Monday, July 23, 2018

क्या ऐसा ग्रंथ किसी अन्य धर्म मैं है ?इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए...

क्या ऐसा ग्रंथ किसी अन्य धर्म मैं है ?

इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए —


यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ


क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े

तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे।


जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ “राघवयादवीयम्” ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है।


इस ग्रन्थ को

‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे

पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और

विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।


पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ “राघवयादवीयम।”


उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः


वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥


अर्थातः

मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो

जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।


विलोमम्:


सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥


अर्थातः

मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के

चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ

विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।


“ राघवयादवीयम” के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-


राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥


विलोमम्:

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥


साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।

पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥


विलोमम्:

वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।

राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥


कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।

सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥


विलोमम्:

भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।

कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥


रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।

नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥


विलोमम्:

यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।

तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥


यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।

तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥


विलोमम्:

तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।

सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥


मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।

काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥


विलोमम्:

तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।

तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥


रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।

कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥


विलोमम्:

मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।

तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥


सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।

साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥


विलोमम्:

हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।

यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥


सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।

सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥


विलोमम्:


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Friday, July 13, 2018

*🔥ओ३म्🔥**“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति...

*🔥ओ३म्🔥*


*“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति ॥”* केनोपनिषद् काण्ड-३,श्लोक-१२ ॥


*पदार्थ—* _(सः) वह इन्द्र=जीवात्मा (तस्मिन्, एव) उसी अर्थात् जहां ब्रह्म यक्षरूप में प्रकट हुआ और अन्तर्धान हुआ, (आकाशे) हृदयाकाश में (हैमवतीम्) हिरण्यमयी दिव्यप्रज्ञावाली अथवा सन्ताप को नष्ट करने वाले शान्त्यादि गुणों से सम्पन्न (बहुशोभमानाम्) (उमाम्) ब्रह्मविद्यारूपी (स्त्रियम्) स्त्री के समीप (आजगाम) प्राप्त हुआ और (ताम्) उससे (ह) दुःखी सा होकर (उवाच) बोला कि (एतत्) यह (यक्षम्) यक्ष (किम्, इति) कौन है ?_

*भावार्थ—* इन्द्र (जीवात्मा) को यक्ष (ब्रह्म) के अन्तर्धान होने पर बहुत दुःख हुआ कि वह यक्ष को जानने के लिए आया था किन्तु जानने का ही अवसर नहीं मिला । तत्पश्चात् जीवात्मा ने योगाङ्गों का अनुष्ठान करते हुए अन्तःकरण को शुद्ध किया और ब्रह्मविद्या को प्राप्त किया । यही इन्द्र की उमा=ब्रह्मविद्या से यक्ष को जानने की प्रार्थना है। यहां ‘उमा’ कोई स्त्रीविशेष नहीं है अपितु ‘उमा ब्रह्मविद्या’ (तैत्तिरीयोप० १।४८) इस प्रमाण से ब्रह्मविद्या का नाम ही ‘उमा’ है । ‘उमा’ अर्थ ही *—‘उम्=परमात्मानं माति प्रमापयति’* अर्थात् जो परब्रह्म का ज्ञान कराती है ।

जब जीव योगसाधना करके दिव्य प्रज्ञा प्राप्त करता है, तब ब्रह्मविद्या से मिलन=ब्रह्म-प्राप्ति होती है और यक्ष (ब्रह्म) को जान पाता है । योग की दिव्यविभूतियां प्राप्त करना ही ब्रह्मविद्या (उमा) के दिव्य आभूषण हैं । इस उमा (ब्रह्मविद्या) से ब्रह्म की प्राप्ति होती है, इस विषय में उपनिषदों में अन्यत्र भी कहा है— *“दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्म- दर्शिभिः ॥”*(कठोप०) अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान सूक्ष्मबुद्धि से होता है । यह सूक्ष्मबुद्धि ब्रह्मज्ञान से ही होती है । ब्रह्म की प्राप्ति कहां होती है ? इस प्रश्न का भी यहां स्पष्ट समाधान किया है । ब्रह्म को खोजने के लिए बाह्य जगत् की कोई आवश्यकता नहीं होती । ब्रह्म को तो हृदय रूप आकाश में प्राप्त किया जाता है, जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् (प्रपा० ८ । मं० १) में स्पष्टरूप से कहा है—


*“अथ यदिमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तरा- काशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥”* इसका अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं—

*“कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में और उदर के ऊपर जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त्त है, उसमें कमल के आकार वेश्म अर्थात् अवकाश रूप एक स्थान है और उसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर भर रहा है, वह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिल जाता है । दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है ।”* (ऋ० भू० उपासनाविषय)


इस खण्ड में वर्णित आख्यायिका के विषय में महर्षि दयानन्द कहते हैं— *“केनोपनिषद् में एक यक्ष की वार्त्ता है । यक्ष ने अग्नि के सम्मुख तृण डाला और अग्नि से कहा कि इस तिनके को तू जला दे । अग्नि से वह तिनका न जल सका, फिर वायु से कहा कि तू इस तिनके को उड़ा ले जा, वायु से भी वह तिनका न उड़ सका । ऐसा कहकर जो हैमवती नामक ब्रह्मविद्या है, उसका माहात्म्य दर्शाया है ।”* (पूना प्रवचन ७४ पृ०)


इस तृतीय खण्ड में आलङ्कारिक आख्यायिका के द्वारा ब्रह्म की महत्ता, अग्नि आदि समस्त देवों की ब्रह्म की शक्ति से ही शक्तिसम्पन्नता, ब्रह्म का अविद्याग्रस्त से छिप जाना और विद्वान् व शान्त्यादि गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को ब्रह्मज्ञान होना इत्यादि विषयों का वर्णन किया गया है ।

*💥शम्💥*

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Friday, June 22, 2018

◙ *मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ…*_“ऋषिवर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे ४१...

◙ *मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ…*


_“ऋषिवर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे ४१ वर्ष हो चुके, परन्तु तुम्हारी दिव्य मूर्ति मेरे हृदय-पटल पर अब तक ज्यों-की-त्यों अंकित है. मेरे निर्बल हृदय के अतिरिक्त कौन मरणधर्मा मनुष्य जान सकता है कि कितनी बार गिरते-गिरते तुम्हारे स्मरण मात्र ने मेरी आत्मिक रक्षा की है. तुमने कितनी गिरी हुई आत्माओं की काया पलट दी, इसकी गणना कौन मनुष्य कर सकता है? परमात्मा के बिना, जिनकी पवित्र गोद में तुम इस समय विचर रहे हो, कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया है? परन्तु अपने विषय में मैं कह सकता हूँ कि तुम्हारे सत्संग ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चा जीवन-लाभ करने के योग्य बनाया?”_


_“मैं क्या था इसे इस कहानी में मैंने छिपाया नहीं. मैं क्या बन गया और अब क्या हूँ, वह सब तुम्हारी कृपा का ही परिणाम है. इसलिए इससे बढकर मेरे पास तुम्हारी जन्म-शताब्दी पर और कोई भेंट नहीं हो सकती कि तुम्हारा दिया आत्मिक जीवन तुम्हें ही अर्पण करुं. तुम वाणी द्वारा प्रचार करनेवाले केवल तत्ववेत्ता ही न थे, परन्तु जिन सच्चाइयों का तुम संसार में प्रचार करना चाहते थे उनको क्रिया में लाकर सिद्ध कर देना भी तुम्हारा ही काम था. भगवान् कृष्ण की तरह तुम्हारे लिए भी तीनों लोकों में कोई कर्तव्य शेष नहीं रह गया था, परन्तु तुमने भी मानव-संसार को सीधा मार्ग दिखाने के लिए कर्म की उपेक्षा नहीं की”._


_“भगवन् ! मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ. इसलिए जिस परमपिता की असीम गोद में तुम परमानन्द का अनुभव कर रहे हो, उसी से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे तुम्हारा सच्चा शिष्य बनने की शक्ति प्रदान करे”._


*- श्रद्धानन्द*


(अपने आत्मोत्सर्ग से दो वर्ष पूर्व वि.सं. १९८१ तदनुसार ई.१९२४ में प्रकाशित अपना आत्म-चरित *“कल्याण मार्ग का पथिक”* ऋषि दयानन्द सरस्वती के चरणों में सादर समर्पित करते हुवे स्वामी श्रद्धानन्द जी के मार्मिक शब्द… स्वामी जी की यह आत्मकथा अपने जन्म-वर्ष १८५७ ई. से १८९२ ई. तक कुल ३५ वर्षों के क्रिया-कलाप और घटनाओं का विवरण देती है. उसके आगे का जीवन तथा उनके कार्यों का लेखा-जोखा जानने के लिए पढें: *“स्वामी श्रद्धानन्द: एक विलक्षण व्यक्तित्व”*, सम्पादक: डॉ. विनोदचन्द्र विद्यालंकार)


* *स्त्रोत:* कल्याण मार्ग का पथिक(संस्करण २०१५, पृ.३)

* *लेखक:* स्वामी श्रद्धानन्द जी

* *सम्पादक:* डॉ. ज्वलन्तकुमार शास्त्री

* *प्रस्तुति:* राजेश ‘आर्य’

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◆ *Swami Shraddhanand* (MR Jambunathan)


https://drive.google.com/file/d/1ACWhRpU4mGpCKsx_OUzZRijHt9_cTD4x/view?usp=drivesdk

◆ *कल्याण मार्ग का पथिक* (स्वामी श्रद्धानन्द)


https://drive.google.com/file/d/1rN4XefoE0bB7JrEG3P0rPIjrcM0YVQyB/view?usp=drivesdk

◆ *वीर सन्यासी श्रद्धानन्द* (राम गोपाल)


https://drive.google.com/file/d/14By6FywhUouSzVbde5PCFvBGEQWr6K52/view?usp=drivesdk

◆ *स्वामी श्रद्धानन्द* (उमा चतुर्वेदी)


https://drive.google.com/file/d/1H1nxN3IBQ3_0Gp3kfai_fIEcWv79QmbK/view?usp=drivesdk

◆ *स्वामी श्रद्धानन्द* (सत्यदेव विद्यालंकार)


https://drive.google.com/file/d/1ZlDBiNqvzeoSe-3GoPwVWrinL7rc_bVM/view?usp=drivesdk


*II ओ३म् II*


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💭 *इस्लाम व कुरान पर भारत के प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा दिए गए क्रांतिकारी विचार*➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖🔺 *स्वामी...

💭 *इस्लाम व कुरान पर भारत के प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा दिए गए क्रांतिकारी विचार*

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🔺 *स्वामी विवेकानन्द*


ऎसा कोई अन्य मजहब नहीं जिसने इतना अधिक रक्तपात किया हो और अन्य के लिए इतना क्रूर हो। इनके अनुसार जो कुरान को नहीं मानता कत्ल कर दिया जाना चाहिए। उसको मारना उस पर दया करना है। जन्नत ( जहां हूरे और अन्य सभी प्रकार की विलासिता सामग्री है ) पाने का निश्चित तरीका गैर ईमान वालों को मारना है। इस्लाम द्वारा किया गया रक्तपात इसी विश्वास के कारण हुआ है।


कम्प्लीट वर्क आफ विवेकानन्द वॉल्यूम २ पृष्ठ २५२-२५३



🔺 *गुरु नानक देव जी*


मुसलमान सैय्यद, शेख, मुगल पठान आदि सभी बहुत निर्दयी हो गए हैं। जो लोग मुसलमान नहीं बनते थें उनके शरीर में कीलें ठोककर एवं कुत्तों से नुचवाकर मरवा दिया जाता था।


नानक प्रकाश तथा प्रेमनाथ जोशी की पुस्तक पैन इस्लाममिज्म रोलिंग बैंक पृष्ठ ८०


🔺 *महर्षि दयानन्द सरस्वती*


इस मजहब में अल्लाह और रसूल के वास्ते संसार को लुटवाना और लूट के माल में खुदा को हिस्सेदार बनाना शबाब का काम हैं। जो मुसलमान नहीं बनते उन लोगों को मारना और बदले में बहिश्त को पाना आदि पक्षपात की बातें ईश्वर की नहीं हो सकती। श्रेष्ठ गैर मुसलमानों से शत्रुता और दुष्ट मुसलमानों से मित्रता, जन्नत में अनेक औरतों और लौंडे होना आदि निन्दित उपदेश कुएं में डालने योग्य हैं। अनेक स्त्रियों को रखने वाले मुहम्मद साहब निर्दयी, राक्षस व विषयासक्त मनुष्य थें, एवं इस्लाम से अधिक अशांति फैलाने वाला दुष्ट मत दूसरा और कोई नहीं। इस्लाम मत की मुख्य पुस्तक कुरान पर हमारा यह लेख हठ, दुराग्रह, ईर्ष्या विवाद और विरोध घटाने के लिए लिखा गया, न कि इसको बढ़ाने के लिए। सब सज्जनों के सामन रखने का उद्देश्य अच्छाई को ग्रहण करना और बुराई को त्यागना है ।।


सत्यार्थ प्रकाश १४ वां समुल्लास विक्रमी २०६१


🔺 *महर्षि अरविन्द*


हिन्दू मुस्लिम एकता असम्भव है क्योंकि मुस्लिम कुरान मत हिन्दू को मित्र रूप में सहन नहीं करता। हिन्दू मुस्लिम एकता का अर्थ हिन्दुओं की गुलामी नहीं होना चाहिए। इस सच्चाई की उपेक्षा करने से लाभ नहीं। किसी दिन हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ने हेतु तैयार होना चाहिए। हम भ्रमित न हों और समस्या के हल से पलायन न करें। हिन्दू मुस्लिम समस्या का हल अंग्रेजों के जाने से पहले सोच लेना चाहिए अन्यथा गृहयुद्ध के खतरे की सम्भावना है । ।


ए बी पुरानी इवनिंग टाक्स विद अरविन्द पृष्ठ २९१-२८९-६६६


🔺 *सरदार वल्लभ भाई पटेल*


मैं अब देखता हूं कि उन्हीं युक्तियों को यहां फिर अपनाया जा रहा है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था। मुसलमानों की पृथक बस्तियां बसाई जा रहीं हैं। मुस्लिम लीग के प्रवक्ताओं की वाणी में भरपूर विष है। मुसलमानों को अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए। मुसलमानों को अपनी मनचाही वस्तु पाकिस्तान मिल गया हैं वे ही पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं, क्योंकि मुसलमान देश के विभाजन के अगुआ थे न कि पाकिस्तान के वासी। जिन लोगों ने मजहब के नाम पर विशेष सुविधांए चाहिंए वे पाकिस्तान चले जाएं इसीलिए उसका निर्माण हुआ है। वे मुसलमान लोग पुनः फूट के बीज बोना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि देश का पुनः विभाजन हो।


संविधान सभा में दिए गए भाषण का सार।


🔺 *भीम राव अंबेडकर*


हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है। यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं। साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा। विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी। पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है। मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है। कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है, इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य है। मुसलामनों के निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होती है। इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता। संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपेन शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया। कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है। गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है। इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं। धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते। मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती। वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते।


प्रमाण सार डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१


🔺 *माधवराव सदाशिवराव* गोलवलकर


पाकिस्तान बनने के पश्चात जो मुसलमान भारत में रह गए हैं क्या उनकी हिन्दुओं के प्रति शत्रुता , उनकी हत्या, लूट दंगे, आगजनी, बलात्कार, आदि पुरानी मानसिकता बदल गयी है, ऐसा विश्वास करना आत्मघाती होगा। पाकिस्तान बनने के पश्चात हिन्दुओं के प्रति मुस्लिम खतरा सैकड़ों गुणा बढ़ गया है। पाकिस्तान और बांग्लादेश से घुसपैठ बढ़ रही है। दिल्ली से लेकर रामपुर और लखनऊ तक मुसलमान खतरनाक हथियारों की जमाखोरी कर रहे हैं। ताकि पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण करने पर वे अपने भाइयों की सहायता कर सके। अनेक भारतीय मुसलमान ट्रांसमीटर के द्वारा पाकिस्तान के साथ लगातार सम्पर्क में हैं। सरकारी पदों पर आसीन मुसलमान भी राष्ट्र विरोधी गोष्ठियों में भाषण देते हें। यदि यहां उनके हितों को सुरक्षित नहीं रखा गया तो वे सशस्त्र क्रांति के खड़े होंगें।


