनियम से ध्वनि निकलती है भाषा नहीं।

शेर जैसे दहाड़ता है,उसके बच्चे भी वैसे ही दहाड़ते हैं।शुक पिक जैसे बोलते हैं उनके बच्चे भी वैसे ही चहकते हैं।मनुष्य उनसे उसी प्रकार की दहाड़,उसी प्रकार की चहक तो सीख सकता है,भाषा नहीं सीख सकता।
लेकिन उस दहाड़ का ,उस चहक का यदि कोई अर्थ होता है तो वह मनुष्य की बुद्धि से परे है,वह न तब जानता था न अब जानता है।

पेड़ से पत्तों के झड़ने का शब्द ,पानी की बून्दों के गिरने का शब्द,उफनती नदी का वेग से बहने का स्वर ! क्या बून्द के गिरने से टप-टप शब्द होता है?क्या उफनती नदी सा-सा करती?नहीं।ये स्पष्ट शब्द नहीं हैं।ये ध्वनियाँ मात्र हैं।इन्हें जैसा चाहो वैसा कह सकते हो,इनसे भाषा का निर्माण नहीं हो सकता।

पैर में कांटा चुभ गया तो क्या मेरे मुख से हाय-आह निकलता है?क्या जब मैं प्रसन्न होता हूं तो वाह वाह ओ हो हो करता हूं।?क्या दुखी देखकर हाय हाय ऐसा करता हूं? ऐसा कुछ नहीं है।ये ध्वनियां हैं,इन्हें कुछ भी कह लो।
हाय के स्थान पर वाह कह लो,ओह के स्थान पर वोह कह लो,आह के स्थान पर आ कह लो।हाय ओह तो मेरे लिए वे शब्द हैं जो मैं नित्य सुनता हूं और मान लेता हूं कि काँटा चुभने पर ये ही मुख से निकलता है।इन अस्पष्ट ध्वनियों से भाषा का निर्माण कैसे हो सकता है?

मानव भाषा का निर्माण अपने आप स्वयं कैसे कर लेगा?बिना नकल के भाषा सीखता नहीं और आरम्भिक सृष्टि में कौन था जिसकी वह नकल करता?इसलिए वेद माता ने स्पष्ट घोषणा की है कि आदि मानव को भाषा ईश्वर ने प्रदान की है।भाषा मनुष्य की कृति नहीं है।

वेदान्त दर्शनकार ने इसी बात को ‘शास्त्र योनित्वात्ः कहकर प्रकट किया है।

प्रश्न :-भाषा ईश्वर ने दी यह मान लिया जाए तो भी यह तो सिद्ध नहीं होता कि वेद भी ईश्वर ने दिये ?

उत्तर :-यदि मैं कहूं “वहाँ एक परछाई थी।” प्रश्न है किसकी परछाई थी।कोई वस्तु तो होनी चाहिये जिसकी परछाई हो।भाषा तो कलेवर है विचार का।जैसे जीवात्मा शरीर धारण करता है।वैसे ही विचार जब शरीर धारण करते हैं तो भाषा बन जाती है।बिना भाषा के विचार का अस्तित्व असिद्ध ही रहेगा तो ईश्वर ने आरम्भ मानवीय सृष्टि में जब मानव को भाषा दी तो जिन शब्दों में ,जिन वाक्यों में,जिन विचारों में,भाषा दी वह ही वेद ज्ञान है।


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આટલી જાતના હોય છે માણસો…… અવળચંડા, અકલમઠા, અદેખા, અકર્મી, આપડાયા, ઓસિયાળા,...

આટલી જાતના હોય છે માણસો……

અવળચંડા,
અકલમઠા,
અદેખા,
અકર્મી,
આપડાયા,
ઓસિયાળા,
ઉતાવળા,
આઘાપાસિયા,
એકલપંડા,
ઓટીવાળ,
કજીયાખોર,
કદરૂપા,
કરમહીણા,
કવાજી,
કસબી,
કપટી,
કપાતર,
કકળાટીયા,
કામી,
કાળમુખા,
કાવતરાખોર,
કાણગારા,
કાંડાબળિયા,
કમજાત,
કાબા,
કબાડા,
અધકચરા,
અજડ,
આળસું,
અટકચાળિયા,
ખટપટિયા,
ખુંધા,
ખાવધરા,
ખટહવાદિયા,
ખૂટલ,
ખેલાડી,
ખેલદિલ,
ખોચરા,
ખુવાર,
ગરજુડા,
ગપસપિયા,
ગપ્પીદાસ,
ગણતરીબાજ,
ગળેપડું,
ગંદા,
ગંજેરી,
ગાંડા,
ગોલા,
ગોબરા,
ગમાર,
ગુણગ્રહી,
ગભરુ,
ગુલાટમાર,
ગાલાવેલિયા,
જ્ઞાની,
ઘરરખા,
ઘરમુલા,
ઘમંડી,
ઘરઘૂસલા,
ઘરફાળુ,
ઘેલહાગરા,
ઘોંઘાટિયા,
ઘૂસણખોર,
ચતુર,
ચહકેલ,
ચબરાક,
ચોવટિયા,
ચાપલા,
ચાગલા,
ચીકણા,
છકેલછોકરમતીયા,
છેલબટાવ,
છીંછરા,
જબરા,
જોરાવર,
જબરવસીલા,
જોશીલા,
જીણા,
ઠરેલ,
ઠાવકા,
ઠંડા,
ડંફાસિયા,
ડાકુ,
ડરપોક,
ડંખીલા,
ડફોળ,
તમોગુણી,
તરંગી,
તુકાબાજ,
દયાળુ,
દરિયાદિલ,
દાતાર,
દાણચોર,
દુ:ખીયા,
દિલદગડા,
દોરંગા,
દોઢડાયા,
દિલદગડા,
ધંધાદારી,
ધમાલીયા,
ધોકાપંથી,
ધાળપાડું,
ધુતારા,
ધર્મનિષ્ઠ,
ધૂળધોયા,
ધિરજવાન,
નવરા,
નગુણા,
નખોદીયા,
નમાલા,
નિડર,
નિશ્વાર્થી,
નિજાનંદી,
નિષ્ઠુર,
નિર્ણય,
નિર્મોહી,
પરોપકારી,
પરિશ્રમી,
પરાધીન,
પહોંચેલા,
પંચાતિયા,
પાણિયારા,
પાંગળા,
પુરષાર્થી,
પોચા,
પોપલા,
પ્રેમાળ,
પાગલ,
ફરતિયાળ,
ફોસી,
ફતનદિવાળીયા,
ફાકાળ,
ફાલતુ,
ફુલણસિંહ,
ફાટેલ,
બહાદુર,
બગભગત,
બટકબોલો,
બચરવાળ,
બહુરંગા,
બેદરકાર,
બિચારા,
બોતડા,
બાયલા,
બિકણા,
બોલકણા,
બળવાખોર,
બુદ્ધિશાળી,
ભડવીર,
ભૂલકણા,
ભલા,
ભદ્રિક,
ભારાળી,
ભાંગફોડિયા,
ભૂંડા,
ભોળા,
ભમરાળા,
મરણિયા,
મસ્તીખોર,
મફતીયા,
મનમોજી,
મતલબી,
મિંઢા,
મિઠાબોલા,
મિંજરા,
મારફાડિયા,
માયાળુ,
માખણીયા,
મારકણા,
મુરખા,
મરદ,
રમુજી,
રમતીયાળ, 😜
રસિક,
રાજકારણી,
રજવાડી,
રિસાડવા,
રોનકી,
રોતી,
રૂડા,
રેઢલ,
રેઢીયાળ,
સુધરેલા,
સમજદાર,
શંકાશિલ,
શાણા,
સંતોષી, 😛 માણસો ના પ્રરકાર કેટલા છે ગમે તો શેર કરો બાકી લેર કરો


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😎🚩 आज हम आपको संस्कृत के बारे में कुछ ऐसे तथ्य बता रहे हैं, जो किसी भी भारतीय का सर गर्व से ऊंचा कर...

😎🚩

आज हम आपको संस्कृत के बारे में कुछ ऐसे
तथ्य बता रहे हैं, जो किसी भी भारतीय
का सर गर्व से ऊंचा कर देंगे.
1. संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी माना
जाता है।
2. संस्कृत उत्तराखंड की आधिकारिक भाषा
है।
3. अरब लोगो की दखलंदाजी से पहले संस्कृत
भारत की राष्ट्रीय भाषा थी।
4. NASA के मुताबिक, संस्कृत धरती पर बोली
जाने वाली सबसे स्पष्ट भाषा है।
5. संस्कृत में दुनिया की किसी भी भाषा से
ज्यादा शब्द है वर्तमान में संस्कृत के शब्दकोष में
102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द है।
6. संस्कृत किसी भी विषय के लिए एक अद्भुत
खजाना है। जैसे हाथी के लिए ही संस्कृत में
100 से ज्यादा शब्द है।
7. NASA के पास संस्कृत में ताड़पत्रो पर
लिखी 60,000 पांडुलिपियां है जिन पर
नासा रिसर्च कर रहा है।
8. फ़ोबर्स मैगज़ीन ने जुलाई,1987 में संस्कृत को
Computer Software के लिए सबसे बेहतर भाषा
माना था।
9. किसी और भाषा के मुकाबले संस्कृत में सबसे
कम शब्दो में वाक्य पूरा हो जाता है।
10. संस्कृत दुनिया की अकेली ऐसी भाषा है
जिसे बोलने में जीभ की सभी मांसपेशियो
का इस्तेमाल होता है।
11. अमेरिकन हिंदु युनिवर्सिटी के अनुसार
संस्कृत में बात करने वाला मनुष्य बीपी, मधुमेह,
कोलेस्ट्रॉल आदि रोग से मुक्त हो जाएगा.
संस्कृत में बात करने से मानव शरीर का
तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है जिससे कि
व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश(Positive
Charges) के साथ सक्रिय हो जाता है।
12. संस्कृत स्पीच थेरेपी में भी मददगार है यह
एकाग्रता को बढ़ाती है।
13. कर्नाटक के मुत्तुर गांव के लोग केवल संस्कृत
में ही बात करते है।
14. सुधर्मा संस्कृत का पहला अखबार था, जो
1970 में शुरू हुआ था। आज भी इसका ऑनलाइन
संस्करण उपलब्ध है।
15. जर्मनी में बड़ी संख्या में संस्कृतभाषियो
की मांग है। जर्मनी की 14 यूनिवर्सिटीज़ में
संस्कृत पढ़ाई जाती है।
16. नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार जब वो
अंतरिक्ष ट्रैवलर्स को मैसेज भेजते थे तो उनके
वाक्य उलट हो जाते थे. इस वजह से मैसेज का
अर्थ ही बदल जाता था. उन्होंले कई भाषाओं
का प्रयोग किया लेकिन हर बार यही
समस्या आई. आखिर में उन्होंने संस्कृत में मैसेज
भेजा क्योंकि संस्कृत के वाक्य उल्टे हो जाने
पर भी अपना अर्थ नही बदलते हैं।
17. आपको जानकर हैरानी होगी कि
Computer द्वारा गणित के सवालो को हल
करने वाली विधि यानि Algorithms संस्कृत में
बने है ना कि अंग्रेजी में।
18. नासा के वैज्ञानिको द्वारा बनाए जा
रहे 6th और 7th जेनरेशन Super Computers
संस्कृत भाषा पर आधारित होंगे जो 2034 तक
बनकर तैयार हो जाएंगे।
19. संस्कृत सीखने से दिमाग तेज हो जाता है
और याद करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसलिए
London और Ireland के कई स्कूलो में संस्कृत को
Compulsory Subject बना दिया है।
20. इस समय दुनिया के 17 से ज्यादा देशो की
कम से कम एक University में तकनीकी शिक्षा
के कोर्सेस में संस्कृत पढ़ाई जाती है।
संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है
लेकिन वर्तमान में विलुप्त होने की कगार पर
है..2001 में संस्कृत बोलने वाले लोगो की
संख्या सिर्फ 14135 थी। दुनिया जहाँ संस्कृत
की महिमा समझकर संस्कृत सीखना चाह रही
है स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटीज के पाठ्यक्रम में
संस्कृत को जोड़ा जा रहा है वही भारत इस
दिशा में कोई खास कदम नही उठा रहा है।

🚩🙏जय श्री राम🙏🚩


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Tuesday, February 2, 2016

🌻🌻ओ३म्🌻🌻 🌷पथरी🌷 (1) उत्तम श्रेणी की चाय १० ग्राम लें।१० ग्राम चाय को एक कप पानी में उबालकर...

