Monday, July 27, 2015

अग्नि के छ: गुण– अग्नि मे छ: गुण है!पहला ,इसकी गति सदा ऊपर की ओर होगी,निम्न दिशाओ मे कभी...

अग्नि के छ: गुण–
अग्नि मे छ: गुण है!पहला ,इसकी गति सदा ऊपर की ओर होगी,निम्न दिशाओ मे कभी नही!दूसरा,अग्नि के साथ प्रकाश का अविछेद संबंध है!तीसरा,अग्नि मे उषनता है!प्राणधारी शरीर मे जब तक अग्नि की उषनता उचित मात्रा मे रहती है,वह जीवित रहता है,जिस समय मंद होती है,शरीर ठंडा हो जाता है!चौथा,अग्नि प्रसाडर और विस्तारशील है!जब अग्नि प्रज्वलित होगी,तो वायु मे गति और कम्पन आ जायेगा!इसलिए,प्रचन्ड अग्नि-कान्ड़ होने पर आन्धी चलनी शुरू हो जाती है!पांचवा,अग्नि सर्व ग्राही है!इसमे जो कुछ भी डालो,सब भस्म कर डालती है!प्लेग इत्यादि रोगो के किटानु नष्ट करने के लिये अग्नि सर्वोत्तम साधन है!छठा,अग्नि के साथ संयोग होने से अल्प वस्तु मे भी शक्ति का समावेश हो जाता है!एक लाल मिर्च को अग्नि मे डाल दो,तो दूर तक बैठे लोगो को भी खाँसी आनी शुरू हो जाएगी!इसीलिए,अग्नि मे डाला गया थोडा-सा घी भी दूर तक रोगनाशक,दुर्गन्ध-निवारक और सुगंध-प्रसारक हो जाता है!
अग्निहोत्र द्वारा यजमान मे नवजीवन—

अग्नि कुंड सम्मुख बैठे यजमान और अन्य उपस्थित व्यक्तियो को अग्नि से ये छ: शिक्षाए लेनी चाहिए!पहली ,वे जीवन मेसदा ऊपरकी ओर बढने वाले हो!दूसरी,उनका जीवन ज्यान व भक्ति से प्रकाशित हो!तीसरी,उनके जीवन मे तेजस्विता हो,उनके ओज के सम्मुख पाप कभी ठहर न सके!चौथी,वे अपने चारो ओर संसार मे सद्गुणो का विस्तार करनेवालेहो! पांचवी,वे सब ओर श्रेषठ विचारो और गुणो को अपने मे समा लेनेवाले हो,और छठी शिक्षा यजमान और यजवेदी पर उपस्थित अन्य व्यक्ति यह ले कि साथ संयोग होने से जिस प्रकार स्वस्थ वस्तु भी सशक्त हो जाती है,उसी प्रकार उनमे इतना आत्मबल हो की वे अपना सम्पर्क मे आनेवाले किसी भी व्यक्ति को धार्मिक और सयनिषठ बना सके!


from Tumblr http://ift.tt/1LNOotG
via IFTTT

Thursday, July 23, 2015

દેવાયત પંડિત દા'ડા દાખવે, સુણી લ્યોને દેવળદે સતીનાર, આપણા ગુરૂએ આગમ ભાખિયા, જુઠડાં નહિ રે...

દેવાયત પંડિત દા'ડા દાખવે, સુણી લ્યોને દેવળદે સતીનાર,

આપણા ગુરૂએ આગમ ભાખિયા, જુઠડાં નહિ રે લગાર,

લખ્યા રે ભાખ્યા રે સોઈ દિન આવશે.


પહેલા પહેલા પવન ફરુકશે, નદીએ નહિ હોય નીર,

ઓતર થકી રે સાયબો આવશે, મુખે હનમો વીર.


ધરતી માથે રે હેમર હાલશે, સુના નગર મોઝાર,

લખમી લુંટાશે લોકો તણી, નહિ એની રાવ ફરિયાદ.


પોરો રે આવ્યો સંતો પાપનો, ધરતી માંગે છે ભોગ,

કેટલાક ખડગે સંહારશે, કેટલાક મરશે રોગ.


ખોટા પુસ્તક ખોટા પાનિયા, ખોટા કાજીના કુરાન,

અસલજાદી ચુડો પહેરશે, એવા આગમના એંધાણ.


કાંકરીએ તળાવે તંબુ તાણશે, સો સો ગામની સીમ,

રૂડી દીસે રળિયામણી, ભેળા અરજણ ભીમ.


જતિ, સતી અને સાબરમતી, ત્યાં હોશે શુરાના સંગ્રામ,

ઓતરખંડેથી સાયબો આવશે, આવે મારા જુગનો જીવન.


કાયમ કાળીંગાને મારશે, નકળંક ધરશે નામ,

કળિયુગ ઉથાપી સતજુગ થાપશે, નકળંક ધરશે નામ,

દેવાયત પંડિત એમ બોલ્યા, ઈ છે આગમનાં એંધાણ


from Tumblr http://ift.tt/1foYjI5
via IFTTT

Monday, July 20, 2015

६ श्रावण 21 जुलाई 15 😶 “ज्ञानी भक्त और विषयासक्त ! ” 🌞 🔥🔥 ओ३म् यो अस्मै...

६ श्रावण 21 जुलाई 15

😶 “ज्ञानी भक्त और विषयासक्त ! ” 🌞

🔥🔥 ओ३म् यो अस्मै घ्रंस उत वा य ऊधनि सोमं सुनोति भवति द्युमाँ अह। 🔥🔥
🍃🍂 अपाप शक्रस्ततनुष्टिमूहति तनूशुभ्रं मघवा य: कवासख:।। 🍂🍃
ऋ० ५ । ३४ । ३

शब्दार्थ:- जो दिन होवे या रात सदैव ही जो इस परमेश्वर के लिए ज्ञानपूर्वक भक्ति में रहता है, यजन करता है वह निश्चय से तेजस्वी हो जाता है और इसके विपरीत विषयों में दिनों-दिन फँसते जानेवाले को, स्वार्थरत, अजयनशील को, शरीर की सजावट-बनावट में लगे रहने वाले को और जो बुरी संगत में रहने वाला है, जिसके कि यार-दोस्त कुत्सित-कर्मा लोग हैं, उस पुरुष को भी सर्वशक्तिमान ऐश्वर्य वाला इंद्रदेव मिटा देता है, विनाश कर देता है।

विनय:- मैं इन दो प्रकार के आदमियों में से कौन-सा हूँ? क्या मुझे दिन-रात भगवान् के भजन में मस्त रहने में मज़ा आता है? क्या मैं चौबीस घण्टे उसके भजन में लीन रहता हूँ। चौबीस घण्टे न सही, क्या मैं दिन-रात में से एक घण्टा भी भगवान् के प्रति अपना हार्दिक प्रेमरस पहुँचाने में बिताता हूँ? अथवा मैं ‘ततनुष्टि’ हूँ? दिन-रात विषयों में फँसा रहता हूँ? न खत्म होनेवाले विषयों की तृप्ति में लगा रहता हूँ? स्वार्थ के लिए धन कमाने की फ़िक्र में और धन के लिए दूसरों के क्लेशों की कुछ परवाह न करके और धोखा-फरेब भी करके उनके चूसने कि नाना नयी-नयी तरकीबें सोचने और करने की फ़िक्र में तो कहीं मेरे दिन-रात नहीं बीतते हैं? क्या अपने शरीर की शोभा बढ़ाने, सँवारने में ही जीवन के अमूल्य समय के प्रतिदिन कई घण्टे मैं नहीं खो रहा हूँ? क्या मैंने अपने अन्दर के मानसिक शरीर को भी बलवान्, स्वच्छ और सुन्दर (पवित्र) करने का भी यत्न किया है? इसके लिए समय दिया है? मेरे साथी-संगी कैसे लोग हैं? कहीं मेरे इर्द-गिर्द बुरे आचरण वाले लोग तो इकट्ठे नहीं हो गये हैं? कहीं मैं कुत्सित कर्म करने वाले दुष्ट मनुष्यों से मिलने-जुलने में आनन्द तो नहीं पाता हूँ? ओह, उस सर्वशक्तिमान्-इंद्र के नियम अटल हैं, मैं जैसा करूँगा वैसा ही मुझे भरना पड़ेगा। मैं तेजस्वी बनूँगा या मेरा विनाश होगा? भगवान् तो दिन-रात सोम-सवन करने वालों को तेजस्वी बना रहा है और विषय-ग्रस्त पुरुषों का नाश कर रहा है।
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे

🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚


from Tumblr http://ift.tt/1MEvTow
via IFTTT

"SamVeda in Hindi" को देखें

"SamVeda in Hindi" को देखें
from Tumblr http://ift.tt/1MEvQJi
via IFTTT

Monday, July 13, 2015

—~~~***★ ओ३म् ★***~~~— ★ चमार जाति का गौरवशाली इतिहास ★ –~~**★ कौन हैं ये...

—~~~***★ ओ३म् ★***~~~—
★ चमार जाति का गौरवशाली इतिहास ★
–~~**★ कौन हैं ये लोग★**~~–
—~~~***★॥ १०८ ॥ ★***~~~—
सिकन्दर लोदी (1489-1517) के शासनकाल से पहले पूरे भारतीय इतिहास में ‘चमार’ नाम की किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता | आज जिन्हें हम चमार जाति से संबोधित करते हैं और जिनके साथ छूआछूत का व्यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवर वंश के क्षत्रिय हैं | जिन्हें सिकन्दर लोदी ने चमार घोषित करके अपमानित करने की चेष्टा की |
भारत के सबसे विश्वसनीय इतिहास लेखकों में से एक विद्वान कर्नल टाड को माना जाता है जिन्होनें अपनी पुस्तक द हिस्ट्री आफ राजस्थान में चंवर वंश के बारे में विस्तार से लिखा है |
प्रख्यात लेखक डॅा विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक हिन्दू चर्ममारी जाति एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास" लिखी | महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस राजवंश का उल्लेख है | डॉ शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी |
अर्वनाइजेशन’ की लेखिका डॉ हमीदा खातून लिखती हैं मध्यकालीन इस्लामी शासन से पूर्व भारत में चर्म एवं सफाई कर्म के लिए किसी विशेष जाति का एक भी उल्लेख नहीं मिलता है | हिंदू चमड़े को निषिद्ध व हेय समझते थे | लेकिन भारत में मुस्लिम शासकों के आने के बाद इसके उत्पादन के भारी प्रयास किए गये थे |
डॅा विजय सोनकर शास्त्री के अनुसार तुर्क आक्रमणकारियों के काल में चंवर राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा चंवरसेन थे | इस क्षत्रिय वंश के राज परिवार का वैवाहिक संबंध बाप्पा रावल वंश के साथ था | राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी |
संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे | उनके महान व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरू माना और उनके अनुयायी बने | उसी का परिणाम है आज भी विशेषकर पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं | राजस्थान में चमार जाति का बर्ताव आज भी लगभग राजपूतों जैसा ही है । औरतें लम्बा घूंघट रखती हैं आदमी ज़्यादातर मूंछे और पगड़ी रखते हैं |
संत रविदास की प्रसिद्धी इतनी बढ़ने लगी कि इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जानता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त वैष्णव (हिन्दू) हो गया | दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया | उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए | लेकिन उन्होंने कहा :-
–~~~***★★★★★***~~~–
वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान.
वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार,
तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार   (रैदास रामायण)
–~~~***★★★★★***~~~–
संत रैदास पर हो रहे अत्याचारों के प्रतिउत्तर में चंवर वंश के क्षत्रियों ने दिल्ली को घेर लिया | इससे भयभीत हो सिकन्दर लोदी को संत रैदास को छोड़ना पड़ा था | संत रैदास का यह दोहा देखिए :-

