Thursday, February 4, 2016

🌷🌹🌷🌹ओ३म्🌹🌷🌹🌷 भूपेश आर्य 🌷वेद-विषय 🌷 प्रश्न:-ईश्वरीय ज्ञान वेद की आवश्यकता ही क्या है ? उत्तर:-जब...

🌷🌹🌷🌹ओ३म्🌹🌷🌹🌷

भूपेश आर्य

🌷वेद-विषय 🌷

प्रश्न:-ईश्वरीय ज्ञान वेद की आवश्यकता ही क्या है ?

उत्तर:-जब उस परमपिता परमात्मा ने हमें संसार में भेजा होगा हमारे लिए जहाँ नाना प्रकार के फल ,अन्न-औषधियाँ हमें दी होंगी,क्या यह भी संभव है कि उसने ये नहीं बताया होगा कि फलों का,पशुओं का,अन्न और औषधि का कैसे प्रयोग करना है।क्या हमें ये नहीं बताया जाना चाहिये कि संसार में जा रहे मानव ! तुम्हें यदि सुखी रहना है तो ये सावधानियाँ बरतना या इन कार्यों को करना,ऐसे रहना,ऐसा व्यवहार करना।जब तक साधारण ज्ञान वाला सांसारिक पिता अपनी संतानों के लिए भी ऐसी व्यवस्था करता है तो वह परमकारुणिक प्रभु क्यों न करता ? ईश्वर ने वेद-ज्ञान के द्वारा संसार में आने वाले मनुष्यों को ज्ञान का भंडार सौंप दिया।

मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो दूसरों की नकल से सीखता है।सेना में कवायद होने लगी।एक आदमी सबसे आगे खड़ा कर दिया गया अब जैसे वो करता है सारे सैनिक उसी की नकल कर रहे हैं।बच्चा रोने लगा ,दो दिन,चार दिन का है।माँ दूध पिला रही है,रोना बन्द ही नहीं हो रहा।दादी बताती है इसके पेट में दर्द होगा,अजवायन पकाकर देती है।ये सो गया।पेट में दर्द ही था।अब बड़ा हो गया।माँ दूध तो पिलाती ही है।गर्मी के दिन चमचे से पानी भी मुख में डालती है,बच्चे को आहिस्ता-आहिस्ता अभ्यास से भान होने लगा।

मम कहने पर मुख खोलता है और फिर कुछ उसमें आता है।शान्ति मिलती है।यह मम भी सीख रहा है।पति-पत्नि जब दोनों लड़ते हैं तो उनका लड़ना ये समझता तो नहीं पर सीख जरुर रहा है।जब मुंह में बोलने की शक्ति आयी,बेचैनी हुई तो ये मम और दुदु भी चिल्लाता है।जब मम या दुदु कहने से कोई समझ नहीं पाता,तब यह रोना शुरु करता है और चाहता है उस बेजुबान को समझो।

तुम समझते क्यों नहीं?तुम जो-जो बोलते हो वह सारे शब्द आत्म-सात् करता जाता है।याद करता जाता है,आप समझें या ना समझें,धीरे-धीरे वह वही भाषा बोलने लगता है,जो उसके वातावरण में आसपास के लोग बोलते थे।उसकी माता,बहन,पिता बोलते थे।

यही कारण है कि एक अंग्रेज माँ की सन्तान बचपन से ही अंग्रेजी बोलने लगती है।एक पंजाबी माँ की सन्तान बचपन से ही पंजाबी बोलने लगती है।एक बंगाली मां की सन्तान बचपन से ही बंगला बोलने लगती है।

यदि थोड़ा सा बदल दिया जाए और अंग्रेज माता की संतान किसी पंजाबी लड़की को पालने के लिए दे दें,किसी पंजाबी लड़की की सन्तान को बंगाली लड़की पालने लगे तो पंजाबी की संतान बंगला बोलेगी,अंग्रेज की सन्तान पंजाबी बोलेगी।

इससे यह स्पष्ट हो गया। कि भाषा बच्चे को जन्म से मिलने वाली धरोहर नहीं है।जैसी भाषा उसके सामने आरम्भ से बोली जाती है,बच्चा उसी की नकल करता है,उसी को सीख लेता है,वही बोलना शुरु करता है।