🌻🌻ओ३म्🌻🌻

🌷पथरी🌷

(1) उत्तम श्रेणी की चाय १० ग्राम लें।१० ग्राम चाय को एक कप पानी में उबालकर पिलाएँ।चाय को अच्छी प्रकार उबालें।८-१० उबाल आ जाने चाहियें।छानकर पिला दें।१५ दिन तक पिलाने से पथरी निश्चितरुप से निकल जाएगी।

(2) केले के फूल का काढ़ा (२० ग्राम फूल को २५० ग्राम पानी में उबालें।गुनगुना पिलाएँ।)बनाकर पिलाने से पथरी गल-गलकर निकल जाती है।

(3) अपामार्ग(चिरचिटा,ओंघा) की जड़ ६ ग्राम को पानी में पीसकर प्रातः-सांय पीने से गुर्दे की पथरी कट-कटकर निकल जाती है।

(4) सफेद प्याज का रस २५ ग्राम,यवक्षार २ ग्राम-दोनों को मिलाकर प्रातः-सांय पिलाने से कुछ ही दिनों में पथरी घुलकर निकल जाती है।पथरी चाहे गाल ब्लेडर में हो अथवा पित्ताशय में-दोंनो के लिए अचूक है।

(5) इन्द्र जौ,काला जीरी,काला नमक,बायबिन्ग-चारों बराबर-बराबर लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें।४-४ ग्राम दवा दिन में तीन बार गुनगुने पानी से लें।पथरी टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जायेगी।

(6) बीस ग्राम कुलथी को २५० ग्राम पानी में औंटाएँ।जब चौथाई पानी रह जाये तब उतारकर छान लें और गुनगुना सा रोगी को पिला दें।प्रातः-सांय दो बार दें।पथरी गलकर मूत्र मार्ग से निकल जायेगी।
रोगी को रोटी के साथ भी कुलथी की दाल खाने को दें।

(7) नीम के पत्तों की राख ६ ग्राम फाँककर ऊपर से पानी पीएँ।कुछ दिन के प्रयोग से पथरी गल जाती है।

(8) प्रतिदिन प्रातः गोमूत्र ५० ग्राम पीएँ और शाम को ३ ग्राम फिटकरी एक गिलास पानी में घोलकर पीएँ।४० दिन सेवन करें,पथरी गलकर निकल जाएगी।परीक्षित है।

(9) चीड़ की लकड़ी का चूर्ण आधा ग्राम से दो ग्राम तक जल के साथ एक मास तक खाने से पथरी रोग अवश्य नष्ट होता है।

(10) पीपल की कोंपलें ७,कालीमिर्च ५ -दोनों को ठण्ड़ाई की भाँति घोटकर एक गिलास पानी में मिलाकर पिला दें।३ दिन प्रयोग करें।पथरी गलकर निकल जायेगी।

(11) तुलसी के बीज ३० ग्राम,खाने का सोड़ा १० ग्राम।तुलसी के बीजों को अच्छी प्रकार पीसकर इसम़े खाने का सोडा मिला लें।प्रतिदिन ४-४ ग्राम दवा प्रातः सांय छाछ के साथ पिलाएँ।छोटी पथरी टुकडे-टुकडे होकर मूत्र मार्ग से निकल जायेगी।जिनका आपरेशन हुआ है ,वे यदि इसका प्रयोग करें तो दोबारा पथरी नहीं बनेगी।

(12) १५० ग्राम सज्जी लेकर बारीक पीस लें।६ ग्राम दवा प्रतिदिन प्रातः गाय की छाछ में मिलाकर ३ सप्ताह तक पिलाएँ।गुर्दा और मसाने की पथरी के लिए रामबाण हैं।


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|| नियोग पर आक्षेप कितने सही ??? क्या नियोग व्यभिचार है ??? नोट:- मित्रों यह लेख मेरा नहीं है...

|| नियोग पर आक्षेप कितने सही ??? क्या नियोग व्यभिचार है ???


नोट:- मित्रों यह लेख मेरा नहीं है परन्तु इसके भेजने का मुख्य उद्देश्य नियोग को व्यभिचार बताकर जो भ्रम फैलाया गया हैं उसका खण्डण करना हैं व अन्त में विभिन्न धर्मों के ग्रन्थों में आये नियोग सम्बन्धित वर्णन को भी सांकेतिक रूप में रखना हैं |

नोट:- यह नियोग विषय पर ४ लेखो की एक श्रंख्ला हैं अन्त के तीनो लेख मेरे द्वारा लिखे गये हैं और उनमें हम विभिन्न शास्त्रों आदि में आये नियोग विषय सम्बन्धित प्रमाणो को पूर्ण प्रमाणिकता के साथ रखेगे ||

∆℅∆ लेख संख्या– १

कुछ अज्ञानी लोग स्वामी दयानंद रचित सत्यार्थ प्रकाश पर नियोग विषय को लेकर आक्षेप करते है। उनका दोष केवल इतना ही हैं कि वे नियोग के विषय में उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं हैं और इस विषय में अधूरी जानकारी होने के कारण वे स्वामी दयानंद के मूल उद्देश्य को समझ नहीं पाते हैं और व्यर्थ वितंडा करते हैं।

शंका–१
क्या नियोग करना धर्म हैं ???

जिस किसी भी आस्तिक व्यक्ति ने वैदिक सिद्धान्तों का व्यापक अध्ययन किया है वह कर्म को तीन प्रकार का मानता हैं।

१. धर्म
२. अधर्म
३. आपद्धर्म

१. धर्म–
वह सब कर्म जिनके करने से पुण्य और जिनके न करने से पाप होता है | जैसे सन्ध्या (सुबह शाम परमात्मा का ध्यान स्मरण) करना, सुपात्र को दान देना, वाणी से सत्य, प्रिय और हितकारी बोलना, सुख दुःख और लाभ-हानी में समान रहना आदि |

२. अधर्म–
उन कर्मों का नाम है जिनके करने से पाप और जिनके न करने से पुण्य होता है जैसे शराब पीना, जुआ खेलना, चोरी, डकैती करना, ठगना, गाली देना, अपमान करना, निरापराध को दण्ड देना आदि |
३. आपद्धर्म–
वे सभी कर्म जिनको सामान्य स्थितियों में करना अच्छा नहीं कहा जाता परन्तु जिनको आपदा अथवा संकट में करना पाप कर्म नहीं कहलाता हैं | जैसे शल्य चिकित्सक द्वारा प्राण रक्षा के लिए मनुष्य के शरीर पर चाकू चलाना, देश कि सीमा पर शत्रु के प्राणों का हरण करना, जंगल में नरभक्षी शेर का शिकार करना आदि |

विवाह धर्म का अंग है, व्याभिचार अधर्म का अंग है ठीक वैसे ही नियोग आपद्धर्म का अंग हैं |

शंका–२
नियोग का मूल उद्देश्य क्या हैं ???

प्रिय पाठकों कृपया एक साधारण से प्रश्न पर विचार करें | यदि आपसे पूछा जाए कि आप रोटी, चावल, दाल, सब्जी, दूध, दही आदि कब खाते हैं तो आप कहेंगे “प्रतिदिन” अब यदि आप से पूछा जाए कि कुनैन आप कब खाते हैं तो आप कहेंगे कि “केवल मलेरिया में” | क्या कड़वी कुनैन भी खाने की चीज हैं, परन्तु मलेरिया में हम न खाने वाली वस्तु को भी खाते हैं ताकि हमारी जान बच जाए | जैसे रोटी चावल आदि सामान्य जीवन का अंग है ठीक इसी तरह विवाह भी सामान्य जीवन का अंग है | जैसे न खाने वाली कुनैन भी आपत्ति में खाना उचित होता है इसी तरह सामान्य जीवन का अंग न होते हुए भी आपत्ति काल में नियोग सही होता है |

सभी आक्षेपकों ने नियोग को अनैतिक कहा और इसकी निन्दा की | परन्तु किसी ने भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि नियोग मूलतः समाज व्यवस्था का सन्तुलन रखने और व्याभिचार को बचाने के लिए ही एक आपद्धर्म है।

जैसे स्वस्थ व्यक्ति को दवा की जरूरत नहीं है वैसे ही सामन्य रूप से संतान उत्पन्न होने पर भी नियोग की जरूरत नहीं है | जैसे कुछ परिस्थितियों मे दवा के बिना शरीर मर जाता है या स्थायी रूप से विकृत /अक्षम हो जाता है वैसे ही बिना नियोग के व्याभिचार से समाज विकृत हो जाता है। जैसे चिकित्सा के कुछ नियम हैं (जैसे दवा की मात्रा /पथ्य/अपथ्य) वैसे नियोग के भी कुछ नियम हैं । जैसे बिना नियम के दवाई लाभ के स्थान पर हानि करती है वैसे ही बिना नियम पालन के नियोग समाज को हानि पहुंचाता है।
नियोग का केवल और केवल एक ही प्रयोजन हैं असक्षम व्यक्ति के लिए संतान उतपन्न करने के लिए, विधवा अथवा जिसका पति उपलब्ध न हो उसे संतान उत्पन्न करने के लिए जिससे उसका जीवन सुचारु प्रकार से व्यतीत हो सके, समाज में मुक्त सम्बन्ध पर लगाम लगाकर, उसे नियम बद्ध कर व्यभिचार को बढ़ने से रोकने के लिए।

शंका–३
व्याभिचार और नियोग में क्या अन्तर हैं ???

बहुत से लोग आलोचना करते हुए कहते हैं कि व्याभिचार और नियोग एक समान हैं | दोनों में कोइ अन्तर नहीं है | इसलिए नियोग भी पाप और अधर्म है | जैसे अपराधी किसी को चाकू से घायल करता है या कोई भी अंग काटता है तो वह अपराध है क्योंकि उसमें कोई नियम और विधि नहीं है। परन्तु जब एक शल्य चिकित्सक किसी रोगी का कोइ अंग चाकू से काटता है तो वह नियम से करता है । भले ही वह चाकू से रोगी को चोट पहुंचा रहा है परन्तु वह चाकू का प्रयोग नियम और चिकित्सा विधि के अनुसार रोगी के हित के लिए करता है | इसी प्रकार व्याभिचार और वेश्यागमन का कोइ नियम नहीं है और समाज के लिए हानिकारक है | परन्तु नियोग विवाह की भांति विधि और नियमों से बंधा हुआ है और समाज के हित में हैं |

शंका–४
महर्षि दयानन्द के नियोग विषय पर क्या विचार हैं ???

ॠग्वेदादि भाष्य भूमिका के नियोग प्रकरण में महर्षि दयानन्द जी लिखते हैं– “इसी प्रकार से विधवा और पुरूष तुम दोनो आपत्काल में धर्म करके सन्तान उत्पत्ति करो और उत्तम-उत्तम व्यवहारों को सिद्ध करते जाओ | गर्भ हत्या या व्याभिचार कभी मत करो | किन्तु नियोग ही कर लो | यही व्यवस्था सबसे उत्तम है |”

इस वाक्य से अर्थ निकलता है कि

** नियोग आपद्धर्म है क्योंकि नियोग केवल आपत्काल मे किया जाता है |

** व्याभिचार और गर्भपात अधर्म/महापाप है इसलिए व्याभिचार और गर्भपात नहीं करना चाहिए |

** नियोग व्यभिचार और गर्भपात जैसे महापापों से बचने का उपाय हैं |

शंका–५
क्या प्राचीन काल में नियोग व्यवहार का प्रयोग होता था ???

निस्संदेह होता था महाभारत/पुराण/स्मृति आदि में नियोग के प्रमाण हैं | कुछ प्रमाणो को हम आगे दे रहे हैं–

∆ व्यासजी का काशिराज की पुत्री अम्बालिका से नियोग- महाभारत आदि पर्व अ 106/6

∆ धृतराष्ट्र व्यास के वीर्य से उत्पन्न हुआ- देवी भगवत स्कन्द 2/6/2

∆ वन में बारिचर ने युधिस्टर से कहा- में तेरा धर्म नामक पिता- उत्पन्न करने वाला जनक हूँ- महाभारत वन पर्व 314/6


∆ कोई गुणवान ब्राह्मण धन देकर बुलाया जाये जो विचित्र वीर्य की स्त्रियों में संतान उत्पन्न करे- महाभारत आदि पर्व 104/2

∆ उत्तम देवर से आपातकाल में पुरुष पुत्र की इच्छा करते हैं- महाभारत आदि पर्व 120/26

∆ परशुराम द्वारा लोक के क्षत्रिय रहित होने पर वेदज्ञ ब्राह्मणों ने क्षत्रानियों में संतान उत्पन्न की- महाभारत आदि पर्व 103/10

∆ पांडु कुंती से- हे कल्याणी अब तू किसी बड़े ब्राह्मण से संतान उत्पन्न करने का प्रयत्न कर- महाभारत आदि पर्व 120/28

∆ किसी कुलीन ब्राह्मण को बुलाकर पत्नी का नियोग करा दो, इनमे कोई दोष नहीं हैं- देवी भगवत 1/20/6/41

∆ व्यास जी के तेज से में भस्म हो जाऊगी इसलिए शरीर से चन्दन लपेटकर भोग कराया- देवी भगवत 1/20/65/41

∆ काम कला जानने वाले व्यास जी को दासी ने संतुष्ट किया- देवी भागवत 2/6/4

∆ भीष्म जी ने व्यास से कहा माता का वचन मानकर , हे व्यास सुख पूर्वक परे स्त्री से संतान उत्पत्ति के लिए विहार कर- देवी भागवत 6/24/46

∆ सूर्य ने कुंती से कहा-भय मत करो संग करो- महाभारत अ। पर्व 111/13

∆ वह तू केसरी का पुत्र क्षेत्रज नियोग से उत्पन्न बड़ा पराकर्मी – वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/28

∆ मरुत ने अंजना से नियोग कर हनुमान को उत्पन्न किया – वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/15

∆ राम द्वारा बाली के मारे जाने पर उसकी पत्नी तारा ने सुग्रीव से संग किया – गरुड़ पुराण उतर खंड 2/52

∆ बिना संतान वाले की स्त्री बीज लेले- गौतम स्मृति 29

∆ जिसका पति मर गया हैं-वह 6 महीने बाद पिता व भाई नियोग करा दे- वशिष्ट स्मृति 17/486

∆ किन्ही का मत हैं की देवर को छोड़कर अन्य से नियोग न करे- गौतम स्मृति 18

∆ जिसका पति विदेश गया हो तो वह नियोग कर ले- नारद स्मृति श्लोक 98/99/100

∆ देवर विधवा से नियोग करे- मनु स्मृति 9/62

∆ आपातकाल में नियोग भी गौण हैं- मनु 9/58

∆ नियोग संतान के लोभ के लिए ही किया जाना चाहिए- ब्राह्मण सर्वस्व पृष्ट 233

∆ यदि राजा वृद्ध हो गया या बीमार रहता हो तो अपने मातृकुल तथा किसी अन्य गुणवान सामंत से अपनी भार्या में नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न करा ले- कौटिलीय शास्त्र 1/17/52


∆ राजा विशाप ने स्त्री का सुख प्रजा के लिए त्याग दिया। वशिष्ट ने नियोग से मद्यंती में संतान उत्पन्न की- विष्णु पुराण 4/4/69

शंका–६
क्या बाइबिल में नियोग का विधान हैं?