बंच आफ थाट्स पहला आंतरिक खतरा मुसलमान पृष्ठ १७७-१८७


🔺 *गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर*


ईसाई व मुसलमान मत अन्य सभी को समाप्त करने हेतु कटिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य केवल अपने मत पर चलना नहीं है अपितु मानव धर्म को नष्ट करना है। वे अपनी राष्ट्र भक्ति गैर मुस्लिम देश के प्रति नहीं रख सकते। वे संसार के किसी भी मुस्लिम एवं मुस्लिम देश के प्रति तो वफादार हो सकते हैं परन्तु किसी अन्य हिन्दू या हिन्दू देश के प्रति नहीं। सम्भवतः मुसलमान और हिन्दू कुछ समय के लिए एक दूसरे के प्रति बनवटी मित्रता तो स्थापित कर सकते हैं परन्तु स्थायी मित्रता नहीं।


- रवीन्द्र नाथ वाडमय २४ वां खण्ड पृच्च्ठ २७५ , टाइम्स आफ इंडिया १७-०४-१९२७ , कालान्तर


🔺 *मोहनदास करम चन्द्र गांधी*


मेरा अपना अनुभव है कि मुसलमान कूर और हिन्दू कायर होते हैं मोपला और नोआखली के दंगों में मुसलमानों द्वारा की गयी असंख्य हिन्दुओं की हिंसा को देखकर अहिंसा नीति से मेरा विचार बदल रहा है।


गांधी जी की जीवनी, धनंजय कौर पृष्ठ ४०२ व मुस्लिम राजनीति श्री पुरूषोत्तम योग


🔺 *लाला लाजपत राय*


मुस्लिम कानून और मुस्लिम इतिहास को पढ़ने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि उनका मजहब उनके अच्छे मार्ग में एक रुकावट है। मुसलमान जनतांत्रिक आधार पर भारत पर शासन चलाने हेतु हिन्दुओं के साथ एक नहीं हो सकते। क्या कोई मुसलमान कुरान के विपरीत जा सकता है ? हिन्दुओं के विरूद्ध कुरान और हदीस की निषेधाज्ञा की क्या हमें एक होने देगी ? मुझे डर है कि भरत के ७ करोड़ मुसलमान अफगानिस्तान, मध्य एशिया अरब, मैसोपोटामिया और तुर्की के हथियारबंद गिरोह मिलकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देंगें।


पत्र सी आर दास बी एस ए वाडमय खण्ड १५ पृष्ठ २७५


🔺 *समर्थ गुरू राम दास जी*


छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरू अपने ग्रंथ दास बोध में लिखते हैं कि मुसलमान शासकों द्वारा कुरान के अनुसार काफिर हिन्दू नारियों से बलात्कार किए गए जिससे दुःखी होकर अनेकों ने आत्महत्या कर ली। मुसलमान न बनने पर अनेक कत्ल किए एवं अगणित बच्चे अपने मां बाप को देखकर रोते रहे। मुसलमान आक्रमणकारी पशुओं के समान निर्दयी थे, उन्होंने धर्म परिवर्तन न करने वालों को जिन्दा ही धरती में दबा दिया।


- डा एस डी कुलकर्णी कृत एन्कांउटर विद इस्लाम पृष्ठ २६७-२६८


🔺 *राजा राममोहन राय*


मुसलमानों ने यह मान रखा है कि कुरान की आयतें अल्लाह का हुक्म हैं। और कुरान पर विश्वास न करने वालों का कत्ल करना उचित है। इसी कारण मुसलमानों ने हिन्दुओं पर अत्यधिक अत्याचार किए, उनका वध किया, लूटा व उन्हें गुलाम बनाया।


वाङ्मय-राजा राममोहन राय पृष्ट ७२६-७२७


🔺 *श्रीमति ऐनी बेसेन्ट*


मुसलमानों के दिल में गैर मुसलमानों के विरूद्ध नंगी और बेशर्मी की हद तक तक नफरत हैं। हमने मुसलमान नेताओं को यह कहते हुए सुना है कि यदि अफगान भारत पर हमला करें तो वे मसलमानों की रक्षा और हिन्दुओं की हत्या करेंगे। मुसलमानों की पहली वफादार मुस्लिम देशों के प्रति हैं, हमारी मातृभूमि के लिए नहीं। यह भी ज्ञात हुआ है कि उनकी इच्छा अंग्रेजों के पश्चात यहां अल्लाह का साम्राज्य स्थापित करने की है न कि सारे संसार के स्वामी व प्रेमी परमात्मा का। स्वाधीन भारत के बारे में सोचते समय हमें मुस्लिम शासन के अंत के बारे में विचार करना होगा।


- कलकत्ता सेशन १९१७ डा बी एस ए सम्पूर्ण वाङ्मय खण्ड, पृष्ठ २७२-२७५


🔺 *स्वामी रामतीर्थ*


अज्ञानी मुसलमानों का दिल ईश्वरीय प्रेम और मानवीय भाईचारे की शिक्षा के स्थान पर नफरत, अलगाववाद, पक्षपात और हिंसा से कूट कूट कर भरा है। मुसलमानों द्वारा लिखे गए इतिहास से इन तथ्यों की पुष्टि होती है। गैर मुसलमानों आर्य खालसा का बड़ी संख्या में काफिर कहकर संहार किया गया। लाखों असहाय स्त्रियों को बिछौना बनाया गया। उनसे इस्लाम के रक्षकों ने अपनी काम पिपासा को शान्त किया। उनके घरों को छीना गया और हजारों हिन्दुओं को गुलाम बनाया गया। क्या यही है शांति का मजहब इस्लाम ? कुछ एक उदाहरणों को छोड़कर अधिकांश मुसलमानों ने गैरों को काफिर माना है।




⛳ *आर्य सत्य विचार* ⛳


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Thursday, June 21, 2018

◙ *मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ…*_“ऋषिवर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे ४१...

◙ *मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ…*


_“ऋषिवर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे ४१ वर्ष हो चुके, परन्तु तुम्हारी दिव्य मूर्ति मेरे हृदय-पटल पर अब तक ज्यों-की-त्यों अंकित है. मेरे निर्बल हृदय के अतिरिक्त कौन मरणधर्मा मनुष्य जान सकता है कि कितनी बार गिरते-गिरते तुम्हारे स्मरण मात्र ने मेरी आत्मिक रक्षा की है. तुमने कितनी गिरी हुई आत्माओं की काया पलट दी, इसकी गणना कौन मनुष्य कर सकता है? परमात्मा के बिना, जिनकी पवित्र गोद में तुम इस समय विचर रहे हो, कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया है? परन्तु अपने विषय में मैं कह सकता हूँ कि तुम्हारे सत्संग ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चा जीवन-लाभ करने के योग्य बनाया?”_


_“मैं क्या था इसे इस कहानी में मैंने छिपाया नहीं. मैं क्या बन गया और अब क्या हूँ, वह सब तुम्हारी कृपा का ही परिणाम है. इसलिए इससे बढकर मेरे पास तुम्हारी जन्म-शताब्दी पर और कोई भेंट नहीं हो सकती कि तुम्हारा दिया आत्मिक जीवन तुम्हें ही अर्पण करुं. तुम वाणी द्वारा प्रचार करनेवाले केवल तत्ववेत्ता ही न थे, परन्तु जिन सच्चाइयों का तुम संसार में प्रचार करना चाहते थे उनको क्रिया में लाकर सिद्ध कर देना भी तुम्हारा ही काम था. भगवान् कृष्ण की तरह तुम्हारे लिए भी तीनों लोकों में कोई कर्तव्य शेष नहीं रह गया था, परन्तु तुमने भी मानव-संसार को सीधा मार्ग दिखाने के लिए कर्म की उपेक्षा नहीं की”._


_“भगवन् ! मैं तुम्हारा ऋणी हूँ; उस ऋण मे मुक्त होना चाहता हूँ. इसलिए जिस परमपिता की असीम गोद में तुम परमानन्द का अनुभव कर रहे हो, उसी से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे तुम्हारा सच्चा शिष्य बनने की शक्ति प्रदान करे”._


*- श्रद्धानन्द*


(अपने आत्मोत्सर्ग से दो वर्ष पूर्व वि.सं. १९८१ तदनुसार ई.१९२४ में प्रकाशित अपना आत्म-चरित *“कल्याण मार्ग का पथिक”* ऋषि दयानन्द सरस्वती के चरणों में सादर समर्पित करते हुवे स्वामी श्रद्धानन्द जी के मार्मिक शब्द… स्वामी जी की यह आत्मकथा अपने जन्म-वर्ष १८५७ ई. से १८९२ ई. तक कुल ३५ वर्षों के क्रिया-कलाप और घटनाओं का विवरण देती है. उसके आगे का जीवन तथा उनके कार्यों का लेखा-जोखा जानने के लिए पढें: *“स्वामी श्रद्धानन्द: एक विलक्षण व्यक्तित्व”*, सम्पादक: डॉ. विनोदचन्द्र विद्यालंकार)


* *स्त्रोत:* कल्याण मार्ग का पथिक(संस्करण २०१५, पृ.३)

* *लेखक:* स्वामी श्रद्धानन्द जी

* *सम्पादक:* डॉ. ज्वलन्तकुमार शास्त्री

* *प्रस्तुति:* राजेश ‘आर्य’

______________________________


◆ *Swami Shraddhanand* (MR Jambunathan)


https://drive.google.com/file/d/1ACWhRpU4mGpCKsx_OUzZRijHt9_cTD4x/view?usp=drivesdk

◆ *कल्याण मार्ग का पथिक* (स्वामी श्रद्धानन्द)


https://drive.google.com/file/d/1rN4XefoE0bB7JrEG3P0rPIjrcM0YVQyB/view?usp=drivesdk

◆ *वीर सन्यासी श्रद्धानन्द* (राम गोपाल)


https://drive.google.com/file/d/14By6FywhUouSzVbde5PCFvBGEQWr6K52/view?usp=drivesdk

◆ *स्वामी श्रद्धानन्द* (उमा चतुर्वेदी)


https://drive.google.com/file/d/1H1nxN3IBQ3_0Gp3kfai_fIEcWv79QmbK/view?usp=drivesdk

◆ *स्वामी श्रद्धानन्द* (सत्यदेव विद्यालंकार)


https://drive.google.com/file/d/1ZlDBiNqvzeoSe-3GoPwVWrinL7rc_bVM/view?usp=drivesdk


*II ओ३म् II*


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Monday, June 18, 2018

जब विमान उड़ता है तो दुर्घटना का खतरा तो होता ही है । यदि किसी को जल्दी पहुंचना हो, समय बचाना हो और...

जब विमान उड़ता है तो दुर्घटना का खतरा तो होता ही है । यदि किसी को जल्दी पहुंचना हो, समय बचाना हो और विमान की तकनीक का लाभ उठाना हो, तो उसे जोखिम तो लेना ही पड़ेगा ।

इसी प्रकार से जीवन में आपको किसी भी क्षेत्र में उन्नति करनी हो, आगे बढ़ना हो, तो वहां सफलता असफलता दोनों हो सकती हैं। इसलिए जोखिम तो लेना ही पड़ेगा।

विमान इस डर से आप न उड़ाएं कि कहीं दुर्घटना ना हो जाए, जमीन पर यह सुरक्षित है , तो उस विमान का कोई लाभ नहीं ।

ऐसे ही यदि आप किसी भी क्षेत्र में असफलता के भय से पुरुषार्थ ना करें, तो जीवन का कोई लाभ नहीं। जीवन इसीलिए ही तो है, कि जोखिम लिया जाए और उन्नति की जाए ।

हां इतना अवश्य ध्यान रखें, कि जोखिम सोच समझकर बुद्धिमत्ता पूर्वक लेना चाहिए , अंधाधुंध नहीं । अपनी क्षमता को देखकर जोखिम उठाना चाहिए । - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।*


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जब सूर्य उदय होता है तब करोड़ों व्यक्ति सो रहे होते हैं , तो भी सूर्य उनकी परवाह नहीं करता, कि लोग...

जब सूर्य उदय होता है तब करोड़ों व्यक्ति सो रहे होते हैं , तो भी सूर्य उनकी परवाह नहीं करता, कि लोग तो जागे नहीं, तो मैं उनके लिए सवेरा क्यों करूं ? फिर भी सूर्य अपना कार्य करता ही है ।

इसी प्रकार से आप देश धर्म समाज के लिए कार्य करते हैं , और देश धर्म समाज के लोग आपके कार्य का मूल्य नहीं समझते, उसको महत्व नहीं देते, आपके कार्य का सम्मान नहीं करते । तो इसका अर्थ यह नहीं है, कि आप अपना कार्य छोड़ देवें।

जैसे सूर्य अपना कार्य करता रहता है, कोई जागे या ना जागे, वह उदय होता ही है, और अपना प्रकाश फैलाता ही है । इसी प्रकार से कोई आपके कार्य का मूल्य समझे या न समझे, आप अपना कार्य करते रहें। हो सकता है, कि संसार के लोग आपके कार्य का मूल्य न समझें, परंतु ईश्वर तो अवश्य ही समझता है। समय आने पर ईश्वर तो अवश्य ही आपके कार्य का मूल्यांकन करेगा और निश्चित रूप से आपके उत्तम कर्मों का फल देगा। (सूर्य यद्यपि जड़ पदार्थ है वह सोचता नहीं है , फिर भी आलंकारिक रूप में हमने सूर्य का उदाहरण प्रस्तुत किया है) - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।*


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Sunday, June 10, 2018

*।। ओ३म् ।।**वैदिक साहित्य और विज्ञान*सूर्य की बाहरी परतों, जोकि डिस्क (फोटोस्फियर) के ऊपर हजारों...

*।। ओ३म् ।।*


*वैदिक साहित्य और विज्ञान*


सूर्य की बाहरी परतों, जोकि डिस्क (फोटोस्फियर) के ऊपर हजारों कि.मी. तक फैला है, को प्रभामंडल कहा जाता है। इसका तापमान मिलियन डिग्री केल्विन से भी अधिक है, जोकि करीबन 6000 केल्विन के सौर डिस्क तापमान से भी बहुत अधिक है। सौर भौतिकी में अब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाया है कि किस प्रकार प्रभामंडल का तापमान इतना अधिक होता है।

सूर्य के अध्धयन के लिए नासा के अतिरिक्त विश्व का हर देश जो ब्रम्हांड का रहस्यों को लेकर उत्सुक है सूर्य के अध्धयन के लिए आतुर है भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधानो को देखने वाला ISHRO भी सूर्य के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने के लिए आदित्य-1 मिशन सूर्य की स्टूडी के लिए भेजने की तैयारी कर रहा है, दृश्य उत्सर्जन रेखा प्रभामंडललेखी (वी.ई.एल.सी.) नामक महत्वाकांक्षी उपग्रह को ले जाने हेतु 400 कि.ग्रा. श्रेणी उपग्रह के रूप में किया गया था तथा उसे 800 कि.मी. निम्न भू कक्षा में स्थापित करने की योजना थी। सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लेग्रांजी बिंदु के आस-पास प्रभामंडल कक्षा में स्थापित उपग्रह से मुख्य लाभ यह होता है कि इससे बिना किसी आच्छादन/ग्रहण के लगातार सूर्य को देखा जा सकता है। अत: आदित्य-1 मिशन को अब “आदित्य-एल1 मिशन” में संशोधित कर दिया गया है और इसे एल़1 के आस-पास प्रभामंडल कक्षा में प्रविष्ट कराया जाएगा, जोकि पृथ्वी से 1.5 मिलियन कि.मी. पर है जिसका उद्देश्य सूर्य के उन रहस्यों को जानना है जिनसे अभी तक मानव सभ्यता अनजान है -


*इन वैज्ञानिक खोजो से पूर्ववर्ती वैदिक साहित्यो में पृथ्वी, सूर्य, ग्रहों, ब्रम्हांड आदि के बारे में पहले से ही लिखा गया है* सैकड़ो साल पहले आर्यभट्ट ने ग्रहों की दूरी का सटीक आकलन किया। वैदिक साहित्यो में आसान और आलंकारिक भाषा मे इसे समझाया गया लेकिन हम इन वैदिक साहित्यो को सिर्फ पूजा पाठ की सामग्री मानकर पढ़ना तो दूर इसके बारे में जानने के लिए भी कभी प्रयत्न नही करते -


