Saturday, May 5, 2018

आर्यों के विमर्श के लिए…आइए कुछ विचार करते हैं – ईश्वर और जीवात्मा के परिमाण और सूक्ष्म-स्थूल स्वरूप...

आर्यों के विमर्श के लिए…


आइए कुछ विचार करते हैं – ईश्वर और जीवात्मा के परिमाण और सूक्ष्म-स्थूल स्वरूप के विषय में

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महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में ईश्वर और जीवात्मा दोनों चेतन (conscious), अदृश्य (invisible), अभौतिक (non-material or non-physical) सत्ताएं हैं।


ईश्वर अनन्त (infinite or endless) है, उसकी सत्ता अनन्त है। ऐसा कह सकते हैं कि वह इतना महान् है कि वह स्वयं भी अपना अन्त नहीं जानता, स्वयं को अनन्त ही समझता है ! यह विचित्र बात है जो आसानी से समझ में नहीं आती है। ईश्वर जैसी सत्ता भी स्वयं को अनन्त जाने अर्थात् अपनी ही विद्यमानता (presence) अवकाश (space) में कहां तक –कितने स्थान पर्यन्त है, इसका उसे ही ज्ञान न हो, अथवा स्वयं को अनन्त ही जाने – यह बात हम महर्षि दयानन्द जी के ग्रन्थ को प्रमाण मानकर स्वीकार तो कर लेते हैं, परन्तु इसे ठीक से – स्पष्ट संकल्पना पूर्वक (conceptually) समझना आसान नहीं है।


जैसे ईश्वर की अनन्त विद्यमानता (infinite presence) को समझना कठिन है, उसकी थाह पाना असम्भव-सा (unfathomable) है, वैसे ही जीवात्मा का अणु-स्वरूप, उसकी सूक्ष्म सत्ता, उसकी परिच्छिन्नता (finitude or boundedness) को समझना कठिन है, क्योंकि वह भी हम जान न पाए इतना छोटा (infinitely or immeasurably small) है।


जैसे क्षेत्र (domain, occupation, region, area, presence) की दृष्टि से ईश्वर अनन्त चेतन सत्ता है, वैसे ही जीवात्मा भी अत्यन्त अणु सत्ता है। जैसे अनन्त ईश्वर की सत्ता की कोई सीमा (border or limit) नहीं है, वैसे जीवात्मा ससीम होते हुए भी उसकी सूक्ष्मता (smallness or minuteness) भी एक प्रकार से ‘अनन्त’ है, वह इतना अत्यन्त अल्प है, छोटा है।


व्यापकत्व (pervasiveness or the quality of being pervaded, permeated or penetrated in others) की दृष्टि से विचार किया जाए तो ईश्वर सर्वव्यापक है, अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर है। इस गुण को लेकर दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में जीवात्मा को ईश्वर से स्थूल और ईश्वर को जीवात्मा से सूक्ष्म लिखा है। जीवात्मा में यह व्यापकत्व गुण नहीं है, ऐसा मैं समझता हूं।


एक कठिन विषय को मैंने अपनी अल्प मति से जैसा समझ पाया हूं, यहां प्रस्तुत करने का प्रयास किया है – इस आशा के साथ कि सुविज्ञ आर्य पाठक इन बातों पर सम्यक् विचार करेंगे जिससे सत्य की गवेषणा हो सके। मैंने यहां जो लिखा है वही सत्य है, ऐसा मैं मन में भी नहीं सोचता हूं। प्रत्युत मैं ऐसा समझता हूं कि यह विषय गहन है, अतः चिन्तनशील आर्यों को धैर्यपूर्वक विचार-विमर्श करना होगा।


जिन आर्यों ने ‘जीवात्मा सर्वथा निराकार नहीं है’ इस प्रकार की बातें प्रसारित की हैं, मैं नहीं समझता हूं कि उन्होंने किसी अ-भद्र भावना से ऐसा किया है। यह विषय ही ऐसा है कि कुछ लोग अन्यथा विचार या निर्णय कर सकते हैं।


लेखक : भावेश मेरजा ( आर्यसमाज, भरूच)


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*प्रश्न-* *सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:। गीता...

*प्रश्न-* *सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:। गीता १८/६६*


इस श्लोक का क्या अर्थ होता है?