बाइबिल में नियोग

तब यहूदा ने ओनान से कहा- अपनी भाई की बीवी के पास जा और उसके साथ द्वार का धर्म करके अपने भाई के लिए संतान जन्मा- उत्पत्ति पर्व 38/8

जब कई भाई संग रहते हो और उनमें से एक निपुत्र मर जाये तो उसकी स्त्री का ब्याह पर गोत्री से न किया जाये-उसके पति का भाई उसके पास जाकर उसे अपनी स्त्री कर ले – व्यवस्था विवरण 25/5-10

यदि देवर नियोग से इंकार करे तो भावज उसके मुह पर थूके और जूते उसके पाव से उतारे- व्यवस्था 25/2

शंका–७
क्या इस्लाम में भी नियोग का विधान हैं ???

इस्लाम में नियोग का विधान

सूरत कलम रुकुअ 1

वलीद घबराया और तलवार खीचकर अपनी माँ से कहा- सच बता की मैं किसका बीटा हूँ ? माँ ने कहाँ-तेरा बाप नामर्द था, और तेरे चचेरे भाई की आंखे हमारी जायदाद पर लगी हुई थी, मैंने अपने गुलाम से बदफैली (नियोग ) कराई और तू पैदा हुआ- तफसीर मूज सु 59 और गजिन मतीन सूरत 45

शंका–८
क्या आधुनिक समाज में नियोग का व्यवहारिक प्रयोग होता हैं ???

निस्संदेह होता हैं, आजकल नियोग को sperm donation अर्थात वीर्य दान कहा जाता हैं | यह मुख्य रूप से उन दम्पत्तियों द्वारा प्रयोग किया जाता हैं जिनमें पुरुष संतान उत्पन्न करने में असक्षम होता हैं | चिकित्सकों द्वारा उत्तम कोटि का वीर्य महिला के शरीर में स्थापित किया जाता हैं जिससे उसे संतान हो जाये |
मुख्य रूप से भाव वही हैं केवल माध्यम अलग हैं |

नियोग के मुख्य प्रयोजन को समझे बिना व्यर्थ के आक्षेप करना कितना सही ?????

ओ३म्…


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🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻 भूपेश आर्य 🌻फलित ज्योतिष🌻 भारतवर्ष को अवनति के गढ़े में छकेलने वाला दूसरा बहुत बड़ा कारण...

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻

भूपेश आर्य

🌻फलित ज्योतिष🌻

भारतवर्ष को अवनति के गढ़े में छकेलने वाला दूसरा बहुत बड़ा कारण है-फलित ज्योतिष।यह फलित ज्योतिष कई भागों में विभक्त है,यथा मुहूर्त्त,नवग्रह पूजा और दिशाशूल।
वैदिक साहित्य में ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण स्थान है।ज्योतिष को वेद के षडअंगों में से एक माना गया है।वेदों में बहुत से ऐसे मन्त्र विद्यमान हैं जिन्हें ज्योतिष की सहायता के बिना समझा ही नहीं जा सकता,परन्तु यह सारा महत्व गणित ज्योतिष का है,फलित का नहीं।

यहाँ गणित और फलित ज्योतिष का अन्तर स्पष्ट करना आवश्यक है।गणित ज्योतिष वह विद्या है,जिसके द्वारा सूर्य,चन्द्र,नक्षत्र आदि से प्रकृति में होने वाली घटनाओं का यथार्थ ज्ञान हो।जैसे सूर्यग्रहण कब होगा,चन्द्रग्रहण कब होगा?दिन घटना कब आरम्भ होता है और बढ़ना कब आरम्भ होता है।गणित ज्योतिष से हम नक्षत्रों की स्थिति जानकर ऐतिहासिक घटनाओं का विज्ञान भी प्राप्त कर सकते हैं।उदाहरण के रुप में जिस समय महाभारत का युद्ध हुआ था,उस समय ग्रह एक युति में थे।पाश्चात्य ज्योतिर्विद बेली के अनुसार ईसा से ३१०२ वर्ष पूर्व २० फरवरी को २ बजकर २७ मिनट और ३० सेकण्ड़ पर ग्रह एक युति में थे,अतः महाभारत का समय ३१०२+२०००=५१०२ वर्ष होगा।यह है ज्योतिष के अनुसार महाभारत का समय और परम्परा के अनुसार भी यही ठीक है।इस गणित ज्योतिष को आर्यसमाज मानता है।

फलित ज्योतिष क्या है?यदि जन्मलग्न में राहु हो और छठे स्थान में चन्द्रमा हो तो बालक की मृत्यु हो जाती है।यदि जन्मलग्न में शनि हो और छठे स्थान में चन्द्रमा हो तथा सातवें स्थान में मंगल हो तो बालक का पिता मर जाता है।जन्मलग्न में तीसरे स्थान में भौम हो तो जितने भाई हों सभी का नाश हो जाता है।इसी प्रकार यदि रात को बच्चा उत्पन्न होगा तो अमुक प्रकार का होगा।रविवार को होगा तो अमुक प्रकार का होगा।किसी कन्या का विवाह अमुक समय में हो गया तो वह विधवा हो जायेगी,आदि-आदि।
यह है फलित ज्योतिष।यह सर्वथा मिथ्या(झूठ) है।यह लोगों को ठगने का पाखण्ड़ है।

फलित ज्योतिष ने भारत के पतन एवं अकल्याण की प्रभूता सामग्री प्रस्तुत की है।यहाँ हम एक ऐतिहासिक घटना लिखने का लोभ संवरण नहीं कर सकते।

महमूद गजनवी ने भारत पर सत्रह बार आक्रमण किये।अन्तिम बार सन् १०२४ ई० में उसने काठियावाड़ के प्रसिद्ध मन्दिर सोमनाथ पर आक्रमण किया।सोमनाथ की रक्षा के लिए एक बहुत बड़ी सेना तैयार खड़ी थी,परन्तु परिणाम क्या हुआ,यह महर्षि दयानन्द के शब्दों में पढ़िये-
“पोप,पूजारी पुरश्चरण,स्तुति-प्रार्थना करते थे कि ‘हे महादेव! इस म्लेच्छ को तू मआर डाल,हमारी रक्षा कर।'और वे अपने राजाओं को समझाते थे कि'आप निश्चिन्त रहिये।महादेवजी भैरव अथवा वीरभद्र को भेज देंगे।वे सब म्लेच्छों को मार डालेगें वा अन्धा कर देंगे।अभी हमारा देवता प्रसिद्ध होता है।हनुमान,दुर्गा और भैरव ने स्वप्न दिया है कि हम सब काम कर देंगे।’
वे बेचारे भोले राजा और क्षत्रीय पोपों के बहकाने से विश्वास में रहे।कितने ही ज्योतिषी पोपों ने कहा कि अभी तुम्हारी चढ़ाई का मुहूर्त्त नहीं है।एक ने आठवाँ चन्द्रमा बतलाया,दूसरे ने योगिनी सामने दिखाई,इत्यादि बहकावट में रहे;जब म्लेच्छों की फौज ने आकर घेर लिया तब दुर्दशा से भागे।कितने ही पोप,पुजारी और उनके चेले पकड़े गये।पूजारियों ने हाथ जोड़कर यह भी कहा कि तीन करोड़ रुपया ले लो,मन्दिर और मूर्ति मत तोड़ो।मुसलमानों ने कहा कि हम 'बुतपरस्त’ नहीं,किन्तु 'बुतशिकन’ हैं,अर्थात् मूर्त्तिपूजक नहीं,किन्तु मूर्त्तिभञ्जक हैं।जाके झट मन्दिर तोड़ दिया। जब ऊपर की छत टूटी तो चुम्बक पाषाण पृथक होने से मूर्त्ति गिर पड़ी।जब मूर्त्ति तोड़ी तो सुनते हैं अठारह करोड़ के रत्न निकले।जब पूजारी और पोपों पर कोड़े पड़े तब रोने लगे।कहा कि कोष बताओ,मार के मारे झट बतला दिया।तब सब कोष लूट-मार कर पोप और उनके चेलों को 'गुलाम’,बिगारी बना पीसना पिसवाया,घास खुदवाया,मल-मूत्रादि उठवाया और चने खाने को दिये।हाय! क्यों पत्थर की पूजा कर सत्यानाश को प्राप्त हुए।क्यों परमेश्वर की भक्ति नहीं की जो म्लेच्छों के दाँत तोड़ डालते और अपनी विजय करते।देखो !जितनी मूर्त्तियाँ पूजी हैं,उतनी शूरवीरों की पूजा करते तो भी कितनी रक्षा होती।पूजारियों ने इन पाषाणों की इतनी भक्ति की,परन्तु एक भी मूर्त्ति उन शत्रुओं के सिर पर उड़के न लगी।जो किसी एक शूरवीर पुरुष की मूर्त्ति के सदृश सेवा करते तो वह अपने सेवकों को यथाशक्ति बचाता और उन शत्रुओं को मारता।”
–सत्यार्थप्रकाश ,एकादशसमुल्लासः

आज कोई भी कार्य किया जाए-मुण्डन हो,यज्ञोपवीत हो,विवाह हो,दुकान का उद्घाटन हो,गृहप्रवेश हो या भवन का शिलान्यास हो-प्रत्येक बात में मुहूर्त्त देखा जाता है।ग्रह-नक्षत्र और कुण्डलियाँ मिलाई जाती हैं,परन्तु फिर भी व्यापार में घाटे हो जाते हैं,मकान बनने में भी विलम्ब हो जाता है,स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं।यह कोई कपोलकल्पना नहीं है।लीजिए,प्रमाण प्रस्तुत करता हूँ–

महाराज मुन्ज ने ज्योतिषी के कहने पर अपने मन्त्री वत्सराज को भोज को मारने का आदेश दिया।उनकी बात सुनकर मन्त्री ने कहा-
त्रैलोक्यनाथो रामोs स्ति वसिष्ठो ब्रह्मपुत्रकः।
तेन राज्याभिषेके तु मुहूर्त्तः कथितोsभवत्।।
तन्मुहूर्त्तेन रामोsपि वनं नीतोsवनीं विना।
सीतापहारोs प्यभवद्विरिञ्चिवचनं वृथा।।
जातः कोs यं नृपश्रेष्ठ किंजिज्ज्ञ उदरम्भरिः।
यदुक्त्या मन्मथाकारं कुमारं हन्तुमिच्छसि।।-(बल्लाल पण्डितविरचित भोजप्रबन्ध २०-२२)
ब्रह्मा के पुत्र वसिष्ठजी ने त्रिलोकीनाथ श्रीराम के राज्याभिषेक का मुहूर्त्त बताया था,उसी मुहूर्त्त में राम को राज्य त्यागकर वन में जाना पड़ा और वहाँ सीता भी चुरा ली गयी,वसिष्ठजी का वचन असत्य ही सिद्ध हुआ,फिर इस पेटू पण्डित के कहने से आप कामदेव के समान सुन्दर भोज को क्यों मारना चाहते हो?

इसी तथ्य को सूरदास जी ने यूँ वर्णित किया है-
कर्मगत टारे नाहीं टरे।
गुरु वसिष्ठ से पण्डित ग्यानी रुचि-रुचि लगन धरी।
सीति हरन मरन दशरथ को विपत में विपत परी।।

मुहूर्त्त क्या है? महर्षि मनु के अनुसार-
निमेषा दश चाष्टौ च काष्टा त्रिंशत्तु ताः कला।
त्रिंशत्कला मुहूर्त्तः स्यादहोरात्रं तु तावतः।।-(मनु० १/६४)
पलक झपकने का नाम निमेष है।१८ निमेष की एक काष्ठा,तीस काष्ठा की एक कला,तीस कला का एक मुहूर्त्त और तीस मुहूर्त्त का एक दिन-रात होता है।

इस प्रकार मुहूर्त्त तो काल की संज्ञा है।क्या यह किसी के ऊपर चढ़ सकता हऐ,या किसी को खा सकता है,अथवा किसी को भस्म कर सकता है?कदापि नहीं।

यदि मुहूर्त्त देखना कोई लाभदायक बात है तो जिन लोगों में (ईसाई,मुसलमान आदि) मुहूर्त्त नहीं देखा जाता,उन्हें हानि होनी चाहिये,परन्तु यहाँ तो हिसाब ही उल्टा है।हिन्दुओं में जहाँ लगन और मुहूर्त्त देखकर विवाह किये जाते हैं,वहाँ विधवाओं की संख्या अन्य देशों की अपेक्षा बहुत अधिक है।मुहूर्त्त देखने से सन्तान अधिक योग्य उत्पन्न होती हो,पति-पत्नि में अधिक प्रेम रहता हो-ऐसी बात भी दृष्टिगोचर नहीं होती।
ऋषि सन्तान! भारत माता के नौनिहालो ! वास्तविकता को समझो और पाखण्ड़ से बचो।

किसी भी कार्य को आरम्भ करने पर नवग्रहपूजा को टकापन्थी पण्डित अनिवार्य बताते हैं।नवग्रहपूजा में भी सबसे पूर्व गणेश का पूजन होता है।एक मिट्टी की डली पर कलावे के दो-तीन चक्कर लगा दिये जाते हैं और उस पर धूप,दीप,नैवेद्य आदि चढ़वाया जाता है।यह भी पण्डित के खाने कमाने का ढ़ोंग है।बार-बार टका चढ़वाकर ये लोग पर्याप्त राशि इकट्ठी कर लेते हैं।जड़ मिट्टी का ढेला तो अपनी रक्षा भी नहीं कर सकता,दूसरे के विघ्न क्या दूर करेगा?