सूर्य के विषय मे वैदिक साहित्य में विस्तृत जानकारी दी गयी है कुछ जानकारियां आइये आपसे साझा करता हूं -

1 - सूर्य_के_प्रकाश_की_गति -

आधुनिक विज्ञान अनुसार - 1,86,286 मील प्रति सेकेण्ड है ।


वैदिक - *‘तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते-द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते ।।’*

।। सायण ऋृग्वेद भाष्य 1.50.4 ।।

अर्थात्

आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है ।

गणना - ½ निमेश = 0.1056 सेकेण्ड

(निमेष की गणना प्रथम कंमेंट में )

अर्थात् 1 योजन = 9.09 मील

(योजन की गणना द्वितीय कमेंट में)

इस सूक्त के अनुसार -

प्रकाश की गति = 2202 योजन प्रति ½ निमेश

2202x9.09 मील प्रति 0.1056 सेकेण्ड = 189547.15909 मील प्रति सेकेण्ड


2 - सूर्य_के_किरणों_के_बारे_में -

आधुनिक विज्ञान - वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन ने इस तथ्य पर वैज्ञानिक प्रयोग किए तथा बताया कि श्वेत प्रकाश (सूर्य का प्रकाश या किरण) में सात रंग पहले से ही मौजूद होते है। प्रिज्म से गुजरने पर अपवर्तन के कारण यह 7 रंगों में विभक्त हो जाता है।

वैदिक -

*एको अश्वो वहति सप्तनामा ।* -ऋग्वेद 1-164-2

सूर्य के प्रकाश में 7 रंग होता है इस सूक्त में पहले से है ।

*अव दिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मय: ।* – अथर्ववेद 17-10 /17/9

सूर्य की सात किरणें दिन को उत्पन्न करती है। सूर्य के अंदर काले धब्बे होते है। जिसे विज्ञान आज इन धब्बो को सौर कलंक कहा है।


3 - सूर्य_की_बनावट -

आधुनिक विज्ञान - सूर्य का बाह्य प्रभामंडल दृश्यमान अंतिम परत है। इसके उपर की परते नग्न आंखों को दिखने लायक पर्याप्त प्रकाश उत्सर्जित करने के लिहाज से काफी ठंडी या काफी पतली है। और उसके चारो ओर गैसों का आवरण है ।

वैदिक -

*‘शकमयं धूमम् आराद् अपश्यम्, विषुवता पर एनावरेण।’* ऋग्वेद(1.164.43)

यानी सूर्य के चारों और दूर-दूर तक शक्तिशाली गैस फैली हुई हैं। यहां गैस के लिए धूम शब्द का प्रयोग किया गया है।


4 - ग्रहण_के_बारे_में -

आधुनिक विज्ञान - ग्रहण एक खगोलीय अवस्था है जिसमें कोई खगोलिय पिंड जैसे ग्रह या उपग्रह किसी प्रकाश के स्रोत जैसे सूर्य और दूसरे खगोलिय पिंड जैसे पृथ्वी के बीच आ जाता है जिससे प्रकाश का कुछ समय के लिये अवरोध हो जाता है इस अवस्था को ग्रहण कहते है।

वैदिक -

*यं वै सूर्य स्वर्भानु स्तमसा विध्यदासुर: ।*

*अत्रय स्तमन्वविन्दन्न हयन्ये अशक्नुन ॥* – ऋग्वेद 5-40-9

अर्थात जब चंद्रमा पृथ्वी ओर सूर्य के बीच में आ जाता है तो सूर्य पूरी तरह से स्पष्ट दिखाई नहीं देता। चंद्रमा द्वारा सूर्य के प्रकाश को ढंक लेना ही सूर्य ग्रहण है ।


5 - सूर्य_से_ग्रहों_की_दूरी -

आज पृथ्वी से सूर्य की दूरी (1.5 * 108 KM) है। इसे एयू (खगोलीय इकाई- astronomical unit) कहा जाता है। इस अनुपात के आधार पर निम्न सूची बनती है :-

ग्रह आर्यभट्ट का मान आधुनिक विज्ञान

बुध 0.375 एयू 0.387 एयू

शुक्र 0.725 एयू 0.723 एयू

मंगल 1.538 एयू 1.523 एयू

गुरु 5.16 एयू 5.20 एयू

शनि 9.41 एयू 9.54 एयू

ग्रहों की दूरी क्या हजारो वर्षो में प्रभावित नही हुई होगी ?


6 - सूर्य_एक_जीवाणुरोधी -

आधुनिक विज्ञान - अंधकार जीवाणुओं के परिवर्धन में सहायक है। बहुत से जीवाणु, जो सक्रिय रूप से अंधकार में चर (mobile) होते हैं, प्रकाश में लाए जाने पर आलसी हो जाता हैं तथा सूर्य के प्रकाश में पतले स्तर में रखे गए जीवाणु तीव्रता से मरते हैं। इन परिस्थितियों में कुछ केवल 10-15 मिनट के लिये जीवित रहते हैं। इसी कारण सूर्य का प्रकाश रोगजनक जीवाणुओं का नाश करनेवाले शक्तिशाली कारकों में माना गया है। साधारणत: दृश्य वर्णक्रम (spectrum) जीवाणुओं पर थोड़ा ही विपरीत प्रभाव रखते हैं तथा प्रकाश के वर्णक्रम के पराबैंगनी (ultraviolet) छोर में यह घातक शक्ति निहित रहती है।

वैदिक -

*'उत पुरस्तात् सूर्य एत, दुष्टान् च ध्नन् अदृष्टान् च,*

*सर्वान् च प्रमृणन् कृमीन्।’* अथर्ववेद (3.7)

अर्थात -

सूर्य का प्रकाश दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले सभी प्रकार के प्रदूषित जीवाणुओं और रोगाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है।


7 - चंद्रमा_पर_प्रकाश -

आधुनिक विज्ञान -

चंद्रमा का स्वयं का प्रकाश नहीं है। वह पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है। वह सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है।

वैदिक -

*सुषुम्णः सूर्य रश्मिः चंद्रमा गरन्धर्व, अस्यैको रश्मिः चंद्रमसं प्रति दीप्तयते।’*

निरुक्त( 2.6)

*'आदित्यतोअस्य दीप्तिर्भवति।’*

यानी सूर्य की सुषुम्ण नामक किरणें चंद्रमा को प्रकाश देती हैं। चंद्रमा का स्वयं का प्रकाश नहीं है। वह सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है।


विशेष -

प्राचीन काल से खगोल विज्ञान वेदांग का हिस्सा रहा है। ऋग्वेद, शतपथ ब्राहृण आदि ग्रथों में नक्षत्र, चान्द्रमास, सौरमास, मल मास, ऋतु परिवर्तन, उत्तरायन, दक्षिणायन, आकाशचक्र, सूर्य की महिमा, कल्प का माप आदि के संदर्भ में अनेक उद्धरण मिलते हैं। इस हेतु ऋषि प्रत्यक्ष अवलोकन करते थे। कहते हैं, ऋषि दीर्घतमस् सूर्य का अध्ययन करने में ही अंधे हुए, ऋषि गृत्स्मद ने चन्द्रमा के गर्भ पर होने वाले परिणामों के बारे में बताया। यजुर्वेद के 18वें अध्याय के चालीसवें मंत्र में यह बताया गया है कि सूर्य किरणों के कारण चन्द्रमा प्रकाशमान है।

यंत्रों का उपयोग कर खगोल का निरीक्षण करने की पद्धति रही है। आर्यभट्ट के समय आज से 1500 से अधिक वर्ष पूर्व पाटलीपुत्र में वेधशाला (Observatory) थी, जिसका प्रयोग कर आर्यभट्ट ने कई निष्कर्ष निकाले।

भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ के यंत्राध्याय प्रकरण में कहते हैं, “काल” के सूक्ष्म खण्डों का ज्ञान यंत्रों के बिना संभव नहीं है। इसलिए अब मैं यंत्रों के बारे में कहता हूं। वे नाड़ीवलय यंत्र, यष्टि यंत्र, घटी यंत्र, चक्र यंत्र, शंकु यंत्र, चाप, तुर्य, फलक आदि का वर्णन करते हैं।

प्रत्यक्ष निरीक्षण एवं अचूक ग्रहीय व कालगणना का 6000 वर्ष से अधिक पुराना इतिहास रखने वाले हम भारतीय आज पश्चिमी देशों की ओर उम्मीद से देखते है जबकि उनसे बेहतर हम सदियो से थे बस अपना आत्मगौरव भूले बैठे है । *आइये एक बेहतर सनातन परंपरा को आगे बढ़ाए। पौराणिक अंधश्रद्धा को छोड़ के वेदों की और पुनः लौटे ।*



*।। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।*


*ओ३म* 🚩


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*🔥ओ३म्🔥**सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन ।* यजुर्वेद- अ॰२७/मं॰१ हे मनुष्य ! दिव्य सौन्दर्य से जगमगा । ...

*🔥ओ३म्🔥*


*सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन ।* यजुर्वेद- अ॰२७/मं॰१


हे मनुष्य ! दिव्य सौन्दर्य से जगमगा ।

*💥शम्💥*

🔥

🚩


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प्रायः लोग रुपया पैसा जायदाद मोटर गाड़ी आदि , को ही धन के रूप में मानते हैं । ठीक है यह भी धन है ,...

प्रायः लोग रुपया पैसा जायदाद मोटर गाड़ी आदि , को ही धन के रूप में मानते हैं । ठीक है यह भी धन है , हम इसका विरोध नहीं करते।

परंतु इन सबसे बढ़िया धन *चरित्र का धन* है। और वह चरित्र का धन प्राप्त होता है , ईश्वर की उपासना से भक्ति से। परमात्मा का ध्यान करें। उससे जो आपके मन की शुद्धता बनेगी और फिर ईश्वर आपके मन में और आपकी आत्मा में जो सेवा परोपकार दान दया ईमानदारी सच्चाई आदि आदि गुणों की संपत्ति भर देगा, वास्तव में वही असली संपत्ति है। इन सारी चीजों को मिलाकर के चरित्र कहलाता है । इसलिए परमात्मा का ध्यान करें , ओम् नाम से ध्यान करें, अर्थ सहित करें। परमात्मा से इन गुणों की प्राप्ति करें , अपना चरित्र उज्जवल बनाएं । यही संसार में सबसे बड़ा धन है । जिसके पास यह धन है वही संसार में सबसे अधिक सुखी है । - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।*


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Bibal

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Saturday, May 5, 2018

आर्यों के विमर्श के लिए…आइए कुछ विचार करते हैं – ईश्वर और जीवात्मा के परिमाण और सूक्ष्म-स्थूल स्वरूप...

आर्यों के विमर्श के लिए…


आइए कुछ विचार करते हैं – ईश्वर और जीवात्मा के परिमाण और सूक्ष्म-स्थूल स्वरूप के विषय में

——————–


महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में ईश्वर और जीवात्मा दोनों चेतन (conscious), अदृश्य (invisible), अभौतिक (non-material or non-physical) सत्ताएं हैं।


ईश्वर अनन्त (infinite or endless) है, उसकी सत्ता अनन्त है। ऐसा कह सकते हैं कि वह इतना महान् है कि वह स्वयं भी अपना अन्त नहीं जानता, स्वयं को अनन्त ही समझता है ! यह विचित्र बात है जो आसानी से समझ में नहीं आती है। ईश्वर जैसी सत्ता भी स्वयं को अनन्त जाने अर्थात् अपनी ही विद्यमानता (presence) अवकाश (space) में कहां तक –कितने स्थान पर्यन्त है, इसका उसे ही ज्ञान न हो, अथवा स्वयं को अनन्त ही जाने – यह बात हम महर्षि दयानन्द जी के ग्रन्थ को प्रमाण मानकर स्वीकार तो कर लेते हैं, परन्तु इसे ठीक से – स्पष्ट संकल्पना पूर्वक (conceptually) समझना आसान नहीं है।


जैसे ईश्वर की अनन्त विद्यमानता (infinite presence) को समझना कठिन है, उसकी थाह पाना असम्भव-सा (unfathomable) है, वैसे ही जीवात्मा का अणु-स्वरूप, उसकी सूक्ष्म सत्ता, उसकी परिच्छिन्नता (finitude or boundedness) को समझना कठिन है, क्योंकि वह भी हम जान न पाए इतना छोटा (infinitely or immeasurably small) है।


जैसे क्षेत्र (domain, occupation, region, area, presence) की दृष्टि से ईश्वर अनन्त चेतन सत्ता है, वैसे ही जीवात्मा भी अत्यन्त अणु सत्ता है। जैसे अनन्त ईश्वर की सत्ता की कोई सीमा (border or limit) नहीं है, वैसे जीवात्मा ससीम होते हुए भी उसकी सूक्ष्मता (smallness or minuteness) भी एक प्रकार से ‘अनन्त’ है, वह इतना अत्यन्त अल्प है, छोटा है।


व्यापकत्व (pervasiveness or the quality of being pervaded, permeated or penetrated in others) की दृष्टि से विचार किया जाए तो ईश्वर सर्वव्यापक है, अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर है। इस गुण को लेकर दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में जीवात्मा को ईश्वर से स्थूल और ईश्वर को जीवात्मा से सूक्ष्म लिखा है। जीवात्मा में यह व्यापकत्व गुण नहीं है, ऐसा मैं समझता हूं।


एक कठिन विषय को मैंने अपनी अल्प मति से जैसा समझ पाया हूं, यहां प्रस्तुत करने का प्रयास किया है – इस आशा के साथ कि सुविज्ञ आर्य पाठक इन बातों पर सम्यक् विचार करेंगे जिससे सत्य की गवेषणा हो सके। मैंने यहां जो लिखा है वही सत्य है, ऐसा मैं मन में भी नहीं सोचता हूं। प्रत्युत मैं ऐसा समझता हूं कि यह विषय गहन है, अतः चिन्तनशील आर्यों को धैर्यपूर्वक विचार-विमर्श करना होगा।


जिन आर्यों ने ‘जीवात्मा सर्वथा निराकार नहीं है’ इस प्रकार की बातें प्रसारित की हैं, मैं नहीं समझता हूं कि उन्होंने किसी अ-भद्र भावना से ऐसा किया है। यह विषय ही ऐसा है कि कुछ लोग अन्यथा विचार या निर्णय कर सकते हैं।


लेखक : भावेश मेरजा ( आर्यसमाज, भरूच)


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*प्रश्न-* *सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:। गीता...

*प्रश्न-* *सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:। गीता १८/६६*


इस श्लोक का क्या अर्थ होता है?