*उत्तर"*


अर्थ : “सब धर्मों(वर्णाश्रम कर्त्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा । मैं तुझ को सब पापों से छुड़ा दूंगा ,चिन्ता मत कर ।


*भावार्थ-* सर्वत्र ब्रह्म को व्यापक देखने का अभ्यास करते-करते अब और आगे बढ़ें और वर्णाश्रम के धर्मों(कर्त्तव्यों) की परवाह छोड़कर सारा समय और अपनी सारी शक्ति ब्रह्म तन्मय हो जाने (समाधि आदि) में लगादें (उस के शरण में जाने का तात्त्पर्य यही है।) तो परमात्मा सर्व पापों से छुड़ा देगा ।


*प्रश्न-* *क्या परमेश्वर पाप को माफ़ कर देंगे? ,फल नहीं भुगवाएँगे?*


*उत्तर-* योग(ध्यान,धारणा,समाधि) तथा ज्ञानरुपी अग्नि में पापरुपी मल दग्ध हो जाता है । परंतु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि ईश्वर पापों को क्षमा कर देगा,पाप कर्म का दण्ड तो अवश्य मिलेगा ।


परंतु योग व ज्ञान से पापों की निवृत्ति होती है यहि अर्थग्रहण करना चाहिए, यही बात मुण्डकोपनिषद् में कही है : *मुण्डक :२ काण्ड :२ श्लोक संख्या :८ ) भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।*


*पदार्थ-* (भिद्यते) टूट जाती है। (हृदयग्रन्थिः) रोहे की गांठ अर्थात् सूक्ष्म शरीर से वियोग हो जाता है। जन्म-मरण में तो सूक्ष्म शरीर साथ रहता है, परन्तु उस दशा में पृथक् हो जाता है। (छिद्यन्ते) नष्ट हो जाते हैं। टूट जाते हैं। (सर्वसंशयाः) सब प्रकार के सन्देह। (क्षीयन्ते) क्षीण हो जाते हैं। (च) और (अस्य) उस ब्रह्मज्ञानी के। (कर्माणि) सब कर्म। (तस्मिन्) उस अवस्था में। (दृष्टे) जब साक्षात् देख लेता है। (परावरे) जो इन्द्रियों से अनुभव होने योग्य नहीं है। *भावार्थ-* जब कोई पुरुष इन्द्रियों से अनुभव न होने योग्य परमात्मा को भीतर ज्ञान-चक्षु से देख लेता है, तब उसके रोहे की गांठ अर्थात् सूक्ष्म शरीर का सबन्ध टूट जाता है। सब संदेहों का सबन्ध मन से है और मन का सूक्ष्म शरीर से। जब सूक्ष्म शरीर ही न रहा, तो मन कहां? जब मन ही नहीं तो उसमें उत्पन्न होने वाले संदेह कहां? *अतः सपूर्ण सन्देह दूर हो जाते हैं। और जब मन ही न रहा, जिसमें सब कर्मों के संस्कार रहते हैं तो उसमें रहने वाले कर्म किस प्रकार रह सकते हैं? उस ज्ञानी के सब कर्म नष्ट हो जाते हैं। इसी बात की उक्त "गीता” के श्लोक में सङ्गति करें ।*


*प्रश्न-क्या सपूर्ण कर्म ब्रह्मज्ञानी होने पर नष्ट हो जाते हैं?*


*उत्तर-* जब तक (वर्णाश्रम धर्मोंका) कर्मों का अभिमान बना है, तब तक ब्रह्मज्ञान या मुक्ति हो ही नहीं सकती। जब मुक्ति होती है, तब कोई कर्म शेष नहीं रहता। जैसे जब दीवाला निकल जावे तब लेने और देने की समाप्ति हो जाती है।


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*🔥ओ३म्🔥**🌿तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं...

*🔥ओ३म्🔥*


*🌿तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥* केनोपनिषद् काण्ड-३,श्लोक-६ ॥ 


*पदार्थ—* यक्ष ने (तस्मै) उस अग्निदेव के लिए (तृणम्) एक तिनका (निदधौ) धर दिया और (एतत्) इस तिनके को (दह, इति) जला दे, ऐसा कहा । अग्नि (तत्) उस तिनके के (सर्वजवेन, उपप्रेयाय) पूरे वेग से समीप गया, परन्तु (तत्) उसको (दग्धुम्) जलाने को (न, शशाक)समर्थ न हो सका । (ततः, एव) उसके बाद ही (सः) वह अग्निदेव (निववृते) वापस आ गए और दूसरे देवों से कहने लगे (यत्) जो (एतत्) यह (यक्षम्, इति) यक्ष है (एतत्) इसको (विज्ञातुम्) जानने को (न, अशकम्) मैं समर्थ नहीं हुआ ।

*भावार्थ—* यक्ष ने अग्नि के अहङ्कार का मर्दन करने के लिए अग्नि के सम्मुख एक छोटा सा तिनका रक्खा, किन्तु अग्नि अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को न जला सका और निराश होकर वापस आ गया और देवों से आकर कहने लगा कि मैं इस यक्ष को नहीं जान सका । क्रमश:…

*💥शम्💥*

🔥

🚩


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Friday, May 4, 2018

-( પાંચ ચોપડી ભણેલી - ફાઈવસ્ટાર ડાયેટિશ્યન )-ગીતા બહેન પટેલ -ખાલી પાંચ ચોપડી ભણેલા…પણ,એમની...

-( પાંચ ચોપડી ભણેલી - ફાઈવસ્ટાર ડાયેટિશ્યન )-


ગીતા બહેન પટેલ -

ખાલી પાંચ ચોપડી ભણેલા…

પણ,

એમની કોઠાસૂઝ ગજબની !