एक बार एक पण्डित जी किसी जाट यजमान के यहाँ पहुंच गये।जब पण्डित जी ने पहली बार टका रखवाया तो जाटजी ने रख दिया।दूसरी बार फिर टका रखने के लिए कहा तो जाट ने सोचा,पता नहीं,पण्डित जी कितनी बार टका रखवाएँगे,अतः पण्डितजी का ध्यान हटते ही जाटजी ने गणेश की मूर्त्ति को उठाया और उसे पीछे की और फेंककर भोलेपन से पूछा,“पण्डितजी ! टका कहाँ रक्खूँ?” पण्डितजी ने कहा-“यहाँ रख,इस गणेश पर।” जाटजी ने कहा-“गणेश कहाँ है,वह तो अपना टका लेते ही चला गया था।”
यदि सभी व्यक्तियों में इस प्रकार की भावनाएँ जाग्रत हो जाएँ तो ये अवैदिक प्रथाएँ समाप्त हो सकती हैं।

नवग्रहपूजा पाखण्ड है।ज्योतिषियों द्वारा स्वीकृत नवग्रह ये हैं-सूर्य,चन्द्रमा,मंगल,बुध,बृहस्पति,शुक्र,शनि,राहु और केतु।राहु और केतु वस्तुतः ग्रह नहीं हैं।ये दोंनो चन्द्रमा के मार्ग की कल्पित ग्रन्थियाँ हैं।शेष सात में भी सूर्य और चन्द्रमा ग्रह नहीं हैं।
कोश में ग्रह का अर्थ इस प्रकार दिया गया है-“सूर्य की परिक्रमा करने वाला तारा।”
इस परिभाषा के अनुसार सूर्य नक्षत्र सिद्ध होता है।चन्द्रमा प्रकाशशून्य है और सूर्य की परिक्रमा न करके पृथिवी की परिक्रमा करता है,अतः यह भी ग्रह नहीं है।इस प्रकार ग्रह कुल पाँच ही रह जाते हैं।जब ग्रह पाँच ही हैं तब नवग्रहपूजा कैसी?

ज्योतिषियों ने सभी ग्रहों के लिए वेदमन्त्र खोज निकाले हैं।यहाँ सभी की समीक्षा का तो समय नहीं है,परन्तु पाखण्ड़ के भण्ड़ाफोड़ के लिए दो-तीन मन्त्रों पर विचार करेंगे।

शनि के लिए जो मन्त्र पढ़ा जाता है,वह इस प्रकार है-

शन्नो देवीरभिष्टयsआपो भवन्तु पीतये।शँयोरभि स्रवन्तु नः।।-(यजु० ३६/१२)
इस मन्त्र में 'शनि’ पद ही नहीं है।उव्वट और महीधर ने भी इस मन्त्र का भाष्य करते हुए इसका शनिग्रह-परक अर्थ नहीं किया है।मन्त्र का ठीक अर्थ इस प्रकार है-
सबका प्रकाशक,सबको आनन्द देने वाला और सर्वव्यापक ईश्वर मनोवाञ्छित आनन्द के लिए और पूर्णानन्द की प्राप्ति के लिए हमारे लिए कल्याणकारी हो।वह प्रभु हम पर सब और से सुखों की वृष्टि करे।

अब केतु का मन्त्र देखिये-
केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे।समुषद्भिरजायथाः।।-(यजु० २९/३७)
इस मन्त्र में 'केतु’ शब्द पड़ा हुआ है,इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है,परन्तु इसका 'केतुग्रह’ के साथ निश्चितरुपेण कोई सम्बन्ध नहीं है।उव्वट ने 'केतु’ का अर्थ 'प्रज्ञान’ किया है और महीधर ने 'ज्ञान’ अर्थ किया है।मन्त्र का ठीक अर्थ यह होगा-

हे विद्वान पुरुष ! अज्ञानियों को ज्ञान प्रदान करते हुए और धनहीन मनुष्यों को धन प्रदान करते हुए तू अज्ञान और दरिद्रय का नाश करने वाले तेजस्वी पुरुषों के साथ उत्तम प्रकार से प्रसिद्ध हो।

“उदबुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि।”-(यजु० १५/५४)
इस मन्त्र को पाखण्डियों ने बुध का मन्त्र बना दिया।इस मन्त्र में 'बुध’ शब्द ही नहीं है।यहाँ 'उदबुध्यस्व’ क्रियापद है।इसका अर्थ है-उदबुद्ध हो।बुध का इस मन्त्र से दूर का भी सम्बन्ध नहीं है।

जिन मन्त्रों का पाठ नवग्रहपूजा में होता है जब वे मन्त्र ही नवग्रहपूजा के नहीं हैं तो यह पूजा और फल सब कुछ व्यर्थ हुआ,अतः बुद्धिमानों को इस पाखण्ड से बचना चाहिये।

ग्रह किसी के ऊपर चढ़ जाते हैं,यह भी मिथ्या है।दो व्यक्ति लो,जिनमें एक के ग्रह (ज्योतिषियों के अनुसार) क्रूर हों और दूसरे के सौम्य।इन दोंनो को ज्येष्ठ मास में जब ऊपर से सूर्य अग्नि बरसाता हो और नीचे से भूमि आग उगलती हो,तब यमुना की रेती पर नंगे पैर चलाओ।जिस पर ग्रह क्रूर हैं उसके पैर और शरीर जलने चाहियें और जिसके सौम्य हैं उसके न जलने चाहिए ।
क्या ऐसा कभी हो सकता है?कदापि नहीं।

फलित-ज्योतिष का एक अंग दिशाशूल भी है।दिशाशूल का अर्थ है कि विषेश दिनो में विषेश दिशा की यात्रा करना उत्तम है और अमुक दिनों में अमुक दिशाओं में जाना हानिकारक है।पाखण्डियों ने अद्भुत गप्पें गढ़ी हुई हैं,जैसे बुधवार को स्त्री को ससुराल नहीं भेजना चाहिये।इसी प्रकार यदि वधू को शुक्रवार को ससुराल भेज दिया जाए तो गर्भपात हो जाता है।यह सब भी वहम और पाखण्ड ही है।

एक बार ऐसा हुआ कि स्वयं पण्डितजी को अपनी लड़की को शुक्रवार को ससुराल भेजना पड़ा।लोगों ने कहा पण्डितजी आप तो शुक्रवार को ससुराल भेजने के लिए मना करते थे फिर आपने कैसे भेज दिया?
पण्डितजी ने कहा,“वसिष्ठ गोत्रवालों को कोई दोष नहीं होता।” पाठकगण! यदि वसिष्ठ गोत्रवालों को दोष नहीं होता तो औरों को क्या दोष हो सकता है?सावधान! इन ज्योतिषियों की चालों से बचो।

यदि विषेश दिन में दिशाविषेश में नहीं जाना चाहिये तो उस दिन उस दिशा में जाने वाली सभी मोटरें,कारें,ट्रक,रेलगाड़ियाँ और वायुयान बन्द कर देने चाहियें,परन्तु हम देखते हैं कि रेलें और मोटरें प्रतिदिन प्रत्येक दिशा में जाती हैं।यदि दिशाशूल का कोई प्रभाव होता तो उस दिन गाडियों की टक्कर होकर सारे यात्रियों की मृत्यु हो जानी चाहिये थी।

ज्योतिषी लोग अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह तो लग्न देख-दाखकर और कुण्डली आदि मिलाकर ही करते हैं,फिर उनकी लड़कियाँ विधवा क्यों हो जाती हैं?ज्योतिषियों के अपने लड़के क्यों मर जाते हैं?इनके लड़के परीक्षाओं में फेल क्यों हो जाते हैं?ये ज्योतिष पृथिवी में गड़े धन को जानकर स्वयं उसे क्यों नहीं निकाल लेते?व्यापार में तेजी-मन्दी को जानकर स्वयं करोड़पति क्यों नहीं हो जाते?

यदि यह फलित-ज्योतिष सच्चा होता तो इन ज्योतिषियों को पटड़ी पर बैठने की आवश्यकता न रहती।यदि इनकी भविष्यवाणियाँ सच्ची होतीं तो इन सबको सी०आई०डी० (गुप्तचर) विभाग में कार्य मिलता अथवा ये चोरों का पता लगाकर और पुलिस को बताकर मालामाल हो जाते।९ फरवरी,१९६५ को पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कैरों की निर्मम हत्या की गयी थी।कोई भी ज्योतिषी नहीं बता सका कि कैरों का हत्यारा कौन है?

विभाजन से पूर्व भारतवर्ष में ६०० राजा थे।उन सभी ने ज्योतिषी पाल रखे थे।किसी ज्योतिषी ने अपने महाराज से यह नहीं कहा -“महाराज! सावधान हो जाओ।अपना कोई प्रबन्ध कर लो।यह राज्य आपसे छिनने वाला है।पटेलरुपी राहु आपको ग्रसने वाला है।”
चलो,राजाओं को न बताया तो कोई बात नहीं,उन्होंने अपना भी कुछ प्रबन्ध न किया।करते तो तब जब उन्हें भविष्य का कुछ ज्ञान होता।

आजकल भृगु-संहिता के नाम से भी एक पाखण्ड पनपने लगा है।प्रत्येक भृगु संहिता वाला कहता है कि मेरी संहिता ही प्रामाणिक है,शेष सब मिथ्या है।अतः ये सभी झूठे हैं।

इन फलित ज्योतिष के अन्तर्गत ही हस्तरेखा भी है।यह भी मिथ्या है।अनेक लोग ज्योतिषियों को अपना हाथ दिखाकर अपने को अपने को ठगाते हैं।
आपके हाथ में क्या है?लीजिए एक शिक्षाप्रद घटना पढिए-
एक बार एक युवक महर्षि दयानन्द के पास गया और अपना हाथ आगे बढ़ाकर कहने लगा -“स्वामी जी!देखिये,मेरे हाथ में क्या है?"स्वामीजी ने उसके हाथ को देखते हुए कहा-"इसमें खून है,मांस है,चर्बी है,चाम है,हड्डियाँ हैं और क्या है?”

हमारे हाथ में क्या है?वेद कहता है-
कृतं में दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनञ्जयो हिरण्यजित्।।-(अथर्व० ७/५०/८)
मेरे दायें हाथ में कर्म है और बायें हाथ में विजय है।मैं अपने कर्मों के द्वारा गौ,भूमि,अश्व,धन और स्वर्ण का विजेता बनूँ।

यदि आप रेखाओं के भरोसे ही बैठे रहे तो कुछ नहीं होगा।कर्म द्वारा,प्रबल पुरुषार्थ द्वारा आप सारे संसार का शासन भी कर सकते हैं।अतः कर्म करो।

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता और विधाता स्वयं है।ज्योतिष के द्वारा आपके भाग्य का निर्माण नहीं हो सकता।ज्योतिष आपको धन-सम्पत्ति नहीं दे सकते।महर्षि दयानन्द के इन वचनों को सदा स्मरण रखो-
“जो धनाढ्य,दरिद्र,प्रजा,राजा,रंक होते हैं,वे अपने कर्मों से होते हैं,ग्रहों से नहीं।”-सत्यार्थप्रकाश ,एकादशसमुल्लासः


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Sunday, January 31, 2016

🌷🌻🌷ओ३म्🌷🌻🌷 भूपेश आर्य 🌷ईश्वर का स्वरुप🌷 पुराणों में जहाँ मूर्ति पूजा तथा अवतारवाद का निरुपण...

🌷🌻🌷ओ३म्🌷🌻🌷

भूपेश आर्य

🌷ईश्वर का स्वरुप🌷

पुराणों में जहाँ मूर्ति पूजा तथा अवतारवाद का निरुपण है,वहाँ ऐसे स्थल भी हैं जहाँ ईश्वर को स्पष्ट शब्दों में निराकार,सर्वव्यापक और अजन्मा बताया है,जिससे मूर्तिपूजा एवं अवतारवाद की आधारशिला ही हिल जाती है और कहीं कहीं प्राचीन वेदिक सिद्धान्तों की झलक दिख पड़ती है।पुराणों के ऐसे ही कुछ श्लोक नीचे देते हैं:-

निर्गुणस्य मुने रुपं न भवेद् दृष्टिगोचरम् ।
दृश्यं च नश्वरं यस्मादरुपं दृश्यते कथम् ।।-(दे०भाग० ३/७)
(ब्रह्मा बोले) हे मुने ! निर्गुण का रुप दृष्टिगोचर नहीं होता।कारण यह है कि दृश्य तो नश्वर है।अरुप का दर्शन कैसे हो सकता है?