*उत्तर"*


अर्थ : “सब धर्मों(वर्णाश्रम कर्त्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा । मैं तुझ को सब पापों से छुड़ा दूंगा ,चिन्ता मत कर ।


*भावार्थ-* सर्वत्र ब्रह्म को व्यापक देखने का अभ्यास करते-करते अब और आगे बढ़ें और वर्णाश्रम के धर्मों(कर्त्तव्यों) की परवाह छोड़कर सारा समय और अपनी सारी शक्ति ब्रह्म तन्मय हो जाने (समाधि आदि) में लगादें (उस के शरण में जाने का तात्त्पर्य यही है।) तो परमात्मा सर्व पापों से छुड़ा देगा ।


*प्रश्न-* *क्या परमेश्वर पाप को माफ़ कर देंगे? ,फल नहीं भुगवाएँगे?*


*उत्तर-* योग(ध्यान,धारणा,समाधि) तथा ज्ञानरुपी अग्नि में पापरुपी मल दग्ध हो जाता है । परंतु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि ईश्वर पापों को क्षमा कर देगा,पाप कर्म का दण्ड तो अवश्य मिलेगा ।


परंतु योग व ज्ञान से पापों की निवृत्ति होती है यहि अर्थग्रहण करना चाहिए, यही बात मुण्डकोपनिषद् में कही है : *मुण्डक :२ काण्ड :२ श्लोक संख्या :८ ) भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।*


*पदार्थ-* (भिद्यते) टूट जाती है। (हृदयग्रन्थिः) रोहे की गांठ अर्थात् सूक्ष्म शरीर से वियोग हो जाता है। जन्म-मरण में तो सूक्ष्म शरीर साथ रहता है, परन्तु उस दशा में पृथक् हो जाता है। (छिद्यन्ते) नष्ट हो जाते हैं। टूट जाते हैं। (सर्वसंशयाः) सब प्रकार के सन्देह। (क्षीयन्ते) क्षीण हो जाते हैं। (च) और (अस्य) उस ब्रह्मज्ञानी के। (कर्माणि) सब कर्म। (तस्मिन्) उस अवस्था में। (दृष्टे) जब साक्षात् देख लेता है। (परावरे) जो इन्द्रियों से अनुभव होने योग्य नहीं है। *भावार्थ-* जब कोई पुरुष इन्द्रियों से अनुभव न होने योग्य परमात्मा को भीतर ज्ञान-चक्षु से देख लेता है, तब उसके रोहे की गांठ अर्थात् सूक्ष्म शरीर का सबन्ध टूट जाता है। सब संदेहों का सबन्ध मन से है और मन का सूक्ष्म शरीर से। जब सूक्ष्म शरीर ही न रहा, तो मन कहां? जब मन ही नहीं तो उसमें उत्पन्न होने वाले संदेह कहां? *अतः सपूर्ण सन्देह दूर हो जाते हैं। और जब मन ही न रहा, जिसमें सब कर्मों के संस्कार रहते हैं तो उसमें रहने वाले कर्म किस प्रकार रह सकते हैं? उस ज्ञानी के सब कर्म नष्ट हो जाते हैं। इसी बात की उक्त "गीता” के श्लोक में सङ्गति करें ।*


*प्रश्न-क्या सपूर्ण कर्म ब्रह्मज्ञानी होने पर नष्ट हो जाते हैं?*


*उत्तर-* जब तक (वर्णाश्रम धर्मोंका) कर्मों का अभिमान बना है, तब तक ब्रह्मज्ञान या मुक्ति हो ही नहीं सकती। जब मुक्ति होती है, तब कोई कर्म शेष नहीं रहता। जैसे जब दीवाला निकल जावे तब लेने और देने की समाप्ति हो जाती है।


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*🔥ओ३म्🔥**🌿तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं...

*🔥ओ३म्🔥*


*🌿तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥* केनोपनिषद् काण्ड-३,श्लोक-६ ॥ 


*पदार्थ—* यक्ष ने (तस्मै) उस अग्निदेव के लिए (तृणम्) एक तिनका (निदधौ) धर दिया और (एतत्) इस तिनके को (दह, इति) जला दे, ऐसा कहा । अग्नि (तत्) उस तिनके के (सर्वजवेन, उपप्रेयाय) पूरे वेग से समीप गया, परन्तु (तत्) उसको (दग्धुम्) जलाने को (न, शशाक)समर्थ न हो सका । (ततः, एव) उसके बाद ही (सः) वह अग्निदेव (निववृते) वापस आ गए और दूसरे देवों से कहने लगे (यत्) जो (एतत्) यह (यक्षम्, इति) यक्ष है (एतत्) इसको (विज्ञातुम्) जानने को (न, अशकम्) मैं समर्थ नहीं हुआ ।

*भावार्थ—* यक्ष ने अग्नि के अहङ्कार का मर्दन करने के लिए अग्नि के सम्मुख एक छोटा सा तिनका रक्खा, किन्तु अग्नि अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को न जला सका और निराश होकर वापस आ गया और देवों से आकर कहने लगा कि मैं इस यक्ष को नहीं जान सका । क्रमश:…

*💥शम्💥*

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Friday, May 4, 2018

-( પાંચ ચોપડી ભણેલી - ફાઈવસ્ટાર ડાયેટિશ્યન )-ગીતા બહેન પટેલ -ખાલી પાંચ ચોપડી ભણેલા…પણ,એમની...

-( પાંચ ચોપડી ભણેલી - ફાઈવસ્ટાર ડાયેટિશ્યન )-


ગીતા બહેન પટેલ -

ખાલી પાંચ ચોપડી ભણેલા…

પણ,

એમની કોઠાસૂઝ ગજબની !


એમના પતિ કરસનભાઈને -

ડૉક્ટર ભાવસાર સાહેબે આ વખતે તો ચોક્ખા શબ્દોમાં કીધું કે -

હવે ડાયાબિટીસ કાબૂમાં નહિં રાખો…

તો,

પગ કપાવવો પડશે !


આ છેલ્લી વખતનું ઓપરેશન છે…

જો ‘સડો’ હાડકામાં પહોંચ્યો…

તો,

આટલા ડાયાબિટીસને લીધે - 'સેપ્ટિસિમીયા’ થઈ આખા શરીરમાં એનું ઝેર પહોંચી શકે છે !


જો એવું થાય તો,

ઝેરનાં લીધે -

કિડની, લિવર , મગજ , ફેફસાં અને હૃદય બધું જ ઠપ થઈ જાય !


ગીતા બહેને પણ આ વાતને ગંભીરતાથી લીધી.


એમણે ભાવસાર સાહેબને પૂછ્યું કે -

પહેલા તો એક ગોળી થી ડાયાબિટીસ કાબૂમાં આવતો હતો…

પછી,

ધીમે ધીમે બે, ત્રણ, ચાર ગોળીઓ અને પાછળથી તો એ પણ અસર કરતી ન હતી.


હવે તો ઈન્સ્યુલીનના ઈંજેકશન પણ થાકી ગયા હતા.


આ વખતનો એચ. બી. એ. વન. સી રિપોર્ટ ૧૨.૫ હતો,

ફાસ્ટિંગ ૨૨૦ અને પી.પી.બી.એસ. ૪૫૦.


દિવસે દિવસે પરિસ્થિતિ બેકાબૂ બનતી હતી…

એમાં -

હવે પગમાં કશું વાગી જાય તો -

ખબર પણ પડતી ન હતી !


જ્યારે પાકે અને રસી નીકળે…

ત્યારે -

કોઈ કહે તો જ કરસનભાઈનું ધ્યાન જાય.


એમને પગનાં તળિયામાં સોય વાગે કે કાચ કોઈ જ વેદના ના થાય.


આનું કારણ જાણવા ગીતાબહેને સાહેબને વિનંતી કરી…


ડૉક્ટર ભાવસારે જણાવ્યું કે -

લાંબા ગાળાના ડાયાબિટીસમાં આખા શરીરની લોહીની નળીઓ અને ચેતાઓ સૂઝી જાય છે.


હૃદય, કિડની, મગજ વગેરે અંગો ખરાબ થઈ જાય છે.


હૃદય અને મગજમાંથી -

વિવિધ અંગો હાથ પગ તરફ આવતી જતી ચેતાઓ પણ સૂઝીને બિનકાર્યક્ષમ થઈ જાય છે.


આ બધાને કારણે રોગપ્રતિકારક શક્તિ પણ ઘટે છે…

અને,

સંવેદના પણ જતી રહે છે.


એટલે -

નાનું મોટું વાગવાનું થાય તો ખબર પડતી નથી.


ગીતા બહેને પૂછ્યું કે -

સારામાં સારા ડાયાબિટીસના ડૉક્ટરોને બતાવવા છતાં પણ…

આ રોગ કેમ કાબૂમાં નથી આવતો ?


ડૉ. ભાવસારે જૂની બધી ફાઈલો અને રિપોર્ટ તપાસ્યાં.


ડૉક્ટરો તો બધાં ડીગ્રીધારી હતાં,

કોઈ ઊંટવૈદ પાસે તો એ લોકો જતાં ન હતાં.


દવાઓ પણ બધી જ સારી અને સ્ટાન્ડર્ડ હતી…


તો પછી -

પાંચ જ વર્ષમાં આ હાલત શા માટે ?


ડૉક્ટરે કઢાવી કરસનભાઈનાં ખોરાક (ભોજન) ની આદતોને…


ઊંડા ઊતરતા ખબર પડી કે -

એમને 'બે’ વખત પેટ ભરીને જમવાની આદત હતી.


આખા દિવસનો ખોરાક ખૂબ વધારે હતો…


પાછી,

તેમની આદત હતી કે -

બંને વખત પેટ ભરીને દબાવીને ઓડકાર આવે એમ ખાવું !


પાછું વચ્ચે-વચ્ચે નાસ્તા ફરસાણ અને ચાર-પાંચ વખત ચા-પાણી…


આ બધી આદતો -

ડાયાબિટીસનાં દર્દી માટે તો આપઘાત કરવા બરાબર કહેવાય !!


બીજું,

કરસનભાઈ જમવામાં માત્ર રોટલી , ભાખરી, પરોઠા અને શાક જ ખાતાં હતાં.


બધા ડૉક્ટરોએ -

એમને ભાત - બટાકા - ખાંડ - ગોળ -આઈસ્ક્રીમ - મિઠાઈથી દૂર રહેવાનું કીધું હતું.


એ બધી પરેજીઓનું એ ચુસ્ત પાલન કરતાં હતાં…


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Monday, April 16, 2018

धन कमाने वाले प्रायः सभी लोग यह मानते हैं कि *मैंने जो धन कमाया है उस पर सिर्फ मेरा ही अधिकार है ।...

धन कमाने वाले प्रायः सभी लोग यह मानते हैं कि *मैंने जो धन कमाया है उस पर सिर्फ मेरा ही अधिकार है । मेरी इच्छा जहां होगी मैं वहां वैसे उतना खर्च करूंगा ।* यह सोच गलत है । क्योंकि आप जो धन कमाया, वह आप तब कमा पाए , जब बचपन से आपके माता पिता ने आपको पाल-पोसकर खिला-पिलाकर बड़ा किया । आपके गुरुजनों ने आपको अनेक विद्या सिखाईं । अन्य भी अनेक विद्वानों संन्यासियों महात्माओं ने आपको शिक्षा दी । ईश्वर ने भी आपके खाने पीने के लिए तरह तरह के अनाज फल फूल साग सब्जियां और सूर्य चंद्रमा पृथ्वी जल अग्नि इत्यादि पदार्थ बनाए। और इन पदार्थों की सहायता से आप इतने बलवान बुद्धिमान विद्वान धनवान एवं समर्थ बन पाए।

ईश्वर, माता पिता और गुरु जनों के अतिरिक्त, देशभर के लोगों ने भी आपके लिए रेल बनाई सड़क बनाई बिजली बनाई टेलीफोन बनाया कंप्यूटर बनाया टेलीविजन बनाया मोबाइल फोन बनाया जिन पदार्थों की सहायता से आप इतने समर्थ हुए और ₹2 कमा पाए ।

यदि ये सब लोग आपकी सहायता न करते , तो आप कुछ भी नहीं कमा पाते, और ना ही इतने स्वस्थ, बलवान व धनवान होते। इसलिए इन सब का उपकार मानना चाहिए। और इनकी सहायता से जो धन आपने कमाया , उस धन पर इन सब लोगों का भी कुछ हिस्सा अधिकार मानना चाहिए । तथा उनके लिए कुछ खर्च दान आदि भी करना चाहिए। यही बुद्धिमत्ता है और यही न्याय है । -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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Saturday, April 14, 2018

इतनी सीधी-सरल बात तो सभी समझ सकते हैं कि बच्चों का ज्ञान अनुभव आदि कम होता है। और उनके माता-पिता का...

इतनी सीधी-सरल बात तो सभी समझ सकते हैं कि बच्चों का ज्ञान अनुभव आदि कम होता है। और उनके माता-पिता का ज्ञान अनुभव आदि बच्चों की तुलना में अधिक होता है। संसार में सबसे उत्तम वस्तु है ज्ञान। जिसका ज्ञान शुद्ध है और उसके अनुसार आचरण भी ठीक है , वही व्यक्ति संसार में सुखी हो सकता है ।

तो माता-पिता का ज्ञान बालक के ज्ञान से अधिक है , और यदि आचरण भी वैसा ही हो , तो बालकों को अपने माता-पिता का अनुसरण करना चाहिए।


जो बच्चे अपने माता-पिता के ज्ञान और आचरण को अपना लेते हैं, उनके निर्देश आदेश संदेश का पालन करते हैं , वे संसार में सुखी होते हैं और जीवन में बहुत अच्छा विकास करते हैं ।

जो बच्चे अपने माता पिता की बात नहीं मानते , वे सदा दुखी और परेशान रहते हैं , उनके जीवन का विकास ठीक नहीं होता। और बुढ़ापे में वे खूब पछताते हैं कि हमने अपने माता-पिता के अनुभवों का लाभ नहीं लिया। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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Friday, April 13, 2018

कर्मफल का शाश्वत सिद्धांत है कि *जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलेगा*। वास्तव में फल मिलता नहीं है ,...

कर्मफल का शाश्वत सिद्धांत है कि *जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलेगा*।

वास्तव में फल मिलता नहीं है , फल न्याय पूर्वक सोच समझ कर माप तोल कर दिया जाता है। मोटी भाषा में लोग कह देते हैं, वैसा फल मिलेगा ।

कोई नौकर किसी सेठ के यहां नौकरी करता है , तो उसे वेतन मिलता नहीं है, सेठ अपने हाथ से उसे नापतोल कर वेतन देता है। यह उसका कर्म फल है ।


तो जिस व्यक्ति के जीवन में अच्छे गुण हों, उन गुणों के कारण वह अच्छे अच्छे कर्म करता हो , तो निश्चित रुप से उसे अच्छा ही फल मिलेगा , कुछ इस जन्म में और कुछ अगले जन्मों में। जब जिस कर्म का फल प्राप्त होने का समय आएगा , उसी समय उसको फल दिया जाएगा। चाहे समाज और सरकार देवे, चाहे ईश्वर देवे। इसलिए फल प्राप्ति में कभी संशय नहीं करना चाहिए।

लोग फल प्राप्ति में जल्दबाजी करते हैं । ठीक समय की प्रतीक्षा नहीं करते , और चिल्लाने लगते हैं कि अब तक हमें हमारे अच्छे कर्मों का फल नहीं मिला , अब तक हमें अच्छा फल नहीं मिला । यह कोई नहीं कहता कि *अब तक हमें हमारे बुरे कर्मों का दंड क्यों नहीं मिला?*

तो चिंता ना करें अच्छे बुरे सभी कर्मों का फल समय आने पर अवश्य मिलेगा। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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*नम्रता और अभिमान* ये दोनों विरोधी तत्व हैं। प्रायः लोग नम्रता की प्रशंसा करते हैं फिर भी उसे जीवन...

*नम्रता और अभिमान* ये दोनों विरोधी तत्व हैं। प्रायः लोग नम्रता की प्रशंसा करते हैं फिर भी उसे जीवन में ला नहीं पाते।

इसी प्रकार से अभिमान की बहुत निंदा करते हैं, फिर भी उसे छोड़ नहीं पाते ।

कोई बात नहीं । किसी भी दोष को छोड़ने के लिए और गुण को धारण करने के लिए बार बार पुरुषार्थ करना चाहिए , चाहे जितनी बार भी असफल हों, तब भी कभी निराश नहीं होना चाहिए , सफलता एक दिन अवश्य मिलेगी ।

तो *नम्रता ही अच्छी है , यही सुखदायक है , समाज में प्रतिष्ठा जनक है । जबकि अभिमान बुद्धि का विनाशक है, दुखदायक है, प्रतिष्ठा को धूल में मिलाने वाला है* ।

ऐसा बार-बार सोचें। ऐसा कुछ प्रयास करने के बाद, आप का अभिमान धीरे-धीरे कम होने लगेगा, और नम्रता बढ़ने लगेगी । तब देखिएगा, जीवन में कितना आनंद होगा। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ।


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Thursday, April 5, 2018

● सभी स्वाध्यायशील पुस्तक प्रेमियों को एक अनुरोध…नीचे दी जा रही लिंक्स को स्टार ★ करके...

