Monday, August 27, 2018

नमस्ते जीहमने वायु की सिद्धि के पश्चात यह जानने का प्रयास किया कि, वायु को वायु संज्ञा से जाना जाता...

नमस्ते जी

हमने वायु की सिद्धि के पश्चात यह जानने का प्रयास किया कि, वायु को वायु संज्ञा से जाना जाता है उनमें क्या प्रमाण है, तो यंहा वेद् स्वतः प्रमाण के स्वरूप में ऋषि कणाद ने कहा कि वेद् ईश्वर की वाणी है और ईश्वर ने ही सृष्टि की उत्पत्ति काल में ही पदार्थो के नाम का तथा उनके गुण, कर्म स्वभाव का संकेत वेद रूपी ज्ञान से हम सब मनुष्यों के लिए दिया है।

जैसा कि *स दाधार पृथिवी द्यामुतेमाम्…ऋग्वेद ८। ४ । १७* परमेश्वर पृथिवी आदि सब लोगों पालन करता है इत्यादीं मंत्रों से जो भूमि आदि की पृथिवी आदि संज्ञा, *सुसमीद्धाय सोचिषेधृतं तीव्रं जूहोतन…यजुर्वेद ३। २* प्रज्वलित अग्नि में हवि प्रदान करें, इत्यादि मंत्रों से अग्निहोत्रादि इष्टकर्मो का विधान तथा *गांमाहि ँ सी: यजुर्वेद १३। ४३* गौ आदि पशुओं की हिंसा न करें इत्यादि गौ आदि पशु हिंसारूप अनिष्ट कर्मों का निषेध वेदों में किया है वह उनके ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है।

भाव यह है कि *नहिदृशस्यग् र्वेदादि लक्षण शास्त्रस्य सर्वज्ञ गुणान्वितस्य सर्वज्ञादयन्त: सम्भवोअस्ति*

अतीत, अनागत तथा वर्तमान अर्थों के प्रतिपादक ऋग्वेदादि चारों वेदों की उत्पत्ति किसी सर्वज्ञ के बिना नही होसक्ति इसलिए भूतादि अर्थों के प्रतिपादनपूर्वक संज्ञा कर्मादि का विधान वेदों के ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है।

लोक में यह देखा जाता है,कि व्यक्ति जिस पदार्थ का प्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्षसदृश निश्चयात्मक अनुभव करता है, उसीका नामकरण करता है। वायु आदि हमारे दृष्टिगोचर नही है, जिनका हम नामकरण करते। अतः वेद में हमसे विशेष अर्थात ईश्वर ने ऐसे पदार्थो का नामकरण किया है। इसी प्रकार वैदिक ग्रन्थों में साक्षात्कृतधर्मा ऋषियों ने नामकरण किया है।

*ऋग्वेद १०। ८२। ३ में …यो देवानां नामधा…* अर्थात जो समस्त ब्रह्मांड का रचयिता और सबको जाननेवाला ईश्वर दिव्यगुणों वाले वायु आदि का नाम रखनेवाला है….

मनुसमृत्ति, प्रत्येक आस्तिक दर्शनों के ऋषियों ने पूर्ण विश्वास के साथ एक स्वर में वेद को परम प्रमाण स्वीकार किया है।

सृष्टि की रचना और वेदों के प्रतिपादन में भी पुर्णतः औचित्य प्रतीत होता है।

यदि किसी मनुष्य द्वारा वेद की रचना होती तो सृष्टि में स्थित प्रकृति और वेद ज्ञान का पुर्णतः सामंज्जस्य नही होता।

क्योंकि कोई भी मनुष्य अपने जीवन में बनी बनाई विद्या में भी एक दो अधिक तो चार से पांच विषय मे ज्ञाता हो सकता है, किन्तु उन विषयों में भी पुर्णतः ज्ञाता हो उनका कोई निश्चिन्त नही होता।

हम जो भी आविष्कार को देखतें है तो उन आविष्कारों के नियत और सीमित विषय ही हुए है, किन्तु ब्रह्माण्ड में तो अनगिनत विषय है, जिसका पुर्णतः ज्ञान को जानना मनुष्य की बुद्धि से परे है।

अतः हमें यही जानना चाहिए की वेदों के द्वारा दिया गया ज्ञान परमपिता परमेश्वर ने हम मनुष्यो के कल्याण हेतु ही दिया है।

जिसका हम सब आज्ञाकारी बने।


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नमस्ते जी*द्रव्यगुणयो: सजातीयारम्भकत्वं साधर्म्यम्**द्रव्याणि द्रव्यान्तरभारभन्ते गुणाश्च...

नमस्ते जी

*द्रव्यगुणयो: सजातीयारम्भकत्वं साधर्म्यम्*

*द्रव्याणि द्रव्यान्तरभारभन्ते गुणाश्च गुणान्तरम्*

*द्रव्यणांम् द्रव्यं कार्य समान्यम्*

उपरोक्त सूत्रों से सिद्ध होता है, की ब्रह्माकुमारी वाले वाक छल का केवल प्रयोग करतें है।

सिद्धान्त के अनुरूप तो कार्य होगा ही।

अर्थात रज - वीर्य किसी भी जाति को उत्पन्न करने में समवायिकारण है, अर्थात द्रव्य से द्रव्य उत्पन्न होगा और जो द्रव्य का समवायिकारण अन्य द्रव्य के समवायिकारण के *संयोग* से अर्थात असमवायिकारण से अपने सजातीय को उतपन्न करेंगे जिस में निमित्तकारणस्त्रीलिङ्ग और पुंलिङ्ग रहेंगे।

कोई भी एक समवायिकारण द्रव्य से कार्यद्रव्य की उत्पत्ति नही होगी। अर्थात अनेक ( दो व दो से अधिक ) कारणद्रव्यों से एक कार्यद्रव्य कि उत्पत्ति होगी।

और अन्त्यावयवी कार्यद्रव्य से भी अन्य कोई कार्यद्रव्य की उत्पत्ति नही होती यह सार्वभौमिक सिद्धान्त है।

अतः किसी भी कार्यद्रव्य की उत्पत्ति में समवायिकारण के आधार पर ही होता है।


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नमस्ते जीपृथिवी,जल,अग्नि और वायु के लक्षणों को महर्षि कणाद के द्वारा संलग्न सूत्रों के माध्यम से...

नमस्ते जी

पृथिवी,जल,अग्नि और वायु के लक्षणों को महर्षि कणाद के द्वारा संलग्न सूत्रों के माध्यम से जानकर अब हम क्रमानुसार आकाश द्रव्य को जानने समझने का प्रयास करेंगे।

*निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङ्गम् ।। २० ।। ( २ - १ )*

अर्थात निष्क्रमण और प्रवेशन यह दोनों आकाशसिद्धि में लिङ्ग है।

स्पर्शवाले द्रव्यका भीतर बाहर निकलने का नाम *निष्क्रमण* तथा बाहर से भीतर जाने का नाम *प्रवेशन* है, अर्थात जो जो द्रव्य स्पर्श गुण से युक्त हो उनका निष्क्रमण तथा वहिर्गमन यह दोनों और प्रवेशन तथा अन्तर्गमन यह दोनों पर्याय्य शब्द है, जिस में हो वह आकाशसिद्धि में लिङ्ग है।

*यत्रधुमस्त्त्र वन्हि:* अर्थात जंहा धूम है वंहा अग्नि है, अर्थात जिस प्रकार अग्निसिद्धि में धूम लिङ्ग है इसीप्रकार *यत्र स्पर्शवतो द्रव्यस्यनिष्क्रमणंप्रवेशनञ्चतत्राकाश*

अर्थात जंहा स्पर्शवाले द्रव्य का निष्क्रमण तथा प्रवेशन है,वंहा आकाश है, इसी प्रकार आकाशसिद्धि में स्पर्शवाले द्रव्य का निष्क्रमण और प्रवेशन भी लिङ्ग है।

तात्पर्य यह है कि जैसे अग्नि के विना धूम नही होसक्ता वैसे ही आकाश के बिना निष्क्रमण तथा प्रवेशन नही होसक्ता वह उसकी सिद्धि में लिङ्ग होना उचित है; अतः अग्निसिद्धि में धूम की भांति निष्क्रमण तथा प्रवेशन यह दोनों भी *आकाशसिद्धि* में लिङ्ग है।


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*बेरोजगारी से आतंकवादी नहीं बनते*कोंग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जी ने हाल ही में एक विचार दिया कि...

*बेरोजगारी से आतंकवादी नहीं बनते*

कोंग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जी ने हाल ही में एक विचार दिया कि बेरोजगारी से आतंकवादी बनते हैं। यह विचार पूर्णतया गलत व निराधार है। क्योंकि आतंकवादियों का इतिहास खंगालें तो पता चलेगा कि सभी आतंकवादी पढ़े लिखे व अमीर थे –

ओसामा बिन लादेन~ सिविल इंजीनियर

अबू-बकर-अल-बगदादी~ पी.एच.डी.

अल जवाहिरी~ सर्जन

हाफिज सईद~ प्रोफेसर

मसूद अजहर~ सॉफ्टवेर इंजिनीयर

रियाज भटकल~ इंजिनियर

अफजल गुरु~ प्रोफेसर

याकूब मेमन~ चार्टर्ड अकॉउंटेन्ट

भारत मे तो करोड़ों लोग गरीब हैं पर उन्होंने कभी isis का दामन नहीं थामा।

व्यक्ति अज्ञानता, गलत शिक्षा व बुरी संगत के कारण ही अपराध की राह पकड़ता है ,गरीबी के कारण नही।

सही धर्म का सही ज्ञान होगा तो व्यक्ति आतंकवादी कभी नहीं बनेगा क्योंकि धर्म में लिखा हुआ है “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः ” अर्थात समस्त संसार के लोग सुखी रहे । सच्चा धर्म प्रेम व भाईचारे का सन्देश देता है, वैमनस्य व हिंसा का नहीं। धार्मिक व्यक्ति कभी भी आतंकवादी नहीं हो सकता और आतंकवादी कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता।

सन्दीप आर्य


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आयुर्वेद को *अथर्वेद का उपवेद* माना जाता...

आयुर्वेद को *अथर्वेद का उपवेद* माना जाता है।

https://drive.google.com/file/d/1UUFT0yHIKzCcz08EsfX4u–Hglaix4Fl/view?usp=drivesdk

सुश्रुत संहिता (Sushrut sanhita)

217 MB - आयुर्वेदिक पुस्तक


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आयुर्वेदिक ग्रन्थ _*चरक संहिता*_ 🚩🚩🚩आयुर्वेद हमारे वेदों का उपवेद है जिसे *अथर्वेद* का *उपवेद* कहा...

आयुर्वेदिक ग्रन्थ _*चरक संहिता*_ 🚩🚩🚩

आयुर्वेद हमारे वेदों का उपवेद है जिसे *अथर्वेद* का *उपवेद* कहा जाता है।

चरक संहिता - भाग -1

https://drive.google.com/file/d/1wvUURdo1ERf-BC4wtA10cR5-8O7hhWJK/view?usp=drivesdk

चरक संहिता - भाग -2

https://drive.google.com/file/d/1H205PbA4zHUj7-1xFIOOGwxgLl6hLx1n/view?usp=drivesdk

👆🏼👆🏼 लिंक पर click करके डाउनलोड करें। 🙏🏻


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Monday, August 13, 2018

Sunday, August 12, 2018

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ઓઉમ

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*वृक्षादि में जीवात्मा ??- भाग तीन*- डा मुमुक्षु आर्य १. पेड पौधों में जीवात्मा नहीं होती। इनमें...

*वृक्षादि में जीवात्मा ??- भाग तीन*

- डा मुमुक्षु आर्य


१. पेड पौधों में जीवात्मा नहीं होती। इनमें जीवन होता है। ऋषि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के १३ वे समुल्लास में ८१ वी समीक्षा में लिखा है- ‘वृक्ष जो जड पदार्थ है उसका क्या अपराध था कि उसको शाप दिया और वह सूख गया ।’ जहां स्पष्ट रुप से स्वामी दयानंद जी ने वृक्ष को एक जड पदार्थ कहा है ।स्ववमन्तव्मयाप्रकाश में भी उन्होंने कहीं नहीं लिखा कि पेड पौधों में जीवात्मा होती है ।


२. ब्राह्मण्ड में खरबों खरबों जीव जन्तु, पशु पक्षी व नर नारी हैं । प्रत्येक का शरीर खरबों खरबों कोशिकाओं का बना हुआ है । हर कोशिका को जीने के लिये खुराक व प्राण वायु आक्सीजन चाहिये । किसी कारण इसमें अवरोध उत्पन्न हो जाये तो ये कोशिकाएं मर जाती हैं । जब तक इन कोशिकाओं को रक्त के माध्यम से खुराक व आक्सीजन मिलती रहती है ये जीवन्त हैं living है। शरीर के भीतर प्रत्येक अंग प्रत्यंग व नस नाड़ी भी भिन्न भिन्न प्रकार की कोशिकाओं की बनी हुई है । इन कोशिकाओं को जिन्दा रहने के लिये आक्सीजन चाहिये खुराक चाहिये परन्तु किसी जीवात्मा की आवश्यकता नहीं । जिगर गुर्दा हृदय वा दिमाग के किसी भाग को रक्त मिलना बन्द हो जाये तो वह भाग मर जाता है । हृदयघात (heart attack ) वा लकवा हो जाने का भी यही कारण होता है ।


३.अण्डकोषों में अरबों खरबों शुक्राणु बनते रहते हैं उनके सिर धड पूंछ होती है और वह गर्भ में मादा अण्डे को मिलने के लिये एक ही दिशा में गति करते हैं। ये शुक्राणु भी जीवन्त कोशिकाओं के बने हुये होते हैं । अब कोई कहे कि इन सब कोशिकाओं में जीवन जीवात्माओं के कारण है तो यह बडा हास्यास्पद होगा । वास्तव में जहाँ जीवन है वहाँ हर जगह आत्मा का होना आवश्यक नहीं । जहाँ आत्मा है वहाँ तो जीवन है ही। इसी प्रकार पेड पौधों में व घास के तिनकों आदि में जीवन है परन्तु जीवात्मा नहीं । जैसे अन्य प्राणियों के शरीरों की कोशिकाओं को जीने के लिये खुराक व आक्सीजन चाहिये वैसे ही इन पेड पौधों को भी जीने के लिये हवा पानी रोशनी व खुराक चाहिये ।


४. यदि किसी शास्त्र का कोई श्लोक वा मंत्र का भाष्य यह कहता है कि जीव अपने दुष्कर्मों का फल भोगने के लिये पेड पौधों में जाकर गहन निद्रा में सोया रहता है तो समझ लेना वहां अर्थ करने में वा समझने में अवश्य कुछ भूल हो रही है । शास्त्रीय प्रमाणों में कहीं तो वृक्षों में केवल जीवन कहा है कहीं जीव तो कहीं विरोधाभास है। परन्तु हमारा अन्त:करण तो वृक्षों में जीवन ही मानता है जीव नहीं । इस मत को विभिन्न तर्कों से प्रमाणित भी किया है। पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय जी वेदादि शास्त्रों के अच्छे विद्वान व प्रखर बुद्धि के धनी थे । उन्होंने एक पुस्तक लिखी है- हम क्या खायें घास या मांस। इसमें इस विषय पर प्रश्नोत्तर शैली मे वहुत लम्बी चर्चा है और सिद्ध किया है कि पेड पौधों में जीवात्मा नहीं होती ।


५. पाणिनि व्याकरण अनुसार जीवात्मा में जीव शब्द है, वह जीव् प्राण धारणे धातु से बना है प्राण धारण करने से वृक्षादि में जीवात्मा है, यदि इस आधार पर वृक्षों में जीवात्मा है तो रक्त के लाल कणों (RBC) में भी जीवात्मा होनी चाहिये क्योंकि वह भी प्राणवायु आक्सीजन को धारण करते हैं ।इन लाल कणों की संख्या खरबों में है और इनकी आयु लगभग चार माह होती है।


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Saturday, August 11, 2018

हिंसा और अहिंसा क्या है ?योगदर्शन के भाष्य मे महार्स्शी वेदव्यास ने अहिंसा शब्द का अर्थ किया है...

हिंसा और अहिंसा क्या है ?