बादशाह ने वचन उचारा | मत प्यारा इसलाम हमारा ||
खंडन करै उसे रविदासा  | उसे करौ प्राण कौ नाशा ||
जब तक राम नाम रट लावे | दाना पानी यह नहींपावे ||
जब इसलाम धर्म स्वीकारे | मुख से कलमा आपा उचारै ||
पढे नमाज जभी चितलाई | दाना पानी तब यह पाई ||

समस्या तो यह है कि आपने और हमने संत रविदास के दोहों को ही नहीं पढ़ा, जिसमें उस समय के समाज का चित्रण है जो बादशाह सिकंदर लोदी के अत्याचार, इस्लाम में जबरदस्ती धर्मांतरण और इसका विरोध करने वाले हिंदू ब्राहमणों व क्षत्रियों को निम्न कर्म में धकेलने की ओर संकेत करता है |
चंवर वंश के वीर क्षत्रिय जिन्हें सिकंदर लोदी ने 'चमार’ बनाया और हमारे-आपके हिंदू पुरखों ने उन्हें अछूत बना कर इस्लामी बर्बरता का हाथ मजबूत किया | इस समाज ने पददलित और अपमानित होना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है |
आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 35 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं | जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता | यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता | हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती |
धन्य हैं हमारे ये भाई जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार और अपमान सहकर भी हिन्दुत्व का गौरव बचाये रखा और स्वयं अपमानित और गरीब रहकर भी हर प्रकार से भारतवासियों की सेवा की |
—~~~***★ ओ३म् ★***~~~— ★
–~~~***★ ॥ १०८ ॥ ★***~~~–


from Tumblr http://ift.tt/1Gh5RST
via IFTTT

Sunday, July 12, 2015

“तेजोअसि तेजो मयि धेहि! वीर्य मसि वीर्य मयि धेहि!! बलमसि बाम मयि धेहि! ओजोअस्य ओजो मयि...

“तेजोअसि तेजो मयि धेहि! वीर्य मसि वीर्य मयि धेहि!!
बलमसि बाम मयि धेहि! ओजोअस्य ओजो मयि धेहि!!
मन्युरसी मन्युं मयि धेहि!सहोअसि सहो मयि धेहि!! (यजुर्वेद १९/९)
भावार्थ—हे परमेश्वर! तू तेज स्वरुप है मुझे तेज दे! तू वीर्यवान है, मुझे पराक्रम दे! तू बलवान है मुझे बल दे! तू ओजस्वी है मुझे भी ओजस्वी बना! तू दुष्टो को भस्म करता है, मुझे भी वह शक्ति दे! साथ ही तू सहनशील है, मुझे भी सहनशील बना!


from Tumblr http://ift.tt/1Jdb405
via IFTTT

एक बार श्री कृष्ण और अर्जुन भ्रमण पर निकले तो उन्होंने मार्ग में एक निर्धन ब्राहमण को भिक्षा मागते...

एक बार श्री कृष्ण और अर्जुन भ्रमण पर निकले तो उन्होंने मार्ग में एक निर्धन ब्राहमण को भिक्षा मागते देखा….

अर्जुन को उस पर दया आ गयी और उन्होंने उस ब्राहमण को स्वर्ण मुद्राओ से भरी एक पोटली दे दी।

जिसे पाकर ब्राहमण प्रसन्नता पूर्वक अपने सुखद भविष्य के सुन्दर स्वप्न देखता हुआ घर लौट चला।

किन्तु उसका दुर्भाग्य उसके साथ चल रहा था, राह में एक लुटेरे ने उससे वो पोटली छीन ली।

ब्राहमण दुखी होकर फिर से भिक्षावृत्ति में लग गया।अगले दिन फिर अर्जुन की दृष्टि जब उस ब्राहमण पर पड़ी तो उन्होंने उससे इसका कारण पूछा।

ब्राहमण ने सारा विवरण अर्जुन को बता दिया, ब्राहमण की व्यथा सुनकर अर्जुन को फिर से उस पर दया आ गयी अर्जुन ने विचार किया और इस बार उन्होंने ब्राहमण को मूल्यवान एक माणिक दिया।

ब्राहमण उसे लेकर घर पंहुचा उसके घर में एक पुराना घड़ा था जो बहुत समय से प्रयोग नहीं किया गया था,ब्राह्मण ने चोरी होने के भय से माणिक उस घड़े में छुपा दिया।

किन्तु उसका दुर्भाग्य, दिन भर का थका मांदा होने के कारण उसे नींद आ गयी… इस बीच
ब्राहमण की स्त्री नदी में जल लेने चली गयी किन्तु मार्ग में
ही उसका घड़ा टूट गया, उसने सोंचा, घर में जो पुराना घड़ा पड़ा है उसे ले आती हूँ, ऐसा विचार कर वह घर लौटी और उस पुराने घड़े को ले कर
चली गई और जैसे ही उसने घड़े
को नदी में डुबोया वह माणिक भी जल की धारा के साथ बह गया।

ब्राहमण को जब यह बात पता चली तो अपने भाग्य को कोसता हुआ वह फिर भिक्षावृत्ति में लग गया।

अर्जुन और श्री कृष्ण ने जब फिर उसे इस दरिद्र अवस्था में देखा तो जाकर उसका कारण पूंछा।

सारा वृतांत सुनकर अर्जुन को बड़ी हताशा हुई और मन ही मन सोचने लगे इस अभागे ब्राहमण के जीवन में कभी सुख नहीं आ सकता।

अब यहाँ से प्रभु की लीला प्रारंभ हुई।उन्होंने उस ब्राहमण को दो पैसे दान में दिए।

तब अर्जुन ने उनसे पुछा “प्रभु
मेरी दी मुद्राए और माणिक
भी इस अभागे की दरिद्रता नहीं मिटा सके तो इन दो पैसो से
इसका क्या होगा” ?

यह सुनकर प्रभु बस मुस्कुरा भर दिए और अर्जुन से उस
ब्राहमण के पीछे जाने को कहा।

रास्ते में ब्राहमण सोचता हुआ जा रहा था कि “दो पैसो से तो एक व्यक्ति के लिए भी भोजन नहीं आएगा प्रभु ने उसे इतना तुच्छ दान क्यों दिया ? प्रभु की यह कैसी लीला है ”?

ऐसा विचार करता हुआ वह
चला जा रहा था उसकी दृष्टि एक मछुवारे पर पड़ी, उसने देखा कि मछुवारे के जाल में एक
मछली फँसी है, और वह छूटने के लिए तड़प रही है ।

ब्राहमण को उस मछली पर दया आ गयी। उसने सोचा"इन दो पैसो से पेट की आग तो बुझेगी नहीं।क्यों? न इस मछली के प्राण ही बचा लिए जाये"।

यह सोचकर उसने दो पैसो में उस मछली का सौदा कर लिया और मछली को अपने कमंडल में डाल लिया। कमंडल में जल भरा और मछली को नदी में छोड़ने चल पड़ा।

तभी मछली के मुख से कुछ निकला।उस निर्धन ब्राह्मण ने देखा ,वह वही माणिक था जो उसने घड़े में छुपाया था।

ब्राहमण प्रसन्नता के मारे चिल्लाने लगा “मिल गया, मिल गया ”..!!!

तभी भाग्यवश वह लुटेरा भी वहाँ से गुजर रहा था जिसने ब्राहमण की मुद्राये लूटी थी।

उसने ब्राह्मण को चिल्लाते हुए सुना “ मिल गया मिल गया ” लुटेरा भयभीत हो गया। उसने सोंचा कि ब्राहमण उसे पहचान गया है और इसीलिए चिल्ला रहा है, अब जाकर राजदरबार में उसकी शिकायत करेगा।

इससे डरकर वह ब्राहमण से रोते हुए क्षमा मांगने लगा। और उससे लूटी हुई सारी मुद्राये भी उसे वापस कर दी।

यह देख अर्जुन प्रभु के आगे नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सके।

अर्जुन बोले,प्रभु यह कैसी लीला है? जो कार्य थैली भर स्वर्ण मुद्राएँ और मूल्यवान माणिक नहीं कर सका वह आपके दो पैसो ने कर दिखाया।

श्री कृष्णा ने कहा “अर्जुन यह अपनी सोंच का अंतर है, जब तुमने उस निर्धन को थैली भर स्वर्ण मुद्राएँ और मूल्यवान माणिक दिया तब उसने मात्र अपने सुख के विषय में सोचा। किन्तु जब मैनें उसको दो पैसे दिए। तब उसने दूसरे के दुःख के विषय में सोचा। इसलिए हे अर्जुन-सत्य तो यह है कि, जब आप दूसरो के दुःख के विषय में सोंचते है, जब आप दूसरे का भला कर रहे होते हैं, तब आप ईश्वर का कार्य कर रहे होते हैं, और तब ईश्वर आपके साथ होते हैं।
🙏🙏🙏 पण्डित भावेश दवे बैंगलोर🙏9591122273


from Tumblr http://ift.tt/1eT6DzB
via IFTTT

स्वर्णिम भारत मंच (SBM) नीरज सोनी पेट तेरा भर सकती है आटे से बनी दो रोटिया फिर क्यों खाता है तू...

