*🔥 ओ३म् 🔥*
*चाणक्यनीतिदर्पण*
*_सप्तदशोऽध्यायः, श्लोक सं.-20_*
*व्यालाश्रयाऽपि विफलापि सकण्टकाऽपि ।*
*वक्राऽपि पङ्किल-भवाऽपि दुरासदाऽपि ।*
*गन्धेन बन्धुरसि केतकि सर्वजन्तोर्*
*एको गुण: खलु निहन्ति समस्तदोषान् ।।२०।।*
*भावार्थ*―हे केतकि! यद्यपि तू साँपों का घर है, फल से रहित है, काँटों से युक्त है, टेढ़ी भी है, उत्पन्न भी कीचड़ में होती है, प्राप्त भी कठिनता से होती है―इतना सब कुछ होने पर भी तू केवल अपने गन्ध के गुण के कारण सब प्राणियों के मन को मोह रही है। इससे निश्चय होता है कि एक भी गुण सारे दोषों को दूर कर देता है।
*विमर्श*―मनुष्य को अपने जीवन में गुणों का विकास करना चाहिए। एक भी गुण मनुष्य को पूज्य बना देता है।
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*यह चाणक्यनीतिदर्पण का आर्यभाषानुवाद में सत्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ।।१७।।*
[ *अनुवादक: _स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती_* ]
*एक प्रकार का सुगन्धित पुष्प है–केतकी।*
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