● सभी स्वाध्यायशील पुस्तक प्रेमियों को एक अनुरोध…

नीचे दी जा रही लिंक्स को स्टार ★ करके सुरक्षित रखें। इन सभी लिंक्स में विषयानुरूप और सेंकडो हिंदी - अंग्रेजी पुस्तकें सम्मिलित होने वाली है।
                   👇🏼👇🏼👇🏼

👇🏼 महापुरुषों के जीवन चरित संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1-ZD_Eq-SYkx1UmX4a7693ayD382G0JQv

👇🏼 स्वामी दयानन्द सरस्वती विषयक ग्रन्थ संग्रह संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=16pMp0wlopdqKkApFPYSz_wvGeaNvhhPW

👇🏼 महर्षि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1jC__V4uKRAjqi6SXrYc-aqsqV21CbNd5

👇🏼 खण्डन-मंडन पुस्तक संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1XXBovQ-rqNjKQC4vpgH-pBnIav9jl6J7

👇 श्री कृष्ण विषयक पुस्तक संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1Ex0AZkFUgvNgU6VEG0s2BntIUse_TjKz

👇🏼 वैदिक साहित्य संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1oRxZ4o-d1XZ59sMm4RhJlVZ_JyZxQ479

👇🏼 इस्लाम विषयक खण्डनात्मक पुस्तकें

https://drive.google.com/folderview?id=1MKu2JIZKbCNG_zPf8x7i_rD8n-m2PNJG

👇🏼 ईसाई मत खंडन पुस्तकें

https://drive.google.com/folderview?id=1mPIecrRVKT-SOkMEbvrXWnUHvDIFtCrj

👇🏼 इतिहास विषयक पुस्तक संग्रह

https://drive.google.com/folderview?id=1yoJc0hhHt2d9aVMDsZVOZVWTtXQOM9EG

🙏🏻 Read and encourage others to read… स्वयं पढ़े और दूसरों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें।🙏🏻


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Wednesday, April 4, 2018

लघु आत्म कथा









लघु आत्म कथा


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Tuesday, April 3, 2018

।।ओ३म्।।सही ‘हनुमान् चालीसा’:-यह नया ‘हनुमान् चालीसा’ लिखने का उद्देश्य केवल यह है कि सभी धर्मप्रेमी...

।।ओ३म्।।

सही ‘हनुमान् चालीसा’:-


यह नया ‘हनुमान् चालीसा’ 

लिखने का उद्देश्य केवल यह है कि सभी धर्मप्रेमी सज्जन महावीर हनुमान् के नाम पर फैल रहे अंधविश्वास,पाखंड और को त्याग कर हनुमान् के यथार्थ चरित्र की विशेषताओं को जान सके, उनके सद्गुणों को अपने जीवनों में धारण कर सकें तथा सच्चे ईश्वरभक्त बनकर अपने जीवनों को सुखी बना सकें।


‘ओ३म्’

‘हनुमान् चालीसा’

करता हूँ वर्णन यहाँ,करके प्रभु का ध्यान।

सुनो वीर हनुमान् का,सुखदाई गुणगान॥


1-पितु पवन थे अंजना माता।

उनके घर जन्मा दुख-त्राता॥


2-चैत्र वदि शुभ अष्टमी आई।

मंगलवार जन्म सुखदाई॥


3-सुन्दरतम हनु अंग सुहाए।

इसीलिए हनुमान् कहाए॥


4-मात-पिता प्रभु के गुण गाते।

बालक को बलवान बनाते॥


5-रवि-सम तेजस्वी मुख पाया।

हृष्ट-पुष्ट सुन्दरतम काया॥


6-ऋषि अगस्त्य के गुरुकुल आए।

वैदिक विद्या पढ़ सुख पाए॥


7-वेद ज्ञान-विज्ञान पढे थे।

सदाचार के पंथ बढ़े थे॥


8-मल्ल-युद्ध गदा थे प्यारे।

नहीं किसी से डरे न हारे॥


9-मात-पिता,गुरु भक्त कहाते।

उठकर प्रात: शीश झुकाते॥


10-शक्ति,शील,सौन्दर्य सारे।

महावीर विनम्र थे प्यारे॥


11-वेद-पाठ सुन्दरतम गाते।

श्रोता मंत्र-मुग्ध हो जाते॥


12-नीति-निपुण,रक्षा सज्जन के।

न्याय करें प्यारे जन-जन के॥


13-संध्या और हवन नित करते।

वेद-ज्ञान,सद्गुण मन धरते॥


14-ब्रह्मचर्य-व्रत जीवन धारे।

सत्य,न्याय,परहित ही प्यारे॥


15-अतुलित बल,यौवन-धन पाया।

संयम का जीवन अपनाया॥


16-परमेश्वर का ध्यान लगाते।

ओम-ओम ही जपते जाते॥


17-प्राण साधना अद्भुत करते।

अनुपम बल तन-मन में भरते॥


18-परमेश्वर का दर्शन पाया।

मानव-जीवन सफल बनाया॥


19-वन-रक्षक अनुपम नर नेता।

सब युद्धों में रहे विजेता॥


20-त्याग तपस्या अनुपम पाए।

सकल विश्व उनके गुण गाए॥


21-मित्र सहायक बनकर आए।

अद्भुत सेना-नायक पाए॥


22-दृढ़ प्रतिज्ञ हनुमान् हमारे।

दुष्ट गदा से रण में मारे॥


23-कभी नहीं विचलित होते थे।

नहीं धीरता को खोते थे॥


24-वेद-ज्ञान के पण्डित भारी।

दिव्य,तपस्वी,शोभा प्यारी॥


25-सन्तजनों की सेवा करते।

उनके सब दु:खों को हरते॥


26-नारी का सम्मान बढ़ाते।

सन्नारी को शीश झुकाते॥


27-रामचन्द्र सुग्रीव मिलाए।

बने सहायक दुख मिटाए॥


28-रामदूत बनकर सुख चाहा।

दिया वचन जो उसे निबाहा॥


29-लाँघ सिन्धु लंका में आए।

सीता को खोजा सुख पाए॥


30-रावण को सब कुछ समझाया।


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वैदिक दर्शन भाष्यकार – आचार्य उदयवीर शास्त्री जीदर्शन शब्द की व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ – “दृश्यतेऽनेन...

वैदिक दर्शन 

भाष्यकार – आचार्य उदयवीर शास्त्री जी


दर्शन शब्द की व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ – “दृश्यतेऽनेन इति दर्शनम्” से सम्यक दृष्टिकोण ही दर्शन है अर्थात् समग्रता को यथार्थरूप में कहने वाला दर्शन है। जो पदार्थ जैसा है, उसे वैसा ही उपदेश करना सत्य है और यही सत्य दर्शनों द्वारा प्रतिपादित किया गया है। वेद को प्रमाणित मानने वाले छः दर्शन है, इन्हीं को वैदिक दर्शन या षड्दर्शन कहते हैं। ये छः दर्शन है – न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त।


महर्षि दयानन्द जी ने अपने ग्रन्थ “सत्यार्थप्रकाश” में दर्शनों के अध्ययन-अध्यापन की विधि का उल्लेख किया है – 

“तदनन्तर पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त अर्थात् जहाँ तक बन सके, वहाँ तक ऋषिकृत व्याख्यासहित अथवा उत्तम विद्वानों की सरल व्याख्यायुक्त छः शास्त्रों को पढे-पढावें” – सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास3 

इससे दर्शनों के महत्त्व का ज्ञान होता है।


सभी दर्शनों में कुछ समानताएं हैं, जो निम्न प्रकार है – 

1 सभी में वैदिक मङ्गलाचरण ‘अथ’ शब्द से होता है।

2 सभी दर्शनों में प्रथम सूत्र में ही अपना प्रतिपाद्य विषय निश्चित है। 

3 सभी दर्शन उद्देश्य कथन के उपरान्त, उसका लक्षण बताते हैं, पुनः शेष शास्त्र में उसका परीक्षण करते हैं।

4 सभी शास्त्रों की शैली सूत्ररूप अर्थात् संक्षेप में कहने की है।

5 सभी शास्त्र अपने प्रधान विषय का परिज्ञान करने के साथ-साथ अनेक उपविषयों का भी परिज्ञान कराते हैं। 

6 सभी शास्त्र वेदों को प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं।

7 सभी शास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।


इन सभी दर्शनों के अपने-अपने विषय है। जिनका संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जाता है – 

1 मीमांसा दर्शन – इसमें धर्म एवम् धर्मी पर विचार किया गया है। यह यज्ञों की दार्शनिक विवेचना करता है लेकिन साथ-साथ यह अनेक विषयों का वर्णन करता है। इसमें वेदों का नित्यत्व और अन्य शास्त्रों के प्रमाण विषय पर विवेचना प्रस्तुत की गई है। 

2 न्याय दर्शन – इस दर्शन में किसी भी कथन को परखने के लिए प्रमाणों का निरुपण किया है। इसमें शरीर, इन्द्रियों, आत्मा, वेद, कर्मफल, पुनर्जन्म आदि विषयों पर गम्भीर विवेचना प्राप्त होती है। 

3 योग दर्शन – इस दर्शन में ध्येय पदार्थों के साक्षात्कार करने की विधियों का निरुपण किया गया है। ईश्वर, जीव, प्रकृति इनका स्पष्टरूप से कथन किया गया है। योग की विभुतियों और योगी के लिए आवश्यक कर्तव्य-कर्मों का इसमें विधान किया गया है। 

4 सांख्य दर्शन – इस दर्शन में जगत के उपादान कारण प्रकृति के स्वरूप का वर्णन, सत्त्वादिगुणों का साधर्म्य-वैधर्म्य और उनके कार्यों का लक्षण दिया गया है। 

त्रिविध दुःखों से निवृत्ति रूप मोक्ष का विवेचन किया है। 

5 वैशेषिक दर्शन – इसमें द्रव्य को धर्मी मानकर गुण आदि को धर्म मानकर विचार किया है। छः द्रव्य और उसके 24 गुण मानकर उनका साधर्म्य-वैधर्म्य स्थापित किया है। भौत्तिक-विज्ञान सम्बन्धित अनेंको विषयों को इसमें सम्मलित किया गया है। 

6 वेदान्त दर्शन – इस दर्शन में ब्रह्म के स्वरूप का विवेचन किया है तथा ब्रह्म का प्रकृति, जीव से सम्बन्ध स्थापित किया है। उपनिषदों के अनेकों स्थलों का इस ग्रन्थ में स्पष्टीकरण किया गया है।


इन सभी दर्शनों पर सरल और विस्तृत भाष्य आचार्य उदयवीर शास्त्री द्वारा रचित है। यह भाष्य दर्शनों के वास्तविक अभिप्राय को प्रकट करता है। इस भाष्य समुच्चय में प्रत्येक दर्शन भाष्य से पूर्व विस्तृत भूमिका दी गई है और अन्त में सूत्रानुक्रमणिका दी गई है। दर्शनों को आत्मसाद् करने के लिए इस दर्शन समुच्चय को अवश्य प्राप्त कर, अध्ययन करें।


प्राप्ति स्थान - vedrishi.com


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*विभिन्न रोग और उनका उपचार*1.नीम की लकड़ी कोपानी में घिसकर एक इंच मोटा लेप फोड़े पर लगायें।इससे फोड़ा...

*विभिन्न रोग और उनका उपचार*


1.नीम की लकड़ी कोपानी में घिसकर एक इंच मोटा लेप फोड़े पर लगायें।इससे फोड़ा समाप्त हो जाता है।

2. नकसीर (नाक में से खून का आना) :नीम की पत्तियों और अजवायन को बराबरमात्रा में पीसकर कनपटियों पर लेप करने सेनकसीर का चलना बन्द हो जाता है।

3. बालों का असमय में सफेद होना (पालित्य रोग) :नीम के बीजों के तेल को 2-2 बूंद नाक सेलेने से और केवल गाय के दूध का सेवन करने से पालित्य रोग में लाभ होता है।

4. नीम के तेल को सूंघने से बाल काले हो जाते हैं।नीम के बीजों को भांगरा और विजयसार केरस की कई भावनाएं देकर बीजों का तेलनिकाल लें, फिर इसकी 2-2 बूंदों को नाक से लेने से तथाआहार में केवल दूध और भात खाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं।

5.बालों की रूसी :एक मुट्टी नीम के पत्तों का काढ़ा बनाकरनहाने से 1 घंटे पहले सिर पर मलने से रूसी मिटजाती है।

6. नीम की निबौलियों को सुखाकरअरीठा के साथ मिलाकर बारीकपीसकर रख लें। इसे 2 चम्मच भर एक गिलास गर्मपानी में घोलकर सिर को धो लेने से सिर कीजूंएं, लीखें, सिर की दुर्गन्ध खत्म होजाती है तथा बाल काले और मुलायम होते हैं।

7. नीम के पत्तों को पीसकर पानीमें उबालकर ठंड़ा होने दें। इसके बाद इसे छानकर इससे सिर को धोलें और बालों को सही तरह से मालिश करें। बालों केसूख जाने पर स्वच्छ एरण्ड का तेल और नारियल का तेल बराबरमात्रा में लेकर इसे मिला लें और इससे सिर कीअच्छी तरह से मालिश करें। इससे सिर कीरूसी मिट जाएगी।


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➡ *क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:❓❓❓❓❓*1. *लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):*“...

➡ *क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:❓❓❓❓❓*


1. *लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):*

“ वैदिक धर्म और आर्य सभ्यता ही एक दिन दुनिया पर राज करेगी क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है"।


2. *हर्बर्ट वेल्स (1846 - 1946):*

” वेदों का सनातन धर्म का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा तभी एकदिन पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित हो जाएगी और उसी दिन ही दिल शाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी सलाम हो उस दिन “।


3. *अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 - 1955):*

"मैं समझता हूँ कि आर्यों ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो यहूदी न कर सके, वेदों मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है"।


4. *हसटन स्मिथ (1919):*

"जो विश्वास हम पर है और इस हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो वेद आधारित सनातन धर्म है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी"।


5. *माइकल नोस्टरीडाम (1503 - 1566):*

” वैदिक सनातन धर्म ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर आर्य लोगों की राजधानी बन जाएगा"।


6. *बर्टरांड रोसल (1872 - 1970):*

“मैंने वेदों को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है, वैदिक धर्म पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में सनातन धर्म के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि आर्य संस्कृति ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा "।


7. *गोस्टा लोबोन (1841 - 1931):*

” वैदिक धर्म ज्ञान ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार के ही विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ"।


8. *बरनार्डशा (1856 - 1950):*

“सारी दुनिया एक दिन सनातन धर्म स्वीकार कर लेगी, अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी।

पश्चिम एक दिन सनातन धर्म स्वीकार कर लेगा और वेद ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा "।


9. *जोहान गीथ (1749 - 1832):*

"हम सभी को अभी या बाद मे सनातन धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है, मुझे कोई आर्य कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा,

मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ।



*जय आर्य जय वैदिक धर्म*

🙏🏼 *जय आर्यावर्त राष्ट्र की* 🙏


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Saturday, March 31, 2018

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व्यक्ति जोश में कभी भी कुछ भी बोल देता है और बाद में पछताता है, कि मैंने किस को क्या बोल दिया ? बाद...

व्यक्ति जोश में कभी भी कुछ भी बोल देता है और बाद में पछताता है, कि मैंने किस को क्या बोल दिया ?

बाद में पश्चाताप न करना पड़े , इसलिए वाणी पर संयम रखें । सोच समझकर बोलें , किसी के बारे में कुछ भी बोलें, तो प्रमाणों से परीक्षा करके बोलें । नापतोल कर बोलें, मीठी भाषा बोलें, सभ्यता पूर्ण भाषा बोलें , कठोर भाषा बोलने पर अथवा गलत विवरण बोलने पर यदि अपना विवरण वापस भी लेना पड़े , तो उसमें कष्ट न हो, इस तरह से बहुत सोच विचार कर बोलना चाहिए ।

क्योंकि लोग आपकी भाषा से ही आपके मन को पहचानेंगे , आपके व्यक्तित्व को पहचानेंगे, आपकी भावनाओं को पहचानेंगे ।

अनेक बार व्यक्ति कहता है , नहीं नहीं , मेरा यह अभिप्राय नहीं था ।

तो जो अभिप्राय था वही शब्द बोलने चाहिएँ थे न !!!

क्योंकि आपके मन के अभिप्राय को आपके शब्दों से ही तो पहचाना जाएगा! मन में अभिप्राय कुछ और हो तथा आपके शब्द कुछ और हों, तो लोग कैसे पहचानेंगे , आप के मन की बात?