स्वर्णिम भारत मंच (SBM)
नीरज सोनी

पेट तेरा भर सकती है आटे से बनी दो रोटिया फिर क्यों खाता है तू बन्दे बेजुबा की बोटिया
शाकाहार सबसे बड़ा पुण्य है जैन धर्म में जीव हत्या को सबसे बड़ा पाप माना है l
ऐसा कोई धर्म नहीं जिसमे किसी निर्दोष बेजुबा की हत्या करना या मांस का सेवन बताया गया हो . हिन्दू धर्म में तो ये एकदम वर्जित है , ऐसा करने से सात पीढ़ी पाप के भागीदार होते है किसी एक के किये हुए बुरे कर्मो का फल सबको भोगना पड़ता है . दुनिया में किसी भी धर्म में मांस के सेवन को नहीं कहा गया है चाहे वो मुस्लिम धर्म हो या क्रिस्चन सब धर्मो में अहिंसा का उल्लेख मिलता है, लेकिन फिर भी खुद से स्वार्थ के लिए बेजुबा जानवर की मारा जाता है उसे अपने पेट में जगह देते है .. अरे मुर्ख प्राणी मुर्दों की जगह तो श्मशान है अगर कोई मर जाता है (चाहे वो कितना भीप्रिय रहा हो उसके बिना रह नहीं पाए) लेकिन मरने के बाद उसकी जगह सिर्फ शमशान ही होना है क्या कभी आपने सुना है के किसी ने अपने मरे हुए प्रिय जो घर में जगह दी हो या कबी किसी ने मरने के बाद किसी को घर पर रखा है … नहीं बिलकुल नहीं ,, घर पर भी केवल जिन्दा लोगो को रहने का हक़ है मरने के बाद तो उसे जल्दी से जल्दी वहा से निकालने की तेयारी शुरु हो जाती है और जब उसे निकला नहीं जाता घर पर चूल्हा नहीं जलता उसके अंतिम संस्कार के बाद नहा धोकर कुछ कहते है .ये नियम हमारा बनाया हुआ नहीं है प्रकति का ये नियम है उसके वावजूद कुछ लोग मरे हुए हुए जानवर को घर लाकर खाते है अब इसे उनकी नादानी कहोगे या पागलपन ये सोचना आपको है समाज को बचाना है आने वाले पीढ़ी को संस्कार वान बनाओ उनका जीवन ख़राब मत करो सोचिये ज़रा ..


from Tumblr http://ift.tt/1HV3VXH
via IFTTT

Friday, July 10, 2015

आषाढ़ कृ. ९ 10 जुलाई 15 😶 “धन का प्रयोग! ” 🌞 🔥🔥ओ३म् पृणीयादित्राधमानाय तव्यान्...

आषाढ़ कृ. ९ 10 जुलाई 15

😶 “धन का प्रयोग! ” 🌞

🔥🔥ओ३म् पृणीयादित्राधमानाय तव्यान् द्रीघीयांसमनु पश्येत पन्थाम् । ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रान्यमन्यमुप तिष्ठन्त राय: ।। 🍂🍃
ऋ० १० । ११७ । ५

शब्दार्थ:- धन से बढ़े हुए समृद्ध पुरुष को चाहिए कि वह माँगनेवाले सत्पात्र को दान देवे ही , सुकृत मार्ग को दीर्घतम देखे। इस लम्बे मार्ग में धन-सम्पतियाँ निश्चय से रथ-चक्रों की भाँति ऊपर-नीचे घूमती रहती हैं, बदलती रहती हैं और एक को छोड़कर दूसरे के पास जाती रहती हैं।

विनय:- धन को जाते हुए कितनी देर लगती है? व्यापार में घाटा हो जाता है, चोर-लुटेरे धन लूट ले जाते हैं, बैंक टूट जाते हैं, घर जल जाता है आदि सैकड़ों प्रकार से लक्ष्मी मनुष्य को क्षणभर में छोड़कर चली जाती है। वह मनुष्य कितना मूर्ख है जो यह समझता है कि बस, यदि मैं दूसरों को धन दान नहीं करूँगा तो और किसी तरह मेरा धन मुझसे जुदा नहीं हो सकेगा। अरे, धन तो जब समय आएगा तो एक पलभर में तुझे कंगाल बनाकर कहीं चला जाएगा। इसलिए
हे धनी पुरुष!
यदि इस समय तेरे शुभकर्मों के भोग से तेरे पास धन-सम्पत्ति आई हुई है तो तू इसे यथोचित-दान में देने में कभी संकोच मत कर। सच्चा दान करना, सचमुच जगत्पति भगवान् को उधार देना है जो बड़े भारी दिव्य सूद के साथ फिर वापस मिलता है। जो जितना त्याग करता है वह उससे न जाने कितना गुणा अधिक प्रतिफल पाता है, यह ईश्वरीय नियम है। यदि इस संसार की गति को हम ज़रा भी ध्यान के साथ देखें तो पता लगेगा कि धन-सम्पत्ति इतनी अस्थिर है कि यह रथचक्र की भाँति घूमती फिरती है-आज इसके पास है तो कल दूसरे के पास है, पर हम अति क्षुद्र दृष्टि वाले हैं और इसीलिए इस ‘आज’ में ही इतने ग्रस्त हैं कि हम 'कल’ को देखते हुए भी देखते नहीं हैं। यदि हम मार्ग को विस्तृत दृष्टि से देखें तो इन धनागमों और धननाशों को अत्यंत तुच्छ बात समझें। यदि संसार में प्रतिक्षण चलायमान, घूमते हुए, इस धन-चक्र को देखे, इस बहते हुए धनप्रवाह को देखेँ, तो हमें धन जमा करने का ज़रा भी मोह न रहे।

🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे

🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚


from Tumblr http://ift.tt/1HjKWjU
via IFTTT

🌻वेदामृतम्🌻 व्रतं कृणुत ।(यजुर्वेद ४/११) मनुष्य को शुभ कर्म करने का व्रत (नियम) लेना चाहिए । 🌹🌹...

🌻वेदामृतम्🌻

व्रतं कृणुत ।(यजुर्वेद ४/११)

मनुष्य को शुभ कर्म करने का व्रत (नियम) लेना चाहिए ।

🌹🌹 सुभाषितम् 🌹

॥ मोक्ष - (मुक्ति) ॥

वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयम: । अहिंसा गुरुसेवा च , नि:श्रेयसकरम्परम् ॥
(मनुस्मृति १२/८३)

वेदों का अभ्यास , तपस्या, ज्ञान, इन्द्रियों का संयम, अहिंसा और आचार्य, माता - पिता आदि गुरुजनों की सेवा ये मोक्ष प्राप्ति कराने वाले श्रेष्ठ साधन हैं ।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🌞 आज का पंचांग🌞

तिथि………..नवमी
वार…………..शुक्रवार
नक्षत्र ……….अश्विनी
योग…………सुकर्मा

(समय मान जयपुर का है)
सूर्योदय ———– ५-४३
सूर्यास्त ———–१९-२०
चन्द्रोदय ———-२५-३६
चन्द्रास्त ———-१४-०१
सूर्य राशि ———-मिथुन
चन्द्र राशि———मेष

सृष्टि संवत् -१,९६,०८,५३,११६
कलियुगाब्द……………५११६
विक्रमी संवत्…………..२०७२
अयन……………..उत्तरायण
ऋतु……………………ग्रीष्म
मास पूर्णिमांत——-आषाढ
(अधिक मास)
विक्रमी संवत् (गुजरात)-२०७१
मास अमांत( गुजरात)…..आषाढ
पक्ष………………… कृष्ण

आंग्ल मतानुसार १० जुलाई सन् २०१५ ईस्वी ।

🌻आज का दिन आपके लिए मंगलमय एवं शुभ हो । 🌻


from Tumblr http://ift.tt/1HjKWjK
via IFTTT

Thursday, July 9, 2015

दीर्घजीवन का एक उपाय संगीत व वेदगान - पण्डित रघुनन्दन...

दीर्घजीवन का एक उपाय संगीत व वेदगान

- पण्डित रघुनन्दन शर्मा
—————-

“संगीत के सदृश चित्त को प्रसन्न करनेवाली और कोई वस्तु संसार में नहीं है और न प्रसन्नता के समान - आनन्द के समान - जीवनदान देनेवाली कोई औषधि भी है ।

अतएव दीर्घजीवन देनेवाले संगीत का अभ्यास करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है ।

आर्यों ने अपने प्रत्येक कार्य में जो वेदों के सस्वर पाठ का क्रम रखा है, उसका यही कारण है ।

आर्य लोग दिन भर किसी न किसी वैदिक यज्ञ के अनुष्ठान में रहते थे और कोई न कोई वेदमन्त्र गाया ही करते थे ।

परन्तु आजकल विद्वानों ने स्वर-ज्ञान को खो दिया है, इसलिए वेदों का पाठ इतना आनन्द नहीं देता जितना संगीत के साथ देता था ।

इसलिए दीर्घजीवन चाहनेवाले प्रत्येक आर्य को उचित है कि वह परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना और उपासना से सम्बन्ध रखनेवाले वेदमन्त्रों को सदैव स्वरों के साथ कायदे से (अर्थात् स्वरविज्ञान के नियम अनुसार) गाने का अभ्यास करे ।

वैदिक ज्ञान से हृदय को आनन्द और मस्तिष्क को उच्च ज्ञान प्राप्त होगा, जिससे उसको अपने समस्त कामों को नियमपूर्वक करने की सूचना मिलती रहेगी और वह दीर्घजीवन के उपायों से कभी विचलित न होगा ।”


from Tumblr http://ift.tt/1JWJPtu
via IFTTT

आहार ही औषधी 🍏🍑 🌽foods that heal 🍋🍐 भोजन द्वारा स्वास्थ्य🍒 (1)-केला: 🍌 ब्लडप्रेशर नियंत्रित करता...

आहार ही औषधी 🍏🍑

🌽foods that heal
🍋🍐 भोजन द्वारा स्वास्थ्य🍒

(1)-केला: 🍌
ब्लडप्रेशर नियंत्रित करता है,हड्डियों को मजबूत बनाता है,हृदय की सुरक्षा करता है,अतिसार में लाभदायक है, खांसी में हितकारी है।

(2)-जामुन: 🌑
केन्सर की रोक थाम,हृदय की सुरक्षा,कब्ज मिटाता है,स्मरण शक्ति बढाता है,रक्त शर्करा नियंत्रित करता है।डायबीटीज में अति लाभदायक।

(3)-सेवफ़ल: 
हृदय की सुरक्षा करता है, दस्त रोकता है,कब्ज में फ़ायदेमंद है,फ़ेफ़डे की शक्ति बढाता है.