योगदर्शन के भाष्य मे महार्स्शी वेदव्यास ने अहिंसा शब्द का अर्थ किया है सर्वथा-सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोह: अहिंसा ज्ञेया | अर्थात सब प्रकार से सदा सब प्राणियों से वैर भाव का त्याग अहिंसा कहलाता है | इसलिए किसी भी प्राणी-पशु पक्षी या मनुष्य को पीड़ा देना या न देना हि हिंसा या अहिंसा नहीं होती अपितु उसके पीछे कारण और भावना हि उस कर्म को हिंसा या अहिंसा बनाते है, वैर भाव से या बिना कारण हि किसी प्राणी को कष्ट देना या जान से मार देना हिंसा है | युद्ध मे शत्रु के प्राण लेना हिंसा नहीं | जंगली दुष्ट पशु जो खेती को खराब करे या जंगली जानवर शेर, चीता आदि जो मनुष्य को हानि पहुचाये उन्हें भी मारना हिंसा नहीं | भोजन के लिए पशुओ को मारना हिंसा और पाप है |

श्री राम ने ताड़का, बाली, रावन आदि दुष्टों का संहार किया | श्री कृष्ण ने कंस, जरासंध, शिशुपाल आदि को मारा | ऐसा करके इन्होने लाखो और करोडो लोगो को उनके अत्याचार से छुटकारा दिलाया | यही सच्ची वैदिक अहिंसा है | राजा का धर्म आतातायी पापी दुराचारी को दंड दे करके सज्जनो की रक्षा करना है | इसी धर्म का श्री राम तथा श्री कृष्ण ने पालन किया था |

निसंदेह वेदों का अनर्थ करके यज्ञ के लिए मूक पशूओं का वध करना रूप क्रूर कर्म देखकर गौतम बुद्ध ने अहिंसा का सन्देश दिया था, परन्तु उनकी अहिंसा भी गलत थी | गौतम बुद्ध तथा वर्धमान महावीर का गलत अहिंसा का दुष्परिणाम यह हुआ की करोडों बहादुर नौजवान केवल अहिंसा का आश्रय लेकर बौद्ध भिक्षुक और जैन श्रावक बनकर कायर, डरपोक, और नपुंसक बन गये | दोनों महानुभावो ने युद्ध का घोर विरोध किया | उनका कहना था कि अपनी हि अंतरात्मा के साथ युद्ध करो, बाहर का युद्ध नहीं | इसी कारण से देश लंबे समय तक गुलाम रहा |

शांति के नाम पर आततायियों के पाव टेल अपने राष्ट्र को रौन्दवा देना कायरता, पाप, हिंसा, और अधर्म है | आततायी के दांत खट्टे करना हि अहिंसा तथा वेदोक्त धर्म है | हमेशा शक्ति से हि शांति खरीदी जा सकती है, अशक्त और गलत अहिंसावादी बनकर नहीं | संसार मे शक्ति कि हि पूजा होती है | महाराणा प्रताप, शिवाजी, बन्दा वैरागी, झाँसी की रानी की पूजा इसीलिए होती है की उन्होंने आततायियों का वीरता से दमन किया था | उन भिक्षुओ और श्रावको की पूजा नहीं होती | जिन्होंने अहिंसा के नाम पर विदेशियों को भरत भू को रौंदने से नहीं रोका | उन पंडो की भी नहीं होती जो हमलावर महमूद गजनवी से न स्वयं लड़े और न हि सैनिको को लड़ने दिया और मान बैठे कि सोमनाथ जी (पत्थर) स्वयं म्लेछो को मार भागएंगा |

ये है वैदिक हिंसा और अहिंसा का भेद | परन्तु आज मूर्खो ने वैदिक अहिंसा को भी हिंसा का रूप दे दिया है | जो मुर्ख हि मानते है | मूर्खो ने कहा और मूर्खो ने सुना |


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Wednesday, August 8, 2018

*ओ३म्**स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(१०)**ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।**ततो रात्र्यजायत ततः...

*ओ३म्*


*स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(१०)*




*ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।*

*ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥*

*समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत ।*

*अहो रात्राणि विदधद् विश्वस्य मिषतो वशी॥*

*सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ।*

*दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥*

-ऋ० अ० ८। अ० ८। व० ४८ । मं० १-३



*भाषार्थ-* … *(ऋतं च सत्यमित्यादि)* ।इनका अर्थ यह है कि- *(धाता)* सब जगत् का धारण और पोषण करने वाला और *(वशी)* सबको

वश करने वाला परमेश्वर, *(यथापूर्वं)* जैसा कि इसके सर्वज्ञ विज्ञान में जगत को रचने का ज्ञान था, और जिस प्रकार पूर्वकल्प की सृष्टि में जगत् की रचना थी, और जैसे जीवों के पुण्य-पाप थे, उनके अनुसार ईश्वर ने मनुष्य प्राणियों के देह बनाये हैं। *(सूर्याचन्द्रमसौ)* जैसे पूर्व कल्प में सूर्य-चन्द्र लोक रचे थे, वैसे ही इस कल्प में भी रचे हैं *(दिवम्)* जैसा पूर्व सृष्टि में सूर्यादि लोकों का प्रकाश रचा था, वैसा ही इस कल्प में भी रचा है तथा *(पृथिवीम्)* जैसी [भूमि जो] प्रत्यक्ष दीखती है, *(अन्तरिक्षम्)* जैसा पृथिवी और सूर्यलोक के बीच में पोलापन है, *(स्व:)* जितने आकाश के बीच में लोक हैं, उनको *(अकल्पयत्)* ईश्वर ने रचा है। जैसे अनादिकाल से लोक-लोकान्तर को जगदीश्वर बनाया करता है, वैसे ही अब भी बनाये हैं, और आगे भी बनावेगा, क्योंकि ईश्वर का ज्ञान विपरीत कभी नहीं होता, किन्तु पूर्ण और अनन्त होने से सर्वदा एकरस ही रहता है, उसमें वृद्धि, क्षय और उलटापन कभी नहीं होता। इसी

कारण से *‘यथापूर्वमकल्पयत्’* इस पद का ग्रहण किया है।


*(विश्वस्य मिषतः)* उसी ईश्वर ने सहजस्वभाव से जगत के रात्रि, दिवस, घटिका, पल और क्षण आदि को जैसे पूर्व थे वैसे ही *(विदधत्)* रचे हैं। इसमें कोई ऐसी शंका करे कि ईश्वर ने किस वस्तु से जगत् को रचा है? उसका उत्तर यह है कि *(अभीद्धात् तपसः)* ईश्वर ने अपने अनन्त सामर्थ्य से सब जगत् को रचा है, क्योंकि ईश्वर के प्रकाश से जगत् का कारण प्रकाशित और सब जगत् के बनाने की सामग्री ईश्वर के अधीन है। *(ऋतम्)* उसी अनन्त ज्ञानमय सामर्थ्य से सब विद्या के खजाने वेदशास्त्र को प्रकाशित किया, जैसाकि पूर्वसृष्टि में प्रकाशित था और आगे के कल्पों में भी इसी प्रकार से वेदों का प्रकाश करेगा। *(सत्यम्)* जो त्रिगुणात्मक, अर्थात् सत्त्व, रज और तमोगुण से युक्त है, जिसके नाम अव्यक्त, अव्याकृत, सत्, प्रधान [और] प्रकृति हैं, जो स्थूल और सूक्ष्म जगत् का कारण है, सो भी *(अध्यजायत)* कार्यरूप होके पूर्वकल्प के समान उत्पन्न हुआ है। *(ततो रात्र्यजायत)* उसी ईश्वर के सामर्थ्य से जो प्रलय के पीछे हजार चतुर्युगी के प्रमाण से रात्रि कहाती है, सो भी पूर्व प्रलय के तुल्य ही होती है। इसमें ऋग्वेद का प्रमाण है कि 'जब-जब विद्यमान सृष्टि होती है उसके पूर्व सब आकाश अन्धकाररूप रहता है, और उसी अन्धकार में सब जगत् के पदार्थ और सब जीव ढके हुए रहते हैं, उसी का नाम महारात्रि है।’ *(ततः समुद्रो अर्णवः)* तदनन्तर उसी सामर्थ्य से पृथिवी और मेघमण्डल में जो महासमुद्र है, सो पूर्व सृष्टि के सदृश ही उत्पन्न हुआ है।


*(समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत)* उसी समुद्र की उत्पत्ति के पश्चात् संवत्सर अर्थात् क्षण, मुहूर्त्त, प्रहर आदि काल भी पूर्वसृष्टि के समान उत्पन्न हुआ है। वेद से लेके पृथिवीपर्यन्त जो यह जगत् है, सो सब ईश्वर के नित्य सामर्थ्य से ही प्रकाशित हुआ है और ईश्वर सबको उत्पन्न करके, सबमें व्यापक होके अन्तर्यामिरूप से सबके पाप-पुण्यों को देखता हुआ, पक्षपात छोड़के सत्य न्याय से सबको यथावत् फल दे रहा है ।। १-३।।


ऐसा निश्चित जानके ईश्वर से भय करके सब मनुष्यों को उचित है कि मन, कर्म और वचन से पापकर्मों को कभी न करें। इसी का नाम *अघमर्षण* है, अर्थात् ईश्वर सबके अन्त:करण के कर्मों को देख रहा है, इससे पाप-कर्मों का आचरण मनुष्य लोग सर्वथा छोड़ देवें।


*ध्यातव्य-*

*सृस्ट्युत्पत्ति विषयक ऋग्वेद के उपर्युक्त तीनों मंत्रो को महर्षि दयानंदसरस्वती जी ने वैदिक संन्ध्या मे “अघमर्षणमन्त्र” शीर्षक के अन्तर्गत विनियुक्त किया है और सन्ध्या के सभी मंत्रों की विस्तृत व्याख्या उन्होंने अपने लघुग्रन्थ “पञ्चमहायज्ञविधि” मे की है, वहीं से हमने भाषार्थ (हिन्दी अर्थ) मात्र को आपके स्वाध्याय हेतु यहाँ पर (सम्पादित करके) दिया है, लेख अधिक लम्बा न हो अतः हमने संस्कृतभाष्य को छोड़ दिया है, जिन स्वाध्यायप्रेमी जिज्ञासुजनों को विशेष जानना हो वे वहीं देख लें क्यों कि संस्कृतभाष्य मे मंत्रों के शब्दार्थों, प्रमाणों वा वैदिक सिद्धान्तों की अपेक्षाकृत अधिक सामग्री प्राप्त हो सकती है ।*



*प्रस्तुति-*

*आचार्य राजीव*


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Sunday, August 5, 2018

◆ *सम्राट अशोक के जीवन-चरित और अशोककालीन भारतीय इतिहास…*______________________________●...

◆ *सम्राट अशोक के जीवन-चरित और अशोककालीन भारतीय इतिहास…*

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● *सम्राट अशोक* (लाला लाजपतराय)


https://drive.google.com/file/d/1hI47L9ExtIpthGFr-E1oHl8JzmLYt1zO/view?usp=drivesdk

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● *अशोक* (हरिश्चन्द्र शेठ)


https://drive.google.com/file/d/114HUtkZbOI2ipKvzW3Zwn7-gZ9GdsREf/view?usp=drivesdk

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● *अशोक* (भगवतीप्रसाद पंथारी)


https://drive.google.com/file/d/12O-2cVoL2mIqQzturj0dJaAThIVBCGSG/view?usp=drivesdk

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● *अशोक* (यदुनन्दन कपूर)


https://drive.google.com/file/d/1FLfDCVrcjhOzIQyZCVXCRZphlwE26UrA/view?usp=drivesdk

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● *Ashok* (Prof. D.R. Bhandarkar)


https://drive.google.com/file/d/1t-SDEPdz5uYNt7t5mwY-27_Ji3snaC_h/view?usp=drivesdk

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● *Ashok* (Radhakumud Mukherji)


https://drive.google.com/file/d/1ga-5hC1ZcnPSelrOojQJ98o_zr5H9zFH/view?usp=drivesdk

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● *Ashok* (Vincent A. Smith)


https://drive.google.com/file/d/1xoj7ON_xxJ8JZiU5CSem0R9CG-eqU_3y/view?usp=drivesdk

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● *मौर्य साम्राज्य का इतिहास* (सत्यकेतु विद्यालंकार)


https://drive.google.com/file/d/1R9W-y5P5nQkjNf8QEaElM3MKXfr_xZuT/view?usp=drivesdk


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🔥ઓ३મ🔥#વિષ્ણુ_નામ📕પૂર્વ કાલ માં #સૂર્ય નું નામ જ #વિષ્ણુ હતું. આ બાબતમાં સર્વ પ્રથમ #વિષ્ણુપુરાણ નું...

🔥ઓ३મ🔥


#વિષ્ણુ_નામ

📕પૂર્વ કાલ માં #સૂર્ય નું નામ જ #વિષ્ણુ હતું. આ બાબતમાં સર્વ પ્રથમ #વિષ્ણુપુરાણ નું પ્રમાણ ➖

⚛️तत्र विष्णुश्च शक्रश्च जज्ञाते पुनरेव च।

अर्यमा चैव धाता च त्वष्टा पूषा तथैव च।(131)

⚛️विवस्वान् सविता चैव मित्रो वरूण एव च।

अंशो भगश्चादितिजा आदित्या द्वादश स्मृताः। (132)

📕વિષ્ણુ, શક્ર, અર્યમા, ધાતા, ત્વષ્ટા, પૂષા, વિવસ્વાન, સવિતા, મિત્ર, વરુણ, અંશ અને ભગ, આ બાર નામ સૂર્ય ના છે.


હવે #મહાભારત નું પ્રમાણ ➖

⚛️धाताऽ र्यमा च मित्रश्च वरुर्णोंऽ शो भगस्तथा।

इन्द्रो विविस्वान् पुषा च त्वष्टा च सविता तथा।

पर्जन्यश्चैव विष्णुश्च आदित्या द्वादश स्मृताः।

📓 મહા. આદિપર્વ અધ્યાય 122/65-66

📕ઉપરોક્ત બન્ને પ્રમાણો થી સિધ્ધ થાય છે, કે પૂર્વ કાલ માં સૂર્ય નું નામ જ વિષ્ણુ હતું. અનેક નામોમાં અંતરિક્ષ નું પણ એક નામ #વિષ્ણુપદ છે.

⚛️वियद् विष्णुपदं वापि पुंस्याकाशविहायसी।।

📓અમરકોંશ, પ્રથમ કાંડ, વ્યોમ વર્ગ 2

જે હેતુ થી આકાશ મા સૂર્યનું સ્થાન છે, અતઃ વિષ્ણુ પદ પણ આકાશ નું જ નામ છે.

त्वष्टा ।सविता। भगः। सुर्यः। पूषा। विष्णुः। वैश्वानरः। वरुणः।

📓નિઘંટુ, અધ્યાય 5,ખંડ 6

ઉપરના શબ્દો ના ભાષ્યકાર મહર્ષિ યાસ્કાચાર્ય પણ સૂર્ય નો અર્થ વિષ્ણુ કર્યો છે વેદો માં તો અનેકો પ્રમાણ મોજુદ છે, જેના વડે સૂર્ય શબ્દ નો અર્થ યથાર્થ માં વિષ્ણુ થાય છે.

⚛️इरावती धेनुमती हि भूतं सूर्यवसिनी मनुष्ये दशस्या।

व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः।

📓ઋગ્વેદ 7/99/3

🔥હે સૂર્ય! આ દ્યુલોક અને ભૂલોકને આપે ધારણ કરી રાખ્યું છે. આપના અનંત કિરણોથી અર્થાત આકર્ષણશક્તિ થી પૃથ્વિને ચારે તરફથી ધારણ કરી રહ્યા છો. 🔥

આ મંત્ર માં મયૂખ શબ્દ કિરણ વાચક છે. અહીં પણ વિષ્ણુ શબ્દ નો અર્થ સૂર્ય થાય છે.

આજ હેતુ ને લક્ષ્ય માં રાખિને કલ્પના કરવાવાળા ઓએ સૂર્ય નામથી જ પોતાના એક દેવ ને કલ્પિત કર્યો જેથી એ દેવતા નું નિરુપણ કરવામાં વેદોમાંથી પુષ્કળ સાધન સામગ્રી મળે.

#ત્રિદેવ_નિર્ણય


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*।। ओ३म् ।।**स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात् (६)**भग प्रणेतुर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः।**भग...

*।। ओ३म् ।।*

*स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात् (६)*




*भग प्रणेतुर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः।*

*भग प्र नो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्निवन्तः स्याम।।*

-यजु:०३४। ३६



*व्याख्यान-* हे भगवन्! परमैश्वर्यवन्! *“भग”* ऐश्वर्य के दाता संसार वा परमार्थ में आप ही हो तथा *“भग प्रणेतः”* आपके ही स्वाधीन सकल ऐश्वर्य है, अन्य किसी के अधीन नहीं, आप जिसको चाहो उसको ऐश्वर्य देओ सो आप कृपा से हम लोगों का दारिद्र्य छेदन करके हमको परमैश्वर्यवाला करें, क्योंकि ऐश्वर्य के प्रेरक आप ही हो । हे *“सत्यराधः”* भगवन् सत्यैश्वर्य की सिद्धि करनेवाले आप ही हो, सो आप *“इमाम् भगम् नः ददत्”* नित्य ऐश्वर्य हमको दीजिए- *जो मोक्ष कहाता है* उस सत्य

ऐश्वर्य का दाता आपसे भिन्न कोई भी नहीं है। हे सत्यभग! पूर्ण ऐश्वर्य, सर्वोत्तम बुद्धि हमको आप दीजिए, जिससे हम लोग आपके गुणों का ग्रहण, आपकी आज्ञा का अनुष्ठान और ज्ञान-इनको यथावत् प्राप्त हों। हमको सत्यबुद्धि, सत्यकर्म और सत्यगुणों को *“उदव”* (उद्गमय प्रापय) प्राप्त कर, जिससे हम लोग सूक्ष्म से भी सूक्ष्म पदार्थों को यथावत् जानें *“भग प्र नो जनय”* हे सर्वैश्वर्योत्पादक! हमारे लिए ऐश्वर्य को अच्छे प्रकार से उत्पन्न कर। *“गोभिः अश्वैः”* सर्वोत्तम गाय, घोड़े और मनुष्य-इनसे सहित अनुत्तम ( जिससे उत्तम और कुछ नहीं,सर्वोत्तम) ऐश्वर्य हमको सदा के लिए दीजिए। हे सर्वशक्तिमन् ! आपके कृपाकटाक्ष से हम लोग सब दिन *“नृभिः नृवन्तः प्र स्याम”* उत्तम-उत्तम पुरुष, स्त्री, सन्तान और भृत्यवाले हों। आपसे हमारी अधिक (विशेष) यही प्रार्थना है कि कोई मनुष्य हममें दुष्ट और मूर्ख न रहे तथा न उत्पन्न हो, जिससे हम लोगों की सर्वत्र सत्कीर्ति हो और निन्दा कभी न हो।


*ध्यातव्य-* मन्त्रार्थ को अधिक स्पष्ट करने के लिए कोष्ठक मे जो शब्द दिए गए हैं वे महर्षि दयानंद जी के नहीं हैं ।


(श्रावण सप्तमी कृ. २०७५)



महर्षि दयानंद सरस्वतीकृत

*आर्याभिविनय* से


*राजीव*


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*ओ३म्**स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(५)**वि जानीह्यार्यान् ये च दस्यवो**बर्हिष्मते रन्धया...