शब्दों से ही आपके विचारों की अभिव्यक्ति होती है।

इसलिए बोलने में सदा सावधान रहें। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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Thursday, March 29, 2018

आत्माएं सब अनादि हैं। सब की आयु एक समान है। शरीर की आयु के कारण हम किसी को छोटा बड़ा मान लेते हैं ।...

आत्माएं सब अनादि हैं। सब की आयु एक समान है। शरीर की आयु के कारण हम किसी को छोटा बड़ा मान लेते हैं ।

परंतु एक जन्म में प्राप्त किए गुण , दूसरे जन्म में साथ चलते हैं । यदि कोई पिछले जन्म का 80 वर्ष का वृद्ध व्यक्ति अनेक गुण साथ लेकर मरा , तो इस जन्म में 10/15 वर्ष की आयु में उसमें वे गुण विशेष दिखाई देंगे ।

तब कोई सोचे कि मैं तो 40 वर्ष का हूं मैं इस 15 वर्ष के बच्चे से क्यों सीखूं? तो यह उसका सोचना गलत है ।

इस शरीर में वह बच्चा भले ही 15 वर्ष का है परंतु उसमें जो गुण हैं, वे तो उसने पिछले जन्म में 80 वर्ष की आयु तक सीखे थे। इसलिए आयु से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ेगा, बल्कि गुणों से लाभ लेना चाहिए । गुण सीख कर अपनी उन्नति करनी चाहिए ।


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जीवन में सभी लोग अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मात्रा में सफल होते हैं । परंतु कुछ लोग विशेष ऊंची...

जीवन में सभी लोग अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मात्रा में सफल होते हैं । परंतु कुछ लोग विशेष ऊंची सफलताएं भी प्राप्त करते हैं । आप भी यदि कोई ऐसी ऊंची सफलता प्राप्त करना चाहते हों, तो कर सकते हैं । बस मन में वही एक लक्ष्य हो , तीव्र इच्छा हो, पूरा बल लगाएं , मन में लक्ष्य प्राप्ति का एक पागलपन सा हो , तो फिर सफलता में कोई बाधा नहीं है।


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प्रत्येक व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र है । वह अपनी इच्छा से , अपनी बुद्धि से, अपने संस्कारों से...

प्रत्येक व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र है । वह अपनी इच्छा से , अपनी बुद्धि से, अपने संस्कारों से सारे काम करता है , चाहे वे गलत हों या सही हों । उसको जो सही लगता है वह व्यक्ति उसी काम को करता है , जैसे रावण और दुर्योधन का उदाहरण आप सब जानते हैं ।

फिर जब ईश्वर सबको मन में सुझाव देता है कि बुरे काम मत करो , अच्छे काम करो । बुरे काम करते समय ईश्वर मन में भय शंका लज्जा उत्पन्न करता है । और अच्छे काम करते समय उत्साह आनंद निर्भयता उत्पन्न करता है। बस यहीं तक ईश्वर की सीमा है । इसके बाद व्यक्ति स्वतंत्र है वह ईश्वर का सुझाव माने , या ना माने ।

जो नहीं मानता और बुरे काम करता ही रहता है, तब ईश्वर उसके कर्मानुसार उसे दंड देता है , और उसकी बुद्धि कम कर देता है । उसे चिंता तनाव आदि उत्पन्न कर देता है । ऐसा करने से उसकी बुद्धि का पेच ढीला हो जाता है । और फिर उतनी ही उन्नति कर पाता है जितना उसकी बुद्धि काम करती है ।

तब वह उल्टे सीधे काम करके दंड भोगता है । और बहुत बाद में उसे समझ में आता है कि मुझे अच्छे काम करने चाहिएँ , बुरे नहीं । इस प्रकार से ईश्वर उसका भी सुधार करता है। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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आपस में अनेक प्रकार के व्यवहार होते रहते हैं । कभी आप किसी पर गुस्सा करते हैं , कभी कोई दूसरा आप पर...

आपस में अनेक प्रकार के व्यवहार होते रहते हैं । कभी आप किसी पर गुस्सा करते हैं , कभी कोई दूसरा आप पर गुस्सा करता है ।

जैसीभी परिस्थिति हो, जब कोई दूसरा आपके साथ दुर्व्यवहार करे , तो उसकी प्रतिक्रिया करने से पहले , कुछ उसकी परिस्थिति को भी समझ लेना चाहिए ।

अनेक बार आप उसकी परिस्थिति समझकर, उसकी मजबूरी जानकर, आप उस पर गुस्सा नहीं करेंगे । और एक नया अपराध करने से बच जाएंगे ।

इसलिए कभी भी जल्दबाजी ना करें । शांति से सोच-समझकर काम करें। आप जीवन में प्रसन्न और आनंदित रहेंगे। यदि बिना सोचे समझे काम करेंगे, तो बाद में पछताएंगे। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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यज्ञ बहुत ही पवित्र उत्तम कर्म है । यज्ञ से बड़े-बड़े लाभ होते हैं । प्रदूषण का निवारण , स्वास्थ्य...

यज्ञ बहुत ही पवित्र उत्तम कर्म है । यज्ञ से बड़े-बड़े लाभ होते हैं । प्रदूषण का निवारण , स्वास्थ्य की रक्षा, रोगों से बचाव , शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का बढ़ना , ईश्वर की भक्ति , आध्यात्मिक उन्नति , काम क्रोध लोभ आदि दोषों का घटना, इत्यादि अनेक लाभ होते हैं।

जो लोग यज्ञ करके फिर अपने सांसारिक कार्यों को आरंभ करते हैं , उन कार्यों में सफलता मिलती है। क्योंकि उनके पीछे इस यज्ञ नामक उत्तम कर्म का प्रभाव साथ में जुड़ा होता है ।

इसलिए प्रतिदिन अपने घर में अथवा कार्यालय में यथासंभव यज्ञ का अनुष्ठान अवश्य करें । उसके बाद ही अन्य सांसारिक कार्य आरंभ करें। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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ऋग्वेद के अनुसार जो अनाज खेतों मे पैदा होता है, उसका बंटवारा तो देखिए…1- जमीन से चार अंगुल...

ऋग्वेद के अनुसार जो अनाज खेतों मे पैदा होता है, उसका बंटवारा तो देखिए…


1- जमीन से चार अंगुल भूमि का,

2- गेहूं के बाली के नीचे का पशुओं का,

3- पहली फसल की पहली बाली अग्नि की,

4- बाली से गेहूं अलग करने पर मूठ्ठी भर दाना पंछियो का,

5- गेहूं का आटा बनाने पर मुट्ठी भर आटा चीटियों का,

6- चुटकी भर गुथा आटा मछलियों का,

7- फिर उस आटे की पहली रोटी गौमाता की,

8- पहली थाली घर के बुज़ुर्ग़ो की

9- फिर हमारी थाली,

10- आखिरी रोटी कुत्ते की,

ये हमें सिखाती है, हमारी संस्कृति और…


मुझे गर्व है कि मैं इस संस्कृति का हिस्सा हूँ ।

🙏🙏🙏


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जो व्यक्ति यज्ञ नहीं करता अर्थात शुभ कर्मों का आचरण नहीं करता , तो वह कुछ ना कुछ तो करेगा, खाली तो...

जो व्यक्ति यज्ञ नहीं करता अर्थात शुभ कर्मों का आचरण नहीं करता , तो वह कुछ ना कुछ तो करेगा, खाली तो सारा दिन कोई बैठ नहीं सकता।

यदि शुभ कर्म नहीं करेगा। तो अशुभ कर्म करेगा। यदि अशुभ कर्म करेगा, तो सदा दुखी, खिन्न, परेशान, और भयभीत भी रहेगा

ही। यदि अशुभ कर्म करेगा तो समाज में उसकी प्रतिष्ठा भी नष्ट हो जाएगी, उसका प्रभाव समाप्त हो जाएगा लोग उसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखेंगे। मूर्ख और दुष्ट व्यक्ति के रूप में देखेंगे । इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह सदा अच्छे ही काम करता रहे तथा जिस से समाज में परिवार में उसका उत्तम प्रभाव बना रहे। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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भारतीय परंपरा में करोड़ों व्यक्ति स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा रखते हैं । परंतु वे जानते नहीं हैं कि...

भारतीय परंपरा में करोड़ों व्यक्ति स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा रखते हैं । परंतु वे जानते नहीं हैं कि स्वर्ग है क्या ?

“जैसे यहां अच्छे भोग फल मिठाइयां खाना पीना नाच गाना बैंड बाजा धन संपत्ति आदि पृथ्वी पर प्राप्त होती है, बस ऐसा ही स्वर्ग में होता है । और वह स्वर्ग कहीं आसमान है, जो कि मरने के बाद मिलता है ।” इस प्रकार से भारतीय लोगों की मान्यता है ।

यह मानता ठीक नहीं है। वेदो और ऋषियों के अनुसार , यह तो ठीक है कि स्वर्ग में सारे सुख मिलते हैं , और वे मरने के बाद मिलते हैं । परंतु वे सब सुख यहीं इसी पृथ्वी पर ही हैं , आपके हमारे घरों में ही मिलते हैं। आसमान में कोई ऐसा अलग स्थान नहीं है, जहां ऐसा स्वर्ग हो ।

और यदि वहां पर भी ऐसा ही राग रंग हो, तो जैसे लोग यहां भोग कर करके रोगी दुखी और परेशान हो जाते हैं , ऐसे ही उस आसमान वाले स्वर्ग में भी रोगी दुखी और परेशान हो जाएंगे । फिर यहां से उस स्वर्ग में क्या विशेष अंतर हुआ? कुछ नहीं ।

इसलिए स्वर्ग भी यहीं है , नरक भी यहीं है। सब कुछ यहीं है। हां , मोक्ष इन दोनों से अलग है, वहां कोई दुख नहीं होता , क्योंकि वहां भौतिक सुख दुख भोगने का साधन शरीर नहीं होता। ईश्वर की शक्तियों से ईश्वर का आनन्द भोगने को मिलता है। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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कुछ लोगों को अभिमान में जीने का शौक होता है । वे दूसरों को हमेशा छोटा ही समझते हैं । या तो कोई वस्तु...

कुछ लोगों को अभिमान में जीने का शौक होता है । वे दूसरों को हमेशा छोटा ही समझते हैं ।

या तो कोई वस्तु दूर से देखी जाए तब वह छोटी दिखती है । जैसे सडक पर बस आ रही है , और आप आधा किलोमीटर दूर से बस को देखें , तो वह बहुत छोटी दिखाई देगी ।

या फिर व्यक्ति अपने अभिमान में चूर होकर जब दूसरों को देखता है तब दूसरे लोग , कितने ही गुणवान क्यों ना हों, वे उसे छोटे ही दिखते हैं ।

तो वस्तुएं तो ठीक है दूरी से छोटी दिखती हैं वह तो भौतिक विज्ञान का नियम है ।

परंतु कम से कम दूसरे गुणवान व्यक्तियों को तो छोटा करके नहीं देखना चाहिए । उनके गुणों को यथावत स्वीकार करना चाहिए । यदि उनमें गुण आप से कम हैं, तो कम मानें। और यदि अधिक हैं तो अधिक मानें।

अपने अभिमान के कारण दूसरों को बडा होते हुए भी, छोटा समझें, यह उचित नहीं है। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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संसार में कुछ अच्छे लोग भी हैं और कुछ दुष्ट भी हैं। अच्छे लोगों को सदा प्रोत्साहन देना चाहिए, उनका...

संसार में कुछ अच्छे लोग भी हैं और कुछ दुष्ट भी हैं। अच्छे लोगों को सदा प्रोत्साहन देना चाहिए, उनका उत्साह बढ़ाना चाहिए , ताकि संसार में अच्छाई का प्रचार अधिक हो ।

मूर्ख और दुष्ट लोगों से बचकर रहना चाहिए। उनको समर्थन सहयोग प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए। अन्यथा संसार में बुराई और दुष्टता का प्रचार बढ़ेगा ।

तो प्रत्येक व्यक्ति का परीक्षण करें , बुद्धिमत्ता और प्रमाणों से परीक्षण करें । व्यवहार के परीक्षण से सब का पता चल जाता है , कि कौन कितना ईमानदार सज्जन है अथवा मूर्ख और दुष्ट है । इस प्रकार परीक्षा करके यथायोग्य व्यवहार करें। अच्छे लोगों को प्रोत्साहन दें , दुष्टों को नहीं। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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कोई भी संसार के कार्य करने हों, तो सबसे पहले शरीर स्वस्थ होना चाहिए। सावधानी रखें । अपनी दिनचर्या...

कोई भी संसार के कार्य करने हों, तो सबसे पहले शरीर स्वस्थ होना चाहिए। सावधानी रखें । अपनी दिनचर्या टाइम टेबल ठीक बनाएं । रात को जल्दी सोना, सुबह जल्दी उठना, थोड़ा व्यायाम करना, ईश्वर का ध्यान करना, यज्ञ करना , वैदिक ग्रंथों का स्वाध्याय करना , आर्य विद्वानों का सत्संग करना, व्यवहार में न्याय पूर्वक लेन देन करना , सत्य का आचरण करना इत्यादि शुभ कर्मों के करने से आपका शरीर मन बुद्धि इंद्रियाँ आदि सब प्रसन्न रहेंगे, तभी आपका जीवन सुखमय होगा ।

खान पान भोजन आदि में भी सावधानी रखना , शुद्ध शाकाहारी और सात्विक भोजन करना, समय-समय पर शरीर का परीक्षण कराते रहना । यदि कोई रोग निकले तो तत्काल चिकित्सा कराना, जिससे आपका जीवन सुखमय हो और आप लंबी आयु को प्राप्त करें। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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आज के भागदौड़ भरे जीवन में व्यक्ति इतना व्यस्त हो गया है उसे यह पता ही नहीं कि मैं कहां जा रहा हूं ,...

आज के भागदौड़ भरे जीवन में व्यक्ति इतना व्यस्त हो गया है उसे यह पता ही नहीं कि मैं कहां जा रहा हूं , कहां जाना चाहिए , क्या करना चाहिए? क्या मुख्य है , क्या गौण है , जीवन में किस कार्य की कितनी उपयोगिता है , उसमें कितनी शक्ति और कितना समय लगाना चाहिए , कुछ पता नहीं ।


पहले लोग जीवन को थोड़ा समझ कर जीते थे। साथ में बैठते थे , सुख दुख की बातें करते थे , एक दूसरे का सहयोग और सेवा करते थे , मिलकर जीवन का आनंद मनाते थे ।

अब तो सब कुछ मशीनी जीवन बनकर रह गया है। पुरानी बातें तो समाप्त सी हो गई ।

सारा दिन यूं ही चिंता और तनाव में बीत जाता है , दो मिनट हँसने को भी याद नहीं रहता। बस ऐसा लगता है कि मशीन की तरह जी रहे हैं , जीवन को जीवन की तरह नहीं जी रहे। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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आज के वातावरण में , जहां चारों और भोगवाद की आंधी चल रही है , व्यक्ति स्वार्थ में डूबकर सिर्फ भोगों...

आज के वातावरण में , जहां चारों और भोगवाद की आंधी चल रही है , व्यक्ति स्वार्थ में डूबकर सिर्फ भोगों को ही लक्ष्य बनाए बैठा है ।

ऐसे वातावरण में अपने आप को बुराई से पाप से बचा लेना कोई छोटी बात नहीं है । अपना जीवन पवित्र रख लेना , बहुत बड़ा काम है ।

और यह ईश्वर की कृपा और सहायता के बिना संभव नहीं है ।

इसके लिए प्रतिदिन सुबह और शाम दोनों समय ईश्वर की उपासना करें । वैदिक यज्ञ करें , वैदिक ग्रंथों का स्वाध्याय करें , आर्य विद्वानों का सत्संग करें, मन को पवित्र रखें , गंदी फिल्मों और उपन्यासों से बचें , गलत रास्ता दिखाने वाले मित्रों से बचें । तब तो संभव है कि आप अपना जीवन पवित्रता से जी लें, और बुराइयों से बचे रहें। -स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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संसार में प्रत्येक व्यक्ति की कोई न कोई समस्या होती ही है । और व्यक्ति प्रायः अपनी समस्याओं से...