(4)-चुकंदर:-🍐
वजन घटाता है,ब्लडप्रेशर नियंत्रित करता है,अस्थिक्छरण रोकता है,केंसर के विरुद्ध लडता है,हृदय की सुरक्षा करता है।

(5)-पत्ता गोभी: 🍏
बवासीर में हितकारी है,हृदय रोगों में लाभदायक है,कब्ज मिटाता है,वजन घटाने में सहायक है। केंसर में फ़ायदेमंद है।

(6)-गाजर:- 
नेत्र ज्योति वर्धक है, केंसर प्रतिरोधक है, वजन घटाने मेँ सहायक है, कब्ज मिटाता है, हृदय की सुरक्षा करता है।

(7)- फ़ूल गोभी:-🍈
हड्डियों को मजबूत बनाता है, स्तन केंसर से बचाव करता है, प्रोस्टेट ग्रंथि के केंसर में भी उपयोगी है, चोंट,खरोंच ठीक करता है।

(8)-लहसुन:
कोलेस्टरोल घटाती है, रक्त चाप घटाती है, कीटाणुनाशक है,केंसर से लडती है

(9)-नींबू:
त्वचा को मुलायम बनाता है,केंसर अवरोधक है, हृदय की सुरक्षा करता है,,ब्लड प्रेशर नियंत्रित करता है, स्कर्वी रोग नाशक है।

(10)-अंगूर:🍇
रक्त प्रवाह वर्धक है, हृदय की सुरक्षा करता है, केंसर से लडता है, गुर्दे की पथरी नष्ट करता है, नेत्र ज्योति वर्धक है।

(11)-आम:🍋
केंसर से बचाव करता है,थायराईड रोग में हितकारी है, पाचन शक्ति बढाता है, याददाश्त की कमजोरी में हितकर है।

(12)-प्याज: 🍑
फ़ंगस रोधी गुण हैं, हार्ट अटेक की रिस्क को कम करता है। जीवाणु नाशक है,केंसर विरोधी है खराब कोलेस्टरोल को घटाता है।

(14)-अलसी के बीज:
मानसिक शक्ति वर्धक है, रोग प्रतिकारक शक्ति को ताकत देता है, डायबीटीज में उपकारी है, हृदय की सुरक्षा करता है, पाचन शक्ति को ठीक करता है।

(15)-संतरा:🍈
हृदय की सुरक्षा करता है, रोग प्रतिकारक शक्ति उन्नत करता है,, श्वसन पथ के विकारों में लाभकारी है, केंसर में हितकारी है

(16)-टमाटर: 
कोलेस्टरोल कम करता है, प्रोस्टेट ग्रंथि के स्वास्थ्य के लिये उपकारी है,केंसर से बचाव करता है, हृदय की सुरक्षा ।

(17)-पानी: 
गुर्दे की पथरी नाशक है, वजन घटाने में सहायक है, केसर के विरुद्ध लडता है, त्वचा के चमक बढाता है।

(18)-अखरोट: 
मूड उन्नत करन में सहायक है, मेमोरी पावर बढाता है,केंसर से लड सकता है, हृदय रोगों से बचाव करता है, कोलेस्टरोल घटाने मं मददगार है।

(19)-तरबूज:
स्ट्रोक रोकने में उपयोगी है, प्रोस्टेट के स्वास्थ्य के लियेओ हितकारी है, रक्तचाप घटाता है, वजन कम करने में सहायक है।

(20)-अंकुरित गेहूं: 
बडी आंत की केंसर से लडता है, कब्ज प्रतिकारक है, स्ट्रोक से रक्षा करता है, कोलेस्टरोल कम करता है, पाचन सुधारता है।

(21)-चावल:
किडनी स्टोन में हितकारी है, डायबीटीज में लाभदायक है,स्ट्रोक से बचाव करता है, केंसर से लडता है, हृदय की सुरक्षा करता है।

(22)-आलू बुखारा:🍒
हृदय रोगों से बचाव करता है, बुढापा जल्द आने से रोकता है, याददाश्त बढाता है, कोलेस्टरोल घटाता है, कब्ज प्रतिकारक है।

(23)-पाईनएपल:🍍
अतिसार(दस्त) रोकता है, वार्ट्स(मस्से) ठीक करता है, सर्दी,ठंड से बचाव करता है, अस्थि क्छरण रोकता है। पाचन सुधारता है।

(24)-जौ,जई: 🌽
कोलेस्टरोल घटाता है,केंसर से लडता है, डायबीटीज में उपकारी है,,कब्ज प्रतिकारक् है ,त्वचा पर शाईनिंग लाता है।

(25)-अंजीर:
रक्त चाप नियंत्रित करता है, स्ट्रोक्स से बचाता है, कोलेस्टरोल कम करता है, केंसर से लडता है,वजन घटाने में सहायक है।

(26)-शकरकंद:🍠
आंखों की रोशनी बढाता है,मूड उन्नत करता है, हड्डिया बलवान बनाता है, केंसर से लडता है


from Tumblr http://ift.tt/1JWJN56
via IFTTT

ध्रुव सत्य है, की १९४७ का बटवारा इस बात पर ही हुआ था की हमे एक ऐसे काफ़िर के साथ नहीं रहेना जो हम से...

ध्रुव सत्य है, की १९४७ का बटवारा इस बात पर ही हुआ था की हमे एक ऐसे काफ़िर के साथ नहीं रहेना जो हम से अलग है. जबकि सत्य यह है के आप उस घर में आक्रमणकारी बनकर, शरणार्थी बनकर आये थे आश्रय पाया या जबरदस्ती राज किया और फिर एक दिन आपने ही उनके साथ रहेने से इनकार कर दिया.
उस देश के असली वारिसो की नसले बर्बाद की, 
उसके घर को रक्तरंजित और खेत खलियान को लहू लूहान किया, 
उसके सभी पवित्र स्थानों (मंदिरों) को अपवित्र किया और अंत में उसी पर तोहमत मारते हुए एक बहुत ही उपजाऊ देश का हिस्सा धर्म के नाम पर मांग लिया.
दे भी दिया गया ! उसने अपनी दोनों भुजाये काट कर धर्म की नफरत को रोकने की पूरी कोशिश करते हुए अपना गोश्त देकर आपकी यह मांग भी पूरी कर दी. जो देश बाँटने के बाद सीमा के उसपार नहीं जा सकते थे उनको इस भारत देश के वासियो ने आपको छोटा भाई और शरणार्थी मान कर सर आखों पर बैठाया और विशेष दर्जा भी दिया, अलाप्संख्यक का. हिन्दू अपनी माँ, बहिन की लुटी असिमिता को भी भूल गए, उसके वीर पुरखो, दसो गुरुओ के बलिदान को भी भूल गए. फिर भी इस देश में बचे इस असहानफरामोश कौम ने उसी के लहू से स्नान करना जारी रखा.
वो जो ले लिया गया उसका तो जिक्र ही नहीं जो अभी है उसपर फिर से वो ही धोंसपट्टी, मेरा लाल गोपाल अभी भी मस्जिदों में कैद है, राम लल्ला अभी भी पुलिस के सायें में है. बाबा विश्वनाथ अभी भी बंधक है. हर शहर और गाँव में अभी भी वो ही दुरभिसंधि जो आज से ६० साल पहेले थी. अभी भी उसकी गौ माता का कलेजा चीर कर गोश्त को खाया और लहू को पीया जा रहा है. अभी भी हिन्दू लडकियों के साथ बलात्कार कर लव जिहाद किया जा रहा है. बाबा अमरनाथ पर जाना आज भी उतना ही कठिन जितना ६० साल पहेले जैसे औरंगजेब को जजिया दिया जाता है अब कश्मीर सकरार को. देश के हिन्दू को आज भी उतना अधिकार नहीं की वो अपनी माँ सरस्वती और दुर्गा के नंगे चित्रों पर विरोध दर्ज ही करा सके. आज भी गाजी और पीर पर ही अगरबत्ती जल रही है. आज भी मस्जिदों को ही संगरक्षण मिल रहा है.
आज आप धर्मनिरपेक्ष, मुसलमान और भारत सरकार हिन्दुओ के साथ न्याय करना चाहेंगी की नहीं? पकिस्तान और बंगलादेश से १९४७ में जो हिन्दू आया था वो अमूमन सक्षम था जिसका बंगलादेश और पकिस्तान के बड़े बड़े नगरो में बहुत ही अच्छा और बड़ा कारोबार था. जिसका नहीं था उसका तो वहीँ पर खतना कर दिया गया. और जो हिंदुस्तान आया उसने यहाँ आकर अपने दम पर हिंदुस्तान में अपना स्थान बनाया. परन्तु आपको फिर से इस देश ने बटवारा करने के इनाम के तौर पर अलाप्संख्यक का विशेष दर्जा दिया जो कालांतर में आपको सभी संसाधनों पर प्रथम स्थान पाने का हकदार बना गया. आज आपको हिन्दुस्तान में इतनी इज्जत और रुतबे के साथ रखा जा रहा है की पकिस्तान के मुसलमान के जीभ में पानी भर आता है और वो वहा से अपनी नौटंकी यहाँ आकर फिल्मो में, टीवी में और संगीत में पैसा कमा कमा कर जाते है. 
और आपने हिंदुस्तान के अपने शरण दाताओं को बदले में क्या दिया?
यदि हिन्दुस्तान में एक भी इस कौम का सच्चा बच्चा है तो बताए की तुमने हिंदुस्तान के हिन्दुओ को क्या दिया ?
८०० साल तुमने उनकी असिमिता और भावनाओ से खेला, आज दो देश लेने के बाद भी बदले में उनको वापस क्या किया ?
इसको असाहन फरामोशी नहीं कहेंगे तो क्या कहंगे आप ?


from Tumblr http://ift.tt/1CrRuAq
via IFTTT

पहले देखें ,पढ़ें और समझें —कृपया पूरा पढ़ें ————— आज किस भी नई...