*ओ३म्*

*स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(५)*






*वि जानीह्यार्यान् ये च दस्यवो*

*बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान् ।*

*शाकी भव यजमानस्य चोदिता*

*विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन ॥*

-ऋ० १।४।१०।८



*व्याख्यान-* सबको यथायोग्य जाननेवाले हे ईश्वर आप *“आर्यान्”* विद्या, धर्मादि उत्कृष्ट स्वभावाचरणयुक्त आर्यों को जानो, *“ये च दस्यवः”* और जो नास्तिक, डाकू, चोर, विश्वासघाती, मूर्ख, विषयलम्पट, हिंसादिदोषयुक्त, उत्तम कर्म में विघ्न करनेवाले स्वार्थी, स्वार्थसाधन में तत्पर, वेदविद्याविरोधी, अनार्य (अनाडी) मनुष्य *“बर्हिष्मते”* सर्वोपकारक यज्ञ का विध्वंस करनेवाले हैं , इन सब दुष्टों को आप *“रन्धय”* (समूलान् विनाशय) मूलसहित नष्ट कर दीजिए और *“शासदव्रतान्”* ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ

संन्यासादि धर्मानुष्ठानव्रतरहित, वेदमार्गोच्छेदक अनाचारियों का यथायोग्य शासन करो (शीघ्र उनपर दण्ड निपातन करो), जिससे वे भी शिक्षायुक्त होके शिष्ट हों अथवा उनका प्राणान्त हो जाए, किंवा हमारे वश में ही रहें, *“शाकी”* तथा जीव को परम शक्तियुक्त शक्ति देने और *“यजमानस्य चोदिता”* यजमान को उत्तम कामों में प्रेरणा करने वाले हो, आप हमें दुष्ट कामों से निरोधक हो। मैं भी *“सधमादेषु”* उत्कृष्ट स्थानों में निवास करता हुआ *“विश्वेत्ता ते”* तुम्हारी आज्ञा अनुकूल सब उत्तम कर्मों की *“चाकन”* कामना करता हूं, सो आप पूरी करें ।



महर्षि दयानंद सरस्वतीकृत-

*आर्याभिविनय* से



*विशेष-* मंत्र से विदित होता है कि मानवीसृष्टि के आदि में आर्य और दस्यु भेद से दो प्रकार के लोग ही थे, जो वेदानुसार अपने गुण कर्म स्वभाव के कारण इन दो नामों से जाने जाते थे, तथा महाभारतकाल अर्थात आज से लगभग६००० वर्ष पूर्व तक इससे भिन्न किसी प्रकार का कोई अन्य मत पंथ सम्प्रदायादि था ही नहीं जैसे कि आज संसार भर मे हो गए हैं । साथ ही यह भी विचारणीय है कि वे सज्जन जो आज भी वेदों में प्रगाढ़श्रद्धा रखते हुए स्वयं को ‘सनातन हिन्दू धर्मी’ कहते हैं उन्हें भी स्वयं को *सनातन वैदिक धर्मी* कहना योग्य है क्योंकि हिन्दू शब्द ही अति अर्वाचीन प्रयोग है जो सनातन कदापि नही वरन् मुस्लिमों के आक्रमण के बाद प्रचलित हुआ, अस्तु….। इसी लिए महर्षि दयानंद जी ने वैदिक मत के पुनरुत्थान हेतु अपने प्रयास के विषय में *स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश* के आरम्भ में ही स्पष्ट किया कि-


*‘सर्वतन्त्र सिद्धांत’ अर्थात् साम्राज्य सार्वजनिक धर्म जिसको सदा से सब मानते आये, मानते हैं और मानेंगे भी, इसलिए उसको सनातन नित्यधर्म कहते हैं कि जिसका विरोधी कोई भी न हो सके। यदि अविद्यायुक्त जन अथवा किसी मत वाले के भ्रमाये हुए जन जिसको अन्यथा जाने वा माने उसका स्वीकार कोई भी बुद्धिमान् नहीं करते, किन्तु जिसको आप्त अर्थात सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी, परोपकारक, पक्षपातरहित विद्वान् मानते हैं वही सब को मन्तव्य और जिसको नहीं मानते वह अमन्तव्य होने से प्रमाण के योग्य नहीं होता। अब जो वेदादि सत्यशास्त्र और ब्रह्मा से लेकर जैमिनीमुनि पर्यन्तों के माने हुए ईश्वरादि पदार्थ हैं जिनको कि मैं भी मानता हूँ; सब सज्जन महाशयों के सामने प्रकाशित करता हूँ।*




*आचार्य राजीव*


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*।। ओ३म् ।।**स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(४)**अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत ।**स देवाँ एह...

*।। ओ३म् ।।*

*स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(४)*



*अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत ।*

*स देवाँ एह वक्षति ॥*

ऋ० १।१।१।२



*व्याख्यान–* *“अग्निः”* हे सब मनुष्यों के स्तुति करने योग्य ईश्वराग्ने ! *‘‘पूर्वेभिः’’* विद्या पढ़े हुए प्राचीन *“ऋषिभिः”* मन्त्रार्थ देखने वाले विद्वान् और *“नूतनैः”* वेदार्थ पढ़ने वाले नवीन ब्रह्मचारियों से *“ईड्यः”* स्तुति के योग्य *“उत”* और जो हम लोग मनुष्य, विद्वान व मूर्ख हैं, उनसे भी अवश्य आप ही स्तुति के योग्य हो, सो स्तुति को प्राप्त हुए *‘‘सः’’* आप हमारे और सब संसार के सुख के लिए *‘‘देवान्’’* दिव्य गुण, अर्थात् विद्यादि को कृपा से *‘‘एह वक्षति"* प्राप्त करो (कराओ), आप ही सबके इष्टदेव हो ।




महर्षि दयानंद सरस्वतीकृत-

आर्याभिविनय से,

प्रस्तुति- *राजीव*



😊


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*स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात् (२)**अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः। देवो देवेभिरा गमत्...

*स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात् (२)*


*अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः। देवो देवेभिरा गमत् ॥*

-ऋ० १ । १ । १।५




*व्याख्यान-* हे सर्वदृक् ! सबको देखने वाले *‘‘होताकवि’’* सब शुभ गुणों और चक्रवर्ती राज्यादि को देने वाले और सर्वज्ञ *“क्रतुः”* सब जगत के जनक *“सत्यः”* अविनाशी, अर्थात् जिसका नाश कभी नहीं होता, *“चित्र श्रवस्तमः”* आश्चर्यश्रवणादि, आश्चर्यगुण, आश्चर्यशक्ति , आश्चर्यरूपवान् और अत्यन्त उत्तम आप हो, जिन आपके तुल्य वा आपसे बड़ा कोई नहीं है। *‘‘देवः"* हे जगदीश ! *“देवेभिः’’* दिव्य गुणों के सह वर्तमान *‘‘आगमत्’’* हमारे हृदय में आप प्रकट हों, सब जगत में भी प्रकाशित हों, जिससे हम और हमारा राज्य दिव्य गुणयुक्त हो । वह राज्य आपका ही है, हम तो केवल आपके पुत्र तथा भृत्यवत् हैं ।




महर्षि दयानंद सरस्वती, आर्याभिविनय से

प्रस्तुति- *राजीव*


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*।।ओ३म्।।**स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(७)*श्रावणमास अष्टमी कृ.प. २०७५ वि.सं.*यो विश्वस्य जगतः...

*।।ओ३म्।।*

*स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(७)*


श्रावणमास अष्टमी कृ.प. २०७५ वि.सं.



*यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्यो ब्रह्मणे प्रथमो गा अविन्दत् ।*

*इन्द्रो यो दस्यूँरधराँ अवातिरन्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे॥*

ऋ० १।७।१२।५



*व्याख्यान-* हे मनुष्यो! *“यः”* जो सब *“विश्वस्य जगतः”* जगत् (स्थावर), जड़, अप्राणी का और *“प्राणत:”* चेतनावाले जगत् का *“पतिः”* अधिष्ठाता और पालक है तथा *“प्रथमः”* जो सब जगत् के प्रथम सदा से है और *“ब्रह्मणे, गाः, अविन्दत्”* जिसने यही नियम किया है कि ब्रह्म, अर्थात् विद्वान् के लिए पृथिवी का लाभ और उसका राज्य है और जो *“इन्द्रः”* परमैश्वर्यवान् परमात्मा *“दस्यून्”* डाकुओं को *“अधरान् ”* नीचे गिराता है तथा उनको *“अवातिरत्”* मार ही डालता है। *“मरुत्वन्तं,सख्याय, हवामहे”* आओ मित्रों ! भाई लोगों ! अपन सब सम्प्रीति से मिलके मरुत्वान्, अर्थात् परमानन्त बलवाले इन्द्र-परमात्मा को सखा होने के लिए प्रार्थना से अत्यन्त गद्गद होके बुलावें। वह शीघ्र ही कृपा करके अपन से सखित्व (परम मित्रता) करेगा,

इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ।




महर्षि दयानंद सरस्वतीविरचित-

*आर्याभिविनय* से

प्रस्तुति- *राजीव*


💐💐💐💐💐


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*।। ओ३म् ।।**स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(३)**अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ।**होतारं...

*।। ओ३म् ।।*

*स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्-(३)*




*अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ।*

*होतारं रत्नधातमम्॥*

-ऋ० १ । १।१।



*व्याख्यान-* हे वन्द्येश्वराग्ने ! आप ज्ञानस्वरूप हो, आपकी मैं स्तुति करता हूँ ।

सब मनुष्यों के प्रति परमात्मा का यह उपदेश है- हे मनष्यो ! तुम लोग इस प्रकार से मेरी स्तुति-प्रार्थना और उपासनादि करो । जैसे पिता वा गुरु अपने पुत्र वा शिष्य को शिक्षा करता है कि तुम पिता वा गुरु के विषय में इस प्रकार से स्तुति आदि का वर्तमान करना, वैसे सबके पिता और परम गुरु ईश्वर ने हमको अपनी कृपा से सब व्यवहार और विद्यादि पदार्थों का उपदेश किया है, जिससे हमको व्यवहार-ज्ञान और परमार्थ-ज्ञान होने से अत्यन्त सुख हो। जैसे सबका आदि कारण ईश्वर है, वैसे परमविद्या वेद का भी आदिकारण ईश्वर है ।


हे सर्वहितोपकारक! आप *‘‘पुरोहितम्"* सब जगत् के हितसाधक हो । हे यज्ञदेव! *“यज्ञस्य देवम्”* सब मनुष्यों के पूज्यतम और ज्ञान-यज्ञादि के लिए कमनीयतम हो । *“ऋत्विजम”*

सब ऋतु–वसन्त आदि के रचक, अर्थात् जिस समय जैसा सुख चाहिए, उस सुख के सम्पादक आप ही हो। *“होतारम्”* सब जगत् को समस्त योग और क्षेम के देनेवाले हो और प्रलय समय में कारण में सब जगत् का होम करनेवाले हो। *“रत्नधातमम्”* रत्न अर्थात् रमणीय पृथिव्यादिकों के धारण, रचन करनेवाले तथा अपने सेवकों के लिए रत्नों के धारण करनेवाले एक आप ही हो। हे सर्वशक्तिमन्! परमात्मन्! इसलिए मैं बारम्बार आपकी स्तुति करता हूँ, इसको आप स्वीकार कीजिए, जिससे हम लोग

आपके कृपापात्र होके सदैव आनन्द में रहें ।



महर्षि दयानंद सरस्वतीकृत-

आर्याभिविनय से

प्रस्तुति- *राजीव*


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*स्वाध्याये नित्य युक्तः स्यात्**ओ३म्**शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा।**शं न इन्द्रो...

*स्वाध्याये नित्य युक्तः स्यात्*



*ओ३म्*

*शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा।*

*शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः ॥*

–ऋ० अ० १। अ० ६ । व० १८ । मं० ९॥


*व्याख्यान-*

हे सच्चिदानन्दान्तस्वरूप! हे नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव! हे अद्वितीयानुपमजगदादिकारण ! हे अज, निराकार, सर्वशक्तिमन्, न्यायकारिन्! हे जगदीश, सर्वजगदुत्पादकाधार! हे

सनातन, सर्वमङ्गलमय, सर्वस्वामिन् ! हे करुणाकरास्मत्पितः,

परमसहायक! हे सर्वानन्दप्रद, सकलदुःखविनाशक! हे अविद्या

अन्धकारनिर्मूलक, विद्यार्कप्रकाशक! हे परमैश्वर्यदायक, साम्राज्यप्रसारक! हे अधमोद्धारक, पतितपावन, मान्यप्रद! हे विश्वविनोदक,विनयविधिप्रद ! हे विश्वासविलासक! हे निरञ्जन, नायक, शर्मद, नरेश, निर्विकार ! हे सर्वान्तर्यामिन्, सदुपदेशक, मोक्षप्रद ! हे सत्यगुणाकर, निर्मल, निरीह, निरामय, निरुपद्रव, दीनदयाकर,परमसुखदायक! हे दारिद्र्यविनाशक, निर्वैरिविधायक, सुनीतिवर्धक! हे प्रीतिसाधक, राज्यविधायक, शत्रुविनाशक! हे सर्वबलदायक,निर्बलपालक! हे धर्मसुप्रापक! हे अर्थसुसाधक, सुकामवर्द्धक, ज्ञानप्रद!

हे सन्ततिपालक, धर्मसुशिक्षक, रोगविनाशक! हे पुरुषार्थप्रापक, दुर्गुणनाशक, सिद्धिप्रद ! हे सज्जनसुखद, दुष्टसुताड़न, गर्वकुक्रोधकुलोभविदारक! हे परमेश, परेश, परमात्मन्, परब्रह्मन् ! हे जगदानन्दक, परमेश्वर, व्यापक, सूक्ष्माच्छेद्य ! हे अजरामृताभयनिर्बन्धानादे! हे अप्रतिमप्रभाव, निर्गुणातुल, विश्वाद्य, विश्ववन्द्य,विद्वद्विलासक, इत्याद्यनन्तविशेषणवाच्य! हे मङ्गलप्रदेश्वर! *“शं नो मित्रः"* आप सर्वथा सबके निश्चित मित्र हो, हमको सर्वदा सत्यसुखदायक हो। हे सर्वोत्कृष्ट, स्वीकरणीय, वरेश्वर! *“शं वरुणः”* आप वरुण, अर्थात् सबसे परमोत्तम हो, सो आप हमको परमसुखदायक हो। *“शन्नो भवत्वर्यमा”* हे पक्षपातरहित, धर्मन्यायकारिन् ! आप अर्यमा (यमराज) हो, इससे हमारे लिए न्याययुक्त सुख देने वाले आप ही हो।*‘‘शन्नः इन्द्रः’’* हे परमैश्वर्यवन्, इन्द्रेश्वर! आप हमको परमैश्वर्य युक्त स्थिर सुख शीघ्र दीजिए । हे महाविद्यवाचोऽधिपते ! *“बृहस्पतिः"* बृहस्पते, परमात्मन्! हम लोगों को (बृहत्) सबसे बड़े सुख को देनेवाले आप ही हो। *“शन्नो विष्णुः उरुक्रमः”* हे सर्वव्यापक, अनन्तपराक्रमेश्वर, विष्णो ! आप हमको अनन्त सुख देओ, जो कुछ माँगेंगे तो आपसे ही हम लोग माँगेंगे, सब सुखों को देने वाला आपके बिना कोई नहीं है। हम लोगों को सर्वथा आपका ही आश्रय है, अन्य किसीका नहीं, क्योंकि सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयामय सबसे बड़े पिता को छोड़ के नीच का आश्रय हम लोग कभी न करेंगे। आपका तो स्वभाव ही है कि अङ्गीकृत को कभी नहीं छोड़ते सो आप हमको सदैव सुख देंगे, यह हम लोगों को दृढ़ निश्चय है ।



*विशेष-* व्याख्याकार ने उपर्युक्त व्याख्या मे ईश्वर के लिए अस्सी से अधिक सम्बोधन का प्रयोग किया है जिस पर विचार करने से स्वाध्यायकर्ता के हृदय मे ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव का प्रकाश होता है ।


महर्षि दयानंद सरस्वतीकृत आर्याभिविनय से

प्रस्तुति- *आचार्य राजीव*


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Tuesday, July 24, 2018

🔥ઓ३મ🔥💥અથ વૈદિક સંધ્યા #બ્રહ્મ_યજ્ઞ💥 🌼ગાયત્રી મંત્ર 🌼☀️ઓ३મ્ ભૂર્ભુવઃ...