संसार में प्रत्येक व्यक्ति की कोई न कोई समस्या होती ही है । और व्यक्ति प्रायः अपनी समस्याओं से परेशान रहता है । समाधान ढूंढने की कोशिश भी करता है , अनेक बार समाधान मिल भी जाते हैं। और जब व्यक्ति उस समाधान को स्वीकार कर लेता है तो उसकी समस्याएं हल हो जाती हैं। जीवन आसान हो जाता है, दुख दूर हो जाते हैं , सुख शांति बढ़ने लगती है ।

फिर भी उसे ऐसा लगता है कि कुछ समस्याएं रह गई हैं , जिनका समाधान उसे खोजने पर भी नहीं मिल पाया ।

वास्तव में समाधान तो मिलता है , परंतु अनेक बार ऐसा होता है व्यक्ति उस समाधान को स्वीकार करना नहीं चाहता । क्योंकि उसे स्वीकार करने में कष्ट होता है । वह अपने मिथ्या विचारों को , मिथ्या आग्रहों को , मिथ्या संस्कारों को छोड़ना नहीं चाहता।

इसका मूल कारण अविद्या है । तो जब तक अविद्या रहती है, व्यक्ति अपनी समस्याओं को नहीं सुलझा पाता । और सुलझ जाएं तो उन्हें स्वीकार नहीं करता । इसलिए वह दुखी रहता है ।

तो अपनी अविद्या से युद्ध करें । उसे दूर करें । सत्य समाधान को स्वीकार करें तथा जीवन को आनंद से जीएँ। - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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जीवन में बहुत सारे कार्य करने पड़ते हैं । अपने भी,घर के भी, बाहर के भी, नौकरी व्यापार के भी, समाज...

जीवन में बहुत सारे कार्य करने पड़ते हैं । अपने भी,घर के भी, बाहर के भी, नौकरी व्यापार के भी, समाज सेवा के भी , और भी अनेक कार्य होते हैं । इन सब कार्यों को संपन्न करने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है । यदि शरीर में मन में आत्मा में बल हो तो व्यक्ति सब कार्यों को आसानी से पूरा कर लेता है ।

यदि शरीर में शक्ति कम हो मन में उत्साह कम हो आत्मा में कोई बल ना हो कोई जोश ना हो , तो उसे कार्यों को संपन्न करने में कठिनाई होती है । इसलिए अपने शरीर मन आत्मा सब को बलवान बनाएं। इसके लिए प्रतिदिन व्यायाम करें , अपनी दिनचर्या ठीक रखें, सात्विक शाकाहारी भोजन खाएं , ईश्वर का ध्यान करें, प्रतिदिन यज्ञ करें , इस प्रकार से शक्ति प्राप्त करें और जीवन को आनंद से जिएं। - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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*“ वैदिक नववर्ष, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत् 2075 (18 मार्च, 2018)” की आप सभी को...

*“ वैदिक नववर्ष, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत् 2075 (18 मार्च, 2018)” की आप सभी को अग्रिम शुभकामनाएँ।*

इसी दिन ‪1960853119‬ वर्ष पूर्व इस पृथिवी के तिब्बत - हिमालय क्षेत्र में युवावस्था में मनुष्यों की उत्पत्ति हुई, इस कारण यह मानव उत्पत्ति संवत् है।

मनुष्योत्पत्ति के दिन ही अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नामक चार महर्षियों ने ब्रह्माण्ड में अनेक प्रकार के  Vibrations के रूप में व्याप्त वैदिक ऋचाओं (मंत्रों) को अपने योग बल से ग्रहण करके सृष्टि के रचयिता निराकार सर्वज्ञ ब्रह्म रूप चेतन तत्व की प्रेरणा से उनका अर्थ भी जाना, जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में सृष्टि में विख्यात हुआ। इन्हीं चार ऋषियों ने महर्षि ब्रह्मा (आद्य) को सर्वप्रथम चारों वेदों का ज्ञान दिया। इस कारण यह वेद संवत् भी है।

यह संवत् संसार के सभी धार्मिक पवित्र मानवों के लिए है-



*चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व :*


*1.:-इसी दिन आज से तथा सृष्टि संवत 1,96,08,53,119 वर्ष पुर्व सूर्योदय के साथ ईश्वर ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।


*2:-प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार इसी दिन वेद-वेदांग-विज्ञान के महान् ज्ञाता मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम ने आततायी महाबली रावण का वध किया। ध्यातव्य है कि श्रीराम व रावण का अन्तिम युद्ध चैत्र की अमावस्या को प्रारम्भ हुआ और दो दिन चला। प्रचलित दशहरे (विजयादशमी) का रावण वध से कोई सम्बन्ध नहीं है।

महाभारत के अनुसार इसी दिन धर्मराज युधिष्ठिर की अधर्म की प्रतिमूर्ति दुर्योधन पर विजय हुई। दुर्योधन की मृत्यु के समय योगेश्वर महामानव भगवान् श्रीकृष्ण जी ने कहा था- ‘प्राप्तं कलियुगं विद्धि’, इस कारण यह दिन किसी भी युग का प्रारम्भिक दिन भी होने से युग संवत् भी है। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ था इसलिए यह युधिष्ठिर संवत है ।


3:-समस्त भारतीयों के लिए यह दिन इस कारण महनीय है क्योंकि इसी भारत भूमि पर मनुष्य, वेद, भगवान् श्रीराम, धर्मराज युधिष्ठिर सभी उत्पन्न हुए तथा इसी का सम्बन्ध सम्राट् विक्रमादित्य से भी है, जिनके नाम से इस दिन को विक्रम संवत् का प्रारम्भ भी मानते हैं। यह 2075 वां वि.सं. है।  सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया। इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है।


*4:-विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।


5:-143 वर्ष पूर्व स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन को आर्य समाज की स्थापना दिवस के रूप में चुना।*आर्य समाज वेद प्रचार का महान कार्य करने वाला संगठन है।


*वैदिक नववर्ष का प्राकृतिक महत्व :*


*1.* वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।


*2.* फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।


*वैदिक नववर्ष कैसे मनाएँ :*


*1.* हम परस्पर एक दुसरे को नववर्ष की शुभकामनाएँ दें।


*2.* आपने परिचित मित्रों, रिश्तेदारों को नववर्ष के शुभ संदेश भेजें।


*3 .* इस मांगलिक अवसर पर अपने-अपने घरों में हवन यज्ञ करे और वेद आदि शास्त्रो के स्वधयाय का संकल्प ले।


*4.* *घरों एवं धार्मिक स्थलों में हवन यज्ञ के प्रोग्राम का आयोजन जरूर करें ।*


*5.* इस अवसर पर होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लें अथवा कार्यक्रमों का आयोजन करें।


*आप सभी से विनम्र निवेदन है कि “वैदिक नववर्ष” हर्षोउल्लास के साथ मनाने के लिए “ज्यादा से ज्यादा सज्जनों को प्रेरित” करें।*

धन्यवाद


🚩नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं🚩


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कोई पशु पक्षी प्राणी कुत्ता सूअर हाथी भेड़िया शेर आदि पढ़ लिख कर के डॉक्टर नहीं बनता, इंजीनियर नहीं...

कोई पशु पक्षी प्राणी कुत्ता सूअर हाथी भेड़िया शेर आदि पढ़ लिख कर के डॉक्टर नहीं बनता, इंजीनियर नहीं बनता, वकील नहीं बनता, वैज्ञानिक नहीं बनता ।

यह सब प्राणी जैसे जन्मे थे जीवन भर वैसे ही रहते हैं । उनको जीवन जीने के लिए जितना ज्ञान आवश्यक है उतना ईश्वर इन को जन्म से ही सिखा कर भेजता है ।

इसलिए इनके ना कोई स्कूल होते हैं ना अध्यापक।

कहीं-कहीं मनुष्य , कुत्ते अधिक प्राणियों को थोड़ी बहुत ट्रेनिंग दे देते हैं जिससे वे चोरों को पकड़वाने में सहायता करते हैं । परंतु ऐसे प्राणियों की प्रगति भी बहुत सीमित होती है बहुत अधिक नहीं ।

परंतु मनुष्य एक ऐसा प्राणी है , जो जन्म से तो बहुत कम जानता है, पिछले जन्म से थोड़े ही संस्कार लेकर आता है, फिर भी यदि इस जन्म में उसे अच्छी शिक्षा अच्छे अध्यापक अच्छा विद्यालय अच्छी सुविधाएं मिल जाएं, तो वह बहुत उन्नति कर सकता है । अपने लिए भी समाज के लिए देश के लिए सबके लिए । बहुत से लोग अनेक क्षेत्रों में उन्नति करते भी हैं । इसलिए हमको अपने मनुष्य जीवन का मूल्य समझते हुए जीवन में पर्याप्त उन्नति करनी चाहिए । वास्तविक उन्नति का तात्पर्य दुखों से छूटना और ईश्वरीय आनंद की प्राप्ति करना है।- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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मनुष्य का यह मनोविज्ञान है कि वह आँख से देखकर 80% बातें सीखता है और कान से सुनकर 20%. तो आपको अपने...

मनुष्य का यह मनोविज्ञान है कि वह आँख से देखकर 80% बातें सीखता है और कान से सुनकर 20%.

तो आपको अपने माता-पिता के साथ व्यवहार करते हुए, आपके बच्चे आंख से देखते हैं । और वे उसमें से 80% बातें सीखते जाते हैं , कि हमारे माता पिता , हमारे दादा दादी के साथ क्या व्यवहार करते हैं?

यही घटना कुछ वर्षों के बाद आपके साथ होने वाली है । अर्थात जो आपने अपने माता-पिता के साथ किया , अच्छा या बुरा, जो भी । वही अब आपके बच्चे , आपके बुढ़ापे में आपके साथ करेंगे। क्योंकि उन्होंने आपको अपनी आंख से देखकर सीखा है, जो आपने अपने बडों के साथ किया ।

इसलिए यदि आप अपना बुढ़ापा सुरक्षित करना चाहते हैं , सुखदायक बनाना चाहते हैं , तो अच्छा यही होगा , कि अपने माता-पिता की ठीक प्रकार से सेवा करें । तब आपके बच्चे भी आपके बुढ़ापे में आपकी सेवा कर देंगे ।

अन्यथा जो स्थिति आप आज देख रहे हैं , उसे सब जानते हैं , उसकी व्याख्या करना की आवश्यकता नहीं है। - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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व्यक्ति 5 इंद्रियों से सुख भोगता है । आज तो चारों ओर ऐसा ही वातावरण बना हुआ है। लोगों को धर्म कर्म...

व्यक्ति 5 इंद्रियों से सुख भोगता है । आज तो चारों ओर ऐसा ही वातावरण बना हुआ है।

लोगों को धर्म कर्म में सेवा परोपकार में ईश्वर में मोक्ष प्राप्ति आदि में कोई खास रुचि नहीं है । इंद्रियों के रूप, रस, गन्ध आदि विषयों का सुख लेने में खूब रुचि है ।

और उनमें से एक मुख्य विषय रस है, जो रसना इंद्रिय से खाने पीने आदि से सुख मिलता है।

यह बहुत आसानी से मिल जाता है , और इसका सुख लेने में प्रायः लोग बुरा भी नहीं मानते । इसलिए बेखटके लोग खाने पीने का सुख लेते रहते हैं।

फिर चाहे परिणाम, कुछ भी क्यों न हो। रोगी हों, चाहे दीर्घरोगी हों, बस रसना आदि इंद्रियों से रस आदि विषयों का सुख जरूर लेना है। मन, इंद्रियों पर संयम तो है नहीं, और कोई माता पिता आदि सिखाते भी नहीं। क्योंकि उनका स्वयं का संयम नहीं है।

तो वेदादि शास्त्र कहते हैं, *भोजन को दवाई के समान खाना चाहिए , अन्यथा भविष्य में दवाइयां भोजन के समान खानी पड़ेंगी* अर्थात भोजन का सुख न लेवें, बल्कि स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भोजन करें। - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिस पर झूठे आरोप ना लगाए जाते हों। और तो और , ईश्वर में एक भी...

संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिस पर झूठे आरोप ना लगाए जाते हों। और तो और , ईश्वर में एक भी दोष नहीं है एक भी कमी नहीं है वह कभी किसी पर अन्याय नहीं करता, दयालु है उपकारी है और बिना कुछ फीस लिए सबका न्याय करता है बदले में कुछ चाहता भी नहीं है , फिर भी ऐसे सर्वगुणसंपन्न सर्वशक्तिमान ईश्वर को भी लोग नहीं छोड़ते । अपनी अविद्या और स्वार्थ के कारण ईश्वर पर भी भरपेट दोष लगाते हैं , झूठे आरोप लगाते हैं। फिर आप और हम तो क्या चीज हैं, ? हम तो सर्वशक्तिमान नहीं हैं, सर्वगुण संपन्न नहीं हैं , जाने अनजाने हम से तो कभी कहीं गलतियां हो भी सकती हैं । ऐसी स्थिति में यदि कोई आप हम पर आरोप लगाए , तो क्या आश्चर्य की बात है ? कुछ नहीं ।

इसलिए लोग यदि आप पर झूठे आरोप लगाए निंदा चुगली करें तो घबराना नहीं , चिंता नहीं करना, और अपने मन को शांत रखना । इसके लिए 2 सूत्र हैं । पहला , *कोई बात नहीं* . दूसरा, *ईश्वर न्याय करेगा* .

अपने मन को शांत रखने के लिए ये 2 सूत्र अपने मन में बोलिए और मस्त रहिए । यह संसार ऐसे ही चलता है ऐसे ही चलेगा। इसकी परवाह न करें। - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक।


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Wednesday, October 11, 2017

 हिन्दू सत्य सनातन धर्म की - अद्भुत पूजा पद्धति जो पूर्णतया वेदानुकूल है,अनुकरणीय है, ध्यान मुद्रा...

 हिन्दू सत्य सनातन धर्म की - अद्भुत पूजा पद्धति जो पूर्णतया वेदानुकूल है,अनुकरणीय है, ध्यान मुद्रा में बैठ कर निम्न वेदमंत्रों का अर्थ सहित चिन्तन करें, ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना करें-*

*अथ वैदिक सन्ध्या*-


ओ३म्‌ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात्‌ ॥

-यजु. ३६.३


ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये।

शंयोरभि स्रवन्तु नः॥

-यजु. ३६.१२

(दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें)


ओं वाक्‌ वाक्‌। ओं प्राणः प्राणः। ओं चक्षुः चक्षुः। ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्‌। ओं नाभिः।

ओं हृदयम्‌। ओं कण्ठः। ओं शिरः। ओं बाहुभ्यां यशोबलम्‌। ओं करतलकरपृष्ठे॥

(इन्द्रिय स्पर्श करें)


ओं भूः पुनातु शिरसि। ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः। ओं स्वः पुनातु कण्ठे।

ओं महः पुनातु हृदये । ओं जनः पुनातु नाभ्याम्‌। ओं तपः पुनातु पादयोः।

ओं सत्यम्‌ पुनातु पुनश्शिरसि। ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥

(जल से मार्जन करें)


ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं तपः। ओं सत्यम्‌॥

(प्राणायाम करें)


ओं ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।

ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥


समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत।

अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी॥


सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्‌।

दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥

-ऋग्‌. १०.१९०.१-३


ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये।

शंयोरभि स्रवन्तु नः॥

-यजु. ३६.१२

(दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें)


ओं प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं उदीची दिक्सोमोेऽधिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं ऊर्ध्वा दिग्बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥

-अथर्व.३.२७.१-६


ओम्‌ उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्तऽउत्तरम्‌।

देवं देवत्रा सूर्य्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्‌॥

-यजु. ३५.१४


उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः।

दृशे विश्वाय सूर्य्यम्‌॥

-यजु. ३३.३१


चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।

आप्रा द्यावापृथिवीऽअन्तरिक्षम्‌

सूर्यऽआत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥

-यजु. ७.४२


तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्‌।

पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं

शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं

भूयश्च शरदः शतात्‌॥

-यजु. ३६.२४


ओ३म्‌ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात्‌ ॥

-यजु. ३६.३


हे ईश्वर दयानिधे ! भवत्कृपयानेन जपोपासनादिकर्मणा

धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर्भवेन्नः॥


ओं नमः शम्भवाय च मयोभवाय च

नमः शंकराय च मयस्कराय च

नमः शिवाय च शिवतराय च॥

-यजु. १४.४१


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सत्यार्थ प्रकाश : क्या और क्योंमहर्षि दयानन्द ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में अपना कालजयी...