पहले देखें ,पढ़ें और समझें —कृपया पूरा पढ़ें
—————
आज किस भी नई हिन्दू दंपत्ति से पूछो ,क्यों जी शादी हो गयी अब तो फुटबॉल टीम होगी,तो जवाब होगा 
उनहुंक सिर्फ 1 होगा/होगी ज्यादा से ज्यादा 2 ,1 ही होगी ,वैसे ये अच्छी बात है 
——————–
कड़वा सच—हिन्दू दंपत्ति आप सब 1 बच्चा करो,मुस्लिम दंपत्ति 3-4 औसतन कर रहा है,ओवैसी के खुद 6 बच्चे है
30 सालों में आपका 1 बच्चा 30 साल का हो जायेगा,उस समय मुस्लिम जनसँख्या 50% पार हो जायेगी
आपका 1 बच्चा खतरे में पड़ जायेगा,तो आज आपका 1 संतान को आप खतरे में पड़ने के लिए जन्म दे रहे हो
—————-
क्या इतिहास से सीख नहीं लेते आप,आस पास घटनाओं से सीख नहीं लेते,मलेशिया में 50% मुस्लिम जनसँख्या होते ही उसे
इस्लामी देश बना दिया गया,अब वहां दूसरे धर्म के लोगो का जीना मुश्किल है।
———
क्या आपको 1947 याद नहीं 30% होते ही आपके भाईचारे वाले भाइयों ने देश के टुकड़े कर डाले,30 लाख से अधिक हिन्दुओ की हत्या हुई 6 लाख से अधिक बलात्कार हुए 
————-
क्या आपको वर्तमान भारत के हालात पता नहीं,30% के लगभग या अधिक मुस्लिम जनसँख्या वाले राज्य उदहारण,कश्मीर,बंगाल,केरल,असम यहाँ के हालात आपको नहीं मालुम,हिन्दू महिलाओ का शोषण,हिन्दुओ पे हमले आम बात है,यहाँ तो हिन्दू लगभग ख़त्म होने के कागार पर है 10 सालों में ही 
—————-
चलिए कुछ और जगहों पर नजर डालते है उदहारण इराक,सीरिया,नाइजिरिया,यहाँ दूसरे धर्म वालो का क़त्ल,बलात्कार आम बात है ,मुस्लिम जनसँख्या अधिक होते ही शरिया की मांग,इस्लामी देश बनाने की मांग,
———-
अब इस्लामी देश बन जायेगा तो क्या होगा,वो आपको दिख नहीं रहा पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में हिन्दुओ की हालात
हिन्दू महिला का अपहरण,बलात्कार हत्या लूट ये तो सब जैसे क़ानूनी है 
मार खा के हिन्दू भारत में आता है,पर जब आपका भारत 30 सालों में 50% से अधिक मुस्लिम वाला देश होगा
तो आप मार खा के कहाँ जायेंगे,समुन्दर में डूब मरेंगे या आज के बांग्लादेश तथा पाकिस्तान में जैसी हिन्दुओ की हालात है
वैसे में जीना चाहेँगे।
——————–
कड़वा सच—–आपकी ये उदारता,सेकुलरिज्म 1 बच्चा जी ,ये सब आपके उसी 1 बच्चे के लिए खतरा होंगी और आपका 1 बच्चा वो कभी आगे बचेगा नहीं ये उदाहरणों से प्रमाणित होता है।
————-
एक और चीज प्यारे सिख,जैन,बौद्ध इत्यादि मित्रों से ,मित्रो देश में फ़िलहाल हिन्दू बहुसंख्यक है इसलिए आप भी सुरक्षित हैं,पढ़ते है,व्यपार करते है इत्यादि,अन्यथा पहले सिख,जैन इत्यादि पाकिस्तान में भी थे आप भी हिन्दू धर्म तथा उसकी सुरक्षा में योगदान दें इसमें अपकी ही सुरक्षा है,क्योंकि हिन्दू समाज भाईचारे और प्रेम की गरंटी है
———-
अब थोडा सा भी दिमाग पर जोर पड़ा,या कुछ मित्रो को ये खतरा पहले से पता है वो शेयर जरूर ही करें
ताकि सोये हुए तथा मस्ती काट रहे प्यारे हिन्दुओ की आँख खुलने या जागरूकता की उम्मीद हो सके
————
सच ये है जहाँ जहाँ हिन्दू घटा,वहां वहां हिन्दू कटा,सैनिको की हत्या हुई,देश बंटा
शेयर जरूर करे इस प्यारे देश को बचाएँ।


from Tumblr http://ift.tt/1Sb90dS
via IFTTT

* दमा में ….तेजपात ,पीपल,अदरक, मिश्री सभी को बराबर मात्र में लेकर चटनी पीस लीजिए।१-१ चम्मच...

* दमा में ….तेजपात ,पीपल,अदरक, मिश्री सभी को बराबर मात्र में लेकर चटनी पीस लीजिए।१-१ चम्मच चटनी रोज खाएं ४० दिनों तक। फायदा सुनिश्चित है।


from Tumblr http://ift.tt/1Sb8XPf
via IFTTT

– 20 वर्षों से डायबिटीज झेल रहीं 65 वर्षीय महिला जो दिन में दो बार इन्सुलिन लेने को विवश थीं,...

– 20 वर्षों से डायबिटीज झेल रहीं 65 वर्षीय महिला जो दिन में दो बार इन्सुलिन लेने को विवश थीं, आज इस रोग से पूर्णतः मुक्त होकर सामान्य सम्पूर्ण आहार ले रही हैं | जी हाँ मिठाई भी ।।

–डाक्टरों ने उस महिला को इन्सुलिन और अन्य ब्लड शुगर कंट्रोल करने वाली दवाइयां भी बंद करने की सलाह दी है ।
और एक ख़ास बात । चूंकि केवल दो सप्ताह चलने वाला यह उपचार पूर्णतः प्राकृतिक तत्वों से घर में ही निर्मित होगा, अतः इसके कोई दुष्प्रभाव होने की रत्ती भर भी संभावना नहीं है ।

–मुम्बई के किडनी विशेषज्ञ डा. टोनी अलमैदा ने दृढ़ता और धैर्य के साथ इस औषधि के व्यापक प्रयोग किये हैं तथा इसे आश्चर्यजनक माना है ।

अतः आग्रह है कि इस उपयोगी उपचार को अधिक से अधिक प्रचारित करें, जिससे अधिक से अधिक लोग लाभान्वित हो सकें |
देखिये कितना आसान है इस औषधि को घर में ही निर्मित करना |
आवश्यक वस्तुएं–

> 1 – गेंहू 100 gm.
> 2 – वृक्ष से निकली गोंद 100 gm.
> 3 - जौ 100 gm.
> 4 - कलुन्जी 100 gm.

–( निर्माण विधि )

उपरोक्त सभी सामग्री को ५ कप पानी में रखें । आग पर इन्हें १० मिनट उबालें । इसे स्वयं ठंडा होने दें । ठंडा होने पर इसे छानकर पानी को किसी बोतल या जग में सुरक्षित रख दें ।

–( उपयोग विधि )

सात दिन तक एक छोटा कप पानी प्रतिदिन सुबह खाली पेट लेना ।
अगले सप्ताह एक दिन छोड़कर इसी प्रकार सुबह खाली पेट पानी लेना । मात्र दो सप्ताह के इस प्रयोग के बाद आश्चर्यजनक रूप से आप पायेंगे कि आप सामान्य हो चुके हैं …और बिना किसी समस्या के अपना नियमित सामान्य भोजन ले सकते हैं ।
जिस किसी के पेरेंट्स को प्रॉब्लम हो उपयोग करे और आगे फॉरवर्ड करे साभार -


from Tumblr http://ift.tt/1KXQC7K
via IFTTT

Wednesday, July 8, 2015

आषाढ़ कृ.८ 9 जुलाई 15 😶 “अकेले मत भोगो! ” 🌞 ओ३म् मोघमन्नं विन्दते अप्रचेता: सत्यं...

आषाढ़ कृ.८ 9 जुलाई 15

😶 “अकेले मत भोगो! ” 🌞

ओ३म् मोघमन्नं विन्दते अप्रचेता: सत्यं ब्रवीमि वध इत् स तस्य। नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी ।। 
ऋ० १० । ११७ । ६ 
शब्दार्थ :- दुर्बुद्धि मनुष्य व्यर्थ ही भोग-सामग्री को पाता है।सच कहता हूँ कि वह भोग-सामग्री उस मनुष्य के लिए मृत्युरूप ही होती है-उसका नाश करने वाली ही होती है। ऐसा दुर्बुद्धि न तो यज्ञ द्वारा अर्यमादि देवों की पुष्टि करता है और न ही मनुष्य-साथियों की पुष्टि करता है। सचमुच वह अकेला खाने-भोग करनेवाला मनुष्य केवल पाप को ही भोगने वाला होता है।

विनय:- हे इंद्र !
संसार में धनी दिखने वाले दुर्बुद्धि (पापबुद्धि) मनुष्य के पास जो अन्न-भंडार और नाना भोग-सामग्री दिखाई देती है, क्या वह भोग-सामग्री है? अरे,वह सब भोग-विलास का सामान तो उनकी ‘मौत’ है। वे भोग-वस्तुऍ नहीं हैं, किन्तु उनको खा जाने वाले ये इतने उनके भोक्ता हैं, भक्षक हैं। 
हे मनुष्य!
तुम्हे इस विचित्र बात पर विशवास नहीं होता होगा, किन्तु मैं सच कहता हूँ, सच कहता हूँ और फिर सच कहता हूँ कि पापी, दुर्बुद्धि पुरुष के पास एकत्र हुआ सब सांसारिक भोग का सामान उसकी मृत्यु का सामान है, इसमें ज़रा भी संदेह नहीं है, क्यूंकि वह पुरुष अपने इस धन-ऐश्वर्य द्वारा केवल अपने देह को ही पोषित करता है। न तो वह उस द्वारा अपने अन्य मनुष्य-भाइयों को पोषित करके अपने स्वाभाविक यज्ञ-धर्म को पालता है, न ही वह अर्यमादि देवों के लिए आहुति देकर आधिदैविक आदि जगत् के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित रखता है। मनुष्यों! याद रखो कि अकेला भोगनेवाला, औरों को बिना खिलाये स्वयमेव अकेला भोगने वाला मनुष्य, केवल पाप को ही भोगता है। जबकि चारों ओर असंख्य पुरुष एक समय भी भरपेट भोजन न पा सकने वाले, भूखे-नंगे, झोपड़ों में पड़े हों तो उनके बीच में जो हलुवा-पूरी खाने वाला, महल में रहने वाला, पलंग पर सोने वाला 'अप्रचेता:’ पुरुष है उससे तुम क्यों ईर्ष्या करते हो? तुम्हें बेशक वह मज़े में हलुवा-पूरी खाता हुआ नज़र आता है, पर ज़रा सूक्ष्मता से देखो तो वह बेचारा तो केवल अपने पाप को भोग रहा होता है, वह केवल शुद्ध पाप का भागी होता है और इस अयज्ञ के भारी पाप-बोझ को वह अकेला ही उठाता है; इसमें उसका कोई और साथी नहीं होता। “केवलाघो भवति केवलादि” यह संसार का परम सत्य है। इसे कभी मत भूलो! (शरीर, मन और आत्मा तीनों को पुष्ट करनेवाले) सच्चे भोजन में और(शीघ्र ही विनाश को पहुँचा देने वाले) पापमय भोजन में भेद करो! पाप से सना हुआ हलुवा-पूरी खाने की अपेक्षा रुखा-सुखा खाना या भूखा रहना हज़ारों गुणा श्रेष्ठ है।। पहले प्रकार का भोजन मौत है; दूसरा अमृत है।

ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे

 वैदिक विनय से


from Tumblr http://ift.tt/1MgiGlN
via IFTTT

चाँद मियाँ ( उर्फ़ साँईं बाबा ), ख्वाजा गरीब नवाज़,  अमीर खुसरो,  निजामुद्दीन औलिया,  हाजी अली,  मामा...