🔥ઓ३મ🔥


💥અથ વૈદિક સંધ્યા #બ્રહ્મ_યજ્ઞ💥

🌼ગાયત્રી મંત્ર 🌼


☀️ઓ३મ્ ભૂર્ભુવઃ સ્વઃ।તત્સવિતુર્વરેણ્યં ભર્ગોદેવસ્ય ધીમહિ ।ધિયો યો નઃ પ્રચોદયાત્ ।।☀️(યજુ०અ-36-મં/3)

☸️જે પરબ્રહ્મ પરમાત્મા નું સર્વોત્તમ નામ ઓ३મ્ છે જે જગતના પ્રાણદાતા દુઃખહર્તા, સુખદાતા અને સત્ ચિત્ આનંદસ્વરૂપ છે. જે સકળ જગતના ઉત્પાદક, પાપનાશક, વિજ્ઞાન સ્વરૂપ છે. અને અતિ ઉત્તમ પૂજવા યોગ્ય છે. તે પ્રકાશમાન પરમાત્માનું ગ્રહણ કરવા યોગ્ય નામ અને તેજ નું અમે ધ્યાન કરીએ છીએ. તે પરમેશ્વર અમારી બુદ્ધિ ને દુરાચાર - ખરાબ કામોથી અલગ કરી સદાચાર - સારા કામોમાં પ્રેરિત કરે. ☸️


☀️આચમન મંત્ર☀️

(હવે, જમણા હાથમાં જળ લઈ નિમ્ન મંત્ર બોલી ત્રણ વખત આચમન કરવું)


🔥ઓ३મ્ શન્નો દેવીરભિષ્ટય આપો ભવન્તુ પીતયે ।

શંયોરભિસ્ત્રવન્તુ નઃ।।(યજુ०અ-36-મં-12)

💥હે સર્વવ્યાપક, કલ્યાણકારી, આનંદ સ્વરૂપ, શુભકામનાઓને પૂર્ણ કરનાર, પરમાત્મા આપ કૃપા કરી અમારા બધાજ દુઃખો દૂર કરો તથા અમને મનોવાંછિત સુખ તથા પૂર્ણ આનંદ ની પ્રાપ્તિ કરાવો. હે પરમાત્મા અમને સદા સર્વદા શાંતિ આપો. 💥


☘️ઇન્દ્રિય સ્પર્શ મંત્ર ☘️


(ડાબા હાથ માં પાણી લઈ જમણા હાથની વચ્ચેની બે આંગળીઓ તેમાં બોળી લખેલા મંત્ર બોલી શરીર ના તે તે ભાગોનો નીચે મુજબ સ્પર્શ કરવો.

⚛️ ઓં વાક્ વાક્ ।⚛️

(નાક ની બન્ને બાજુએ સ્પર્શ કરવો)

હે પરમાત્મા અમારી વાણી યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં પ્રાણઃ પ્રાણઃ ।⚛️

(નાક ની બન્ને બાજુ એ)

હે પરમાત્મા અમારો પ્રાણ યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં ચક્ષુઃ ચક્ષુઃ।⚛️

(બન્ને આંખો ને સ્પર્શ કરો)

હે પરમાત્મા અમારી બન્ને આંખો યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં શ્રોત્રં શ્રોત્રમ્।⚛️

(બન્ને કાનો ને સ્પર્શ કરો)

હે પરમાત્મા અમારા બન્ને કાન યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં નાભિઃ। ⚛️

(નાભિ ને સ્પર્શ કરો.)

હે પરમાત્મા અમારી નાભિ યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં હ્રદયમ્। ⚛️

(હ્રદય ઉપર સ્પર્શ કરો)

હે પરમાત્મા અમારુ હ્રદય યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં કંઠઃ। ⚛️

(કંઠ ઉપર સ્પર્શ કરવો.)

હે પરમાત્મા અમારો કંઠ મધુર અને બળવાન બને.

⚛️ઓં શિરઃ। ⚛️

(માથા ઉપર સ્પર્શ કરવો.)

હે પરમાત્મા અમારૂ શિર બળવાન બને.

⚛️ઓં બાહુભ્યાં યશોબલમ્ ।⚛️

(બન્ને ભુજાઓને સ્પર્શ કરો.)

હે પરમાત્મા અમારી બન્ને ભુજાઓ યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં કરતલકરપૃષ્ઠે। ⚛️

(બન્ને હથેળી ઓ ઉપર)

હે પરમાત્મા અમારી બન્ને હથેળીઓ યશ અને બળવાન બને.


#ભાવાર્થ - હે અન્તર્યામિન્ પ્રભો ! આપની કૃપાથી અમે સ્વસ્થ સંપન્ન અને યશસ્વી વાણી, પ્રાણ, નેત્ર, કાન, નાભિ, હ્રદય, કંઠ, શિર, ભુજા, હથેળી કરપૃષ્ઠવાળા


☸️માર્જન મંત્ર ☸️

(ફરી ડાબા હાથ માં જળ લઇને જમણા હાથ ની અનામિકા અને અંગુઠા થી, મંત્ર પાઠ પછી, સંબન્ધિત અંગો પર જળ છાંટવું)

⚛️ઓં ભૂઃપુનાતુ શિરસિ ।

⚛️ઓં ભુવઃ પુનાતુ નેત્રયોઃ।

⚛️ઓં સ્વઃ પુનાતુ કંઠે ।

⚛️ઓં મહઃ પુનાતુ હ્રદયે ।

⚛️ઓં જનઃ પુનાતુ નાભ્યામ્ ।

⚛️ઓં તપઃ પુનાતુ પાદયોઃ।

⚛️ઓં સત્યં પુનાતુ પુનઃ શિરસિ ।

⚛️ઓં ખં બ્રહ્મ પુનાતુ સર્વત્ર ।।


☸️હે પ્રાણધાર, દુઃખ વિનાશક સર્વસુખપ્રદાતા, મહાનતમ, જગત ઉત્પાદક, જ્ઞાન સ્વરૂપ, અવિનાશી, સર્વત્ર વ્યાપક પરમેશ્વર ! આપની કૃપાથી અમારા મસ્તિષ્ક, નેત્ર, કંઠ, હ્રદય, નાભિ, પગ, શિર હંમેશા પવિત્ર રહે.


💥પ્રાણાયામ મંત્ર💥


(આ રીતે માર્જન કર્યા પછી હવે બાહ્ય, આભ્યંન્તર, સ્તંભવૃત્તિ, બાહ્યાભ્યન્તર, વિષયોક્ષેપી પ્રાણાયામ ઓછામાં ઓછા 3 અને વધુમાં વધુ ૨૧ વખત યથાશક્તિ વિધિવત્ કરવા અને તે વખતે નિમ્ન મંત્રોનો જાપ કરતા રહેવું)


⚛️ઓં ભૂઃ।ઓં ભૂવઃ।ઓં સ્વઃ।ઓં મહઃ।ઓં જનઃ। ઓં તપઃ। ઓં સત્યમ્।। ⚛️(તૈતિ०10/27)


☸️પ્રાણ સ્વરૂપ, પ્રાણોથી પ્રિય, દુઃખ દૂર કરવાવાળા, સર્વવ્યાપક, આનંદ સ્વરૂપ, બધાથી મોટો, બધાનો પિતા, દુષ્ટ ને દુઃખ આપનાર, બધાને જાણવાવાળો અને અવિનાશી પ્રભુ છે. ☸️


💥અઘમર્ષણ મંત્ર💥


⚛️ઓ३મ્ ઋતંચ સત્યંચાભીદ્ધાત્તપસોડધ્યજાયત।

તતો રાત્ર્યજાયત તતઃ સમુદ્રો અર્ણવઃ।।ઋગ્०10/190/1)


☸️પરમેશ્વર ના અનંત સામર્થ્ય વડે વેદ વિદ્યા અને કાર્ય કરતું જગત ઉત્પન્ન થયું, તેના જ સામર્થ્ય વડે પ્રલય તથા તેનાજ સામર્થ્ય વડે પાણિના સમુદ્રો બન્યા. ☸️


⚛️ઓ३મ્ સમુદ્રાદર્ણવાદધિ સંવત્સરો અજાયત ।

અહોરાત્રાણિ વિદધદ્વશ્વસ્ય મિષતો વશી ।।(ઋગ્०10/190/2)


☸️હે સર્વનિયંતા ભગવન્! આપે આપના સહજ સ્વભાવથી જળના સમુદ્રો વગેરે ઉત્પન્ન કર્યા પછી વર્ષ, દિવસ અને રાતનું નિર્માણ કર્યું છે.


⚛️ઓ३મ સૂર્યાચંદ્રમસૌ ધાતા યથા પૂર્વમકલ્પયત્।

દિવંચ પૃથ્વીંચાન્તરિક્ષમથો સ્વઃ।।(ઋગ્०10/190/3)


☸️પરમાત્માએ સૂર્ય, ચંદ્ર, દ્યૌલોક, પૃથ્વી લોક તથા આકાશમાં ફરતા દિવ્ય લોક-લોકાન્તરોની રચના, જેવી પહેલા સૃષ્ટિ બનાવી હતી તેવી જ આ સૃષ્ટિ માં બનાવી.


⚛️ઓ३મ્ શન્નો દેવીરભિષ્ટય આપો ભવન્તુ પીતયે ।

શંયોરભિસ્ત્રવન્તુ નઃ।।(યજુ०અ-36-મં/12)


☸️હે સર્વવ્યાપક, કલ્યાણકારી, આનંદ સ્વરૂપ, શુભકામનાઓને પૂર્ણ કરનાર, પરમાત્મા આપ કૃપા કરી અમારા બધાજ દુઃખો દૂર કરો અને મનોવાંછિત સુખ તથા પૂર્ણ આનંદ પ્રાપ્તિ કરાવો, હે પરમાત્મા અમને સદા સર્વદા સુખ શાંતિ આપો.



💥મનસા પરિક્રમા મંત્ર💥


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Monday, July 23, 2018

वेदविचार-305(वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। -स्वामी दयानन्द सरस्वती)6-...

वेदविचार-305

(वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। -स्वामी दयानन्द सरस्वती)


6- भूमिवर्ग:


कृषि: (11)

घृतेन सीता मधुना समज्यतां विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः।

ऊर्जस्वती पयसा पिन्वमानास्मान्त्सीते पयसाsभ्या ववृत्स्व।।


-यजुर्वेद 12/70; द्र० अथर्व० (3/17/9)


शब्दार्थ- (विश्वैः) समस्त (देवैः) देवों एवं (मरुद्भिः) मरुतों से (अनुमता) अनुमोदित तथा-


(पयसा) दूध से (पिन्वमाना) सिंचित होती हुई (ऊर्जस्वती) ऊर्जावाली (सीता) फाली (मधुना) मधुर (घृतेन) घृत से (सम्) अच्छी तरह (अज्यताम्) पुती जाए।


(सीते) हे सीते! (अस्मान्) हम लोगों से (पयसा) दूध से (अभि) मुख्यतः (आ) सब ओर से (ववृत्स्व) वर्ताव करो।


भावार्थ- सब विद्वानों को चाहिए कि किसान लोग विद्या के अनुकूल घी मीठा और जल आदि से संस्कार कर स्वीकार की हुई खेत की पृथिवी को अन्न को सिद्ध करनेवाली करें। जैसे बीज सुगंधि आदि युक्त करके बोते हैं, वैसे इस पृथिवी को भी संस्कार युक्त करें।


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[7/22, 8:28 AM] ‪+91 92751 95715‬: 🔥ओ३म्🔥⚛️अरा इव रथनाभस्य प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्।ऋचो यजूंषि...

[7/22, 8:28 AM] ‪+91 92751 95715‬: 🔥ओ३म्🔥

⚛️अरा इव रथनाभस्य प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्।

ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च।⚛️

☸️जिस प्रकार रथ के पहिये की #नाभि में अरे लगे होते हैं, जो नाभि के बिना स्थित नहीं रह सकते, ऐसे ही सम्पूर्ण पदार्थ #प्राणों में स्थित रहते हैं। #ऋग्वेद जिससे स्तुति की जाती है, वह प्राणों से स्थित है, #यजुर्वेद जिससे क्रिया होती है, वह भी प्राणों से स्थित है, और #सामवेद जिससे उपासना होती है, वह भी प्राणों के कारण से है। #यज्ञादि कर्म भी प्राणों के ही द्वारा होते हैं। शरीर में जो बल स्थित है, वह भी प्राणों के ही कारण से है। निदान बाह्य पदार्थो का ज्ञान जिससे ब्राह्मण बनते हैं, वह भी प्राण वायु के ही आधार से है।

⚛️तात्पर्य यह है कि चाहे किसी प्रकार का काम या ज्ञान करना हो, वह #प्राणधारी #जीव ही कर सकता है प्राण रहित #जीवात्मा सब कामों से शून्य होता है अर्थात् वह कुछ काम नहीं कर सकता। ज्ञान, बल, यज्ञ, स्तुति, कर्म, उपासना सब प्राणों से ही हो सकते हैं अर्थात् जो जीव का #लक्षण है कि वह ज्ञान तो #स्वाभाविक रखता है, अन्य कामों को यंत्रों से कर सकता है। जिस #यंत्र से जीव काम करता है, वह प्राण ही है, अतएव प्रत्येक #योनि में जीव ही #प्राणी कहलाता है। जो कुछ वृद्धि, क्षय इत्यादि #विकार है सब #प्राणों के कारण ही हैं। ⚛️


#प्रश्नोपनिषद् @द्वितीय प्रश्न @

[7/22, 8:29 AM] ‪+91 92751 95715‬: 🔥ओ३म्🔥

💥शरीर में जीतने काम होते हैं उन सबका कारण #प्राण है। जीव तो केवल नियम में रखने वाला है, शेष सब क्रिया प्राणों से होती है। प्राण ही माता के उदर में जाकर लोथड़ा बनाते हैं, प्राण ही #पुत्र और #पुत्री के रूप में उत्पन्न होकर बाहर दृष्टि पड़ते हैं। यह सब जगत् पशु और पक्षी आदि #प्राणों की रक्षार्थ ही भोजन करते हैं। यदि प्राणों को उसकी #भोग्य वस्तु न दी जावे, तो शरीर समाप्त हो सकता है, प्राण ही खाने वाला है। 💥


#प्रश्नोपनिषद् @द्वितीय प्रश्न @


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હે પરમાત્મા અમારી નાભિ યશ અને બળવાન બને. ⚛️ઓં હ્રદયમ્। ⚛️(હ્રદય ઉપર સ્પર્શ કરો)હે પરમાત્મા અમારુ...

હે પરમાત્મા અમારી નાભિ યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં હ્રદયમ્। ⚛️

(હ્રદય ઉપર સ્પર્શ કરો)

હે પરમાત્મા અમારુ હ્રદય યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં કંઠઃ। ⚛️

(કંઠ ઉપર સ્પર્શ કરવો.)

હે પરમાત્મા અમારો કંઠ મધુર અને બળવાન બને.

⚛️ઓં શિરઃ। ⚛️

(માથા ઉપર સ્પર્શ કરવો.)

હે પરમાત્મા અમારૂ શિર બળવાન બને.

⚛️ઓં બાહુભ્યાં યશોબલમ્ ।⚛️

(બન્ને ભુજાઓને સ્પર્શ કરો.)

હે પરમાત્મા અમારી બન્ને ભુજાઓ યશ અને બળવાન બને.

⚛️ઓં કરતલકરપૃષ્ઠે। ⚛️

(બન્ને હથેળી ઓ ઉપર)

હે પરમાત્મા અમારી બન્ને હથેળીઓ યશ અને બળવાન બને.


#ભાવાર્થ - હે અન્તર્યામિન્ પ્રભો ! આપની કૃપાથી અમે સ્વસ્થ સંપન્ન અને યશસ્વી વાણી, પ્રાણ, નેત્ર, કાન, નાભિ, હ્રદય, કંઠ, શિર, ભુજા, હથેળી કરપૃષ્ઠવાળા થઈએ.


#વૈદિક_સંધ્યા


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🔥ઓ३મ🔥💥અથ #વૈદિક_સંધ્યા - #બ્રહ્મ_યજ્ઞ💥 🌼ગાયત્રી મંત્ર 🌼☀️ઓ३મ્ ભૂર્ભુવઃ...

🔥ઓ३મ🔥


💥અથ #વૈદિક_સંધ્યા - #બ્રહ્મ_યજ્ઞ💥

🌼ગાયત્રી મંત્ર 🌼


☀️ઓ३મ્ ભૂર્ભુવઃ સ્વઃ।તત્સવિતુર્વરેણ્યં ભર્ગોદેવસ્ય ધીમહિ ।ધિયો યો નઃ પ્રચોદયાત્ ।।☀️

☸️જે પરબ્રહ્મ પરમાત્મા નું સર્વોત્તમ નામ ઓ३મ્ છે જે જગતના પ્રાણદાતા દુઃખહર્તા, સુખદાતા અને સત્ ચિત્ આનંદસ્વરૂપ છે. જે સકળ જગતના ઉત્પાદક, પાપનાશક, વિજ્ઞાન સ્વરૂપ છે. અને અતિ ઉત્તમ પૂજવા યોગ્ય છે. તે પ્રકાશમાન પરમાત્માનું ગ્રહણ કરવા યોગ્ય નામ અને તેજ નું અમે ધ્યાન કરીએ છીએ. તે પરમેશ્વર અમારી બુદ્ધિ ને દુરાચાર - ખરાબ કામોથી અલગ કરી સદાચાર - સારા કામોમાં પ્રેરિત કરે. ☸️


#વૈદિક_સંધ્યા ☘ ☘


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🔥ઓ३મ🔥🍁અથ વૈદિક સંધ્યા #બ્રહ્મ_યજ્ઞ 🍁☸️માર્જન મંત્ર ☸️(ફરી ડાબા હાથ માં જળ લઇને જમણા હાથ ની અનામિકા...

