🌷🌷🌷ओ३म्🌷🌷🌷
भूपेश आर्य
🌷अवतारवाद चरित्रनाश का मूल कारण🌷
ईश्वर की जगह जब इन मूर्तियों की पूजा शुरु हो गयी तो उन्हें ईश्वर सिद्ध करने के लिए -‘ईश्वर भी माँ के गर्भ में आकर जन्म लेता है।अवतारवाद का यह महानिकम्मा,तर्क-शून्य और चरित्र-नाशक सिद्धान्त घड़ा गया।१४ अवतार बना डाले गये जिनमें कच्छप (कछुआ) और बाराह (सूअर) के अवतार भी शामिल हैं।अपने घोर से घोर पापों को छिपाने के लिए श्रीकृष्ण आदि महापुरुषों को एक और तो ईश्वर बता गया है तो दूसरी और शर्म को शर्माने वाली पाप की कहानियाँ उनके पवित्र जीवनों के साथ जोड़ दी गई।क्योंकि अब कहा जा सकता था कि जब भगवान् ही दानलीला,चीरहरणलीला,माखनचोरी लीला के रुप में चोर जार शिरोमणि बनाकर चोरों और व्यभिचारियों के सरदार बन सकते हैं तो हमारे ऐसा करने में क्या दोष है?
महापुरुषों का किसी देश और जाति को सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि राष्ट्र की भावी पीढ़ियाँ उनसे प्रेरणा और प्रकाश लेती हैं।महापुरुष राष्ट्र के प्रकाश-स्तम्भ होते हैं।पर जब उन्हें ईश्वर बना दिया जाता है तो यह बड़ा लाभ खत्म हो जाता है।महापुरुषों के जीवन से जब कभी किसी बात की मिसाल दी जाती है तो हम सोच लेते हैं कि अमुक काम तो वही कर सकते थे।वे ईश्वर थे,हम साधारण लोग ऐसा काम कैसे कर सकते हैं?
तो हर अच्छे और ऊंचे काम से छुट्टी पाने का बहाना और हर नीच काम का समर्थन 'अवतारवाद’ की आड़ में हमें मिलने लगा।रही सही कसर मिथ्यामहात्म्यों और 'कलियुग केवल नाम अधारा’ की मान्यता ने पूरी कर दी।कैसा भी पाप करो पहले तो कलियुग के मत्थे मढ़कर ही छुट्टी फिर गंगा,यमुना में नहा लो सारे गुनाह माफ ! दशहरे के दिन नीलकण्ठ के दर्शन से २१ पीढ़ियाँ तर जावेगी।गंगा में नहाने ,गंगाजल स्पर्श करने और गंगाजल के दर्शन का तो अपार पुण्य है ही पर चार सौ कोस या ८०० मील से ही 'गंगा-गंगा’ कहने से भी सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।पाप की खुला छुट्टी का कैसा बढ़िया लाइसेन्स है,यह ! पाप से रोकने के लिए नहीं,पाप के नतीजे से बचने के लिए गुरुपूजा,तीर्थयात्रा,श्राद्ध,व्रत,उपवास इन उत्तम बातों को भी ऐसे भ्रान्त रुप में पेश किया गया जिससे पाप और दुश्चरित्रता को खूब बढ़ावा मिला।हर पाप का समर्थन करने के लिए एक नया देवता घड़ लिया जाता था।
सब और से यही आवाज थी-आओ,हमारा देवता सबसे ऊंचा है।उसमें शाप और वरदान की अनन्त शक्तियाँ हैं।हर पाप का सस्ते से सस्ता प्रायश्चित हमारे पास है।आओ हमारे देवता की सजावट और श्रृंगार देखो,निहाल हो जाओगे-आदि-२ और इस गोरख धन्धे का नाम रखा गया-'सनातन धर्म।’
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