👉👉🌺ईशोपनिषद मन्त्र-3🌺👈👈
असुर्य्या नाम ते लोका अंधेन तमसावृताः।
तांस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः।।
वे ही मनुष्य असुर, दैत्य, राक्षस और दुष्ट हैं जो आत्मा में कुछ और, मन में कुछ और, वाणी में कुछ और व कर्म में कुछ और ही आचरण करते हैं।
ऐसे लोग अंधकार रूपी अज्ञान से सब ओर से ढके रहते हैं और इस प्रकार के आचरण से अपनी आत्मा का हत्या करते हैं। ऐसे लोग अविद्या रूपी दुःख के सागर को पार करके कभी आनंद को प्राप्त नहीं कर सकते।
और जो लोग आत्मा में सो मन में, मन में सो वाणी में, वाणी में सो कर्म में कपटरहित आचरण करते हैं वे ही देव व आर्यजन सब जग को पवित्र करते हुए इस लोक के साथ साथ परलोक में भी अनुपम आनंद प्राप्त करते हैं।
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