एको व्यापीसमः शुद्धो निर्गुणः प्रकृतेः परः ।
जन्म-वृद्ध्यादिरहित आत्मा सर्वगतोsव्ययः ।।
परंज्ञानमयोsसदि्भर्नामजात्यादिभिर्विभुः ।
न योगवान्न युक्तोsभून्नैव पार्थिव चोक्ष्यते ।।-(विष्णु पु० २/६४)
जन्म से रहित आत्मा एक,व्यापक,सम,शुद्ध,निर्गुण और प्रकृति से परे है।
जन्म-वृद्धि आदि से रहित,सर्वव्यापी और अव्यय है।।
हे राजन !वह परं ज्ञानमय है,असत् नाम और जाति से उस सर्वव्यापक का योग न कभी हुआ है,न है,और न होगा।।

विष्णु पुराण में विष्णु शब्द की व्याख्या भी ‘सर्वव्यापक’ के अर्थ में की गयी है-
यस्माद्विष्टमिदं विश्वं तस्य शक्त्या महात्मनः।
तस्मात्स प्रोच्यते विष्णुर्विशेर्धातोः प्रवेशनात् ।।-(वि०पु० ३/१)
यह सम्पूर्ण विश्व उस परमात्मा की ही शक्ति से व्याप्त है।अतः वह विष्णु कहलाता है,क्योंकि 'विश’ धातु का अर्थ प्रवेश करना है।

न ह्यादिमध्यान्तमजस्य यस्य विद्यो वयं सर्वमयस्यधातुः ।
न च स्वरुपं न परं स्वभावं न चैव सारं परमेश्वरस्य ।।
कलामुहूर्त्तादिमयश्च कालो न यद्विभूतेः परिणामहेतूः ।
अजन्मानाश्यस्य सदैकमूर्तेरनामरुपस्य सनातनस्य ।।-(वि०पु० अंश ४,अ० १)
जिस अजन्मा,सर्वमय,विधाता,परमेश्वर का आदि,मध्य,अंत,स्वरुप,स्वभाव और सार हम नहीं पाते।।
कलामुहूर्त्तादिमय काल भी जिसकी विभूति के परिणाम का कारण नहीं हो सकता,जिसका जन्म और मरण नहीं होता,जो सनातन और सर्वदा एकरुप है तथा जो नाम-रुप से रहित है।।

न तत्रात्मा स्वयंज्योतिर्यो व्यक्ताव्यक्तयोः परः ।
आकाश इव चाधारो ध्रुवोsनन्तोपमस्ततः ।।-(श्रीमद्भा०,स्कन्द १२,अ०५)
ज्योतिस्वरुप परमात्मा व्यक्ताव्यक्त पदार्थों से भी सूक्ष्म है।वह आकाश की भांति सर्वाधार ,निर्विकार,अन्तहीन और उपमारहित हैँ।


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🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 भूपेश आर्यः 🌻जीवेम शरदः शतम्🌻 शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमसौ। एतौ यक्ष्मं वि...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

भूपेश आर्यः

🌻जीवेम शरदः शतम्🌻

शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमसौ।
एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुन्ञतो अंहसः ।।-(अथर्व० ८/२/१८)
चावल और जौ तेरे लिए कल्याणकारी हों,ये कफ न करने वाले व खाने में मधुर हैं।ये रोग को रोकते हैं और कष्टों से बचाते हैं,अर्थात् जौ और चावल के प्रयोग से रोग आते ही नहीं और मनुष्य रोग पीड़ा से बचा रहता है।

त्रयायषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् ।
त्रेधामृतस्य चक्षणं त्रीण्यायूँषि तेs करम् ।।-(अथर्व० ५/२८/७)
जमदग्नि-जिसकी जठराग्नि मन्द नहीं होती,उस जमदग्नि की आयु तीन सौ साल होती है।
कश्यपस्य-वस्तुओं के स्वरुप व तत्त्व को समझने वाले के लिए भी तिहरी आयु है।इनमें शरीर,मन व बुद्धि तीनों प्रकार से अमरता सी दिखाई देती है,अर्थात् इनकी बुद्धि तीन सौ वर्ष तक उर्वरा रहती है,इनके मन मलिन नहीं होने पाते,शरीर रोगी नहीं होते।मैं भी तेरी आयु तीन सौ वर्ष की करता हूं।

अयं मे हस्तो भगवान् अयं में भगवत्तरः ।
अयं मे विश्वभेषजोsयं शिवाभिमर्शनः ।।-(अथर्व० ४/१३/६)
अर्थ:-वैद्य रोगी से अत्यन्त विश्वास के साथ कहता है कि –“यह मेरा हाथ बड़ा सौभाग्यवाला है।यह दूसरा उससे भी अधिक सौभाग्यशाली है।यह हाथ सब रोगों की ओषधि है,तथा छूते ही कल्याण करने वाला है।”

इस मन्त्र में सम्मोहन विद्या व चिकित्सा की चर्चा है।

अपामार्ग ओषधीनां सर्वासामेक इद्वशी।
तेन ते मृज्म आस्थितमथ त्वमगदश्चर ।।-(अथर्व० ४/१७/८)
अपामार्ग सब ओषधियों को वश में रखने वाली एक ओषध है।उससे तेरे शरीर में स्थित् रोग को हम दूर करते हैं,अतः तू अब निरोग होकर चल।

न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते ।
यं भेषजस्य गुल्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते ।।-(अथर्व० १९/३८/१)
अर्थ-जिसको इस ओषध गुल्गुल का सुगन्ध प्राप्त होता है उसे न रोग व्याप्ता है और न ही कोई शाप प्रभावित करता है।

अश्ववत्थो दर्भो वीरुधां सोमो राजामृतं हविः ।
व्रीहिर्यवश्च भेषजौ दिवस्पुत्रावमत्य्रौ ।।-(अथर्व० ८/७/२०)
वृक्षों में पीपल,घासों में कुशा,लताओं में सोमलता,पेय पदार्थों में जल तथा भक्ष्य पदार्थों में घृत प्रमुख है।वृष्टिजल से उत्पन्न व्रीहि और यव अमर्त्य औषध हैं।इनके होते हुए असमय के रोगों से मृत्यु का प्रश्न ही नहीं उठता।


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नमस्ते जी ऋग्वेद का पांचवाँ, छठा और सातवां मंडल का ऋषि दयानन्द कृत भाष्य को डॉउनलोड करने हेतु इस...

नमस्ते जी
ऋग्वेद का पांचवाँ, छठा और सातवां मंडल का ऋषि दयानन्द कृत भाष्य को डॉउनलोड करने हेतु इस लिंक पर क्लिक करें !
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नमस्ते जी ऋग्वेद का प्रथम मंडल आप डॉउनलोड कर सकते है . इस लिंक पर क्लिक करें ...

नमस्ते जी
ऋग्वेद का प्रथम मंडल आप डॉउनलोड कर सकते है .
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👍👍एक वकील साहब ने अपने बेटे का रिश्ता तय किया। कुछ दिनों बाद, वकील साहब होने वाले समधी के घर गए तो...

👍👍एक वकील साहब ने अपने बेटे का रिश्ता तय किया।

कुछ दिनों बाद, वकील साहब होने वाले समधी के घर गए तो देखा कि होने वाली समधन खाना बना रही थीं।
सभी बच्चे और होने वाली बहु टी वी देख रहे थे। वकील साहब ने चाय पी, कुशल जाना और चले आये।

एक माह बाद, वकील साहब समधी जी के घर, फिर गए। देखा, समधन जी झाड़ू लगा रहीं थी, बच्चे पढ़ रहे थे और होने वाली बहु सो रही थी। वकील साहब ने खाना खाया और चले आये।

कुछ दिन बाद, वकील साहब किसी काम से फिर होने वाले समधी जी के घर गए !! घर में जाकर देखा, होने वाली समधन बर्तन साफ़ कर रही थी, बच्चे टीवी देख रहे थे और होने वाली बहु खुद के हाथों में नेलपेंट लगा रही थी।

वकील साहब ने घर आकर, गहन सोच-विचार कर लड़की वालों के यहाँ खबर पहुचाई, कि हमें ये रिश्ता मंजूर नहीं है"

…कारण पूछने पर वकील साहब ने कहा कि, “मैं होने वाले समधी के घर तीन बार गया !!

तीनों बार, सिर्फ समधन जी ही घर के काम काज में व्यस्त दिखीं। एक भी बार भी मुझे होने वाली बहु घर का काम काज करते हुए नहीं दिखी। जो बेटी अपने सगी माँ को हर समय काम में व्यस्त पा कर भी उन की मदद करने का न सोचे, उम्र दराज माँ से कम उम्र की, जवान हो कर भी स्वयं की माँ का हाथ बटाने का जज्बा न रखे,,, वो किसी और की माँ और किसी अपरिचित परिवार के बारे में क्या सोचेगी।

"मुझे अपने बेटे के लिए एक बहु की आवश्यकता है, किसी गुलदस्ते की नहीं, जो किसी फ्लावर पाटॅ में सजाया जाये !!

👉इसलिये सभी माता-पिता को चाहिये, कि वे इन छोटी छोटी बातों पर अवश्य ध्यान देंवे।

🌹बेटी कितनी भी प्यारी क्यों न हो, उससे घर का काम काज अवश्य कराना चाहिए।

🌹समय-समय पर डांटना भी चाहिए, जिससे ससुराल में ज्यादा काम पड़ने या डांट पड़ने पर उसके द्वारा गलत करने की कोशिश ना की जाये।

🌹हमारे घर बेटी पैदा होती है, हमारी जिम्मेदारी, बेटी से "बहु”, बनाने की है।

🌹अगर हमने, अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह से नहीं निभाई, बेटी में बहु के संस्कार नहीं डाले तो इसकी सज़ा, बेटी को तो मिलती है और माँ बाप को मिलती हैं, “जिन्दगी भर गालियाँ"।

🌹हर किसी को सुन्दर, सुशील बहु चाहिए। लेकिन भाइयो, जब हम अपनी बेटियों में, एक अच्छी बहु के संस्कार, डालेंगे तभी तो हमें संस्कारित बहु मिलेगी? ?

👉ये कड़वा सच, शायद कुछ लोग न बर्दाश्त कर पाएं ….लेकिन पढ़ें और समझें, बस इतनी इलतिजा..

🌹🍁वृद्धाआश्रम में माँ बाप को देखकर सब लोग बेटो को ही कोसते हैं, लेकिन ये कैसे भूल जाते हैं कि उन्हें वहां भेजने में किसी की बेटी का भी अहम रोल होता है। वरना बेटे अपने माँ बाप को शादी के पहले वृद्धाश्रम क्यों नही भेजते।
🌹👏🌹👏🌹👏🌹👏🌹


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नमस्ते जी यदि आपको ऋग्वेद का दूसरा , तीसरा और चौथा मंडल का पीडीएफ फाईल चाहिए तो आप इस 👇लिंक ...

नमस्ते जी
यदि आपको ऋग्वेद का दूसरा , तीसरा और चौथा मंडल का पीडीएफ फाईल चाहिए तो आप इस 👇लिंक
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पर जाकर डॉउनलोड करें !
यह महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत हिन्दी भाष्य है और अच्छि गुणवत्ता मे है !
अन्य मंडल भी स्कैन हो चुकी है , क्लाउड ड्राइव मे अपलोड होते ही लिंक शेयर कर दूंगा !!


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॥ ईशोपनिषद् ॥ ॥ ओ३म् ॥ तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य...

॥ ईशोपनिषद् ॥
॥ ओ३म् ॥ तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ मंत्रः ५ ॥
भावार्थ :- कोई कहता है वह ( ईश्वर ) चलता है , तो कोई कहता है की नहीं चलता ; कोई कहता है की वह ( ईश्वर ) दूर है तो कोई कहता है की एकदम पास में है । कोई कहता है वह ( ईश्वर ) सबके अंदर ही है तो कोई कहता है हम सबके बाहर है ।


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Saturday, January 30, 2016

शंका: यज्ञ से धुँआ होता है जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता है और ऑक्सीजन भी खर्च होती है।क्योकि कोई चीज तभी...

शंका: यज्ञ से धुँआ होता है जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता है और ऑक्सीजन भी खर्च होती है।क्योकि कोई चीज तभी जलती है जब उसे ऑक्सीजन मिले।
समाधान: यज्ञ से प्रदूषण कदापि नही होता।जितना ऑक्सीजन खर्च होता है उससे कहीं ज्यादा बढ़ता है। प्रदूषण दूर होता है।
यज्ञ पूर्णतः वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
यज्ञो वै श्रेष्ठतम कर्म।
यज्ञ से श्रेष्ठ कोई कार्य नही है।
यज्ञ को अग्निहोत्र भी कहते हैं।
अग्निहोत्र का अर्थ है जल, पृथ्वी, वायु आदि की शुद्धि के लिए डाली गयी आहुतियां।
यज्ञ केवल कर्मकाण्ड ही नही बल्कि चिकित्सा पद्धति भी है।
यज्ञ करते समय जो हम विभिन्न मंत्रोच्चार करते हैं उसका हमारे मन, मस्तिष्क,व आत्मा पर विशेष प्रभाव डालती है।साथ साथ वातावरण को भी शुद्ध करती है।
यज्ञ को हवि भी कहते हैं जिसका अर्थ है विष को हरने वाला।
विज्ञानं के सिद्धान्त के अनुसार कोई भी पदार्थ नष्ट नही होता ,हां उसका रूप बदला जा सकता है।
(By law of conservation of mass we know that mass cannot be created nor destroyed in a chemical reaction)
हवन सामग्री गाय का देशी घी आदि जो हम अग्नि पर डालते है हवन के लिए वे वास्तव में औषधियां हैं , जलने से नष्ट नही होतीं बल्कि दूसरे रूप में परिवर्तित होती हैं और सूक्ष्म रूप में हमे प्राप्त होती हैं।
जब एलोपैथ नही था तो प्राचीन काल में आयुर्वेद था।आयुर्वेद में इन्ही वनस्पतियों से ही चिकित्सा की जाती थी।
हवन सामग्री में जो औषधियां हैं उनमे
1.कीटाणुनाशक
2.सुगंधि वर्धक
3.स्वास्थ्यवर्धक (medicinal action property)
4.पौष्टिक
5. ऑक्सीजन वर्धक
गुण होते हैं।
जब ये औषधियां हवन कुण्ड में जलायी जाती हैं तो ये परमाणु रूप मे सांस के माध्यम से एक नही बल्कि अनेको जिव जंतुओं तक पहुचती हैं।जिससे परोपकार भी होता है।
यज्ञ में होने वाली रासायनिक क्रियाएँ निम्न हैं…
1.ज्वलन ( combustion)
2. ऊर्ध्वपातन ( sublimation)
3. धूनी (Fumigation)
Fumigation is a method of pest control that completely fills an area with smoke, vapor, or gas to especially for the purpose of disinfecting or of destroying pests.
4.औटना( Volatilization)
Volatilization is the process whereby a dissolved sample is vaporised.
ये सभी रासायनिक क्रियाएँ हमारे लिए लाभकारी ही हैं।
इनमे ज्वलन (combustion) अभिक्रिया के दौरान गाय का घी ( जिसमे लगभग 8% संतृप्त saturated fatty acids तथा triglycerides, diglycerides, monoglyceride)
ज्वलन को तेज करता है जिससे complete cumbustion हो सके।
fatty acid के combustion के दौरान CO2 और H2O निकलती है। complete combustion से CO2 भी बहुत कम हो जाता है।
Glycerol के combustion में pyruvic acid और Glyoxal (C2H2O2)बनता है। pyruvic acid हमारे metabolism को बढ़ाता है।और glyoxal बैक्टेरिया को ख़त्म करता है।
इनके आलावा combustion के दौरान जो हाइड्रोकार्बन बनते हैं वे पुनः स्लो combustion रिएक्शन होता है और methyle, ethyle alcohol ,फार्मिक एसिड और फार्मेल्डिहाइड आदि बनता है।जोकि वायु को सुगन्धित करता है और कीटाणुनाशक ही है। यही तक कि H1N1 वायरस को भी समाप्त करने की क्षमता भी यज्ञ में है।
अब आप सोच रहे होंगे की जब ज्वलन होता है तो ऑक्सीजन खर्च होती है ।एक तरह से हम पर्यावरण को नुक्सान पहुचाते हैं।तो आप गलत हैं
यज्ञ ही वह प्रक्रिया है जिसमे ऑक्सीजन खर्च तो होता है पर ऑक्सीजन बनती भी है।क्यों की इसमें CO2 के साथ -साथ वाष्प(H2O) भी बनती है। देखिये..
CO2 + H2O (g) +112000 cal = HCHO (farmaldehyde) +O2(ऑक्सीजन)
इस प्रकार यज्ञ करने से ऑक्सीजन खर्च नही बल्कि प्रोड्यूस होती है बनती है।
साथ ही साथ अन्य रासायनिक क्रियाओं से बने gaseous प्रोडक्ट्स से पर्यावरण शुद्ध होता है।एवं हमें स्वास्थ्य लाभ भी होता है।
साथ ही अग्निहोत्र का अवशेष राख हमारी मिटटी की उर्वरकता बढाती है।
अतः यज्ञ से कोई नुक्सान नही बल्कि लाभ ही लाभ है।
आज भी वैदिक पद्धति से रविवार को सुबह आर्य समाज मंदिर में यज्ञ होता है
यज्ञ में पधारे और पूण्य का भागी बने🙏


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ओ३म् तत्सत् अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीय परार्धे, श्वेत वराह प्रथम दिने, द्वितीय प्रहरार्धे, वैवस्वत...

