🌷ईश्वर जी ने योग के विषय मे पूछा था 🌷
गणित की संख्याओं को जोड़ने के लिए
भी ‘योग’ शब्द का प्रयोग किया जाता है
परन्तु आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि में जब ‘योग’ शब्द
का प्रयोग किया जाता है तब उसका अर्थ
आत्मा को परमात्मा से जोड़ना होता है।
महर्षि पंतजलि ने आत्मा को परमात्मा से
जोड़ने की क्रिया को आठ भागों में बांट
दिया है। यही क्रिया अष्टांग योग के नाम से
प्रसिद्ध है। आत्मा में बेहद बिखराव (विक्षेप)
है जिसके कारण वह परमात्मा, जो आत्मा में
भी व्याप्त है, की अनुभूति नहीं कर पाता। यूँ
भी कहा जा सकता है कि अपने
विक्षेपों (बिखराव) के समाप्त होने पर
आत्मा स्वत: ही परमात्मा को पा लेता है।
योग के आठों अंगों का ध्येय आत्मा के
विक्षेपों को दूर करना ही है।
परमात्मा को प्राप्त करने का अष्टांग योग से
अन्य कोर्इ मार्ग नहीं। अष्टांग योग के पहले
दो अंग-यम और नियम हमारे संसारिक व्यवहार
में सिद्धान्तिक एकरूपता लाते हैं। अन्य छ: अंग
आत्मा के अन्य विक्षेपों को दूर करते हैं।
महर्षि पंतजलि द्वारा वर्णित योग के आठ
अंगो के क्रम का भी अत्यन्त मह त्त्व है। हर अंग
आत्मा के विशिष्ट (खास तरह के)
विक्षेपों को दूर करता है परन्तु तभी, जब उसके
पहले के अंग सिद्ध कर लिए गए हों।
उदाहरणार्थ यम और नियम को सिद्ध किए
बगैर आसन को सिद्ध नहीं किया जा सकता।
सभी मतवाले इस बात को मानते हैं कि असत्य,
हिंसा आदि (सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्राचर्य
और अपरिग्रह, अष्टांग योग के पहले अंग-यम के
विभाग हैं) की राह पर चलने वाले र्इश्वर
को कभी नहीं पास करते। यह इस बात
की पुष्टि ही है कि र्इश्वर को पाने
का अष्टांग योग एक मात्र रास्ता है।
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