🐚 सुप्रभातम् ! सुदिनमस्तु ! शुभमस्तु ! 🐚
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
🚩आचार्य चाणक्य कहते हैं🚩
🔸द्वादशोऽध्यायः🔸
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया स्वसा।
शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः॥१०॥
🔸शब्दार्थ :— कोई योगी अपने परिवार का परिचय देते हुए कहता है — (सत्यम्) सत्य को जानना, सत्य को बोलना और सत्य ही लिखना (माता) मेरी माता है (ज्ञानम्) यथार्थ ज्ञान (पिता) मेरा पिता है, पालक और रक्षक है (धर्मः) धर्म (भ्राता) मेरा भाई है (दया) प्राणिमात्र पर दया करना (स्वसा) मेरी बहन है, (शान्तिः) शान्ति (पत्नी) मेरी पत्नी है (क्षमा) सहनशीलता (पुत्रः) मेरा पुत्र है — (एते) ये (षट्) छह (मम) मेरे (बान्धवाः) बन्धु-बान्धव हैं।
🔸भावार्थ :— उपर्युक्त श्लोक में आचार्य चाणक्य ने मोह-माया से रहित मनुष्य के वास्तविक सहचरों का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि सत्य ही एक वैरागी की माता के समान है, ज्ञान उसके पिता के समान , धर्म भाई के समान, दया बहन के समान, शान्ति पत्नी के समान और क्षमा पुत्र के समान होती है। वस्तुत इस नाशवान् संसार में केवल ये ही उसके सच्चे बन्धु-बान्धव हैं। इस प्रकार संसार से विरक्त होने के बाद भी मनुष्य अकेला नहीं होगा।
from Tumblr http://ift.tt/1qAYDts
via IFTTT
No comments:
Post a Comment