🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷
भूपेश आर्य
🌻साधुओं की निकम्मी फौज🌻
भारत की अवनति का एक और कारण है साठ लाख साधुओं की निकम्मी फौज।वैदिक धर्म में सन्यासियों का स्थान बहुत ऊंचा और सम्मानप्रद है।महर्षि दयानन्द के शब्दों में “जैसे शरीर में सिर की आवश्यकता है,वैसे ही आश्रमों में संन्यासाश्रम की आवश्यकता है”, परन्तु आज यह शिरोमणि आश्रम सबसे अधिक दूषित और विकृत हो गया है।आज कहाँ हैं सच्चे सन्यासी?
आज के सन्यासियों की अवस्था तो तुलसीदासजी की इस चौपाई से मिलती-जुलती है-
नारि मुई घर सम्पत्ति नासी।
मूँड मुँडाय भये संन्यासी।
आज सन्यासियों का स्थान टकापन्थी,ढोंगी,दम्भी और पाखण्डियों ने ले लिया है।आज का सन्यासी सर्वत्यागी होने के स्थान पर सर्वग्राही बन गया है।आज का सन्यासी लोकोद्धार के लिए,देश के कल्याण के लिए ,जाति को सन्मार्ग पर लाने के लिए संन्यासी नहीं बनता,वह सन्यासी बनता है अपने घर वालों का पालन-पोषण करने के लिए ,महल और कोठियाँ बनवाने के लिए,अपनी कुण्ठित वासनाओं को शान्त करने के लिए।आज के सन्यासियों के जीवन का तनिक निकट से अध्ययन करें तो पता लगेगा कि किसी ने पच्चीस लाख रुपया जमा किया हुआ है तो किसी ने पचास लाख तथा किसी ने एक करोड़ और किसी ने आश्रम के रुप में करोडों और अरबों की सम्पत्ति इकट्ठी की हुई है।तनिक निकल जाइये हरिद्वार और ऋषिकेश की और,आपको ऐसे सैकड़ों ढोंगी और पाखण्डी साधु मिल जाएँगें।ये ढोंगी और पाखण्डी साधु संसार को उपदेश देते हैं-
रुखी सूखी खायके ठण्डा पानी पीव।
देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जीव।।
जिन गृहस्थों को अपने बच्चों का पालन और पोषण करना होता है,अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा करके ८-१० घण्टे प्रतिदिन दफ्तरों या दुकानों में काम करना होता है वे तो रुखी-सूखी खाकर निर्वाह करें और जो निठल्ले पड़े रहते हैं,वे खूब दूध-मलाई छकें।
क्या सुन्दर उपदेश है।
इन पाखण्डी साधुओं का इनके साथ रहकर निरीक्षण किया जाए तो पता चलेगा कि संसार को ईश्वर भक्ति का उपदेश देने वाले ये दम्भी और पाखण्डी स्वयं एक मिनट भी उपासना नहीं करते।प्रातः उठते ही शौच से निवृत्त हो तेल की मालिश कराते हैं,फिर स्नान कर गर्मियों में बादाम की ठण्ड़ाई पर हाथ साफ करते हैं।सर्दियों में बादाम का हलवा और बादाम-पाक खाते हैं।दोपहर को ऐसा बढ़िया भोजन खाते हैं कि अच्छे अच्छे गृहस्थियों को भी प्राप्त न होता होगा।दो घंटा पश्चात् मौसमी और सन्तरों का रस पीते हैं।शाम को फिर भोजन और रात्रि को दूध।ये तथाकथित सन्यासी दण्ड पेलकर साँड बन रहे हैं और देश पर भार बन रहे हैं।ये ढोंगी साधु दिन भर पड़े हुए खाटों को तोड़ते हैं,न लिखना,न पढ़ना,न स्वाध्याय ,न प्रवचन।
इन सन्यासियों के दिन भर मठों में व्यभिचार होता है।कलकत्ता के हीरालाल गोयन्दका ने जो व्यभिचार किये थे वे किससे छिपे हैं?अभी कुछ समय पूर्व ऋषिकेश के एक महन्त के कमरे में देखा गया कि महन्तजी झूले में झूल रहे हैं।झूले के पास पांच-सात युवतियाँ बैठी हुई हैं,उन सभी ने मेकअप किया हुआ था और साधु जी आनन्द के हिलोरे ले रहे थे।
हे महन्तों और मठाधीशों ! मैं आपसे पूछना चाहता हूं-यदि आपको ये भवन ही खड़े करने थे,यदि सम्पत्ति ही संगृहीत करनी थी,यदि गुलछर्रे ही उड़ाने थे तो आपने सन्यास क्यों लिया?यह काम तो तुम गृहस्थाश्रम में रहकर भी कर सकते थे,फिर इसे त्यागने की क्या आवश्यकता थी?
