🐚 सुप्रभातम् ! सुदिनमस्तु ! शुभमस्तु ! 🐚
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🚩आचार्य चाणक्य कहते हैं🚩
🔸द्वादशोऽध्यायः🔸
आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्य यत् श्रद्धया स्वल्पमुपैति दानम्।
अनन्तपारं समुपैति राजन् यद्दियते तन्न लभेद् द्विजेभ्यः॥२॥
🔸शब्दार्थ :— (दयान्वितः) दयालु (च) और करुणापूर्ण मनुष्य (आर्तेषु) दूःखी तथा पीड़ित (विप्रेषु) ब्राह्मणों को (श्रद्धया) श्रद्धापूर्वक (यत्) जो (स्वल्पम्) थोड़ा सा भी (दानम्) दान (अप+एति) देता है, (राजन्) हे राजन् (द्विजेभ्य) ब्राह्मणों के लिए (यत्) जो कुछ (दीयते) दिया जाता है (तत्) वह उतना ही (न लभेत्) प्राप्त नहीं होता, अपितु वह दान उस पुरुष को परमात्मा की कृपा से (अनन्तपारम्) अनन्त होकर (समुपैति) पुनः सम्यक् प्रकार से मिल जाता है।
🔸भावार्थ :— दान की महिमा बताते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि दिया गया दान कभी व्यर्थ नहीं जाता है। अपितु जितना दान दिया जाता है, उससे दस गुणा अधिक होकर व्यक्ति को पुनः प्राप्त हो जाता है। इसलिए मनुष्य को दुःख और कष्टों से ग्रस्त ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिए। ऐसा करने से उसका दान उसके लिए धन-प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त करता है।
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