चाँद मियाँ ( उर्फ़ साँईं बाबा ),
ख्वाजा गरीब नवाज़, 
अमीर खुसरो, 
निजामुद्दीन औलिया, 
हाजी अली, 
मामा - भांजा की मज़ार, 
आदि - आदि की दरगाह पर जाकर मन्नत मांगने वाले सनातन धर्मी हिन्दू लोगों के लिए विशेष :-

पूरे देश में स्थान स्थान पर बनी कब्रों, मजारों या दरगाहों पर हर वीरवार को जाकर शीश झुकाने व मन्नत करने वालों से कुछ प्रश्न :-

१. क्या एक कब्र जिसमें मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चुकी है वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती हैं ?

२. ज्यादातर कब्र या मजार उन मुसलमानों की हैं जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुए मारे गए थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजों का अपमान नहीं हैं जिन्होंने अपने प्राण धर्म की रक्षा करते हुए बलि वेदी पर समर्पित कर दिये थे ?

३. क्या हिन्दुओं के भगवान श्री राम जी, श्री कृष्ण अथवा देवी - देवता शक्तिहीन हो चुकें हैं जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक है ?

४. जब गीता में श्री कृष्ण जी महाराज ने कहाँ है कि कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती हैं तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा ?

यान्ति देवव्रता देवान्
पितृन्यान्ति पितृव्रताः
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्तमद्याजिनोऽपिमाम

अर्थात, श्रीमदभगवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भूत प्रेत, मुर्दा, पितृ (खुला या दफ़नाया हुआ अर्थात् कब्र,मजार अथवा समाधि) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद भूत- प्रेत व पितृ की योनी में ही विचरण करते हैं व उसे ही प्राप्त करते हैं l

५. भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा, बंदा बहादुर, गुरु गोबिंद सिंह, भगवन बुद्ध, महावीर स्वामी, स्वामी विवेकानंद आदि वीरों की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता हैं ? तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करने वालों की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते हैं ?

६. क्या संसार में इससे बड़ी मूर्खता का प्रमाण आपको कहीं मिल सकता है ?

७. हिन्दू कौन सी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजा कर प्राप्त कर रहे हैं जो वेदों-उपनिषदों-पुराणों-स्मृतियों आदि में कहीं नहीं कही गयीं हैं ?

८. कब्र, मजार पूजा को हिन्दू मुस्लिम सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओं 
को अँधेरे में रखना नहीं तो क्या हैं ? सेक्युलरता तो ये तब हो न, जब मुस्लिम भी वहाँ शीश झुकाएं ।
नोट - सूफी समाज इस्लाम की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं है, अर्थात वे उन्हें मुस्लिम नहीं मानते ।

आशा है आप इस लेख को पढ़ कर आपकी बुद्धि में कुछ प्रकाश हुआ होगा 
अगर आप आर्य राजा श्री राम और श्री कृष्ण जी महाराज की संतान हैं तो तत्काल इस मुर्खता पूर्ण अंधविश्वास को छोड़ दें और अन्य हिन्दुओं को भी इस बारे में बता कर उनका अंधविश्वास दूर करें व आप अपने धर्म को जानिए l इस अज्ञानता के चक्र में से बाहर निकलिए l

विशेष : - पृथ्वी राज चौहान की समाधि पर कंधार, अफगानिस्तान में अभी हाल ही तक भी जूते चप्पल मारे जाते थे । जब तक एक हिन्दू वीर ने बड़ी चतुराई से उनकी अस्थियां वहां से भारत भेज कर माँ गंगा को अर्पण नहीं कर दीं । परंतु आज भी वे लोग उस बिना अस्थियों वाली कब्र पर अपने जूते - चप्पल ही झाड़ कर मोहम्मद गौरी की मज़ार में जाते हैं ।


from Tumblr http://ift.tt/1CpZYaX
via IFTTT

वेदामृतम् देवो व: सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्म्मणे । (यजुर्वेद १/१) उत्तम प्रेरणा देने वाला...

वेदामृतम्

देवो व: सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्म्मणे । (यजुर्वेद १/१)

उत्तम प्रेरणा देने वाला परमात्मा तुम्हें अधिक श्रेष्ठ कर्म करने के लिए प्रेरणा प्रदान करे ।

 सुभाषितम् 

॥ स्वाध्याय ॥

यथा यथा हि पुरुष : , शास्त्रं समधिगच्छति । तथा तथा विजानाति, विज्ञानं चास्य रोचते ॥ 
(मनुस्मृति ४/२०)

जैसे - जैसे मनुष्य शास्त्र का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय करता जाता है, वैसे वैसे ही वह अनेक पदार्थों को विशेष रूप से जानता जाता है और उसकी विवेक युक्त ज्ञान में रुचि बढती जाती है ।

🌞 आज का पंचांग🌞

तिथि………..अष्टमी
वार…………..गुरुवार
नक्षत्र ……….रेवती
योग…………अतिगन्ड

(समय मान जयपुर का है) 
सूर्योदय ———– ५-४३
सूर्यास्त ———–१९-२०
चन्द्रोदय ———-२४-५१
चन्द्रास्त ———-१३-०१
सूर्य राशि ———-मिथुन
चन्द्र राशि———मीन

सृष्टि संवत् -१,९६,०८,५३,११६
कलियुगाब्द……………५११६
विक्रमी संवत्…………..२०७२
अयन……………..उत्तरायण
ऋतु……………………ग्रीष्म
मास पूर्णिमांत——-आषाढ 
(अधिक मास) 
विक्रमी संवत् (गुजरात)-२०७१
मास अमांत( गुजरात)…..आषाढ
पक्ष………………… कृष्ण

आंग्ल मतानुसार ९ जुलाई सन् २०१५ ईस्वी ।

आज का दिन आपके लिए मंगलमय एवं शुभ हो ।


from Tumblr http://ift.tt/1CpZYaT
via IFTTT

http://ift.tt/1JUcJdW Yogi ka atmacharitra Download & read...

http://ift.tt/1JUcJdW

Yogi ka atmacharitra

Download & read Self Written Biography of Maharshi Dayanand Saraswati


from Tumblr http://ift.tt/1KOQZmP
via IFTTT

आस्तिकवाद एवं विज्ञान महर्षि कपिल का जीवन वृत्तान्त :– • कपिलमुनि के माता का नाम मनुपुत्री...

आस्तिकवाद एवं विज्ञान

महर्षि कपिल का जीवन वृत्तान्त :–

• कपिलमुनि के माता का नाम मनुपुत्री देवहूति और पिता का नाम कर्दम ऋषि था । 
• कर्दम मुनि का आश्रम सरस्वति नदि के तट पर बिन्दुसर नामक तीर्थ पर था । 
• कपिल मुनि का कान आज से लगभग 6000 वर्ष पूर्व है । 
• सांख्य सिद्धान्तों की परम्परा आपने अपने पिता से ही प्राप्त की थी । 
• आपने षष्टितन्त्र नामक शास्त्र की रचना की जिसको आगे चलकर सांख्यदर्शन भी कहा जाने लगा । 
• आपके सांख्यदर्शन का मुख्य विषय है । प्रकृत्ति उसके विकार, विवेकख्याति, और आत्मा आदि । 
• आपके इस सिद्धान्त को आधुनिक विज्ञान ने भी मान्यता दी है :– ( नऽवस्तुनो वस्तुसिद्धिः ) अभाव से भाव नहीं होता । 
• सांख्य परम्परा में आपके आसुरि नामक शिष्य हुए ।
• आसुरि के शिष्य आचार्यपञ्चशिख हुए हैं । जिनके सिद्धान्त भी आपके सांख्यशास्त्र में हैं । राजा जनक की सभा में पञ्चशिखाचार्य की उपस्थिति बताई जाती है ।
• श्रीमदभग्वदगीता में आपके सांख्यशास्त्र की गहरी छाप है । योगेश्वर कृष्ण भी आपके सांख्य के महाविद्वान थे । 
• आपने अपने शास्त्र में २५ तत्वों का उल्लेख किया है । जो सृष्टि रचना में सहयोगी होते हैं । 
• आपका सांख्यदर्शन पूर्ण रूप से आस्तिक है । कुछ लोगों ने ईश्वर विषय को इसमें न पाकर आपको नास्तिक मान लिया था । 

।। ओ३म् ।।


from Tumblr http://ift.tt/1S8UmUt
via IFTTT

शब्द के लक्षण क्या है ? उत्तर - श्रोतोप्लब्धिर्बुद्धिनिर्ग्राह्म: प्रयोगेणाभिज्वलित आकाश देश: शब्द:...

शब्द के लक्षण क्या है ?
उत्तर - श्रोतोप्लब्धिर्बुद्धिनिर्ग्राह्म: प्रयोगेणाभिज्वलित आकाश देश: शब्द: ||अष्टाध्यायी १/२/२ ||
जो कान से सुनने को आवे बुद्धि से जिसका अच्छी प्रकार ग्रहण हो ,वाणी से बोलने से जाना जाए ओर आकाश जिसका स्थान हो | 
(मह्रिषी दयानंद सरस्वती कृत अष्टाध्यायी भाष्य से उद्द्र्त


from Tumblr http://ift.tt/1S8UmUn
via IFTTT

पाप की अन्तिम झाँकी अपघ्नन्पवसे मृधः क्रतुवित्सोम मत्सरः । नुदस्वादेवयुञ्जनम् ॥ मेरे सूखे हृदय के...