ओ३म् तत्सत् अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीय परार्धे, श्वेत वराह प्रथम दिने, द्वितीय प्रहरार्धे, वैवस्वत मन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमेयुगे, कलियुगे, कलि प्रथम चरणे, पञ्चसहस्त्र पञ्चदशाधिकशतम् (5115) वर्षेषु गतेषु, जम्बूद्वीपे भरतखण्डे, पुण्यभूमौ आर्य्यावर्त्ते, “दिल्ली” प्रदेशे, द्विसहस्त्रद्वासप्तति (2072) वैक्रमाब्दे, “उत्तर” अयने, “हेमन्त” ऋतौ, “माघ” मासे, “कृष्ण” पक्षे, “सप्तमी” तिथौ, “रवि” वासरे, “चित्रा” नक्षत्रे, “तुला” लग्ने, “***” मुहूर्ते, “दिल्ली” जनपदे (district), “राजौरी गार्डन” स्थानवास्तव्य:, “$$$” गोत्रोत्पन्न, “@@@” नामाहम्, भगवत् कृपया लोकसिद्धयर्थ “देवयज्ञ” कृत्यम् करिष्ये।


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🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻 भूपेश आर्य 🌷शराब छुड़ाना🌷 जब शराब पीने की इच्छा हो तब २-४ चम्मच शहद खाने से कुछ दिनों...

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻

भूपेश आर्य

🌷शराब छुड़ाना🌷

जब शराब पीने की इच्छा हो तब २-४ चम्मच शहद खाने से कुछ दिनों में यह लत छुट जाती है।

(2) “Spiritas Glandium Quercus 30” ४-४ गोली दिन में ३ बार दें।शराब छुड़ाने में अत्यन्त लाभकारी है।२-३ मास में आदत छुट जाती है।

इस दवा के साथ पेसी फ्लोरा इन्कारनेटा ३० भी दी जाए तो सोने पर सुहागे का काम होगा।दोनों दवाओं की दो-दो खुराक दिन भर में दें।

(3) “Acid Sulf 30” ५-५ गोलियाँ दिन में तीन बार खिलाने से शराब पीने की लत छूट जाती है।

नोट:-ये होम्योपैथिक दवाएँ हैं।

(4) Stercula-q यह शराबियों के लिए वरदान है।इसके सेवन से थकान भी नहीं होती।


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🐊 🐍 🐢 🐉 🐗 उपनिषदों में काल्पनिक कहानियाँ हैं जो वेदों की मान्यताओं को समझाती हैं । एक कहानी में एक...

🐊 🐍 🐢 🐉 🐗

उपनिषदों में काल्पनिक कहानियाँ हैं जो वेदों की मान्यताओं को समझाती हैं ।

एक कहानी में एक बड़ा सेठ मरकर अगला जन्म एक सर्प सूअर या कीड़े का पाता है ।

उसने भगवान से पूछा- हे प्रभु ! मैंने पूरा जीवन गरीबों की मदद की । खूब दान दिया । कोई पाप नहीं किया । तेरी वेद आज्ञा से मैंने पूरा जीवन जिया । फिर मुझे नर्क ऐसे कीड़े के रूप में अगला जन्म क्योंमिल रहा है जो सारा दिन गंदगी खाता है । ( कुछ कीड़े कार्बन लेकर आक्सीजन छोड़ते हैं )

तो उपनिषद का ऋषि इस काल्पनिक कहानी में समझाता है -

प्रभु बोले - वास्तव में ही हे सेठ तूँ एक पुण्य आत्मा है । तूने कोई पाप नहीं किया । तेरा जीवन अनुकरणीय है ।

मगर तूने मल मूत्र आदि से जो गंदगी फैलाई पूरे जीवन में , अपने हिस्से की उस गंदगी के लिए कभी तूने हवन नहीं किया ।

बस तेरा वो कर्ज रह गया है । अभी तुझे एक दो जन्म और मिलेंगे कीड़े-मकोड़ों के । तब तूँ स्वर्ग का अधिकारी बनेगा ।

हे सेठ ! तेरे जीवन कार्यों से मैं अति प्रसन्न हूँ । तूँ मुझे अति प्रिय है मगर न्यायिक विधान को मैं नहीं बदल सकता ।

____________✒ वैदिक


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🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻 भूपेश आर्य 🌻आस्तिकता🌻 प्राणायाम,ब्रह्मचर्य और तप एवं वेदाभ्यास,सदाचार,आदि मृत्यु पर...

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻

भूपेश आर्य

🌻आस्तिकता🌻

प्राणायाम,ब्रह्मचर्य और तप एवं वेदाभ्यास,सदाचार,आदि मृत्यु पर विजय दिलाने वाले ‘अमृत’ प्राप्ति के अमोल साधन अवश्य है,किन्तु मृत्यु पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिए एक अन्य अचूक उपाय का आश्रय ग्रहण करना पड़ता है।वह है-आस्तिकता-उस दिव्य सत्ता पर परम विश्वास तथा दृढ़ आस्था और अनुराग।

मृत्यु के कष्टों से पीड़ित जीव की पुकार सदा इस मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की रही है।भक्त की कामना है–
मृत्योर्माsमृतं गमय ।
मृत्यु बन्धन को हटा अमरत्व हे भगवान दो।

प्रभो! यह मृत्यु मुझे बहुत परेशान कर रही है।मैं उससे ड़र गया हूं,यह मुझे बहुत पीड़ित कर रही है।प्रभू! जीवन में कार्यों को सुचारु-रुप में करने की अभी मैं योजना भी न बना पाता कि यह मार्ग में बाधक बनकर आ खड़ी होती है।अन्त में इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि तुम्हीं हो जो इससे सदा सर्वदा के लिए मुक्ति दिला सकते हो।मैं जानता हूं कि मेरे आराध्य केवल एक तुम हो,कोई दूसरा नहीं है।

जो तुम्हारे अनन्यभाव को प्राप्त नहीं होता वह-
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति यो नानेव पश्यति ।
वह मृत्युग्रस्त ही है जिसमें तुम्हारे प्रति अनन्यभाव नहीं है।

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाsति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेsयनाय ।।-(यजुर्वेद ३१/१८)
अर्थ:-अन्धकार से विहीन,आदित्यरुप उस महान प्रभु को मैंने जान लिया है,उसके दर्शनों से कृतार्थ हो गया हूं मैं।उसे जानकर मृत्यु को मैंने लांघ लिया है।हे अमृतस्वरुप ! तुमसे मुझे अमरता प्राप्त हुई है।मृत्यु से बचने का 'अमृत’ प्राप्ति का इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।

समाधियोग से चित्त के अविद्यादि मल नष्ट होने पर आत्मस्थ होने से परमात्मा के योग का जो आनन्द उपलब्ध हुआ है वह वाणी द्वारा वर्णन नह़ी किया जा सकता।वह तो अन्तःकरण द्वारा अनुभव किया जा सकता है।

यजुर्वेद में कहा है:-
यस्य छायाsमृतं यस्य मृत्युः कस्मैदेवायहविषा विधेम ।
ऋषि दयानन्द इसका अभिप्राय सपष्ट करते हुए कहते हैं-
“जिस (ब्रह्म) का आश्रय ही अमृत अर्थात् मोक्ष-सुखदायक है और जिसका न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही मृत्यु आदि दुःख का हेतु है,हम लोग उस सुखस्वरुप,सकल ज्ञान के देने हारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए आत्मा और अन्तःकरण से भक्ति अर्थात् उसकी आज्ञापालन करने में तत्पर रहें।”

अथर्ववेद की एक ऋचा में इस रहस्य को बड़े स्पष्ट और सुन्दर रुप में कहा गया है:-
सर्वौ व तत्र जीवति गौरश्वः पुरुषः पशुः।
यत्रैदं ब्रह्म क्रियते परिधिर्जीवनाय कम् ।।-(अथर्ववेद ८/२/२५)
जहां जीवन की परिधि ब्रह्म को बना लिया जाता है अर्थात् जीवन में चारों और-
ब्रह्मापरं युज्यतां ब्रह्म पूर्वं ब्रह्मान्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वतः।
ब्रह्म ऊपर है,नीचे है,आगे है,पीछे है,मध्य में है,सब और है-जहां ऐसी अनुभूति होने लगती है उन घरों में गौ,घोड़ा,पशु और मनुष्य किसी को भी मृत्यु अपने वश में नहीं करती।

कितना बड़ा आश्वासन है यह !कितने विश्वास से ये बात कही गयी है उनके लिए जो वेदवचन पर अमित श्रद्धा रखकर मृत्यु के इस दुःख को उस ब्रह्म-सरोवर में डुबकी लगाकर दूर कर सकें।

योगवासिष्ठ में कहा है-
एकस्मिन्निर्मले येन पदे परमपायने।
संश्रिता चितविश्रान्तिस्तं मृत्युर्न जिघांसति ।।-(योगवासिष्ठ ६/१/२३/११)
अर्थ:-जिसका मन निर्मल ,परमपावन एक ब्रह्म में स्थिर होकर शान्त हो गया है उसे मृत्यु कभी नहीं मार सकती।

उस परमपिता परमात्मा की गोद ही ऐसी है जहाँ बैठकर मृत्यु क्या,अन्य सभी प्रकार के भय भी शान्त हो जाते हैं।

तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्।
तेषां शान्तिः शाश्वतं नेतरेषाम्।।
उन्हें शाश्वत सुख मिलता है,परम शान्ति होती है जो उसकी गोद में बैठते हैं,अन्य को नहीं।

श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा है-
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवाभियन्ति।-(श्वेताश्व० ३/१०)
जो उस ब्रह्म को जान लेते हैं वे अमृत हो जाते हैं किन्तु जो ऐसा नहीं करते वें बार बार जन्म-मरण के दुःख को प्राप्त करते हैं।

बृहदारण्यकोपनिषद् (३/१) में एक कथा आती है।विदेह देश के राजा वैदेह जनक ने एक बार 'बहुदक्षिणा यज्ञ’ रचाया,जिसमें देश देश के अनेक विद्वानों और ऋषि महर्षियों को आमत्रित किया गया।राजा जनक की यह इच्छा हुई कि यह जाने कि एकत्र हुए इन सब विद्वानों में सर्वातिशय 'अनूचान’ (प्रवचनकर्त्ता) विद्वान कौन है?उसने सोने के मढ़े हुए सींगों वाली एक हजार सुन्दर गौएँ मँगवाई और घोषणा की कि 'आप सब विद्वानों में जो सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ विद्वान हो वह इन एक सहस्र गौवों को हांक ले जाए।’ राजा जनक की इस घोषणा को सुनकर भी किसी का साहस उन गौवों को ले जानें का नहीं हुआ।सबको मौन देखकर और इस घोषणा को विद्वान् ब्राह्मणों का अपमान मानकर ब्रह्मज्ञानी ऋषि याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्य ब्रह्मचारी सामश्रवा को उन गौवों को अपने आश्रम में हाँक ले जाने की आज्ञा दी।
ऋषि याज्ञवल्क्य की इस धृष्टता से क्रुद्ध होकर वहाँ उपस्थित अनेक ऋषियों ने याज्ञवल्क्य पर प्रश्नों की बौछार लगा दी।उन्हीं में सर्वप्रथम राजा जनक के होता अश्वल पूछते हैं-

याज्ञवल्क्येति होवाच-यदिदं सर्वं मृत्युनाssप्तं, सर्वं मृत्युनाभिपन्नं,केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति।।-(बृहदारण्यक० ३/१/३)
हे याज्ञवल्क्य ! यह बताओ कि यदि यह समस्त संसार मृत्यु से व्याप्त है-मृत्यु के वश में है,तो वह साधन क्या है जिससे यजमान इस मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है?

याज्ञवल्क्येति होवाच-यदिदं सर्वं मृत्योरन्नं,का स्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमिति?-(बृहदारण्यक० ३/२/१०)
हे याज्ञवल्क्य ! संसार में हमें दिखायी देता है कि जो कुछ भी है वह सब मृत्यु का अन्न है अर्थात् मृत्यु उन्हें एक -एक कर खाये जा रही है।क्या ऐसा भी कोई देवता है जिसका मृत्यु अन्न बन सके?