🔥ઓ३મ🔥


🍁અથ વૈદિક સંધ્યા #બ્રહ્મ_યજ્ઞ 🍁

☸️માર્જન મંત્ર ☸️

(ફરી ડાબા હાથ માં જળ લઇને જમણા હાથ ની અનામિકા અને અંગુઠા થી, મંત્ર પાઠ પછી, સંબન્ધિત અંગો પર જળ છાંટવું)

⚛️ઓં ભૂઃપુનાતુ શિરસિ ।

⚛️ઓં ભુવઃ પુનાતુ નેત્રયોઃ।

⚛️ઓં સ્વઃ પુનાતુ કંઠે ।

⚛️ઓં મહઃ પુનાતુ હ્રદયે ।

⚛️ઓં જનઃ પુનાતુ નાભ્યામ્ ।

⚛️ઓં તપઃ પુનાતુ પાદયોઃ।

⚛️ઓં સત્યં પુનાતુ પુનઃ શિરસિ ।

⚛️ઓં ખં બ્રહ્મ પુનાતુ સર્વત્ર ।।


☸️હે પ્રાણધાર, દુઃખ વિનાશક સર્વસુખપ્રદાતા, મહાનતમ, જગત ઉત્પાદક, જ્ઞાન સ્વરૂપ, અવિનાશી, સર્વત્ર વ્યાપક પરમેશ્વર ! આપની કૃપાથી અમારા મસ્તિષ્ક, નેત્ર, કંઠ, હ્રદય, નાભિ, પગ, શિર હંમેશા પવિત્ર રહે. ☸️


#વૈદિક_સંધ્યા


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🔥ઓ३મ🔥🍁અથ વૈદિક સંધ્યા - #બ્રહ્મ_યજ્ઞ 🍁💥પ્રાણાયામ મંત્ર💥(આ રીતે માર્જન કર્યા પછી હવે બાહ્ય,...

🔥ઓ३મ🔥

🍁અથ વૈદિક સંધ્યા - #બ્રહ્મ_યજ્ઞ 🍁


💥પ્રાણાયામ મંત્ર💥


(આ રીતે માર્જન કર્યા પછી હવે બાહ્ય, આભ્યંન્તર, સ્તંભવૃત્તિ, બાહ્યાભ્યન્તર, વિષયોક્ષેપી પ્રાણાયામ ઓછામાં ઓછા 3 અને વધુમાં વધુ ૨૧ વખત યથાશક્તિ વિધિવત્ કરવા અને તે વખતે નિમ્ન મંત્રોનો જાપ કરતા રહેવું)


⚛️ઓં ભૂઃ।ઓં ભૂવઃ।ઓં સ્વઃ।ઓં મહઃ।ઓં જનઃ। ઓં તપઃ। ઓં સત્યમ્।। ⚛️


☸️પ્રાણ સ્વરૂપ, પ્રાણોથી પ્રિય, દુઃખ દૂર કરવાવાળા, સર્વવ્યાપક, આનંદ સ્વરૂપ, બધાથી મોટો, બધાનો પિતા, દુષ્ટ ને દુઃખ આપનાર, બધાને જાણવાવાળો અને અવિનાશી પ્રભુ છે. ☸️


💥અઘમર્ષણ મંત્ર💥


⚛️ઓ३મ્ ઋતંચ સત્યંચાભીદ્ધાત્તપસોડધ્યજાયત।

તતો રાત્ર્યજાયત તતઃ સમુદ્રો અર્ણવઃ।।


☸️પરમેશ્વર ના અનંત સામર્થ્ય વડે વેદ વિદ્યા અને કાર્ય કરતું જગત ઉત્પન્ન થયું, તેના જ સામર્થ્ય વડે પ્રલય તથા તેનાજ સામર્થ્ય વડે પાણિના સમુદ્રો બન્યા. ☸️


⚛️ઓ३મ્ સમુદ્રાદર્ણવાદધિ સંવત્સરો અજાયત ।

અહોરાત્રાણિ વિદધદ્વશ્વસ્ય મિષતો વશી ।।


☸️હે સર્વનિયંતા ભગવન્! આપે આપના સહજ સ્વભાવથી જળના સમુદ્રો વગેરે ઉત્પન્ન કર્યા પછી વર્ષ, દિવસ અને રાતનું નિર્માણ કર્યું છે.


⚛️ઓ३મ સૂર્યાચંદ્રમસૌ ધાતા યથા પૂર્વમકલ્પયત્।

દિવંચ પૃથ્વીંચાન્તરિક્ષમથો સ્વઃ।।


☸️પરમાત્માએ સૂર્ય, ચંદ્ર, દ્યૌલોક, પૃથ્વી લોક તથા આકાશમાં ફરતા દિવ્ય લોક-લોકાન્તરોની રચના, જેવી પહેલા સૃષ્ટિ બનાવી હતી તેવી જ આ સૃષ્ટિ માં બનાવી.


⚛️ઓ३મ્ શન્નો દેવીરભિષ્ટય આપો ભવન્તુ પીતયે ।

શંયોરભિસ્ત્રવન્તુ નઃ।।


☸️હે સર્વવ્યાપક, કલ્યાણકારી, આનંદ સ્વરૂપ, શુભકામનાઓને પૂર્ણ કરનાર, પરમાત્મા આપ કૃપા કરી અમારા બધાજ દુઃખો દૂર કરો અને મનોવાંછિત સુખ તથા પૂર્ણ આનંદ પ્રાપ્તિ કરાવો, હે પરમાત્મા અમને સદા સર્વદા સુખ શાંતિ આપો.


#વૈદિક_સંધ્યા


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🔥ઓ३મ🔥 ☘️અથ વૈદિક સંધ્યા - #બ્રહ્મ_યજ્ઞ 💥મનસા પરિક્રમા મંત્ર💥⚛️ઓ३મ્...

🔥ઓ३મ🔥


☘️અથ વૈદિક સંધ્યા - #બ્રહ્મ_યજ્ઞ


💥મનસા પરિક્રમા મંત્ર💥


⚛️ઓ३મ્ પ્રાચીદિગગ્નિરધિપતિરસિતો રક્ષિતાદિત્યા ઈષવઃ।

તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।

યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।


☸️હે પૂર્વદિશા ના સ્વામી તેજસ્વી,બન્ધનરહિત, સર્વ રક્ષક, પ્રકાશસ્વરૂપ, શક્તિમાન, પરમેશ્વર ! અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ.

જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમો કોઈનાથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો ! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


⚛️ઓ३મ્ દક્ષિણાદિગિન્દ્રોડધિપતિસ્તિરશ્ચિરાજી રક્ષિતા પિતર ઈષવઃ ।તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।


☸️હે દક્ષિણ દિશાના સ્વામી સમ્પૂર્ણ ઐશ્વર્યયુક્ત કીટ પતંગ,વીંછી વગેરે થી અમારી રક્ષા કરનાર જગત ને ઉત્પન્ન કરનાર, પાલનકર્તા પરમાત્મન્ અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમે કોઈથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો ! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


⚛️ઓ३મ્ પ્રતીચી દિગ્વરુણોઽધિપતિઃ પૃદાકૂ રક્ષિતાન્નમિષવઃ।

તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।


☸️હે પશ્ચિમ દિશાના સ્વામી સર્વેશ્વર, સર્પાદિ વિષધર પ્રાણીઓથી અમને રક્ષણ આપનાર, અન્ન આપનાર ભગવન્! અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમે કોઇથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


⚛️ઓ३મ્ ઉદીચી દિકાસોમોઽધિપતિઃ સ્વજો રક્ષિતાશનિરિષવઃ ।

તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।

યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।


☸️હે પરમાત્મા! તમે અમારી ડાબી તરફ (હ્રદય આકાશ) માં વ્યાપક છો. તમે અમારા પરમ ઐશ્વર્ય સ્વામી અને રક્ષા કરવાવાળા છો. તમોજ વિદ્યુત દ્વારા અમારી રૂધીર ની ગતિ તથા પ્રાણોની રક્ષા કરો છો. આપની આ રક્ષા કરવા તથા અમને જીવન આપવા બદલ તમને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જો અજ્ઞાનતાથી કોઈ જીવ અમારા પ્રત્યે ઈર્ષા દ્વેષ ભાવ રાખે અથવા અમે બીજા જીવ પ્રત્યે ઈર્ષાદ્વેષભાવ રાખીએ તે અંગે આપ જે ન્યાય કરો તે અમને માન્ય છે.☸️


⚛️ઓ३મ્ ધ્રુવા દિગ્વિષ્ણુરધિપતિઃ કલ્માષણગ્રીવોરક્ષિતા વીરુધ ઈષવઃ ।તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।


☸️હે પરમાત્મા! આપ અમારી નીચેનાં સ્થાનોમાં વિદ્યમાન છો. વૃક્ષો - વેલાઓ વગેરે વનસ્પતિઓ દ્વારા અમારા પ્રણોની રક્ષા કરો છો. આપની આ કૃપા બદલ અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમે કોઈથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


⚛️ઓ३મ્ ઊર્ધ્વા દિગ્ બૃહસ્પતિરધિપતિઃ શ્વિત્રો રક્ષિતા વર્ષમિવઃ ।

તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।

યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।

☸️હે મહાન પ્રભુ! તમે તમે ઉપર ના લોકોમાં વ્યાપક પવિત્ર છો. અમારા સ્વામી તથા રક્ષક છો. તમે વરસાદ વરસાવી અમારી ખેતીને સીંચો છો જેથી અમને જીવન મળે છે. અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમે કોઈથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


#વૈદિક_સંધ્યા


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🔥ઓ३મ🔥 ☘️અથ વૈદિક સંધ્યા - #બ્રહ્મ_યજ્ઞ 💥મનસા પરિક્રમા મંત્ર💥⚛️ઓ३મ્...

🔥ઓ३મ🔥


☘️અથ વૈદિક સંધ્યા - #બ્રહ્મ_યજ્ઞ


💥મનસા પરિક્રમા મંત્ર💥


⚛️ઓ३મ્ પ્રાચીદિગગ્નિરધિપતિરસિતો રક્ષિતાદિત્યા ઈષવઃ।

તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।

યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।


☸️હે પૂર્વદિશા ના સ્વામી તેજસ્વી,બન્ધનરહિત, સર્વ રક્ષક, પ્રકાશસ્વરૂપ, શક્તિમાન, પરમેશ્વર ! અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ.

જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમો કોઈનાથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો ! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


⚛️ઓ३મ્ દક્ષિણાદિગિન્દ્રોડધિપતિસ્તિરશ્ચિરાજી રક્ષિતા પિતર ઈષવઃ ।તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।


☸️હે દક્ષિણ દિશાના સ્વામી સમ્પૂર્ણ ઐશ્વર્યયુક્ત કીટ પતંગ,વીંછી વગેરે થી અમારી રક્ષા કરનાર જગત ને ઉત્પન્ન કરનાર, પાલનકર્તા પરમાત્મન્ અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમે કોઈથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો ! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


⚛️ઓ३મ્ પ્રતીચી દિગ્વરુણોઽધિપતિઃ પૃદાકૂ રક્ષિતાન્નમિષવઃ।

તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।


☸️હે પશ્ચિમ દિશાના સ્વામી સર્વેશ્વર, સર્પાદિ વિષધર પ્રાણીઓથી અમને રક્ષણ આપનાર, અન્ન આપનાર ભગવન્! અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમે કોઇથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


⚛️ઓ३મ્ ઉદીચી દિકાસોમોઽધિપતિઃ સ્વજો રક્ષિતાશનિરિષવઃ ।

તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।

યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।


☸️હે પરમાત્મા! તમે અમારી ડાબી તરફ (હ્રદય આકાશ) માં વ્યાપક છો. તમે અમારા પરમ ઐશ્વર્ય સ્વામી અને રક્ષા કરવાવાળા છો. તમોજ વિદ્યુત દ્વારા અમારી રૂધીર ની ગતિ તથા પ્રાણોની રક્ષા કરો છો. આપની આ રક્ષા કરવા તથા અમને જીવન આપવા બદલ તમને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જો અજ્ઞાનતાથી કોઈ જીવ અમારા પ્રત્યે ઈર્ષા દ્વેષ ભાવ રાખે અથવા અમે બીજા જીવ પ્રત્યે ઈર્ષાદ્વેષભાવ રાખીએ તે અંગે આપ જે ન્યાય કરો તે અમને માન્ય છે.☸️


⚛️ઓ३મ્ ધ્રુવા દિગ્વિષ્ણુરધિપતિઃ કલ્માષણગ્રીવોરક્ષિતા વીરુધ ઈષવઃ ।તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।


☸️હે પરમાત્મા! આપ અમારી નીચેનાં સ્થાનોમાં વિદ્યમાન છો. વૃક્ષો - વેલાઓ વગેરે વનસ્પતિઓ દ્વારા અમારા પ્રણોની રક્ષા કરો છો. આપની આ કૃપા બદલ અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમે કોઈથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


⚛️ઓ३મ્ ઊર્ધ્વા દિગ્ બૃહસ્પતિરધિપતિઃ શ્વિત્રો રક્ષિતા વર્ષમિવઃ ।

તેભ્યો નમોઽધિપતિભ્યો નમો રક્ષિતૃભ્યો નમ ઈષુભ્યો નમ એભ્યો અસ્તુ ।

યોડસ્માન્ દ્વેષ્ટિ યં વયં દ્વિષ્મસ્તં વો જમ્ભે દધ્મઃ ।।

☸️હે મહાન પ્રભુ! તમે તમે ઉપર ના લોકોમાં વ્યાપક પવિત્ર છો. અમારા સ્વામી તથા રક્ષક છો. તમે વરસાદ વરસાવી અમારી ખેતીને સીંચો છો જેથી અમને જીવન મળે છે. અમે આપને વારંવાર નમસ્કાર કરીએ છીએ. જે અમારા પ્રત્યે દ્વેષભાવ રાખે અથવા અમે કોઈથી દ્વેષ કરીએ તો હે ન્યાયકારી પ્રભો! આપ જ એના નિર્ણાયક છો. ☸️


#વૈદિક_સંધ્યા


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क्या ऐसा ग्रंथ किसी अन्य धर्म मैं है ?इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए...

क्या ऐसा ग्रंथ किसी अन्य धर्म मैं है ?

इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए —


यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ


क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े

तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे।


जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ “राघवयादवीयम्” ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है।


इस ग्रन्थ को

‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे

पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और

विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।


पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ “राघवयादवीयम।”


उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः


वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥


अर्थातः

मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो

जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।


विलोमम्:


सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥


अर्थातः

मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के

चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ

विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।


“ राघवयादवीयम” के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-


राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥


विलोमम्:

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥


साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।

पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥


विलोमम्:

वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।

राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥


कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।

सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥


विलोमम्:

भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।

कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥


रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।

नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥


विलोमम्:

यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।

तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥


यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।

तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥


विलोमम्:

तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।

सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥


मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।

काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥


विलोमम्:

तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।

तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥


रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।

कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥


विलोमम्:

मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।

तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥


सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।

साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥


विलोमम्:

हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।

यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥


सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।

सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥


विलोमम्:


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Friday, July 13, 2018

*🔥ओ३म्🔥**“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति...

*🔥ओ३म्🔥*


*“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति ॥”* केनोपनिषद् काण्ड-३,श्लोक-१२ ॥


*पदार्थ—* _(सः) वह इन्द्र=जीवात्मा (तस्मिन्, एव) उसी अर्थात् जहां ब्रह्म यक्षरूप में प्रकट हुआ और अन्तर्धान हुआ, (आकाशे) हृदयाकाश में (हैमवतीम्) हिरण्यमयी दिव्यप्रज्ञावाली अथवा सन्ताप को नष्ट करने वाले शान्त्यादि गुणों से सम्पन्न (बहुशोभमानाम्) (उमाम्) ब्रह्मविद्यारूपी (स्त्रियम्) स्त्री के समीप (आजगाम) प्राप्त हुआ और (ताम्) उससे (ह) दुःखी सा होकर (उवाच) बोला कि (एतत्) यह (यक्षम्) यक्ष (किम्, इति) कौन है ?_

*भावार्थ—* इन्द्र (जीवात्मा) को यक्ष (ब्रह्म) के अन्तर्धान होने पर बहुत दुःख हुआ कि वह यक्ष को जानने के लिए आया था किन्तु जानने का ही अवसर नहीं मिला । तत्पश्चात् जीवात्मा ने योगाङ्गों का अनुष्ठान करते हुए अन्तःकरण को शुद्ध किया और ब्रह्मविद्या को प्राप्त किया । यही इन्द्र की उमा=ब्रह्मविद्या से यक्ष को जानने की प्रार्थना है। यहां ‘उमा’ कोई स्त्रीविशेष नहीं है अपितु ‘उमा ब्रह्मविद्या’ (तैत्तिरीयोप० १।४८) इस प्रमाण से ब्रह्मविद्या का नाम ही ‘उमा’ है । ‘उमा’ अर्थ ही *—‘उम्=परमात्मानं माति प्रमापयति’* अर्थात् जो परब्रह्म का ज्ञान कराती है ।

जब जीव योगसाधना करके दिव्य प्रज्ञा प्राप्त करता है, तब ब्रह्मविद्या से मिलन=ब्रह्म-प्राप्ति होती है और यक्ष (ब्रह्म) को जान पाता है । योग की दिव्यविभूतियां प्राप्त करना ही ब्रह्मविद्या (उमा) के दिव्य आभूषण हैं । इस उमा (ब्रह्मविद्या) से ब्रह्म की प्राप्ति होती है, इस विषय में उपनिषदों में अन्यत्र भी कहा है— *“दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्म- दर्शिभिः ॥”*(कठोप०) अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान सूक्ष्मबुद्धि से होता है । यह सूक्ष्मबुद्धि ब्रह्मज्ञान से ही होती है । ब्रह्म की प्राप्ति कहां होती है ? इस प्रश्न का भी यहां स्पष्ट समाधान किया है । ब्रह्म को खोजने के लिए बाह्य जगत् की कोई आवश्यकता नहीं होती । ब्रह्म को तो हृदय रूप आकाश में प्राप्त किया जाता है, जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् (प्रपा० ८ । मं० १) में स्पष्टरूप से कहा है—


*“अथ यदिमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तरा- काशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥”* इसका अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं—

*“कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में और उदर के ऊपर जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त्त है, उसमें कमल के आकार वेश्म अर्थात् अवकाश रूप एक स्थान है और उसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर भर रहा है, वह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिल जाता है । दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है ।”* (ऋ० भू० उपासनाविषय)


इस खण्ड में वर्णित आख्यायिका के विषय में महर्षि दयानन्द कहते हैं— *“केनोपनिषद् में एक यक्ष की वार्त्ता है । यक्ष ने अग्नि के सम्मुख तृण डाला और अग्नि से कहा कि इस तिनके को तू जला दे । अग्नि से वह तिनका न जल सका, फिर वायु से कहा कि तू इस तिनके को उड़ा ले जा, वायु से भी वह तिनका न उड़ सका । ऐसा कहकर जो हैमवती नामक ब्रह्मविद्या है, उसका माहात्म्य दर्शाया है ।”* (पूना प्रवचन ७४ पृ०)


इस तृतीय खण्ड में आलङ्कारिक आख्यायिका के द्वारा ब्रह्म की महत्ता, अग्नि आदि समस्त देवों की ब्रह्म की शक्ति से ही शक्तिसम्पन्नता, ब्रह्म का अविद्याग्रस्त से छिप जाना और विद्वान् व शान्त्यादि गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को ब्रह्मज्ञान होना इत्यादि विषयों का वर्णन किया गया है ।

*💥शम्💥*

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Friday, June 22, 2018

◙ *मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ…*_“ऋषिवर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे ४१...