सत्यार्थ प्रकाश : क्या और क्यों


महर्षि दयानन्द ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में अपना कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश रचकर धार्मिक जगत में एक क्रांति कर दी . यह ग्रन्थ वैचारिक क्रान्ति का एक शंखनाद है . इस ग्रन्थ का जन साधारण पर और विचारशील दोनों प्रकार के लोगों पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा . हिन्दी भाषा में प्रकाशित होनेवाले किसी दुसरे ग्रन्थ का एक शताब्दी से भी कम समय में इतना प्रसार नहीं हुआ जितना की इस ग्रन्थ का अर्धशताब्दी में प्रचार प्रसार हुआ . हिन्दी में छपा कोई अन्य ग्रन्थ एक शताब्दी के भीतर देश व विदेश की इतनी भाषाओँ में अनुदित नहीं हुआ जितनी भाषाओँ में इसका अनुवाद हो गया है. हिन्दी में तो कवियों ने इसका पद्यानुवाद भी कर दिया .


सार्वभौमिक नित्य सत्य : इस ग्रन्थ का लेखक ईश्वर जीव प्रकृति इन तीन पदार्थों को अनादि मानता है .ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव भी अनादि व नित्य हैं . सृष्टि नियमों को भी ग्रन्थ करता अनादि व नित्य तथा सार्वभौमिक मानता हिया . विज्ञान का भी यही मत है की सृष्टि नियम Laws of Nature अटल अटूट सार्वभौमिक हैं . इन नियमों का नियंता परमात्मा है . परमात्मा की सृष्टी नियम न तो बदलते हैं न टूटते हैं न घटते हिएँ न बढते हैं और न ही घिसते हैं इसलिए चमत्कार की बातें करना एक अन्धविश्वास है . किसी भी मत का व्यक्ति चमत्कार में आस्था रखता है तो यह अन्धविश्वास है.


सबसे पहला ग्रन्थ विश्व में इस युत में चमत्कारों को चुनौती देने वाला सबसे पहला ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश है. जिस मनीषी ने चमत्कारों को तर्क तुला पर तोलकर मत पंथों को अपनों व परायों को झाक्खोरा विश्व का वह पहला विचारक महर्षि दयानन्द सरस्वती है. सत्यार्थ प्रकाश के प्रणेता तत्ववेत्ता ऋषि दयानन्द को न तो पुराणों के चमत्कार मान्य हैं और न ही बाइबल व कुरान के . हनुमान के सूर्य को मुख में ले लिया यह भी सत्य नहीं है और हजरत ईसा ने रोगियों को चंगा कर दिया , मृतकों को जीवित कर दिया तथा हजरत मुहम्मद साहेब ने चाँद के दो टुकडे कर दिए – ये भी ऐतिहासिक तथ्य नहीं है . हजरत मुसा हों अथवा इब्राहीम सृष्टि नियम तोड़ने में कोई भी सक्षम नहीं हो सकता . दयानन्द जी के इस घोष का कड़ा विरोध हुआ . आर्य विद्वानों ने इस विषय मरण सैकड़ों शाश्त्रार्थ किये. पंडित लेखराम जी आर्य पथिक को इसी कारण बलिदान तक देना पड़ा . ख्वाजा हसन निजामी को सन १९२५ में एक आर्य विचारक प्रो हासानन्द ने चमत्कार दिखाने की चुनौती दी और कहा की में आपसे बढकर जादूगरी से चमत्कार दिखाऊंगा . ख्वाजा साहेब को आगे बढकर चमत्कार दिखाने का साहस ही नहीं हुआ . (दृष्टव्य : दैनिक तेज उर्दू दिनांक ३०.१०.१९२५ पृष्ठ ५ ) सत्य साईं बाबा भी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की चुनौती को स्वीकार करके कोई चमत्कार न दिखा सका.


अब तो विरोधी भी मन रहे हैं : ईश्वर की कृपा हुयी . ऋषी की पुण्य प्रताप व अनेक बलिदानों की फलस्वरूप अब विरोधी भी सत्यार्थ प्रकाश के प्रभाव को स्वीकार करके इस अन्धविश्वास से मुक्ति पा रहे हैं . हाँ ऐसे लोगों की अब भी कमी नहीं है जो सत्यार्थ प्रकाश से प्रकाश भी पा रहे हैं और इसे कोष भी रहे हैं . गुड का स्वाद भी लेते हैं और गन्ने को गालीयाँ भी देते हैं . पुराण बाइबिल व कुरान के ऐसे प्रसंगों की व्याख्याएं ही बदल गयीं हैं . अब रोगियों को चंगा करने का अर्थ मानसिक और आध्यात्मिक रोगों को दूर करना हो गया है . मृतकों को जिलाने का अर्थ नैतिक मृत्यु से बचाना किया जाने लगा है . यह व्याख्या कैसे सूझी? इन धर्म ग्रंथों के भाष्य व तफ्सीरें बदल गयीं हैं .


सत्य असत्य की कसौटी : आज से साथ वर्ष पहले तक धर्म की सच्चाई की कसौटी चमत्कारों को माना जाता था . आज है कोई जो कुमारी मरियम से ईसा की उत्पत्ति को इसाई मत की सचाई का प्रबल प्रमाण मानता हो ? कौन है जो पुराणों की असंभव बातों को संभव व सत्य मानता हो ? कौन है जो बुराक पर सवार होकर पैगम्बर मुहम्मद की आसमानी यात्रा को सत्य मानता हो ? मुसलमानों के नेता सर सैयद अहमद खां ने बड़ी निर्भीकता से इन गप्पों को झुठलाया है ( दृष्टव्य “ हयाते जावेद लेखक मौलाना हाली – पानीपत ). यह सब सत्यार्थ प्रकाश का ही प्रभाव है .


लोगों का ध्यान नहीं गया :सत्यार्थ प्रकाश ने भारतीय जनमानस में मातृभूमि का प्यार जगाया . जन्म भूमि व पूर्वजों के प्रति आस्था पैदा की . जातीय स्वाभिमान को पैदा किया . एकादश समुल्लास की अनुभुमिका ने भारतीयों की हीन भावना को भगाया. सत्यार्थ प्रकाश की इसी अनुभुमिका का प्रभाव था की गर्ज -२ कर आर्य लोग गाया करते थे :


कभी हम बुलन्द इकबाल थे तुम्हें याद हो कि न याद हो


हर फेन में रखते कमाल थे तुम्हें याद हो य न याद हो .


सत्यार्थ प्रकाश ने देशवासियों को स्वराज्य का मंत्र दिया . इनके अतिरिक्त सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित कुछ वाक्यों व विचारों की मौलिकता व महत्व्य को विचारकों ने जाना व माना परन्तु उनका व्यापक प्रचार नहीं किया गया .इन्हें हम संक्षेप में यहाँ देते हैं :


ऋषी दयानन्द आधुनिक विश्व के प्रथम विचारक हैं जिन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में सबके लिए अनिवार्य व निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा का सिद्धांत रखा . उनके एक प्रमुख शिष्य स्वामी दर्शनानंद जी ने भारत में सबसे पहले निःशुल्क शिक्षा प्रणाली का प्रयोग किया .ऋषी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कृषक व श्रमिक आदि राजाओं के राजा हैं . कृषकों व श्रमिकों का समाज में सम्मान का स्थान है . इस युग में ऐसी घोषणा करने वाले पहले धर्म गुरु ऋषी दयानन्द ही थेऋषी ने अपने सत्यार्थ प्रकाश के १३ वे समुल्लास में लिखा है की यदि कोई गोरा किसी काले को मार देता है तो भी पक्षपात करते हुए न्यायालय उसे दोषमुक्त करके छोड़ देता है . इसाई मत की समीक्षा करते हुए ऐसा लिखा गया है . यह महर्षि की निर्भीकता व सत्य वादिता एवं प्रखर देशभक्ति का एक प्रमाण है . बीसवीं शताब्दी में आरंभिक वर्षों में मद्रास कोलकाता व रावलपिंडी आदि नगरों में ऐसे घटनाएं घटती रहती थें . मरने वालों के लिए कोई बोलता ही नहीं था .प्रथम विश्व युद्ध तक गांधी जी भी अंग्रेज जाति की न्याय प्रियता में अडिग आस्था रखते हुए अंग्रेजी न्याय पालिका का गुणगान करते थे

महर्षि दयानन्द प्रथम भारतीय महापुरुष हैं जिन्होंने विदेशी शाषकों की न्याय पालिका का खुलकर अपमान किया . ऋषी ने विदेशियों की लूट खसोट व देश की कंगाली पर तो इस ग्रन्थ में कई बार खून के आंसू बहाये हैं

सत्यार्थ प्रकाश के तेरहवें समुल्लास में ही इसाई मत की समीक्षा करते हुए लिखा है कि तभी तो ये इसाई लोग दूसरों के धन पर ऐसे टूटते हैं जैसे प्यासा जल पर व भूखा अन्न पर . ऐसी निर्भीकता का हमारे देश के आधुनिक इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता


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ओ३म् ओ३म् ओ३म् सभी को सादर वैदिक नमस्ते जी जब हम मूर्ति पूजा का ख़ंडन करते हैँ तो लोग ये तर्क करते...

ओ३म् ओ३म् ओ३म्
सभी को सादर वैदिक नमस्ते जी
जब हम मूर्ति पूजा का ख़ंडन करते हैँ तो लोग ये तर्क करते हैं—-
वे कहते है की अगर आप अपने पिता की तस्वीर पर नहीं थूक सकते तो फिर मूर्ति का तिरस्कार क्यों करते है ।
उत्तर : हम मूर्ति का तिरस्कार नहीं वरन मूर्ति को ईश्वर मान उसको पूजने का विरोध करते हैं।हम पिता की तस्वीर अपने घर में लगाते है क्योंकि वह हमारे प्रिय हैँ हमारे आदर्श हैँ ,हमारे पूर्वज हैँ ।किन्तु उस तस्वीर को पिता समझ कर पिता की तरह व्यवहार नही करते। तस्वीर से धन नही मांगते ,सहायतानही मांगते ।क्योकि यह जानते है कि यह पिता की तस्वीर है पिता नहीं ,पिता की तरह चेतन नही है , यह जड़ है, ना सुनती है , ना देखती है ओर ना प्रतिक्रिया करती है।सबसे बड़ी बात , अगर पिता जीवित है तो सिर्फ उस चेतन पिता से चर्चा करके ही कुछ प्राप्त किया जा सकता , उनकी जड़ तस्वीर या मूर्ति से नही। अगर हमारे जीवित पिता हमे अपनी तस्वीर से बात करते देंखे तो वे हमें मूढ़ समझेंगे, बुद्धिहीन समझेंगे ओर क्रोध भी करेंगे ।क्या यही गलती हम उस चेतन ईश्वर के सम्बन्ध में नही कर रहे है??वह परमपिता परमात्मा जीवित है , चेतन है , हमारे ह्र्दय में है , फिर भी हम उसकी जगह मूर्तियों से मांगते है, जो जड़ है , हम जड़ वस्तुओं से बात करते है ईश्वर समझ कर । क्या ईश्वर यह देखकर प्रसन्न होगा??ईश्वर का कोई रूप रंग आकर नहीं होता फिर एक मनुष्य जैसी आकृति ईश्वर का प्रतिक कैसे आभासित करवासकती है??और चलो करवा भी दिया तो फिर मूर्ति में जरा भी टूट होते ही फेंक क्यों देते हो , फिर उसका भगवान् मर गया ?? गायब हो गया??क्यों नहीं सड़को पर पड़ी टूटी फूटी मूर्तियो को भी उठा लाते हो ??सच तो ये है तुम लोग मूर्तियो में ईश्वर का प्रतिक नहीं देखते बल्कि मूर्ति को ही भगवान् माने बैठे हो , वो भी एक ख़ास समय और स्तिथि में जब उसमे कोई मुर्ख पाखंडी पंडा आकर प्राण ना फूँक देतभी और जब तक वह खंडित ना हो जाए तब तक ।इससे आगे पीछे की स्तिथियों में वे ही मूर्तियां सड़को पर पड़ी रहती है।
2 : दूसरा तर्क है मूर्ति में भी भगवान है क्योकि वह कण कण में है तो मूर्ति को ही क्यों नहीं पूजते?
उत्तर : ईश्वर तो कण कण में है परंतु मूर्ति उसने नहीं बनाई , मूर्ति तो मनुष्य ने बनाई , ईश्वर ने बनाया फूल तो बताओ कौन बड़ा मूर्ति या फूल , तुम छोटी वस्तु पर बड़ी वस्तु चढ़ाते हो ।वह ईश्वर सर्वव्यापक है और तुम उसे एक छोटी सी मूर्ति में सिमित कर देते हो ।जब किसी से मिलना होता है तो उस स्थान पर हमारा ओर जिससे मिलना हो उसकी एक साथ उपस्तिथि आवश्यक है ।उदाहरण के लिए , अगर मुझे अपने मोदी जी से मिलना हो तो या तो दिल्ली जाना पड़ेगा या मोदी जी को मुजफ्फरनगर आना पड़ेगा ।इसी प्रकार अगर ईश्वर का साक्षत्कार करना है तो ईश्वर ओर हमे एक स्थान पर उपस्थित होना पड़ेगा ।हम से आशय हमारा शरीर नही बल्कि हमारी आत्मा से है।अर्थात वह स्थान बताइये जहां हमारी आत्मा ओर ईश्वर एक साथ उपस्थित हो।ईश्वर तो सर्वव्यापक होने से मूर्ति में भी है, आपके शरीर के भीतर भी है।अब आप कहाँ कहाँ है ??क्या आप मूर्ति के भीतर है ??क्या आप संसार की किसी भी वस्तु के भीतर है??आप सिर्फ अपने शरीर के भीतर है , यही वह स्थान है जहां आपका ईश्वर से साक्षात्कार सम्भव है , अन्यथा कही नही।यह मेरे विचार नही अपितु वेद वाणी है जो तर्क की कसौटी पर भी खरी उतरती है।वेद अंतिम प्रमाणवेद निंदक नास्तिकों अस्तिचिंतन करे, ओर ईश्वर को अपने भीतर खोजे ओर उसका तरीका भी वेदो में ही है जिसे महृषि पतंजलि ने अष्टांग योग के नाम से प्रचारित किया है।
3: तीसरा तर्क एकाग्रता के लिए मूर्ति जरुरी है, उत्तर : मूर्ति पर एकाग्रता किस लिए बढ़ा रहे हो , क्या मूर्ति भगवान् है , नहीं मूर्ति भगवान नहीं । मूर्ति को एकाग्रचित होकर भगवान् समझने से भी वह भगवान् नहीं बनेगी , मूर्ति ही रहेगी ।और किसी दिन टूट गयी 20 साल की एकाग्रता को ठेष पहुचेगी किन्तु आप फिर भी आप बिना मूर्ति के उपासना नही करेंगे बल्कि दूसरी मूर्ति खरीद लाओगे।सभी मूर्तिपूजक ये दावा करते है कि एक दिन मूर्तिपूजा करते करते एकाग्रता इतनी अधिक हो जाएगी किमूर्ति छूट जाएगी और ध्यान निराकार पर लग जायेगा।यह झुठ है क्योंकि निराकार पर ध्यान तभी लगेगा जब निराकार उपासना विधि आर्थत अष्टांग योग का प्रयास करोगे।इसीलिए एक 10 साल का बालक मूर्तिपूजा करते करते 80 साल का हो जाता है किंतु मूर्तिपूजा नहीछोड़ताअष्टाङ्ग योग विधि अपना कर कोई भी व्यक्ति एकाग्रता भी बढ़ा सकता है और निराकार ईश्वर का ध्यान भी कर सकता है ।


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हवन का महत्वफ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमे उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः...

हवन का महत्व

फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमे उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है जो की खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओ को मारती है तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।

(२) टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

(३) हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है अथवा नही. उन्होंने ग्रंथो. में वर्णित हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया की ये विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा की सिर्फ आम की लकड़ी १ किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बॅक्टेरिया का स्तर ९४ % कम हो गया। यही नही. उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया की कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओ का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। बार बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ की इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।

यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर २००७ में छप चुकी है।

रिपोर्ट में लिखा �


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