दीपावली के अवसर पर दिल्ली और नई दिल्ली के मन्दिरों में इतनी मिठाई चढ़ती है कि मिठाइयों के पहाड़ लग जाते हैं,दूसरी और गरीब बच्चे मिठाई के एक कण के लिए रोते और बिलखते हैं।दीपावली के दिन ही क्या साधारण दिनों में भी नई दिल्ली के दो मन्दिरों में इतनी मिठाई चढ़ती है कि पूजारी और उसके बच्चे उस मिठाई को खा नहीं पाते।वह मिठाई पडी पडी सूखती है या उसे कुत्तों को फेंका जाता है।
ये शंकराचार्य और मण्डलेश्वर भी देश के लिए एक भीषण संकट हैं।ये सोने के सिंहासन पर बैठते हैं।हे मण्डलेश्वरों! लोगों को तुम सम्भाव का उपदेश देते हो,संसार के सभी प्राणियों में एकात्मदर्शन की बात करते हो और स्वयं सन्यासियों से अपनी पालकी उठवाते हो।तुम्हें लज्जा आती है या नहीं?
इन महन्तों,मठाधीशों और मण्डलेश्वरों के अतिरिक्त देश में साठ लाख साधुओं की निकम्मी फौज विद्यमान है।इनको साधु कहना तो वस्तुतः ‘साधु’ शब्द का ही अपमान करना है।ये तो स्वादु हैं,ठग हैं।लीजिए इन साधुओं का स्वादुपन देखिये-
एक साधु एक घर में पहुंचकर कहने लगा-“माता! आज तो साधु की इच्छा दूध पीने की है,एक सेर पक्का दूध पिला दे।"स्त्रियों में साधुओं के प्रति भक्तिभाव होता ही है।माता एक बर्तन लेकर अहारे में रक्खी हाँडी से दूध डालने लगी तो उसके साथ मलाई भी आने लगी।माता उस मलाई को बर्तन में गिरने से रोकने लगी,तो साधुजी बोले-"माता! मलाई भी आने दे,हमें स्वाद से क्या मतलब,हम तो मलाई सहित पी लेंगे।” यह है आज के साधुओं का स्वादुपन।
इनकी विद्वत्ता और योग्यता कितनी है,जहाँ तक साधारण साधुओं की बात है,उनकी योग्यता का पता तो निम्न चित्रण से लग जायेगा-
एक सदगृहस्थ ने किसी साधु से कहा-“महाराज! मेरे बच्चे को गायत्री का उपदेश कर दो।”
साधु बोला-“ना महाराज”
“अच्छा यदि गायत्री का उपदेश नह़ी कर सकते तो मेरे बच्चे को कुछ हिन्दी ही पढ़ा दिया करें,”
गृहस्थी ने विनयपूर्वक कहा।
साधु बोला-“ना महाराज ! यदि पढ़ा होता तो सन्यासी क्यों बनता,कमाकर खाता।”
गृहस्थी ने पूछा-“साधुजी ! खीर खाओगे ?”
साधुजी तपाक से बोले-“हाँ महाराज।”
अब जिन साधुओं को बहुत बड़ा विद्वान समझा जाता है उनकी योग्यता भी सुन लीजिए।करपात्री जी और कृष्णबोधाश्रम का कहना है कि"स्त्रियों को गायत्री मन्त्र का जप नहीं करना चाहिये।स्त्री यदि गायत्री का जप करेगी तो विधवा हो जायेगी।"
ऐसा ऊटपटाँग व्याख्यान सुनकर एक देवी करपात्रीजी के पास पहुँची और पूछा-“गायत्री स्त्री थी या पुरुष?”
करपात्रीजी ने कहा-“स्त्री।"तब उस देवी ने कहा-"तो वह स्त्रियों में बैठकर प्रसन्न होगी या पुरुषों में?”
करपात्रीजी देवी का मुँह ताकते रह गये,कोई उत्तर न बन पडा।
आर्यसमाज के अधिकारियों ने शास्त्रार्थ का चैलैन्ज दिया,जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया।
आज साधुओं के स्थान पर दम्भी,पाखण्डी और ठग अधिक हैं।ये अनेक प्रकार से लोगों को ठगते हैं।लोगों की आंखों में धूल झोंककर ये लोग धन बटोरते हैं। और अपना उल्लू सीधा करते हैं।
देश में इस प्रकार के साठ लाख निकम्मे और निठल्ले साधुओं का जमघट है और यह संख्या प्रतिदिन बढ़ रही है।इन साधुओं पर होने वाला वार्षिक व्यय लगभग ४०० करोड़ रुपये है,अर्थात् प्रतिदिन एक करोड़ रुपये से भी अधिक इन पर खर्च होता है फिर देश का सत्यानाश क्यों न हो?
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