◙ *मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ…*


_“ऋषिवर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे ४१ वर्ष हो चुके, परन्तु तुम्हारी दिव्य मूर्ति मेरे हृदय-पटल पर अब तक ज्यों-की-त्यों अंकित है. मेरे निर्बल हृदय के अतिरिक्त कौन मरणधर्मा मनुष्य जान सकता है कि कितनी बार गिरते-गिरते तुम्हारे स्मरण मात्र ने मेरी आत्मिक रक्षा की है. तुमने कितनी गिरी हुई आत्माओं की काया पलट दी, इसकी गणना कौन मनुष्य कर सकता है? परमात्मा के बिना, जिनकी पवित्र गोद में तुम इस समय विचर रहे हो, कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया है? परन्तु अपने विषय में मैं कह सकता हूँ कि तुम्हारे सत्संग ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चा जीवन-लाभ करने के योग्य बनाया?”_


_“मैं क्या था इसे इस कहानी में मैंने छिपाया नहीं. मैं क्या बन गया और अब क्या हूँ, वह सब तुम्हारी कृपा का ही परिणाम है. इसलिए इससे बढकर मेरे पास तुम्हारी जन्म-शताब्दी पर और कोई भेंट नहीं हो सकती कि तुम्हारा दिया आत्मिक जीवन तुम्हें ही अर्पण करुं. तुम वाणी द्वारा प्रचार करनेवाले केवल तत्ववेत्ता ही न थे, परन्तु जिन सच्चाइयों का तुम संसार में प्रचार करना चाहते थे उनको क्रिया में लाकर सिद्ध कर देना भी तुम्हारा ही काम था. भगवान् कृष्ण की तरह तुम्हारे लिए भी तीनों लोकों में कोई कर्तव्य शेष नहीं रह गया था, परन्तु तुमने भी मानव-संसार को सीधा मार्ग दिखाने के लिए कर्म की उपेक्षा नहीं की”._


_“भगवन् ! मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ. इसलिए जिस परमपिता की असीम गोद में तुम परमानन्द का अनुभव कर रहे हो, उसी से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे तुम्हारा सच्चा शिष्य बनने की शक्ति प्रदान करे”._


*- श्रद्धानन्द*


(अपने आत्मोत्सर्ग से दो वर्ष पूर्व वि.सं. १९८१ तदनुसार ई.१९२४ में प्रकाशित अपना आत्म-चरित *“कल्याण मार्ग का पथिक”* ऋषि दयानन्द सरस्वती के चरणों में सादर समर्पित करते हुवे स्वामी श्रद्धानन्द जी के मार्मिक शब्द… स्वामी जी की यह आत्मकथा अपने जन्म-वर्ष १८५७ ई. से १८९२ ई. तक कुल ३५ वर्षों के क्रिया-कलाप और घटनाओं का विवरण देती है. उसके आगे का जीवन तथा उनके कार्यों का लेखा-जोखा जानने के लिए पढें: *“स्वामी श्रद्धानन्द: एक विलक्षण व्यक्तित्व”*, सम्पादक: डॉ. विनोदचन्द्र विद्यालंकार)


* *स्त्रोत:* कल्याण मार्ग का पथिक(संस्करण २०१५, पृ.३)

* *लेखक:* स्वामी श्रद्धानन्द जी

* *सम्पादक:* डॉ. ज्वलन्तकुमार शास्त्री

* *प्रस्तुति:* राजेश ‘आर्य’

______________________________


◆ *Swami Shraddhanand* (MR Jambunathan)


https://drive.google.com/file/d/1ACWhRpU4mGpCKsx_OUzZRijHt9_cTD4x/view?usp=drivesdk

◆ *कल्याण मार्ग का पथिक* (स्वामी श्रद्धानन्द)


https://drive.google.com/file/d/1rN4XefoE0bB7JrEG3P0rPIjrcM0YVQyB/view?usp=drivesdk

◆ *वीर सन्यासी श्रद्धानन्द* (राम गोपाल)


https://drive.google.com/file/d/14By6FywhUouSzVbde5PCFvBGEQWr6K52/view?usp=drivesdk

◆ *स्वामी श्रद्धानन्द* (उमा चतुर्वेदी)


https://drive.google.com/file/d/1H1nxN3IBQ3_0Gp3kfai_fIEcWv79QmbK/view?usp=drivesdk

◆ *स्वामी श्रद्धानन्द* (सत्यदेव विद्यालंकार)


https://drive.google.com/file/d/1ZlDBiNqvzeoSe-3GoPwVWrinL7rc_bVM/view?usp=drivesdk


*II ओ३म् II*


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💭 *इस्लाम व कुरान पर भारत के प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा दिए गए क्रांतिकारी विचार*➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖🔺 *स्वामी...

💭 *इस्लाम व कुरान पर भारत के प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा दिए गए क्रांतिकारी विचार*

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🔺 *स्वामी विवेकानन्द*


ऎसा कोई अन्य मजहब नहीं जिसने इतना अधिक रक्तपात किया हो और अन्य के लिए इतना क्रूर हो। इनके अनुसार जो कुरान को नहीं मानता कत्ल कर दिया जाना चाहिए। उसको मारना उस पर दया करना है। जन्नत ( जहां हूरे और अन्य सभी प्रकार की विलासिता सामग्री है ) पाने का निश्चित तरीका गैर ईमान वालों को मारना है। इस्लाम द्वारा किया गया रक्तपात इसी विश्वास के कारण हुआ है।


कम्प्लीट वर्क आफ विवेकानन्द वॉल्यूम २ पृष्ठ २५२-२५३



🔺 *गुरु नानक देव जी*


मुसलमान सैय्यद, शेख, मुगल पठान आदि सभी बहुत निर्दयी हो गए हैं। जो लोग मुसलमान नहीं बनते थें उनके शरीर में कीलें ठोककर एवं कुत्तों से नुचवाकर मरवा दिया जाता था।


नानक प्रकाश तथा प्रेमनाथ जोशी की पुस्तक पैन इस्लाममिज्म रोलिंग बैंक पृष्ठ ८०


🔺 *महर्षि दयानन्द सरस्वती*


इस मजहब में अल्लाह और रसूल के वास्ते संसार को लुटवाना और लूट के माल में खुदा को हिस्सेदार बनाना शबाब का काम हैं। जो मुसलमान नहीं बनते उन लोगों को मारना और बदले में बहिश्त को पाना आदि पक्षपात की बातें ईश्वर की नहीं हो सकती। श्रेष्ठ गैर मुसलमानों से शत्रुता और दुष्ट मुसलमानों से मित्रता, जन्नत में अनेक औरतों और लौंडे होना आदि निन्दित उपदेश कुएं में डालने योग्य हैं। अनेक स्त्रियों को रखने वाले मुहम्मद साहब निर्दयी, राक्षस व विषयासक्त मनुष्य थें, एवं इस्लाम से अधिक अशांति फैलाने वाला दुष्ट मत दूसरा और कोई नहीं। इस्लाम मत की मुख्य पुस्तक कुरान पर हमारा यह लेख हठ, दुराग्रह, ईर्ष्या विवाद और विरोध घटाने के लिए लिखा गया, न कि इसको बढ़ाने के लिए। सब सज्जनों के सामन रखने का उद्देश्य अच्छाई को ग्रहण करना और बुराई को त्यागना है ।।


सत्यार्थ प्रकाश १४ वां समुल्लास विक्रमी २०६१


🔺 *महर्षि अरविन्द*


हिन्दू मुस्लिम एकता असम्भव है क्योंकि मुस्लिम कुरान मत हिन्दू को मित्र रूप में सहन नहीं करता। हिन्दू मुस्लिम एकता का अर्थ हिन्दुओं की गुलामी नहीं होना चाहिए। इस सच्चाई की उपेक्षा करने से लाभ नहीं। किसी दिन हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ने हेतु तैयार होना चाहिए। हम भ्रमित न हों और समस्या के हल से पलायन न करें। हिन्दू मुस्लिम समस्या का हल अंग्रेजों के जाने से पहले सोच लेना चाहिए अन्यथा गृहयुद्ध के खतरे की सम्भावना है । ।


ए बी पुरानी इवनिंग टाक्स विद अरविन्द पृष्ठ २९१-२८९-६६६


🔺 *सरदार वल्लभ भाई पटेल*


मैं अब देखता हूं कि उन्हीं युक्तियों को यहां फिर अपनाया जा रहा है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था। मुसलमानों की पृथक बस्तियां बसाई जा रहीं हैं। मुस्लिम लीग के प्रवक्ताओं की वाणी में भरपूर विष है। मुसलमानों को अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए। मुसलमानों को अपनी मनचाही वस्तु पाकिस्तान मिल गया हैं वे ही पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं, क्योंकि मुसलमान देश के विभाजन के अगुआ थे न कि पाकिस्तान के वासी। जिन लोगों ने मजहब के नाम पर विशेष सुविधांए चाहिंए वे पाकिस्तान चले जाएं इसीलिए उसका निर्माण हुआ है। वे मुसलमान लोग पुनः फूट के बीज बोना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि देश का पुनः विभाजन हो।


संविधान सभा में दिए गए भाषण का सार।


🔺 *भीम राव अंबेडकर*


हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है। यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं। साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा। विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी। पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है। मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है। कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है, इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य है। मुसलामनों के निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होती है। इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता। संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपेन शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया। कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है। गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है। इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं। धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते। मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती। वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते।


प्रमाण सार डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१


🔺 *माधवराव सदाशिवराव* गोलवलकर


पाकिस्तान बनने के पश्चात जो मुसलमान भारत में रह गए हैं क्या उनकी हिन्दुओं के प्रति शत्रुता , उनकी हत्या, लूट दंगे, आगजनी, बलात्कार, आदि पुरानी मानसिकता बदल गयी है, ऐसा विश्वास करना आत्मघाती होगा। पाकिस्तान बनने के पश्चात हिन्दुओं के प्रति मुस्लिम खतरा सैकड़ों गुणा बढ़ गया है। पाकिस्तान और बांग्लादेश से घुसपैठ बढ़ रही है। दिल्ली से लेकर रामपुर और लखनऊ तक मुसलमान खतरनाक हथियारों की जमाखोरी कर रहे हैं। ताकि पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण करने पर वे अपने भाइयों की सहायता कर सके। अनेक भारतीय मुसलमान ट्रांसमीटर के द्वारा पाकिस्तान के साथ लगातार सम्पर्क में हैं। सरकारी पदों पर आसीन मुसलमान भी राष्ट्र विरोधी गोष्ठियों में भाषण देते हें। यदि यहां उनके हितों को सुरक्षित नहीं रखा गया तो वे सशस्त्र क्रांति के खड़े होंगें।


बंच आफ थाट्स पहला आंतरिक खतरा मुसलमान पृष्ठ १७७-१८७


🔺 *गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर*


ईसाई व मुसलमान मत अन्य सभी को समाप्त करने हेतु कटिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य केवल अपने मत पर चलना नहीं है अपितु मानव धर्म को नष्ट करना है। वे अपनी राष्ट्र भक्ति गैर मुस्लिम देश के प्रति नहीं रख सकते। वे संसार के किसी भी मुस्लिम एवं मुस्लिम देश के प्रति तो वफादार हो सकते हैं परन्तु किसी अन्य हिन्दू या हिन्दू देश के प्रति नहीं। सम्भवतः मुसलमान और हिन्दू कुछ समय के लिए एक दूसरे के प्रति बनवटी मित्रता तो स्थापित कर सकते हैं परन्तु स्थायी मित्रता नहीं।


- रवीन्द्र नाथ वाडमय २४ वां खण्ड पृच्च्ठ २७५ , टाइम्स आफ इंडिया १७-०४-१९२७ , कालान्तर


🔺 *मोहनदास करम चन्द्र गांधी*


मेरा अपना अनुभव है कि मुसलमान कूर और हिन्दू कायर होते हैं मोपला और नोआखली के दंगों में मुसलमानों द्वारा की गयी असंख्य हिन्दुओं की हिंसा को देखकर अहिंसा नीति से मेरा विचार बदल रहा है।


गांधी जी की जीवनी, धनंजय कौर पृष्ठ ४०२ व मुस्लिम राजनीति श्री पुरूषोत्तम योग


🔺 *लाला लाजपत राय*


मुस्लिम कानून और मुस्लिम इतिहास को पढ़ने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि उनका मजहब उनके अच्छे मार्ग में एक रुकावट है। मुसलमान जनतांत्रिक आधार पर भारत पर शासन चलाने हेतु हिन्दुओं के साथ एक नहीं हो सकते। क्या कोई मुसलमान कुरान के विपरीत जा सकता है ? हिन्दुओं के विरूद्ध कुरान और हदीस की निषेधाज्ञा की क्या हमें एक होने देगी ? मुझे डर है कि भरत के ७ करोड़ मुसलमान अफगानिस्तान, मध्य एशिया अरब, मैसोपोटामिया और तुर्की के हथियारबंद गिरोह मिलकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देंगें।


पत्र सी आर दास बी एस ए वाडमय खण्ड १५ पृष्ठ २७५


🔺 *समर्थ गुरू राम दास जी*


छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरू अपने ग्रंथ दास बोध में लिखते हैं कि मुसलमान शासकों द्वारा कुरान के अनुसार काफिर हिन्दू नारियों से बलात्कार किए गए जिससे दुःखी होकर अनेकों ने आत्महत्या कर ली। मुसलमान न बनने पर अनेक कत्ल किए एवं अगणित बच्चे अपने मां बाप को देखकर रोते रहे। मुसलमान आक्रमणकारी पशुओं के समान निर्दयी थे, उन्होंने धर्म परिवर्तन न करने वालों को जिन्दा ही धरती में दबा दिया।


- डा एस डी कुलकर्णी कृत एन्कांउटर विद इस्लाम पृष्ठ २६७-२६८


🔺 *राजा राममोहन राय*


मुसलमानों ने यह मान रखा है कि कुरान की आयतें अल्लाह का हुक्म हैं। और कुरान पर विश्वास न करने वालों का कत्ल करना उचित है। इसी कारण मुसलमानों ने हिन्दुओं पर अत्यधिक अत्याचार किए, उनका वध किया, लूटा व उन्हें गुलाम बनाया।


वाङ्मय-राजा राममोहन राय पृष्ट ७२६-७२७


🔺 *श्रीमति ऐनी बेसेन्ट*


मुसलमानों के दिल में गैर मुसलमानों के विरूद्ध नंगी और बेशर्मी की हद तक तक नफरत हैं। हमने मुसलमान नेताओं को यह कहते हुए सुना है कि यदि अफगान भारत पर हमला करें तो वे मसलमानों की रक्षा और हिन्दुओं की हत्या करेंगे। मुसलमानों की पहली वफादार मुस्लिम देशों के प्रति हैं, हमारी मातृभूमि के लिए नहीं। यह भी ज्ञात हुआ है कि उनकी इच्छा अंग्रेजों के पश्चात यहां अल्लाह का साम्राज्य स्थापित करने की है न कि सारे संसार के स्वामी व प्रेमी परमात्मा का। स्वाधीन भारत के बारे में सोचते समय हमें मुस्लिम शासन के अंत के बारे में विचार करना होगा।


- कलकत्ता सेशन १९१७ डा बी एस ए सम्पूर्ण वाङ्मय खण्ड, पृष्ठ २७२-२७५


🔺 *स्वामी रामतीर्थ*


अज्ञानी मुसलमानों का दिल ईश्वरीय प्रेम और मानवीय भाईचारे की शिक्षा के स्थान पर नफरत, अलगाववाद, पक्षपात और हिंसा से कूट कूट कर भरा है। मुसलमानों द्वारा लिखे गए इतिहास से इन तथ्यों की पुष्टि होती है। गैर मुसलमानों आर्य खालसा का बड़ी संख्या में काफिर कहकर संहार किया गया। लाखों असहाय स्त्रियों को बिछौना बनाया गया। उनसे इस्लाम के रक्षकों ने अपनी काम पिपासा को शान्त किया। उनके घरों को छीना गया और हजारों हिन्दुओं को गुलाम बनाया गया। क्या यही है शांति का मजहब इस्लाम ? कुछ एक उदाहरणों को छोड़कर अधिकांश मुसलमानों ने गैरों को काफिर माना है।




⛳ *आर्य सत्य विचार* ⛳


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Thursday, June 21, 2018

◙ *मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ…*_“ऋषिवर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे ४१...

