Sunday, February 7, 2016

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻 भूपेश आर्य 🌷विदुर नीति🌷 (1) एकया द्वे विनिश्चित्य त्रींश्चतुर्भिर्वशे कुरु । पञ्च...

🌻🌻🌻ओ३म्🌻🌻🌻

भूपेश आर्य

🌷विदुर नीति🌷

(1) एकया द्वे विनिश्चित्य त्रींश्चतुर्भिर्वशे कुरु ।
पञ्च जित्वा विदित्वा षट् सप्त हित्वा सुखी भव ।।

अर्थ:-एक बुद्धि से दो कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय करके चार साम,दाम,भेद,दण्ड से तीन दुश्मन,दोस्त और उदासीन को वश में कीजिए।पाँच इन्द्रियों को जीतकर छः सन्धि,विग्रह,यान,आसन,द्वैवीभाव और समाश्रयरुप गुणों को जानकर और सात को छोड़कर-पराई स्त्री,जुआ,मृगया,मद्य,कठोर वचन,दण्ड की कठोरता और अन्याय से धन का उपार्जन को छोड़कर सुखी हो जाइये।

(2) एकमेवाद्वितीयं तद् यद् राजन्नावबुध्यसे।
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं परावारस्य नौरिव ।। ५२ ।।

अर्थ:-हे राजन! जो ब्रह्म एक ही है और अद्वितीय है,अनुपम है उसे आप नहीं समझ रहे हैं।वह सत्यस्वरुप परमेश्वर मोक्षप्राप्ति की सीढ़ी है,उसी प्रकार जैसे समुद्र के पार जाने के लिए नौका होती है।

(3) एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते।
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ।। ५३ ।।

अर्थ:-क्षमाशील आदमियों में एक ही दोष का आरोप होता है,दूसरे की सम्भावना नहीं है।वह दोष यह है कि क्षमाशील मनुष्य को लोग असमर्थ समझ लेते हैं।

(4) द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो विलशयानिव।
राजनं वाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ।। ५८ ।।

अर्थ:-जैसे सांप बिल में रहने वाले चूहे आदि को निगल जाता है,वैसे ही यह भूमि इन दोनों को निगल जाती है।-१.विरोध न करने वाले,युद्ध न करने वाले राजा को और २.प्रवास,यात्रा न करने वाले सन्यासी को।


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