🙏🙏🙏🙏यजु0 32अध्याय, 16 वाँ मन्त्र~~~~ ॐ येन द्यौरुग्रा पृथ्वी च दृढा,येन स्वः स्तभितम् येन नाकः| यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः| कस्मै देवाय हविषा विधेमः||~~मन्त्र का पद्य में भाव~~ जिसने लोक लोकान्तर रच कर, स्व~ सौंदर्य बढ़ाया है| कभी न टकराते आपस में, बहु कौशल से घुमाया है| पृथ्वी द्यु अंतरिक्ष सभी का, शक्तिमान निर्माता है| आओ करें प्रीति ~प्रभु~ भक्ति, स्वर्ग मोक्ष सुख दाता है|सुखस्वरूप देवाधिदेव, अन्तस्थल श्रद्धा से भरना| कभी विमुख न हो पाएं हम, ग्रहण हवि प्रियतम करना||
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