◙ *मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ…*


_“ऋषिवर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे ४१ वर्ष हो चुके, परन्तु तुम्हारी दिव्य मूर्ति मेरे हृदय-पटल पर अब तक ज्यों-की-त्यों अंकित है. मेरे निर्बल हृदय के अतिरिक्त कौन मरणधर्मा मनुष्य जान सकता है कि कितनी बार गिरते-गिरते तुम्हारे स्मरण मात्र ने मेरी आत्मिक रक्षा की है. तुमने कितनी गिरी हुई आत्माओं की काया पलट दी, इसकी गणना कौन मनुष्य कर सकता है? परमात्मा के बिना, जिनकी पवित्र गोद में तुम इस समय विचर रहे हो, कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया है? परन्तु अपने विषय में मैं कह सकता हूँ कि तुम्हारे सत्संग ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चा जीवन-लाभ करने के योग्य बनाया?”_


_“मैं क्या था इसे इस कहानी में मैंने छिपाया नहीं. मैं क्या बन गया और अब क्या हूँ, वह सब तुम्हारी कृपा का ही परिणाम है. इसलिए इससे बढकर मेरे पास तुम्हारी जन्म-शताब्दी पर और कोई भेंट नहीं हो सकती कि तुम्हारा दिया आत्मिक जीवन तुम्हें ही अर्पण करुं. तुम वाणी द्वारा प्रचार करनेवाले केवल तत्ववेत्ता ही न थे, परन्तु जिन सच्चाइयों का तुम संसार में प्रचार करना चाहते थे उनको क्रिया में लाकर सिद्ध कर देना भी तुम्हारा ही काम था. भगवान् कृष्ण की तरह तुम्हारे लिए भी तीनों लोकों में कोई कर्तव्य शेष नहीं रह गया था, परन्तु तुमने भी मानव-संसार को सीधा मार्ग दिखाने के लिए कर्म की उपेक्षा नहीं की”._


_“भगवन् ! मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ. इसलिए जिस परमपिता की असीम गोद में तुम परमानन्द का अनुभव कर रहे हो, उसी से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे तुम्हारा सच्चा शिष्य बनने की शक्ति प्रदान करे”._


*- श्रद्धानन्द*


(अपने आत्मोत्सर्ग से दो वर्ष पूर्व वि.सं. १९८१ तदनुसार ई.१९२४ में प्रकाशित अपना आत्म-चरित *“कल्याण मार्ग का पथिक”* ऋषि दयानन्द सरस्वती के चरणों में सादर समर्पित करते हुवे स्वामी श्रद्धानन्द जी के मार्मिक शब्द… स्वामी जी की यह आत्मकथा अपने जन्म-वर्ष १८५७ ई. से १८९२ ई. तक कुल ३५ वर्षों के क्रिया-कलाप और घटनाओं का विवरण देती है. उसके आगे का जीवन तथा उनके कार्यों का लेखा-जोखा जानने के लिए पढें: *“स्वामी श्रद्धानन्द: एक विलक्षण व्यक्तित्व”*, सम्पादक: डॉ. विनोदचन्द्र विद्यालंकार)


* *स्त्रोत:* कल्याण मार्ग का पथिक(संस्करण २०१५, पृ.३)

* *लेखक:* स्वामी श्रद्धानन्द जी

* *सम्पादक:* डॉ. ज्वलन्तकुमार शास्त्री

* *प्रस्तुति:* राजेश ‘आर्य’

______________________________


◆ *Swami Shraddhanand* (MR Jambunathan)


https://drive.google.com/file/d/1ACWhRpU4mGpCKsx_OUzZRijHt9_cTD4x/view?usp=drivesdk

◆ *कल्याण मार्ग का पथिक* (स्वामी श्रद्धानन्द)


https://drive.google.com/file/d/1rN4XefoE0bB7JrEG3P0rPIjrcM0YVQyB/view?usp=drivesdk

◆ *वीर सन्यासी श्रद्धानन्द* (राम गोपाल)


https://drive.google.com/file/d/14By6FywhUouSzVbde5PCFvBGEQWr6K52/view?usp=drivesdk

◆ *स्वामी श्रद्धानन्द* (उमा चतुर्वेदी)


https://drive.google.com/file/d/1H1nxN3IBQ3_0Gp3kfai_fIEcWv79QmbK/view?usp=drivesdk

◆ *स्वामी श्रद्धानन्द* (सत्यदेव विद्यालंकार)


https://drive.google.com/file/d/1ZlDBiNqvzeoSe-3GoPwVWrinL7rc_bVM/view?usp=drivesdk


*II ओ३म् II*


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Monday, June 18, 2018

जब विमान उड़ता है तो दुर्घटना का खतरा तो होता ही है । यदि किसी को जल्दी पहुंचना हो, समय बचाना हो और...

जब विमान उड़ता है तो दुर्घटना का खतरा तो होता ही है । यदि किसी को जल्दी पहुंचना हो, समय बचाना हो और विमान की तकनीक का लाभ उठाना हो, तो उसे जोखिम तो लेना ही पड़ेगा ।

इसी प्रकार से जीवन में आपको किसी भी क्षेत्र में उन्नति करनी हो, आगे बढ़ना हो, तो वहां सफलता असफलता दोनों हो सकती हैं। इसलिए जोखिम तो लेना ही पड़ेगा।

विमान इस डर से आप न उड़ाएं कि कहीं दुर्घटना ना हो जाए, जमीन पर यह सुरक्षित है , तो उस विमान का कोई लाभ नहीं ।

ऐसे ही यदि आप किसी भी क्षेत्र में असफलता के भय से पुरुषार्थ ना करें, तो जीवन का कोई लाभ नहीं। जीवन इसीलिए ही तो है, कि जोखिम लिया जाए और उन्नति की जाए ।

हां इतना अवश्य ध्यान रखें, कि जोखिम सोच समझकर बुद्धिमत्ता पूर्वक लेना चाहिए , अंधाधुंध नहीं । अपनी क्षमता को देखकर जोखिम उठाना चाहिए । - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।*


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जब सूर्य उदय होता है तब करोड़ों व्यक्ति सो रहे होते हैं , तो भी सूर्य उनकी परवाह नहीं करता, कि लोग...

जब सूर्य उदय होता है तब करोड़ों व्यक्ति सो रहे होते हैं , तो भी सूर्य उनकी परवाह नहीं करता, कि लोग तो जागे नहीं, तो मैं उनके लिए सवेरा क्यों करूं ? फिर भी सूर्य अपना कार्य करता ही है ।

इसी प्रकार से आप देश धर्म समाज के लिए कार्य करते हैं , और देश धर्म समाज के लोग आपके कार्य का मूल्य नहीं समझते, उसको महत्व नहीं देते, आपके कार्य का सम्मान नहीं करते । तो इसका अर्थ यह नहीं है, कि आप अपना कार्य छोड़ देवें।

जैसे सूर्य अपना कार्य करता रहता है, कोई जागे या ना जागे, वह उदय होता ही है, और अपना प्रकाश फैलाता ही है । इसी प्रकार से कोई आपके कार्य का मूल्य समझे या न समझे, आप अपना कार्य करते रहें। हो सकता है, कि संसार के लोग आपके कार्य का मूल्य न समझें, परंतु ईश्वर तो अवश्य ही समझता है। समय आने पर ईश्वर तो अवश्य ही आपके कार्य का मूल्यांकन करेगा और निश्चित रूप से आपके उत्तम कर्मों का फल देगा। (सूर्य यद्यपि जड़ पदार्थ है वह सोचता नहीं है , फिर भी आलंकारिक रूप में हमने सूर्य का उदाहरण प्रस्तुत किया है) - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।*


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Sunday, June 10, 2018

*।। ओ३म् ।।**वैदिक साहित्य और विज्ञान*सूर्य की बाहरी परतों, जोकि डिस्क (फोटोस्फियर) के ऊपर हजारों...

*।। ओ३म् ।।*


*वैदिक साहित्य और विज्ञान*


सूर्य की बाहरी परतों, जोकि डिस्क (फोटोस्फियर) के ऊपर हजारों कि.मी. तक फैला है, को प्रभामंडल कहा जाता है। इसका तापमान मिलियन डिग्री केल्विन से भी अधिक है, जोकि करीबन 6000 केल्विन के सौर डिस्क तापमान से भी बहुत अधिक है। सौर भौतिकी में अब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाया है कि किस प्रकार प्रभामंडल का तापमान इतना अधिक होता है।

सूर्य के अध्धयन के लिए नासा के अतिरिक्त विश्व का हर देश जो ब्रम्हांड का रहस्यों को लेकर उत्सुक है सूर्य के अध्धयन के लिए आतुर है भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधानो को देखने वाला ISHRO भी सूर्य के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने के लिए आदित्य-1 मिशन सूर्य की स्टूडी के लिए भेजने की तैयारी कर रहा है, दृश्य उत्सर्जन रेखा प्रभामंडललेखी (वी.ई.एल.सी.) नामक महत्वाकांक्षी उपग्रह को ले जाने हेतु 400 कि.ग्रा. श्रेणी उपग्रह के रूप में किया गया था तथा उसे 800 कि.मी. निम्न भू कक्षा में स्थापित करने की योजना थी। सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लेग्रांजी बिंदु के आस-पास प्रभामंडल कक्षा में स्थापित उपग्रह से मुख्य लाभ यह होता है कि इससे बिना किसी आच्छादन/ग्रहण के लगातार सूर्य को देखा जा सकता है। अत: आदित्य-1 मिशन को अब “आदित्य-एल1 मिशन” में संशोधित कर दिया गया है और इसे एल़1 के आस-पास प्रभामंडल कक्षा में प्रविष्ट कराया जाएगा, जोकि पृथ्वी से 1.5 मिलियन कि.मी. पर है जिसका उद्देश्य सूर्य के उन रहस्यों को जानना है जिनसे अभी तक मानव सभ्यता अनजान है -


*इन वैज्ञानिक खोजो से पूर्ववर्ती वैदिक साहित्यो में पृथ्वी, सूर्य, ग्रहों, ब्रम्हांड आदि के बारे में पहले से ही लिखा गया है* सैकड़ो साल पहले आर्यभट्ट ने ग्रहों की दूरी का सटीक आकलन किया। वैदिक साहित्यो में आसान और आलंकारिक भाषा मे इसे समझाया गया लेकिन हम इन वैदिक साहित्यो को सिर्फ पूजा पाठ की सामग्री मानकर पढ़ना तो दूर इसके बारे में जानने के लिए भी कभी प्रयत्न नही करते -


सूर्य के विषय मे वैदिक साहित्य में विस्तृत जानकारी दी गयी है कुछ जानकारियां आइये आपसे साझा करता हूं -

1 - सूर्य_के_प्रकाश_की_गति -

आधुनिक विज्ञान अनुसार - 1,86,286 मील प्रति सेकेण्ड है ।


वैदिक - *‘तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते-द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते ।।’*

।। सायण ऋृग्वेद भाष्य 1.50.4 ।।

अर्थात्

आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है ।

गणना - ½ निमेश = 0.1056 सेकेण्ड

(निमेष की गणना प्रथम कंमेंट में )

अर्थात् 1 योजन = 9.09 मील

(योजन की गणना द्वितीय कमेंट में)

इस सूक्त के अनुसार -

प्रकाश की गति = 2202 योजन प्रति ½ निमेश

2202x9.09 मील प्रति 0.1056 सेकेण्ड = 189547.15909 मील प्रति सेकेण्ड


2 - सूर्य_के_किरणों_के_बारे_में -

आधुनिक विज्ञान - वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन ने इस तथ्य पर वैज्ञानिक प्रयोग किए तथा बताया कि श्वेत प्रकाश (सूर्य का प्रकाश या किरण) में सात रंग पहले से ही मौजूद होते है। प्रिज्म से गुजरने पर अपवर्तन के कारण यह 7 रंगों में विभक्त हो जाता है।

वैदिक -

*एको अश्वो वहति सप्तनामा ।* -ऋग्वेद 1-164-2

सूर्य के प्रकाश में 7 रंग होता है इस सूक्त में पहले से है ।

*अव दिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मय: ।* – अथर्ववेद 17-10 /17/9

सूर्य की सात किरणें दिन को उत्पन्न करती है। सूर्य के अंदर काले धब्बे होते है। जिसे विज्ञान आज इन धब्बो को सौर कलंक कहा है।


3 - सूर्य_की_बनावट -

आधुनिक विज्ञान - सूर्य का बाह्य प्रभामंडल दृश्यमान अंतिम परत है। इसके उपर की परते नग्न आंखों को दिखने लायक पर्याप्त प्रकाश उत्सर्जित करने के लिहाज से काफी ठंडी या काफी पतली है। और उसके चारो ओर गैसों का आवरण है ।

वैदिक -

*‘शकमयं धूमम् आराद् अपश्यम्, विषुवता पर एनावरेण।’* ऋग्वेद(1.164.43)

यानी सूर्य के चारों और दूर-दूर तक शक्तिशाली गैस फैली हुई हैं। यहां गैस के लिए धूम शब्द का प्रयोग किया गया है।


4 - ग्रहण_के_बारे_में -

आधुनिक विज्ञान - ग्रहण एक खगोलीय अवस्था है जिसमें कोई खगोलिय पिंड जैसे ग्रह या उपग्रह किसी प्रकाश के स्रोत जैसे सूर्य और दूसरे खगोलिय पिंड जैसे पृथ्वी के बीच आ जाता है जिससे प्रकाश का कुछ समय के लिये अवरोध हो जाता है इस अवस्था को ग्रहण कहते है।

वैदिक -

*यं वै सूर्य स्वर्भानु स्तमसा विध्यदासुर: ।*

*अत्रय स्तमन्वविन्दन्न हयन्ये अशक्नुन ॥* – ऋग्वेद 5-40-9

अर्थात जब चंद्रमा पृथ्वी ओर सूर्य के बीच में आ जाता है तो सूर्य पूरी तरह से स्पष्ट दिखाई नहीं देता। चंद्रमा द्वारा सूर्य के प्रकाश को ढंक लेना ही सूर्य ग्रहण है ।


5 - सूर्य_से_ग्रहों_की_दूरी -

आज पृथ्वी से सूर्य की दूरी (1.5 * 108 KM) है। इसे एयू (खगोलीय इकाई- astronomical unit) कहा जाता है। इस अनुपात के आधार पर निम्न सूची बनती है :-

ग्रह आर्यभट्ट का मान आधुनिक विज्ञान

बुध 0.375 एयू 0.387 एयू

शुक्र 0.725 एयू 0.723 एयू

मंगल 1.538 एयू 1.523 एयू

गुरु 5.16 एयू 5.20 एयू

शनि 9.41 एयू 9.54 एयू

ग्रहों की दूरी क्या हजारो वर्षो में प्रभावित नही हुई होगी ?


6 - सूर्य_एक_जीवाणुरोधी -

आधुनिक विज्ञान - अंधकार जीवाणुओं के परिवर्धन में सहायक है। बहुत से जीवाणु, जो सक्रिय रूप से अंधकार में चर (mobile) होते हैं, प्रकाश में लाए जाने पर आलसी हो जाता हैं तथा सूर्य के प्रकाश में पतले स्तर में रखे गए जीवाणु तीव्रता से मरते हैं। इन परिस्थितियों में कुछ केवल 10-15 मिनट के लिये जीवित रहते हैं। इसी कारण सूर्य का प्रकाश रोगजनक जीवाणुओं का नाश करनेवाले शक्तिशाली कारकों में माना गया है। साधारणत: दृश्य वर्णक्रम (spectrum) जीवाणुओं पर थोड़ा ही विपरीत प्रभाव रखते हैं तथा प्रकाश के वर्णक्रम के पराबैंगनी (ultraviolet) छोर में यह घातक शक्ति निहित रहती है।

वैदिक -

*'उत पुरस्तात् सूर्य एत, दुष्टान् च ध्नन् अदृष्टान् च,*

*सर्वान् च प्रमृणन् कृमीन्।’* अथर्ववेद (3.7)

अर्थात -

सूर्य का प्रकाश दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले सभी प्रकार के प्रदूषित जीवाणुओं और रोगाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है।


7 - चंद्रमा_पर_प्रकाश -

आधुनिक विज्ञान -

चंद्रमा का स्वयं का प्रकाश नहीं है। वह पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है। वह सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है।

वैदिक -

*सुषुम्णः सूर्य रश्मिः चंद्रमा गरन्धर्व, अस्यैको रश्मिः चंद्रमसं प्रति दीप्तयते।’*

निरुक्त( 2.6)

*'आदित्यतोअस्य दीप्तिर्भवति।’*

यानी सूर्य की सुषुम्ण नामक किरणें चंद्रमा को प्रकाश देती हैं। चंद्रमा का स्वयं का प्रकाश नहीं है। वह सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है।


विशेष -

प्राचीन काल से खगोल विज्ञान वेदांग का हिस्सा रहा है। ऋग्वेद, शतपथ ब्राहृण आदि ग्रथों में नक्षत्र, चान्द्रमास, सौरमास, मल मास, ऋतु परिवर्तन, उत्तरायन, दक्षिणायन, आकाशचक्र, सूर्य की महिमा, कल्प का माप आदि के संदर्भ में अनेक उद्धरण मिलते हैं। इस हेतु ऋषि प्रत्यक्ष अवलोकन करते थे। कहते हैं, ऋषि दीर्घतमस् सूर्य का अध्ययन करने में ही अंधे हुए, ऋषि गृत्स्मद ने चन्द्रमा के गर्भ पर होने वाले परिणामों के बारे में बताया। यजुर्वेद के 18वें अध्याय के चालीसवें मंत्र में यह बताया गया है कि सूर्य किरणों के कारण चन्द्रमा प्रकाशमान है।

यंत्रों का उपयोग कर खगोल का निरीक्षण करने की पद्धति रही है। आर्यभट्ट के समय आज से 1500 से अधिक वर्ष पूर्व पाटलीपुत्र में वेधशाला (Observatory) थी, जिसका प्रयोग कर आर्यभट्ट ने कई निष्कर्ष निकाले।

भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ के यंत्राध्याय प्रकरण में कहते हैं, “काल” के सूक्ष्म खण्डों का ज्ञान यंत्रों के बिना संभव नहीं है। इसलिए अब मैं यंत्रों के बारे में कहता हूं। वे नाड़ीवलय यंत्र, यष्टि यंत्र, घटी यंत्र, चक्र यंत्र, शंकु यंत्र, चाप, तुर्य, फलक आदि का वर्णन करते हैं।

प्रत्यक्ष निरीक्षण एवं अचूक ग्रहीय व कालगणना का 6000 वर्ष से अधिक पुराना इतिहास रखने वाले हम भारतीय आज पश्चिमी देशों की ओर उम्मीद से देखते है जबकि उनसे बेहतर हम सदियो से थे बस अपना आत्मगौरव भूले बैठे है । *आइये एक बेहतर सनातन परंपरा को आगे बढ़ाए। पौराणिक अंधश्रद्धा को छोड़ के वेदों की और पुनः लौटे ।*



*।। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।*


*ओ३म* 🚩


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*🔥ओ३म्🔥**सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन ।* यजुर्वेद- अ॰२७/मं॰१ हे मनुष्य ! दिव्य सौन्दर्य से जगमगा । ...