पाप की अन्तिम झाँकी

अपघ्नन्पवसे मृधः क्रतुवित्सोम मत्सरः ।
नुदस्वादेवयुञ्जनम् ॥

मेरे सूखे हृदय के संजीवन ! तेरी पहुँच मेरे प्रत्येक संकल्प , प्रत्येक क्रिया , प्रत्येक चेष्टा में है । तू हर्ष का सरोवर है । तू पापों का विनाश कर पवित्रता का प्रवाह लाता है । पाप की ओर प्रवृत्त इस जन को पाप-पथ से हटा कर सन्मार्ग में प्रेरित कर ।

मेरे अन्दर मस्ती का सागर ठाठें मार रहा है । मैं उठूँ , बैठूँ , फिरूँ , कुछ करूँ , मस्ती की लहर मेरी प्रत्येक क्रिया के साथ-साथ उठती है । एक पवित्र हर्ष का प्रवाह है जिस में मैं दिन-रात डूबा रहता हूँ । मेरा प्रत्येक कार्य ईश्वर के समर्पण है । ऐसी अवस्था में पाप को उदित होने का अवसर कहाँ है ? सोम-रस के पहिले ही घूँट के साथ मैं पाप के बीज को नष्ट कर चुका हूँ ।
प्रभो ! फिर बात क्या है ? मस्ती के इस अटूट प्रवाह में कभी-कभी अहंकार की , अभिमान की , और इन के साथ-साथ कभी-कभी काम की , क्रोध की झाँकी-सी आ जाती है । मैं जैसे अपने आपे से बाहर हो जाता हूँ । ऐसा प्रतीत होने लगता है कि वह मस्ती कृत्रिम थी , धर्म का एक अस्थिर आवरण-सा था जो मेरे हृदय में बैठे “अदेव” को – राक्षस को – कुछ देर के लिए आवृत कर रहा था – ओट-सी दे रहा था । वास्तव में मैं “अदेवयु” – पापी ही हूँ ।
तो क्या तुम इस पाप की प्रवृत्ति को मिटा नहीं सकते ?
या ये उस की – विनाश पा रहे पाप की – अन्तिम झलकियाँ ही हैं ? नष्ट हो रहे संस्कार अपनी मोहिनी का क्षणिक म्रियमाण रूप दिखा-दिखा कर विदा हो रहे हैं ।
मैं अपने पुराने “ अदेवयु” स्वभाव का आखिरी दर्शन कर रहा हूँ । अहा ! कैसा प्यारा रूप है । मन मोहित होने लगा । मेरे सोम-रस वाले प्रभो ! अब तुम्हारा ही आसरा है । इस वृत्र का संहार कीजिये । मेरे संयम का , तप का इस परीक्षा की घड़ी में तुम्हारे सिवा और कौन रक्षक हो सकता है ? तुम्हारे सोम-रस की लाज ! उसे कहीं निष्फल न होने देना । 
तुम्हारा भक्त होकर मैं “अदेवयु” रहूँ ? 
मुझे प्रेरित कीजिये – पुण्य की ओर , अपने पवित्र मार्ग की ओर प्रेरित कीजिये ॥

पण्डित चमूपति जी
“सोम सरोवर”


from Tumblr http://ift.tt/1LSf2QU
via IFTTT

भारतीय इतिहास का दूसरा जार्डेनबूर्नो कांड! पिछली पोस्ट में सल्तनत काल के प्रथम जार्डेनबूर्नो कांड...

भारतीय इतिहास का दूसरा जार्डेनबूर्नो कांड!

पिछली पोस्ट में सल्तनत काल के प्रथम जार्डेनबूर्नो कांड के बारे में बताया जा चुका है। जार्डेनबूर्नो कांड क्या है इसे दोहराते हुये दूसरे ऐसे कांड का खुलासा करना इस पोस्ट का मकसद है।

यूरोप में टालेमी के इस असत्य सिध्दांत कि “ पृथ्‍वी विश्व का केंद्र है और सूर्य तथा अन्य ग्रह इसके चक्कर लगाते हैं ” , को चुनौती देने के कारण 1600 ईस्वी में पोप ने जार्डेन बूर्नो नाम साहसी युवक को चौराहे पर जीवित जला दिया था ।

सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में सिकंदर लोदी ने मथुरा के तीर्थस्थलों पर अनेक प्रतिबंध लगाये। वहीं पास के कटेहर निवासी लोधन नामक एक हिन्दू ने कुछ मुसलमानों के सामने कहा , “ इस्लाम सत्य है और मेरा धर्म भी सत्य है । ” इस बात का मुस्लिम आलिमों ने विरोध किया । वहाँ के हाकिम आजम हुमायूं ने लोधन को संभल में सुल्तान सिकंदर लोदी के पास भेज दिया। लोदी ने इसपर विचार विमर्श के लिये अपनी सल्तनत के अन्य भागों से आलिमों को बुलवाया । आलिमों ने यह फैसला दिया कि लोधन को कारागार में डालकर इस्लाम की शिक्षा दी जाये और फिर भी वो इस्लाम स्वीकार ना करे तो उसकी हत्या कर दी जाये । बहादुर लोधन ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया । फलस्वरुप उसकी हत्या कर दी गयी । तारीख ए दाऊदी , पेज 59-60 में यह घटना दर्ज है और दाऊदी के मुस्लिम होने के कारण कोई भी मुसलमान इसकी सत्यता को खारिज नहीं कर सकता । ये बात अलग है कि आजादी के बाद के लम्बे कांग्रेसी शासन में वामपंथियों के कुचक्र से इतिहास के सच को दबाये रखा गया ।

लोधन को मारे जाने की घटना फिरोज तुगलक के काल में एक हिंदू को जीवित जलाकर मार देने की ही पुनरावृत्ति थी जो पुनर्जागरण काल के निरंकुश पोप और सुप्रसिध्द जार्डेनबूर्नो कांड की याल दिलाती है । साथ ही इस्लाम की सही तस्वीर भी उजागर करती है।

- ’ सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध ’
लेखक: अशोक कुमार सिंह , पेज 476-477


from Tumblr http://ift.tt/1S8UmE3
via IFTTT

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं । भर्गो देवस्य धीमहि, धीयो यो न: प्रचोदयात् ।। Oh God, the...

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं । भर्गो देवस्य धीमहि, धीयो यो न: प्रचोदयात् ।।
Oh God, the Protector, the basis of all life, Who is self-existent, Who is free from all pains and Whose contact frees the soul from all troubles, Who pervades the Universe and sustains all, the Creator and Energizer of the whole Universe, the Giver of happiness,Who is worthy of acceptance, the most excellent, Who is Pure and the Purifier of all, let us embrace that very God, so that He may direct our mental faculties in the right direction.

“ ओ३म् -वन्दना ”
हे ओ३म् दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयेंI
दीनों पर करें दया और, जीवों को न कहीं सतायें II
सौरजगत निर्माता स्वयं हैं, पृथ्वी जिसका हिस्सा
उसे पलक झपकते विलय कराते, यह वेदों का किस्सा I
सब घूमें जीव स्वतन्त्र यहाँ, कोई परतंत्र ना हो जायें
हे ओ३म् दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
हो भेदभाव से रहित जगत यह, ईश हमारा सपना
सब जियें यहाँ उस प्रेमभाव से, “मत” हो अपना-अपना I
दो भक्तिभाव हे परमब्रह्म, ना “वेद” विहीन हो जायें
हे ओ३म् दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
वह तीस करोड़ और सरसठ लाख, वर्ष बीस हजार की गिनती
फिर होगी कथित “प्रलय” द्वापर सम, मिलजुल करते विनती I
ब्रह्माण्ड रचयिता हैं आप, हम सूक्ष्मात्मा कहलायें
हे ओ३म् दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
पुनः “आदिमनु” पैदा करते, मानवान्तर के स्वामी
तदोपरान्त सृष्टि चलती, वे अग्रज हम अनुगामी I
परमपिता वह सद्बुद्धि दो, गीत आपके गायें
हे ओ३म् दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
अग्नि वायु आदित्य अंगिरा,“वेदों” के अधिकारी
गले उतारे ओउम ने उनके, सबको दी जानकारी I
विघ्न निवारक और सुखदायक, जो ध्यावें सो पायें
हे ओ३म् दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
चौदह “मनु” निर्मित करते नित्य, “कल्प” जो कहलावे
दिन तीनसौ साठ ‘शतक’ में, महाकल्प बन जावे I
वर्ष इकत्तिस्सौदस बिन्दु चार खरब, की दीर्घायु वे पायें
हे ओ३म् दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
तदोपरान्त उस ब्रह्माण्ड के संग, स्वयं विलीन हो जावें
यह क्रम प्रभु का चले निरंतर, कभी रुकावटें न आवें I
दो श्रेष्ट आत्मा वह साहस, दुष्टों से ना झुक जायें
हे ओ३म् दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयें II
किम कर्तव्य विमूढ़ किये, ये धर्मज्ञों ने अन्तर्यामी
क्षमा करें “गज” त्रुटि हमारी,ओ३मम शरणम गच्छामी I
हे ओ३म् दीजिये शक्ति, यथोचित काम सभी के आयेंI
दीनों पर करें दया और, जीवों को न कहीं सतायें II
—————-Rachayita Gajraj Singh——————


from Tumblr http://ift.tt/1LSf0bQ
via IFTTT

सोम का वास्तविक अर्थ और सोमरस का...

सोम का वास्तविक अर्थ और सोमरस का पाखंड 
————————————————–

अ हं दां गृणते पूर्व्यं वस्वहं ब्रह्म कृणवं मह्यं वर्धनम् ।

अ हं भुवं यजमानस्य चोदिताऽयज्वनः साक्षि विश्वस्मिन्भरे ।।

– ऋ० मं० १०। सू० ४९। मं० १।।

हे मनुष्यो! मैं सत्यभाषणरूप स्तुति करनेवाले मनुष्य को सनातन ज्ञानादि धन को देता हूं। मैं ब्रह्म अर्थात् वेद का प्रकाश करनेहारा और मुझ को वह वेद यथावत् कहता उस से सब के ज्ञान को मैं बढ़ाता; मैं सत्पुरुष का प्रेरक यज्ञ करनेहारे को फलप्रदाता और इस विश्व में जो कुछ है उस सब कार्य्य का बनाने और धारण करनेवाला हूं। इसलिये तुम लोग मुझ को छोड़ किसी दूसरे को मेरे स्थान में मत पूजो, मत मानो और मत जानो।

नमस्ते मित्रो,

जैसा की आप सभी जानते हों हमारे देश में अनेको विद्वान और गुरुजन होते चले आये हैं और होते भी रहेंगे क्योंकि ये देश ही विद्वान उत्पन्न करने वाला है, इसीलिए इस देश आर्यावर्त को विश्वगुरु कहा जाता है, मगर ये भी एक कटु सत्य है की इसी देश में अनेको ऐसे भी तथाकथित और स्वघोषित विद्वान होते आये हैं जिनका उद्देश्य ही धर्म अर्थात वेद और वेदज्ञान का उपहास करना रहा है, ऐसे ही एक तथाकथित विद्वान हुए थे जिनका नाम था नारायण भवानराव पावगी इन्होने कुछ पुस्तके लिखी थी जिनमे कुछ हैं