आदि सृष्टि में जब मानव पैदा हुआ होगा तो कोन था जिसकी भाषा की वह नकल करता?कौन था जिसकी भाषा वह सीखता?
कोई पूछे,क्या पशुओं की भाषा ,क्या पक्षियों की भाषा नहीं थी?
थी,परन्तु वह भाषा नहीं है वे तो ध्वनियां-मात्र है।मुर्गा कुकडूं कूं करता है क्या सचमुच कुकडूं कूं करता है या डुडलुं डूं करता है?
जैसे हारमोनियम की ध्वनि में कोई भी गीत गा लो प्रत्येक भाषा के साथ हारमोनियम का स्वर वही गीत गाता मालूम होता है।हारमोनियम से ध्वनि निकलती है भाषा नहीं।

शेर जैसे दहाड़ता है,उसके बच्चे भी वैसे ही दहाड़ते हैं।शुक पिक जैसे बोलते हैं उनके बच्चे भी वैसे ही चहकते हैं।मनुष्य उनसे उसी प्रकार की दहाड़,उसी प्रकार की चहक तो सीख सकता है,भाषा नहीं सीख सकता।
लेकिन उस दहाड़ का ,उस चहक का यदि कोई अर्थ होता है तो वह मनुष्य की बुद्धि से परे है,वह न तब जानता था न अब जानता है।

पेड़ से पत्तों के झड़ने का शब्द ,पानी की बून्दों के गिरने का शब्द,उफनती नदी का वेग से बहने का स्वर ! क्या बून्द के गिरने से टप-टप शब्द होता है?क्या उफनती नदी सा-सा करती?नहीं।ये स्पष्ट शब्द नहीं हैं।ये ध्वनियाँ मात्र हैं।इन्हें जैसा चाहो वैसा कह सकते हो,इनसे भाषा का निर्माण नहीं हो सकता।

पैर में कांटा चुभ गया तो क्या मेरे मुख से हाय-आह निकलता है?क्या जब मैं प्रसन्न होता हूं तो वाह वाह ओ हो हो करता हूं।?क्या दुखी देखकर हाय हाय ऐसा करता हूं? ऐसा कुछ नहीं है।ये ध्वनियां हैं,इन्हें कुछ भी कह लो।
हाय के स्थान पर वाह कह लो,ओह के स्थान पर वोह कह लो,आह के स्थान पर आ कह लो।हाय ओह तो मेरे लिए वे शब्द हैं जो मैं नित्य सुनता हूं और मान लेता हूं कि काँटा चुभने पर ये ही मुख से निकलता है।इन अस्पष्ट ध्वनियों से भाषा का निर्माण कैसे हो सकता है?

मानव भाषा का निर्माण अपने आप स्वयं कैसे कर लेगा?बिना नकल के भाषा सीखता नहीं और आरम्भिक सृष्टि में कौन था जिसकी वह नकल करता?इसलिए वेद माता ने स्पष्ट घोषणा की है कि आदि मानव को भाषा ईश्वर ने प्रदान की है।भाषा मनुष्य की कृति नहीं है।

वेदान्त दर्शनकार ने इसी बात को ‘शास्त्र योनित्वात्ः कहकर प्रकट किया है।

प्रश्न :-भाषा ईश्वर ने दी यह मान लिया जाए तो भी यह तो सिद्ध नहीं होता कि वेद भी ईश्वर ने दिये ?

उत्तर :-यदि मैं कहूं “वहाँ एक परछाई थी।” प्रश्न है किसकी परछाई थी।कोई वस्तु तो होनी चाहिये जिसकी परछाई हो।भाषा तो कलेवर है विचार का।जैसे जीवात्मा शरीर धारण करता है।वैसे ही विचार जब शरीर धारण करते हैं तो भाषा बन जाती है।बिना भाषा के विचार का अस्तित्व असिद्ध ही रहेगा तो ईश्वर ने आरम्भ मानवीय सृष्टि में जब मानव को भाषा दी तो जिन शब्दों में ,जिन वाक्यों में,जिन विचारों में,भाषा दी वह ही वेद ज्ञान है।


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