*🔥ओ३म्🔥*


*सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन ।* यजुर्वेद- अ॰२७/मं॰१


हे मनुष्य ! दिव्य सौन्दर्य से जगमगा ।

*💥शम्💥*

🔥

🚩


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प्रायः लोग रुपया पैसा जायदाद मोटर गाड़ी आदि , को ही धन के रूप में मानते हैं । ठीक है यह भी धन है ,...

प्रायः लोग रुपया पैसा जायदाद मोटर गाड़ी आदि , को ही धन के रूप में मानते हैं । ठीक है यह भी धन है , हम इसका विरोध नहीं करते।

परंतु इन सबसे बढ़िया धन *चरित्र का धन* है। और वह चरित्र का धन प्राप्त होता है , ईश्वर की उपासना से भक्ति से। परमात्मा का ध्यान करें। उससे जो आपके मन की शुद्धता बनेगी और फिर ईश्वर आपके मन में और आपकी आत्मा में जो सेवा परोपकार दान दया ईमानदारी सच्चाई आदि आदि गुणों की संपत्ति भर देगा, वास्तव में वही असली संपत्ति है। इन सारी चीजों को मिलाकर के चरित्र कहलाता है । इसलिए परमात्मा का ध्यान करें , ओम् नाम से ध्यान करें, अर्थ सहित करें। परमात्मा से इन गुणों की प्राप्ति करें , अपना चरित्र उज्जवल बनाएं । यही संसार में सबसे बड़ा धन है । जिसके पास यह धन है वही संसार में सबसे अधिक सुखी है । - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।*


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Saturday, May 5, 2018

आर्यों के विमर्श के लिए…आइए कुछ विचार करते हैं – ईश्वर और जीवात्मा के परिमाण और सूक्ष्म-स्थूल स्वरूप...

आर्यों के विमर्श के लिए…


आइए कुछ विचार करते हैं – ईश्वर और जीवात्मा के परिमाण और सूक्ष्म-स्थूल स्वरूप के विषय में

——————–


महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में ईश्वर और जीवात्मा दोनों चेतन (conscious), अदृश्य (invisible), अभौतिक (non-material or non-physical) सत्ताएं हैं।


ईश्वर अनन्त (infinite or endless) है, उसकी सत्ता अनन्त है। ऐसा कह सकते हैं कि वह इतना महान् है कि वह स्वयं भी अपना अन्त नहीं जानता, स्वयं को अनन्त ही समझता है ! यह विचित्र बात है जो आसानी से समझ में नहीं आती है। ईश्वर जैसी सत्ता भी स्वयं को अनन्त जाने अर्थात् अपनी ही विद्यमानता (presence) अवकाश (space) में कहां तक –कितने स्थान पर्यन्त है, इसका उसे ही ज्ञान न हो, अथवा स्वयं को अनन्त ही जाने – यह बात हम महर्षि दयानन्द जी के ग्रन्थ को प्रमाण मानकर स्वीकार तो कर लेते हैं, परन्तु इसे ठीक से – स्पष्ट संकल्पना पूर्वक (conceptually) समझना आसान नहीं है।


जैसे ईश्वर की अनन्त विद्यमानता (infinite presence) को समझना कठिन है, उसकी थाह पाना असम्भव-सा (unfathomable) है, वैसे ही जीवात्मा का अणु-स्वरूप, उसकी सूक्ष्म सत्ता, उसकी परिच्छिन्नता (finitude or boundedness) को समझना कठिन है, क्योंकि वह भी हम जान न पाए इतना छोटा (infinitely or immeasurably small) है।


जैसे क्षेत्र (domain, occupation, region, area, presence) की दृष्टि से ईश्वर अनन्त चेतन सत्ता है, वैसे ही जीवात्मा भी अत्यन्त अणु सत्ता है। जैसे अनन्त ईश्वर की सत्ता की कोई सीमा (border or limit) नहीं है, वैसे जीवात्मा ससीम होते हुए भी उसकी सूक्ष्मता (smallness or minuteness) भी एक प्रकार से ‘अनन्त’ है, वह इतना अत्यन्त अल्प है, छोटा है।


व्यापकत्व (pervasiveness or the quality of being pervaded, permeated or penetrated in others) की दृष्टि से विचार किया जाए तो ईश्वर सर्वव्यापक है, अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर है। इस गुण को लेकर दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में जीवात्मा को ईश्वर से स्थूल और ईश्वर को जीवात्मा से सूक्ष्म लिखा है। जीवात्मा में यह व्यापकत्व गुण नहीं है, ऐसा मैं समझता हूं।


एक कठिन विषय को मैंने अपनी अल्प मति से जैसा समझ पाया हूं, यहां प्रस्तुत करने का प्रयास किया है – इस आशा के साथ कि सुविज्ञ आर्य पाठक इन बातों पर सम्यक् विचार करेंगे जिससे सत्य की गवेषणा हो सके। मैंने यहां जो लिखा है वही सत्य है, ऐसा मैं मन में भी नहीं सोचता हूं। प्रत्युत मैं ऐसा समझता हूं कि यह विषय गहन है, अतः चिन्तनशील आर्यों को धैर्यपूर्वक विचार-विमर्श करना होगा।


जिन आर्यों ने ‘जीवात्मा सर्वथा निराकार नहीं है’ इस प्रकार की बातें प्रसारित की हैं, मैं नहीं समझता हूं कि उन्होंने किसी अ-भद्र भावना से ऐसा किया है। यह विषय ही ऐसा है कि कुछ लोग अन्यथा विचार या निर्णय कर सकते हैं।


लेखक : भावेश मेरजा ( आर्यसमाज, भरूच)


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*प्रश्न-* *सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:। गीता...

*प्रश्न-* *सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:। गीता १८/६६*


इस श्लोक का क्या अर्थ होता है?


*उत्तर"*


अर्थ : “सब धर्मों(वर्णाश्रम कर्त्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा । मैं तुझ को सब पापों से छुड़ा दूंगा ,चिन्ता मत कर ।


*भावार्थ-* सर्वत्र ब्रह्म को व्यापक देखने का अभ्यास करते-करते अब और आगे बढ़ें और वर्णाश्रम के धर्मों(कर्त्तव्यों) की परवाह छोड़कर सारा समय और अपनी सारी शक्ति ब्रह्म तन्मय हो जाने (समाधि आदि) में लगादें (उस के शरण में जाने का तात्त्पर्य यही है।) तो परमात्मा सर्व पापों से छुड़ा देगा ।


*प्रश्न-* *क्या परमेश्वर पाप को माफ़ कर देंगे? ,फल नहीं भुगवाएँगे?*


*उत्तर-* योग(ध्यान,धारणा,समाधि) तथा ज्ञानरुपी अग्नि में पापरुपी मल दग्ध हो जाता है । परंतु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि ईश्वर पापों को क्षमा कर देगा,पाप कर्म का दण्ड तो अवश्य मिलेगा ।


परंतु योग व ज्ञान से पापों की निवृत्ति होती है यहि अर्थग्रहण करना चाहिए, यही बात मुण्डकोपनिषद् में कही है : *मुण्डक :२ काण्ड :२ श्लोक संख्या :८ ) भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।*


*पदार्थ-* (भिद्यते) टूट जाती है। (हृदयग्रन्थिः) रोहे की गांठ अर्थात् सूक्ष्म शरीर से वियोग हो जाता है। जन्म-मरण में तो सूक्ष्म शरीर साथ रहता है, परन्तु उस दशा में पृथक् हो जाता है। (छिद्यन्ते) नष्ट हो जाते हैं। टूट जाते हैं। (सर्वसंशयाः) सब प्रकार के सन्देह। (क्षीयन्ते) क्षीण हो जाते हैं। (च) और (अस्य) उस ब्रह्मज्ञानी के। (कर्माणि) सब कर्म। (तस्मिन्) उस अवस्था में। (दृष्टे) जब साक्षात् देख लेता है। (परावरे) जो इन्द्रियों से अनुभव होने योग्य नहीं है। *भावार्थ-* जब कोई पुरुष इन्द्रियों से अनुभव न होने योग्य परमात्मा को भीतर ज्ञान-चक्षु से देख लेता है, तब उसके रोहे की गांठ अर्थात् सूक्ष्म शरीर का सबन्ध टूट जाता है। सब संदेहों का सबन्ध मन से है और मन का सूक्ष्म शरीर से। जब सूक्ष्म शरीर ही न रहा, तो मन कहां? जब मन ही नहीं तो उसमें उत्पन्न होने वाले संदेह कहां? *अतः सपूर्ण सन्देह दूर हो जाते हैं। और जब मन ही न रहा, जिसमें सब कर्मों के संस्कार रहते हैं तो उसमें रहने वाले कर्म किस प्रकार रह सकते हैं? उस ज्ञानी के सब कर्म नष्ट हो जाते हैं। इसी बात की उक्त "गीता” के श्लोक में सङ्गति करें ।*


*प्रश्न-क्या सपूर्ण कर्म ब्रह्मज्ञानी होने पर नष्ट हो जाते हैं?*


*उत्तर-* जब तक (वर्णाश्रम धर्मोंका) कर्मों का अभिमान बना है, तब तक ब्रह्मज्ञान या मुक्ति हो ही नहीं सकती। जब मुक्ति होती है, तब कोई कर्म शेष नहीं रहता। जैसे जब दीवाला निकल जावे तब लेने और देने की समाप्ति हो जाती है।


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*🔥ओ३म्🔥**🌿तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं...

*🔥ओ३म्🔥*


*🌿तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥* केनोपनिषद् काण्ड-३,श्लोक-६ ॥ 


*पदार्थ—* यक्ष ने (तस्मै) उस अग्निदेव के लिए (तृणम्) एक तिनका (निदधौ) धर दिया और (एतत्) इस तिनके को (दह, इति) जला दे, ऐसा कहा । अग्नि (तत्) उस तिनके के (सर्वजवेन, उपप्रेयाय) पूरे वेग से समीप गया, परन्तु (तत्) उसको (दग्धुम्) जलाने को (न, शशाक)समर्थ न हो सका । (ततः, एव) उसके बाद ही (सः) वह अग्निदेव (निववृते) वापस आ गए और दूसरे देवों से कहने लगे (यत्) जो (एतत्) यह (यक्षम्, इति) यक्ष है (एतत्) इसको (विज्ञातुम्) जानने को (न, अशकम्) मैं समर्थ नहीं हुआ ।

*भावार्थ—* यक्ष ने अग्नि के अहङ्कार का मर्दन करने के लिए अग्नि के सम्मुख एक छोटा सा तिनका रक्खा, किन्तु अग्नि अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को न जला सका और निराश होकर वापस आ गया और देवों से आकर कहने लगा कि मैं इस यक्ष को नहीं जान सका । क्रमश:…

*💥शम्💥*

🔥

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Friday, May 4, 2018

-( પાંચ ચોપડી ભણેલી - ફાઈવસ્ટાર ડાયેટિશ્યન )-ગીતા બહેન પટેલ -ખાલી પાંચ ચોપડી ભણેલા…પણ,એમની...

-( પાંચ ચોપડી ભણેલી - ફાઈવસ્ટાર ડાયેટિશ્યન )-


ગીતા બહેન પટેલ -

ખાલી પાંચ ચોપડી ભણેલા…

પણ,

એમની કોઠાસૂઝ ગજબની !


એમના પતિ કરસનભાઈને -

ડૉક્ટર ભાવસાર સાહેબે આ વખતે તો ચોક્ખા શબ્દોમાં કીધું કે -

હવે ડાયાબિટીસ કાબૂમાં નહિં રાખો…

તો,

પગ કપાવવો પડશે !


આ છેલ્લી વખતનું ઓપરેશન છે…

જો ‘સડો’ હાડકામાં પહોંચ્યો…

તો,

આટલા ડાયાબિટીસને લીધે - 'સેપ્ટિસિમીયા’ થઈ આખા શરીરમાં એનું ઝેર પહોંચી શકે છે !


જો એવું થાય તો,

ઝેરનાં લીધે -

કિડની, લિવર , મગજ , ફેફસાં અને હૃદય બધું જ ઠપ થઈ જાય !


ગીતા બહેને પણ આ વાતને ગંભીરતાથી લીધી.


એમણે ભાવસાર સાહેબને પૂછ્યું કે -

પહેલા તો એક ગોળી થી ડાયાબિટીસ કાબૂમાં આવતો હતો…

પછી,

ધીમે ધીમે બે, ત્રણ, ચાર ગોળીઓ અને પાછળથી તો એ પણ અસર કરતી ન હતી.


હવે તો ઈન્સ્યુલીનના ઈંજેકશન પણ થાકી ગયા હતા.


આ વખતનો એચ. બી. એ. વન. સી રિપોર્ટ ૧૨.૫ હતો,

ફાસ્ટિંગ ૨૨૦ અને પી.પી.બી.એસ. ૪૫૦.


દિવસે દિવસે પરિસ્થિતિ બેકાબૂ બનતી હતી…

એમાં -

હવે પગમાં કશું વાગી જાય તો -

ખબર પણ પડતી ન હતી !


જ્યારે પાકે અને રસી નીકળે…

ત્યારે -

કોઈ કહે તો જ કરસનભાઈનું ધ્યાન જાય.


એમને પગનાં તળિયામાં સોય વાગે કે કાચ કોઈ જ વેદના ના થાય.


આનું કારણ જાણવા ગીતાબહેને સાહેબને વિનંતી કરી…


ડૉક્ટર ભાવસારે જણાવ્યું કે -

લાંબા ગાળાના ડાયાબિટીસમાં આખા શરીરની લોહીની નળીઓ અને ચેતાઓ સૂઝી જાય છે.


હૃદય, કિડની, મગજ વગેરે અંગો ખરાબ થઈ જાય છે.


હૃદય અને મગજમાંથી -

વિવિધ અંગો હાથ પગ તરફ આવતી જતી ચેતાઓ પણ સૂઝીને બિનકાર્યક્ષમ થઈ જાય છે.


આ બધાને કારણે રોગપ્રતિકારક શક્તિ પણ ઘટે છે…

અને,

સંવેદના પણ જતી રહે છે.


એટલે -

નાનું મોટું વાગવાનું થાય તો ખબર પડતી નથી.


ગીતા બહેને પૂછ્યું કે -

સારામાં સારા ડાયાબિટીસના ડૉક્ટરોને બતાવવા છતાં પણ…

આ રોગ કેમ કાબૂમાં નથી આવતો ?


ડૉ. ભાવસારે જૂની બધી ફાઈલો અને રિપોર્ટ તપાસ્યાં.


ડૉક્ટરો તો બધાં ડીગ્રીધારી હતાં,

કોઈ ઊંટવૈદ પાસે તો એ લોકો જતાં ન હતાં.


દવાઓ પણ બધી જ સારી અને સ્ટાન્ડર્ડ હતી…


તો પછી -

પાંચ જ વર્ષમાં આ હાલત શા માટે ?


ડૉક્ટરે કઢાવી કરસનભાઈનાં ખોરાક (ભોજન) ની આદતોને…


ઊંડા ઊતરતા ખબર પડી કે -

એમને 'બે’ વખત પેટ ભરીને જમવાની આદત હતી.


આખા દિવસનો ખોરાક ખૂબ વધારે હતો…


પાછી,

તેમની આદત હતી કે -

બંને વખત પેટ ભરીને દબાવીને ઓડકાર આવે એમ ખાવું !


પાછું વચ્ચે-વચ્ચે નાસ્તા ફરસાણ અને ચાર-પાંચ વખત ચા-પાણી…


આ બધી આદતો -

ડાયાબિટીસનાં દર્દી માટે તો આપઘાત કરવા બરાબર કહેવાય !!


બીજું,

કરસનભાઈ જમવામાં માત્ર રોટલી , ભાખરી, પરોઠા અને શાક જ ખાતાં હતાં.


બધા ડૉક્ટરોએ -

એમને ભાત - બટાકા - ખાંડ - ગોળ -આઈસ્ક્રીમ - મિઠાઈથી દૂર રહેવાનું કીધું હતું.


એ બધી પરેજીઓનું એ ચુસ્ત પાલન કરતાં હતાં…


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