ऋषि याज्ञवल्क्य इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि-
अग्निर्वै मृत्युः सोsपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति।-(बृहदा० ३/२/१०)
हे मुनियो ! मृत्यु अग्निरुप है(सर्वभक्षक है),किन्तु उस अग्निरुप मृत्यु की भी मृत्यु शीतल जलों से हो जाती है।जो इस रहस्य को जान लेता है वह मृत्यु को भी जीत लेता है।

मृत्यु के वास्तविक स्वरुप की यदि हम तुलना करना चाहें तो कह सकते हैं कि मृत्यु अग्निरुप है।दोनों के स्वरुप और विषेशताओं में बहुत समानता है।मृत्यु भी अग्नि की भाँति सर्वभक्षक,दाहक,भस्मक,ज्वालक और विनाशक है,किन्तु इस अग्नि की भी मृत्यु का उपाय लोकसिद्ध है।वह है-शीतल जल।
ठीक इसी प्रकार मृत्युरुपी अग्नि को यदि हम शान्त करना चाहते हैं-यदि हम मृत्यु की मृत्यु के अभिलाषी हैं तो शान्त,शीतल,आह्लादक ब्रह्मानन्द-जल में डुबकी लगानी पड़ेगी।तब यह मृत्यु या मृत्यु-जन्य दुःख की आग वैसे ही शान्त हो जाती है जैसे जलों से आग शान्त हो जाती है।
इसलिए संसार में ईश्वर के सच्चे भक्तों को मौत नहीं जीत सकी है,अपितु मौत को उन्होंने जीत लिया है।

यजुर्वेद में कहा है-
यस्य छायाsमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम।-(यजुर्वेद २५/१३)


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Friday, January 29, 2016

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 भूपेश आर्य 🌻दिव्य ओषधियाँ🌻 (1) अनेक रोगों की एक दवा:-हींग १० ग्राम,नौशादर १०...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

भूपेश आर्य

🌻दिव्य ओषधियाँ🌻

(1) अनेक रोगों की एक दवा:-हींग १० ग्राम,नौशादर १० ग्राम,सेंधा नमक १० ग्राम-सबको ६०० ग्राम पानी में खरल करें।जब सब दवाएं पानी में मिलकर एक हो जाएँ तब बोतल में भर लें।२५-२५ ग्राम दवा प्रातः सांय पिलायें।
यह योग दर्द-गुर्दा,तिल्ली,जिगर का वरम,वायुगोला,बदहज्मी,भूख न लगना आदि रोगों की शर्तिया दवा है।

(2) अर्श (बवासीर )के मस्से:-जब भी पेशाब करने जाएँ,अपना मूत्र अन्जलि में भरकर मस्सों को धो लिया करें।दो मास तक ऐसा करने से बवासीर के रोग से सदा के लिए छुट्टी हो जाएगी।

(3) आँख का दर्द:-सूर्योदय के पूर्व आँखों में बरगद(बड़) का दूध डालें।दर्द तुरन्त मिट जायेगा।
नोट-बड़ का दूध सूर्योदय से पूर्व ही अच्छा निकलता है।एक पत्ते से २-३ बूंद प्राप्त हो जाता है।

(4) सुबह उठते ही अपना बासी थूक आँखों में लगाने से आँखों की रोशनी बढ़ती है,और जाला,धून्धलापन मिटता है।बशर्ते कि दांतों में पायरिया आदि रोग न हों।तभी कारगर है।

(5) आँख के अनेक रोगों पर:-यदि आँखों में दर्द,खुजली,जाला,लाली हो,मोतिया उतरना आरम्भ हो गया हो तो प्रतिदिन प्रातः गाय का ताजा मूत्र २-३ बूंद चालिस दिन तक आँख में डालें।मोतियाबिन्द बिना आपरेशन के कट जाता है।शर्तिया दवा है।

(6) आग से जलना:-यदि कोई अंग आग से जल जाये तो उसी समय जले स्थान पर ग्लिसरीन लगा दें।जले के लिए अचूक एवं अद्भूत दवा है।न दर्द होगा,न छाले पड़ेगे और न चमड़ी ही लाल होगी।

(7) आधासीसी:- १.जिस और दर्द हो उस और के कान में कागजी नींबू का रस की ३-४ बूंदे डाल दो।दर्द तुरन्त मिट जाता है।
२.कालीमिर्च पानी में घिसकर जिस और दर्द हो,उससे उल्टी आँख में लगा दें।यह दवा लगेगी तो बहुत,परन्तु आधासीसी का दर्द एक ही बार में भाग जायेगा और फिर कभी नहीं होगा।

(8) एक वर्ष के लिए तन्दुरुस्ती का बीमा:-कालीमिर्च,नीम के पत्ते और बीजरहित लालमिर्च,सबको बराबर लेकर घोट-पीसकर ६-६ ग्राम की गोलियाँ बना लें।शौच,स्नान और दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर प्रतिदिन प्रातः निराहार १-१ गोली पानी के साथ चैत्र सुदी १ से १५ दिन तक खाएँ।एक वर्ष तक कोई रोग नहीं होगा।

(9) हरड़ अमृत समान:-प्रतिदिन २-३ छोटी हरड़ चूसने से पेट के सब विकार दूर हो जाते हैं,कब्ज दूर होती है,भूख खूब बढ़ती है,पाचनशक्ति बढ़ जाती है,रक्त शुद्ध हो जाता है,आँखों के लिए भी लाभप्रद है।निरन्तर सेवन से चश्में का नम्बर भी घट जाता है।
इसकी प्रशंसा में ठीक ही कहा है-
माता यस्य गृहे नास्ति तस्य माता हरीतकी ।
कदाचित्कुप्यते माता नोदरस्था हरीतकी ।।

जिसके घर में माता नहीं है उसकी माता हरड़ है।माता कभी क्रुद्ध भी हो जाती है,परन्तु पेट में गयी हुई हरड़ कभी कुपित नहीं होती।

और भी–
हरि हरीतकीं चैव गायत्रीं च दिनेदिने ।
मोक्षारोग्यतपः कामश्चिन्तयेद् भक्षयेज्जपेत् ।।

अर्थ:-मोक्ष,आरोग्य और तप की इच्छा करने वाले को प्रतिदिन परमात्मा,हरड़ और गायत्री का क्रम से चिन्तन,सेवन और जप करना चाहिये.

(10) क्षय(टी.वी.) नाशक:-स्वस्थ एवं दुधारु काली गाय का मूत्र दिन में २०-२० ग्राम पिलाएँ।यह प्रयोग २१ दिन तक करें।

(11) खाँसी:-
१.दिन में तीन चार बार २०-२० ग्राम बढ़िया बूरा फाँकने से खाँसी ठीक हो जाती है।
नोट–बूरा फाँकने से २ घण्टा पूर्व और एक घण्टा पश्चात् जल न पीएँ।रात्रि में भोजन न करें।जल भी न पीएँ।यदि प्यास लगे तो गर्म दूध या तुलसी के पत्तों की चाय लें।
२.तुलसी के पत्ते १५,कालीमिर्च ९,इन दोनों की चाय बनाकर पीने से खाँसी,जुकाम,बुखार,कफ-विकार,मन्दाग्नि आदि रोग दूर हो जाते हैं।
३.फिटकरी भुनी हुई १० ग्राम,खाँड देशी १० ग्राम दोनों को बारीक पीसकर १४ पुड़िया बना लें।सूखी खाँसीवाले को दूध से और आर्द्र (गीली)खाँसी वाले को जल से खिलाएँ।इससे पुरानी से पुरानी खाँसी और साधारण दमा भी दूर हो जाता है।
४.बार-बार शीशा देखने से भी खाँसी में बहुत लाभ होता है।

(12) गर्भरक्षा:-जिस स्त्री को बार-बार गर्भपात हो जाता हो उसकी कमर में धतूरे की जड़ बाँध दें।इससे गर्भपात नहीं होगा।जब नौ मास पूरे हो जाएँ तब जड़ खोल दें।

(13) गर्भस्थापक:-
१.अपामार्ग की जड़ का चूर्ण ३० ग्राम,कालीमिर्च २१ दोनों को बारीक पीस लें।मासिकधर्म के एक सप्ताह पूर्व से ऋतु के तीसरे दिन तक दें।भोजन में केवल दूध और चावल का प्रयोग करें।तीन मास तक ब्रह्मचर्य का पालन करें।इससे गर्भाशय के सारे रोग दूर हो जाते हैं,मासिक नियमित हो जाता है।प्रदर एवं बन्धयत्व को दूर करने वाली महौषधि है।
२.ऋतुकाल में चारों दिन २५ ग्राम अजवायन और २५ ग्राम मिश्री को २५ ग्राम पानी में रात्रि में मिट्टी के बर्तन में भिगो दें।प्रातः ठण्डाई की भाँति खूब पीसकर पी जाएँ।
पथ्य में मूँग की दाल और रोटी (बिना नमक की) लें।आठ दिन दवा का सेवन करें।अवश्य गर्भ रहेगा।

(14) दन्तमंजन:-दालचीनी,कालीमिर्च,धनिया भूना हुआ,नीलाथोथा भूना हुआ,कपूरकचरी,सेंधानमक,मस्तगी और चोबचीनी–प्रत्येक १० ग्राम।पपड़ियाकत्था २० ग्राम,माजूफल ५ नग।सबको कूट-पीसकर मंजन बना लें।
इस मंजन का प्रयोग करने से दन्तरोग तो दूर होंगे ही,बाल जीवनभर सफेद नहीं होंगे।

(15) दन्त-रोग:-
१.लौंग १० ग्राम,कपूर १ ग्राम।-दोनों को बारीक पीसकर दांतों पर मलने से दाँतों के सब रोग और दर्द आदि नष्ट हो जाते हैं।
२.मौलश्री की दातुन करने से हिलते हुए दाँत दृढ़ हो जाते हैं,पायोरिया दूर होता है।मौलश्री में दन्तरोगों को दूर करने की अदभूत शक्ति है।
आयुर्वेद के ग्रन्थों में लिखा है-‘दन्ता भवन्ति चपलापि च वज्रतुल्या।'दाँत मोती जैसे श्वेत और व्रज के समान दृढ़ हो जाते हैं।

(16) दमा की अद्भूत दवा:-धतूरे का १-१ बीज ८ दिन तक प्रातः पानी से निगल लें।दूसरे सप्ताह २-२ बीज लें।इसी प्रकार प्रति सप्ताह एक -एक बीज बढ़ाते हुए पाँचवें सप्ताह ५-५ बीज प्रतिदिन लें।दमा कितना भी पुराना हो मिट जायेगा।

(17) दर्दमात्र की दवा:-सोडाबाईकार्ब ३ ग्राम,फिटकरी सफेद कच्ची ३ ग्राम।
दोनों को बारीक पीस लें।यह एक मात्रा है।दवा फाँककर ऊपर से गर्म पानी पी लें।एक ही मात्रा से सब प्रकार के दर्द भाग जाते हैं।

(18) दांतों का हिलना:-बड़ की दातुन करें।वटवृक्ष की दातुन हिलते हुए दाँतों को जमाने की सर्वश्रेष्ठ ओषधि है।इसके प्रयोग से दाँतों का आगे के लिए विकृत होना बन्द हो जाता है।
२.शौच करते समय दाँतों को भींचकर रखने से (दबाकर रखने से) दांत जिन्दगी भर नहीं हिलेंगे।

(19) निर्मली के बीज १४० दानें मिट्टी के बर्तन में भिगो दें।पाँचवें दिन से दो दानें प्रातः व २ दानें सांय मिश्री मिले हुए ठण्ड़े दूध से लें।
ये बीज कब्ज को दूर करते हैं,बल बढ़ाते हैं।वात,पित्त और कफ के तमाम रोगों को जीतते हैं।परखने पर स्वर्ण भस्म के तुल्य प्रतीत होंगे।
प्रमेह और प्रदर की अचूक दवा है।
नोट-पानी को प्रतिदिन बदलते रहें।
गुड़,तेल,मिर्च,खटाई,छाछ,खीर एवं उडद की दाल का परहेज करें।

(20) पथरी:-
१.नीम के पत्तों की राख ६ ग्राम फाँककर ऊपर से पानी पीएँ।कुछ दिन के प्रयोग से पथरी गल जाती है।
२.प्रतिदिन प्रातः गोमूत्र ५० ग्राम पीएँ और सांय तीन ग्राम फिटकरी एक गिलास पानी में घोलकर पीएं।४० दिन सेवन करें।पथरी गलकर निकल जायेगी।परीक्षित है।

(21) शक्ति का खजाना:-
१.असगन्ध का चूर्ण ६ ग्राम फाँककर ऊपर से दूध पीने से शरीर पुष्ट व बल की वृद्धि होती है।

२.भाँगरे का चूर्ण १०० ग्राम,काले तिल का चूर्ण २०० ग्राम,आँवला चूर्ण २०० ग्राम-तीनों को कूट-पीसकर कपड़छन कर लें,फिर उसमें ५०० ग्राम मिश्री मिला लें और घी के चिकने बर्तन में सुरक्षित रक्खें।
१०-१० ग्राम दवा प्रातः-साँय गोदुग्ध के साथ सेवन करें।
इसके सेवन से रोग नहीं सताते।बाल काले होते हैं,बल और शक्ति की अपूर्व वृद्धि होती है।अकालमृत्यु और वृद्धावस्था का विषेश भय नहीं रहता।

३.रात्रि में छोटी पीपल ,पानी में भिगो दें।प्रातः घोट-पीसकर मधु से चाटें,ऊपर से गोदुग्ध पीएँ।इससे ज्वर,खाँसी,अशक्ति नष्ट होकर बल और शक्ति बढ़ेगी।कम से कम ४० दिन सेवन करें।

(22) आरोग्याम्बु:-एक लीटर पानी को ओटाने से २५० ग्रिम रह जाए तो इसे आरोग्याम्बु कहते हैं।इसे पीने से खाँसी,दमा और कफ के रोग दूर होते हैं।बुखार शीघ्र उतर जाता है।भूख बढ़ती है।खाई वस्तु तुरन्त पच जाती है।बवासीर,पाण्डुरोग,वायुगोला और हाथ पाँव की शोथ (सूजन) को दूर करता है।इस प्रकार के जल का सदा प्रयोग किया जाए तो रोग उत्पन्न ही नहीं होते।