એમના પતિ કરસનભાઈને -

ડૉક્ટર ભાવસાર સાહેબે આ વખતે તો ચોક્ખા શબ્દોમાં કીધું કે -

હવે ડાયાબિટીસ કાબૂમાં નહિં રાખો…

તો,

પગ કપાવવો પડશે !


આ છેલ્લી વખતનું ઓપરેશન છે…

જો ‘સડો’ હાડકામાં પહોંચ્યો…

તો,

આટલા ડાયાબિટીસને લીધે - 'સેપ્ટિસિમીયા’ થઈ આખા શરીરમાં એનું ઝેર પહોંચી શકે છે !


જો એવું થાય તો,

ઝેરનાં લીધે -

કિડની, લિવર , મગજ , ફેફસાં અને હૃદય બધું જ ઠપ થઈ જાય !


ગીતા બહેને પણ આ વાતને ગંભીરતાથી લીધી.


એમણે ભાવસાર સાહેબને પૂછ્યું કે -

પહેલા તો એક ગોળી થી ડાયાબિટીસ કાબૂમાં આવતો હતો…

પછી,

ધીમે ધીમે બે, ત્રણ, ચાર ગોળીઓ અને પાછળથી તો એ પણ અસર કરતી ન હતી.


હવે તો ઈન્સ્યુલીનના ઈંજેકશન પણ થાકી ગયા હતા.


આ વખતનો એચ. બી. એ. વન. સી રિપોર્ટ ૧૨.૫ હતો,

ફાસ્ટિંગ ૨૨૦ અને પી.પી.બી.એસ. ૪૫૦.


દિવસે દિવસે પરિસ્થિતિ બેકાબૂ બનતી હતી…

એમાં -

હવે પગમાં કશું વાગી જાય તો -

ખબર પણ પડતી ન હતી !


જ્યારે પાકે અને રસી નીકળે…

ત્યારે -

કોઈ કહે તો જ કરસનભાઈનું ધ્યાન જાય.


એમને પગનાં તળિયામાં સોય વાગે કે કાચ કોઈ જ વેદના ના થાય.


આનું કારણ જાણવા ગીતાબહેને સાહેબને વિનંતી કરી…


ડૉક્ટર ભાવસારે જણાવ્યું કે -

લાંબા ગાળાના ડાયાબિટીસમાં આખા શરીરની લોહીની નળીઓ અને ચેતાઓ સૂઝી જાય છે.


હૃદય, કિડની, મગજ વગેરે અંગો ખરાબ થઈ જાય છે.


હૃદય અને મગજમાંથી -

વિવિધ અંગો હાથ પગ તરફ આવતી જતી ચેતાઓ પણ સૂઝીને બિનકાર્યક્ષમ થઈ જાય છે.


આ બધાને કારણે રોગપ્રતિકારક શક્તિ પણ ઘટે છે…

અને,

સંવેદના પણ જતી રહે છે.


એટલે -

નાનું મોટું વાગવાનું થાય તો ખબર પડતી નથી.


ગીતા બહેને પૂછ્યું કે -

સારામાં સારા ડાયાબિટીસના ડૉક્ટરોને બતાવવા છતાં પણ…

આ રોગ કેમ કાબૂમાં નથી આવતો ?


ડૉ. ભાવસારે જૂની બધી ફાઈલો અને રિપોર્ટ તપાસ્યાં.


ડૉક્ટરો તો બધાં ડીગ્રીધારી હતાં,

કોઈ ઊંટવૈદ પાસે તો એ લોકો જતાં ન હતાં.


દવાઓ પણ બધી જ સારી અને સ્ટાન્ડર્ડ હતી…


તો પછી -

પાંચ જ વર્ષમાં આ હાલત શા માટે ?


ડૉક્ટરે કઢાવી કરસનભાઈનાં ખોરાક (ભોજન) ની આદતોને…


ઊંડા ઊતરતા ખબર પડી કે -

એમને 'બે’ વખત પેટ ભરીને જમવાની આદત હતી.


આખા દિવસનો ખોરાક ખૂબ વધારે હતો…


પાછી,

તેમની આદત હતી કે -

બંને વખત પેટ ભરીને દબાવીને ઓડકાર આવે એમ ખાવું !


પાછું વચ્ચે-વચ્ચે નાસ્તા ફરસાણ અને ચાર-પાંચ વખત ચા-પાણી…


આ બધી આદતો -

ડાયાબિટીસનાં દર્દી માટે તો આપઘાત કરવા બરાબર કહેવાય !!


બીજું,

કરસનભાઈ જમવામાં માત્ર રોટલી , ભાખરી, પરોઠા અને શાક જ ખાતાં હતાં.


બધા ડૉક્ટરોએ -

એમને ભાત - બટાકા - ખાંડ - ગોળ -આઈસ્ક્રીમ - મિઠાઈથી દૂર રહેવાનું કીધું હતું.


એ બધી પરેજીઓનું એ ચુસ્ત પાલન કરતાં હતાં…


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