(23) दीर्घजीवन:-जिस दिन बालक का जन्म हो,उसी दिन से शुद्ध-सोने को चौथाई चावल की मात्रा में घिसकर और जरा सा पानी मिलाकर १० दिन तक चटाते रहें।
इसके प्रयोग से आयु दीर्घ होती है,बच्चा सब प्रकार के रोगों से सुरक्षित रहता है।

(24) नजला:-सफेद मिर्च २१ दानें पानी के साथ सात दिन तक प्रतिदिन निगलवा दें।प्रभु कृपा से सदा के लिए नजला-जुकाम से छुट्टी मिल जायेगी।

(25) पीलिया:-६० ग्राम मूली के पत्तों का रस निकालकर इसमें १० ग्राम चीनी मिला लें।प्रातः बिना कुछ खाये-पिये इस रस को पिलायें।पीलिया को नष्ट करने के लिए रामबाण दवा है।

(26) बाल काले करना:-मालकांगनी के बीज (छिलका उतार दें) २५० ग्राम लेकर बोतल में भर लें और दृढ़ कार्क लगा दें।१० दानें प्रतिदिन पानी से निगल लें।निरन्तर एक वर्ष तक प्रयोग करें।
इन बीजों के सेवन से बुद्धि तीव्र होती है।चेहरा लाल हो जाता है।बाल पुनः काले होने लगते हैं।
पथ्य-गर्म वस्तुओं से बचें।

(27) उषःपान:-प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व ८ अंजलि जल पीना बड़ा लाभकारी है।ऋषियों ने इसकी बड़ी प्रशंसा की है।
'भावप्रकाश’ में लिखा है-

सवितुः समुदयकाले प्रसृतीसलिलस्य पिबेदष्टौ ।
रोगजरापरिमुक्तो जीवेद् वत्सरशतं साग्रम् ।।
सूर्योदय के समय जो व्यक्ति प्रतिदिन आठ अंजलि जल पान करता है वह रोगों से मुक्त हो जाता है,बुढ़ापा उसके पास नहीं फटकता और वह सौ वर्ष से भी अधिक आयु प्राप्त करता है।

प्रातः उषःपान करने से कब्ज,वीर्य सम्बन्धी रोग,बवासीर,उदररोग,कुष्ट,मूत्र और धातुरोग,सिरदर्द,नेत्रविकार ,निर्बलता तथा वात,पित्त और कफ आदि से होने वाले भयंकर से भयंकर रोग नष्ट हो जाते हैं।

यदि यह जल मुख के बजाय नासिका से पिया जाए तो सोने पे सुहागे का काम करता है।

नासिका द्वारा जलपान के गुणों का वर्णन करते हुए आयुर्वेद के ग्रन्थों में लिखा है–
विगतघननिशीथे प्रातरुत्थाय नित्यम्,
पिबति खलु नरो यो घ्राणरन्ध्रेण वारि ।
स भवति मतिपूर्णश्चक्षुषा तार्क्ष्यतुल्यो,
वलिपलितविहीनः सर्वरोगैर्विमुक्तः ।।

अर्थात् रात्रि का अन्धकार दूर हो जाने पर जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर नासिका द्वारा जलपान करता है,वह बुद्धिमान बन जाता है।उसकी नेत्र ज्योति गरुड़ के समान हो जाती है।उसके बाल असमय में सफेद नहीं होते तथा वह सम्पूर्ण रोगों से सदा मुक्त रहता है।

नासिका द्वारा जलपान से सिर-दर्द,जुकाम-चाहे नया हो या पुराना,नजलि,नकसीर चलना आदि रोग जड़मूल से दूर हो जाते हैं।

शीत ऋतु में यदि जल बहुत शीतल हो तो उसे थोड़ा गर्म करके पान किया जा सकता है।

जल पीने के नियम:-लाभ सूर्योदय के पूर्व पीने से ही होता है।सूर्यास्त के पश्चात् जल कभी नहीं पीना चाहिये।
रात्रि के प्रथम पहर में जल विष है,मध्य रात्रि में दूध के समान और प्रातः सूर्योदय से पूर्व माँ के दूध के समान गुणकारी है।
भोजन के तुरन्त बाद भी जल नहीं पीना चाहिये।

(27) मल-मूत्र के वेगों को न रोकें:-बहुत से व्यक्ति किसी अन्य आवश्यक कार्य के कारण मल-मूत्र के वेगों को रोक लेते हैं।ऐसा करना शरीर के लिए बहुत हानिकर है।

महर्षि चरक ने कहा है:-
न वेगान् धारयेद्धीमाञ्जातान्मूत्रपुरीषयोः ।-(चरक० सूत्र० ७/३)
बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि मल-मूत्र के वेगों को न रोके।
इन वेगों को रोकने से भारीपन,सिरदर्द आदि हो जाते हैं।नेत्र ज्योति मन्द होती है।


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Thursday, January 28, 2016

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷 भूपेश आर्यः 🌻जीवेम शरदः शतम्🌻 शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमसौ। एतौ यक्ष्मं वि...

🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷

भूपेश आर्यः

🌻जीवेम शरदः शतम्🌻

शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमसौ।
एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुन्ञतो अंहसः ।।-(अथर्व० ८/२/१८)
चावल और जौ तेरे लिए कल्याणकारी हों,ये कफ न करने वाले व खाने में मधुर हैं।ये रोग को रोकते हैं और कष्टों से बचाते हैं,अर्थात् जौ और चावल के प्रयोग से रोग आते ही नहीं और मनुष्य रोग पीड़ा से बचा रहता है।

त्रयायषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् ।
त्रेधामृतस्य चक्षणं त्रीण्यायूँषि तेs करम् ।।-(अथर्व० ५/२८/७)
जमदग्नि-जिसकी जठराग्नि मन्द नहीं होती,उस जमदग्नि की आयु तीन सौ साल होती है।
कश्यपस्य-वस्तुओं के स्वरुप व तत्त्व को समझने वाले के लिए भी तिहरी आयु है।इनमें शरीर,मन व बुद्धि तीनों प्रकार से अमरता सी दिखाई देती है,अर्थात् इनकी बुद्धि तीन सौ वर्ष तक उर्वरा रहती है,इनके मन मलिन नहीं होने पाते,शरीर रोगी नहीं होते।मैं भी तेरी आयु तीन सौ वर्ष की करता हूं।

अयं मे हस्तो भगवान् अयं में भगवत्तरः ।
अयं मे विश्वभेषजोsयं शिवाभिमर्शनः ।।-(अथर्व० ४/१३/६)
अर्थ:-वैद्य रोगी से अत्यन्त विश्वास के साथ कहता है कि –“यह मेरा हाथ बड़ा सौभाग्यवाला है।यह दूसरा उससे भी अधिक सौभाग्यशाली है।यह हाथ सब रोगों की ओषधि है,तथा छूते ही कल्याण करने वाला है।”

इस मन्त्र में सम्मोहन विद्या व चिकित्सा की चर्चा है।

अपामार्ग ओषधीनां सर्वासामेक इद्वशी।
तेन ते मृज्म आस्थितमथ त्वमगदश्चर ।।-(अथर्व० ४/१७/८)
अपामार्ग सब ओषधियों को वश में रखने वाली एक ओषध है।उससे तेरे शरीर में स्थित् रोग को हम दूर करते हैं,अतः तू अब निरोग होकर चल।

न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते ।
यं भेषजस्य गुल्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते ।।-(अथर्व० १९/३८/१)
अर्थ-जिसको इस ओषध गुल्गुल का सुगन्ध प्राप्त होता है उसे न रोग व्याप्ता है और न ही कोई शाप प्रभावित करता है।

अश्ववत्थो दर्भो वीरुधां सोमो राजामृतं हविः ।
व्रीहिर्यवश्च भेषजौ दिवस्पुत्रावमत्य्रौ ।।-(अथर्व० ८/७/२०)
वृक्षों में पीपल,घासों में कुशा,लताओं में सोमलता,पेय पदार्थों में जल तथा भक्ष्य पदार्थों में घृत प्रमुख है।वृष्टिजल से उत्पन्न व्रीहि और यव अमर्त्य औषध हैं।इनके होते हुए असमय के रोगों से मृत्यु का प्रश्न ही नहीं उठता।


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सनातन संस्कृति में मुंडन क्यूँ :— *********************** क्या आप जानते हैं कि हमारे सनातन...

सनातन संस्कृति में मुंडन क्यूँ :—
***********************

क्या आप जानते हैं कि हमारे सनातन धर्म में बच्चों के मुंडन की परंपरा क्यों बनाई गई है और केवल बच्चे ही क्यों …जन्म से लेकर मृत्यु तक के हमारे सोलह संस्कारों में भी मुंडन को हमारे हिन्दू धर्म में अनिवार्य माना गया है…! यहाँ तक कि हम हिन्दू सनातन धर्मियों में बच्चों का मुंडन जितना अनिवार्य है उतना ही अनिवार्य किसी नजदीकी रिश्तेदार की मृत्यु के समय भी है….और, इस तरह से मुंडन करवाना हम सनातनियों के संस्कार में सम्मिलित है …

लेकिन, हम से अधिकतर सनातनी बिना कुछ जाने समझे इसे केवल इसीलिए करते हैं क्योंकि हम बचपन से ही ऐसा देखते आये हैं….और, चूँकि हमारे पूर्वज भी ऐसा किया करते थे इसीलिए, हमलोग भी बस इसे एक “"आध्यात्मिक परंपरा”“ के तौर पर इसे निभा देते हैं…!

लेकिन यह जानकर हर किसी को बेहद हैरानी होगी कि मुंडन का आध्यात्म से कुछ लेना-देना नहीं है बल्कि यह एक शुद्ध विज्ञान है और, मुंडन संस्कार सीधे हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा है।

कारण :– वास्तव में जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तो वो माँ के प्लीजेंटल फ्लूइड तैरता रहता है ….तथा, बच्चे के जन्म लेने के बाद उसके शरीर में प्लीजेंटल फ्लूइड में मौजूद रसायन एवं , कीटाणु, बैक्टीरिया और जीवाणु लगे होते हैं जो, साधारण तरह से धोने पर शरीर से तो निकल जाते हैं परन्तु, बाल होने के कारण सर से नहीं निकल पाते हैं….!अतएव , उसे पूरी तरह से साफ़ करने के लिए….. उस बाल को निकलना जरुरी होता है….

अतः… एक बार बच्चे का मुंडन जरूरी होता है……. ताकि, बच्चे को भविष्य में इन्फेक्शन का कोई खतरा ना रहे….

यही कारण है कि जन्म के एक साल के भीतर बच्चे का मुंडन कराया जाता है… और, लगभग कुछ ऐसा ही कारण मृत्यु के समय मुंडन का भी होता है….!जब पार्थिव देह को जलाया जाता है तो , उसमें से भी कुछ ऐसे ही जीवाणु हमारे शरीर पर चिपक जाते हैं, क्यूंकि जलाते समय जो रासायनिक अभिक्रियाएँ होती है वो अत्यंत ही उच्च ताप एवम दाब पे होती है ,, और दाब के वातावरण के अंतर के कारण ही जीवाणु साधारण ( ठन्डे) वातावरण की तरफ DIFFUSE करते हैं …

इसीलिए, पार्थिव देह जलाने के बाद नदी में स्नान और धूप में बैठने की भी परंपरा है….क्योंकि आज हम सभी इस बात से अवगत हैं कि सूर्य की रोशनी में बहुत सारे बैक्टीरिया और वाइरस जीवित नहीं रह पाते हैं तदोपरांत, सिर में चिपके इन जीवाणुओं को पूरी तरह निकालने के लिए ही मुंडन कराया जाता है ( यहाँ तक कि दाढ़ी और मूंछें तक निकाल दी जाती है )

यहाँ कुछ मनहूस सेक्यूलर आदतन ये बोल सकते हैं कि :– अगर मुंडन का यही कारण है तो, मुंडन तुरंत क्यों नहीं करवा दिया जाता है… तो उन कूढ़मगजों के लिए इतना ही समझा देना पर्याप्त है कि नवजात शिशु की त्वचा काफी कोमल होती है .
और, तुरंत ही उस पर ब्लेड चलाने से इन्फेक्शन का खतरा घटने के बजाए और, बढ़ ही जाएगा इसीलिए, लगभग ६ महीने साल भर तक इंतजार किया जाता है ताकि. वो नवजात शिशु बाहरी आवो-हवा का आदि हो जाए…उसी तरह किसी की मृत्यु के बाद भी तुरत मुंडन नहीं करवा कर कुछ दिन बाद ( नवमी के दिन ) मुंडन इसीलिए करवा जाता है ताकि, उस दौरान घर की पूरी तरह साफ़-सफाई की जा सके अन्यथा, मुंडन के बाद भी साफ़-सफाई करने से स्थिति वही रह जाएगी….!

अंत में इतना ही कहूँगा कि….. हम सनातनियों को गर्व करना चाहिए कि जो बातें हम आज के आधुनिकतम तकनीक के बाद भी ठीक से समझ नहीं पाते हैं,,,उस जीवाणु -विषाणु , और बैक्टीरिया -वाइरस एवं उससे होने वाले दुष्प्रभावों को हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि हजारों-लाखों लाख पहले ही जान गए थे….! परन्तु चूँकि हर किसी को बारी-बारी विज्ञान की इतनी गूढ़ बातें समझानी संभव नहीं थी ( क्यूंकि हर कोई समझने समझाने के लायक नहीं होता) इसलिए, हमारे पूर्वजों ने इसे एक परंपरा का रूप दे दिया ताकि, उनके आने वाले वंशज (जो अगर साधारण बुद्धि के भी हैं ) सदियों तक उनके इन अमूल्य खोज का लाभ उठाते रहें….जैसे कि… हमलोग अभी उठा रहे हैं….!🚩🚩


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