1. आर्यावर्तच आर्यांची जन्मभूमि व उत्तर ध्रुवाकडील त्यांच्या वसाहती (इ.स. १९२०)

2. ॠग्वेदातील सप्तसिंधुंचा प्रांत अथवा आर्यावर्तातील आर्यांची जन्मभूमि आणि उत्तर ध्रुवाकडील त्यांच्या वसाहती (इ.स. १९२१)

3. सोमरस-सुरा नव्हे (इ.स. १९२२)

इन पुस्तको में लेखक ने वेदो, वैदिक ज्ञान और ऋषियों पर अनेक लांछन लगाये जिनमे प्रमुखता से ये सिद्ध करने की कोशिश की गयी की वैदिक काल में ऋषि और सामान्य मानव भी होम के दौरान सोमरस का पान देवताओ को करवाते थे और अपनी इच्छित मनोकामनाओ की पूर्ति हेतु यज्ञ में पशु वध, नरमेध भी करते थे। अब इन आधारहीन तथ्यों के आधार पर अनेको विधर्मी और महामानव आदि अपनी वेबसाइट और लेखो के माध्यम से हिन्दुओ के मन में वेदज्ञान के प्रति जहर भरने का कार्य करते हैं, उनमे मुख्यत जो आरोप लगाया जाता है वो है :

वेदो और वैदिक ज्ञान के अनुसार ऋषि आदि अपनी मनोकामनाए पूरी करने हेतु अनेको देवताओ को सोमरस (शराब) की भेंट करते थे।

सोमरस बनाने की विधि वेद में वर्णित है ऐसा भी इनका खोखला दावा है।

आइये एक एक आक्षेप को देखकर उसका समुचित जवाब देने की कोशिश करते हैं।

आक्षेप 1. वेदों में वर्णित सोमरस का पौधा जिसे सोम कहते हैं अफ़ग़ानिस्तान की पहाड़ियों पर ही पाया जाता है। यह बिना पत्तियों का गहरे बादामी रंग का पौधा है। जिसे यदि उबाल कर इसका पानी पीया जाय तो इससे थोड़ा नशा भी होता है। कहते हैं यह पौरुष वर्धक औषधि के रूप में भी प्रयोग होता है।
सोम वसुवर्ग के देवताओं में हैं ।
मत्स्य पुराण (5-21) में आठ वसुओं में सोम की गणना इस प्रकार है-
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोज्नल: ।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोज्ष्टौ प्रकीर्तिता: ॥

समाधान : सोमलता की उत्पत्ति जो बिना पत्ती का पौधा है ऐसा इनका विचार है जो अफगानिस्तान की पहाड़ियों में पैदा होता है ऐसा इनका दावा है उसके लिए ये ऋग्वेद 10.34.1 का मन्त्र “सोमस्येव मौजवतस्य भक्षः” उद्धृत करते हैं। मौजवत पर्वत को आजके हिन्दुकुश अर्थात अफगानिस्तान से निरर्थक ही जोड़ने का प्रयास करते हैं जबकि सच्चाई इसके विपरीत है।

निरुक्त में “मूजवान पर्वतः” पाठ है मगर वेद का मौजवत और निरुक्त का मूजवान एक ही है, इसमें संदेह होता है, क्योंकि सुश्रुत में “मुञ्जवान” सोम का पर्याय लिखा है अतः मौजवत, मूजवान और मुञ्जवान पृथक पृथक हैं ज्ञात होता है। वेद में एक पदार्थ का वर्णन जो सोम नाम से आता है वह पृथ्वी के वृक्षों की जान है। पृथ्वी की वनस्पति का पोषक है, वनस्पति में सौम्यभाव लाने वाला औषिधिराज है और वनस्पतिमात्र का स्वामी है। वह जिस स्थान में रहता है उसको मौजवत कहते हैं। मेरी पिछली पोस्ट में गौओ के निवास को व्रज कहते हैं ये सिद्ध किया था उसी प्रकार सोम के स्थान को मौजवत कहा गया है। यह स्थान पृथ्वी पर नहीं किन्तु आकाश में है। क्योंकि वनस्पति की जीवनशक्ति चन्द्रमा के आधीन है इसलिए उसका नाम सोम है वह औषधि राज है। अलंकारूप से वह लतारूप है क्योंकि जो भी व्यक्ति शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष को समझते हैं जानते हैं उन्हें पता है की चन्द्रमा पंद्रह दिन तक बढ़ता और पंद्रह दिन तक घटता है, इसे न समझकर व्यर्थ की कोरी कल्पना कर ली गयी की शुक्लपक्ष में इस सोमलता के पत्ते होते हैं और कृष्णपक्ष में गिर जाते हैं।

सोम वसुवर्ग के देवताओ में हैं ये भी मिथ्या कल्पना इनके घर की है क्योंकि जो वसु का अर्थ भली प्रकार जानते तो ऐसे दोष और मिथ्या बाते प्रचारित ही न करते, आठ वसु में सोम भी शामिल है उसके लिए उपर्लिखित पुराण का श्लोक उद्धृत करते हैं

मत्स्य पुराण (5-21) में आठ वसुओं में सोम की गणना इस प्रकार है-
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोज्नल: ।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोज्ष्टौ प्रकीर्तिता: ॥

भागवत पुराण के अनुसार- द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु और विभावसु। महाभारत में आप (अप्) के स्थान में ‘अह:’ और शिवपुराण में 'अयज’ नाम दिया है।

अब यदि इनसे पूछा जाए की - आठ वसुओं में सोम हैं मत्स्य पुराण के अनुसार जिसका अर्थ है मादक दृव्य यानी शराब - तो भगवत पुराण में आठ वसुओं में सोम क्यों नहीं लिखा ?

देखिये ऋषि दयानंद अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में वसु का अर्थ किस प्रकार करते हैं :

पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु। (स. प्र. सप्तम समुल्लास)

ऋषि ने बहुत ही सरल शब्दों में वसु का अर्थ कर दिया। अब अन्य आर्ष ग्रन्थ से आठ वसुओं का प्रमाण देते हैं :

शाकल्य-'आठ वसु कौन से है?’
याज्ञ.-'अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्र और नक्षत्र। जगत के सम्पूर्ण पदार्थ इनमें समाये हुए हैं। अत: ये वसुगण हैं।

(बृहदारण्यकोपनिषद, अध्याय तीन)

इन प्रमाणों से सिद्ध है की आठ वसुओं में सोम नामक कोई नाम नहीं। हाँ यदि सोम का अर्थ चन्द्र से करते हो जैसा की इस लेख से सिद्ध भी होता है तो आपकी सोमलता और सोमरस का सिद्धांत ही खंडित हो जाता है।

आक्षेप 2. सोम की उत्पत्ति के दो स्थान है- (1) स्वर्ग और (2) पार्थिव पर्वत । अग्नि की भाँति सोम भी स्वर्ग से पृथ्वी पर आया । ऋग्वेद ऋग्वेद 1.93.6 में कथन है : 'मातरिश्वा ने तुम में से एक को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा; गरुत्मान ने दूसरे को मेघशिलाओं से।’ इसी प्रकार ऋग्वेद 9.61.10 में कहा गया है: हे सोम, तुम्हारा जन्म उच्च स्थानीय है; तुम स्वर्ग में रहते हो, यद्यपि पृथ्वी तुम्हारा स्वागत करती है । सोम की उत्पत्ति का पार्थिव स्थान मूजवन्त पर्वत (गान्धार-कम्बोज प्रदेश) है'। ऋग्वेद 10.34.1

समाधान : यहाँ भी “आँख के अंधे और गाँठ के पुरे” वाली कहावत चरितार्थ होती है देखिये :

अप्सु में सोमो अब्रवीदंतविर्श्वानी भेषजा। 
अग्निं च विश्वशम्भुवमापश्च विश्वभेषजीः।। (ऋग्वेद 1.23.20)

यहाँ सोम समस्त औषधियों के अंदर व्याप्त बतलाया गया है। इस सोम को ऐतरेयब्राह्मण 7.2.10 में स्पष्ट कह दिया है की “एतद्वै देव सोमं यच्चन्द्रमाः” अर्थात यही देवताओ का सोम है जो चन्द्रमा है। इस सोम को गरुड़ और श्येन स्वर्ग से लाते हैं। गरुड़ और श्येन भी सूर्य की किरणे ही हैं। सोम का सौम्य गुण औषधियों पर पड़ता है, यही स्वर्ग से गरुड़ और श्येन द्वारा उसका लाना है।

ऐसे वैदिक रीति से किये अर्थो को ना जानकार व्यर्थ ही वेद और सत्य ज्ञान पर आक्षेप लगाना जो सम्पूर्ण विज्ञानं सम्मत है निरर्थक कार्य है, क्योंकि आज विज्ञानं भी प्रमाणित करता है की चन्द्रमा की रौशनी अपनी खुद की नहीं सूर्य की रौशनी ही है यही बात इस मन्त्र में यथार्थ रूप से प्रकट होती है और दूसरा सबसे बड़ा विज्ञानं ये है की चन्द्रमा जो रात को प्रकाश देता है उससे औषधियों का बल बढ़ता है।

आशा है इस लेख के माध्यम से सोमरस, सोमलता आदि जो मिथ्या बाते फैलाई जा रही हैं उनपर ज्ञानीजन विचार करेंगे। ईश्वर कृपा से इसी विषय पर जो और आक्षेप लगाये हैं उनका भी समाधान प्रस्तुत होता रहेगा

लौटो वेदो की और

नमस्ते

।। ओ३म ।।


from Tumblr http://ift.tt/1S8UoLX
via IFTTT

पाप की अन्तिम झाँकी अपघ्नन्पवसे मृधः क्रतुवित्सोम मत्सरः । नुदस्वादेवयुञ्जनम् ॥ मेरे सूखे हृदय के...

पाप की अन्तिम झाँकी

अपघ्नन्पवसे मृधः क्रतुवित्सोम मत्सरः ।
नुदस्वादेवयुञ्जनम् ॥

मेरे सूखे हृदय के संजीवन ! तेरी पहुँच मेरे प्रत्येक संकल्प , प्रत्येक क्रिया , प्रत्येक चेष्टा में है । तू हर्ष का सरोवर है । तू पापों का विनाश कर पवित्रता का प्रवाह लाता है । पाप की ओर प्रवृत्त इस जन को पाप-पथ से हटा कर सन्मार्ग में प्रेरित कर ।

मेरे अन्दर मस्ती का सागर ठाठें मार रहा है । मैं उठूँ , बैठूँ , फिरूँ , कुछ करूँ , मस्ती की लहर मेरी प्रत्येक क्रिया के साथ-साथ उठती है । एक पवित्र हर्ष का प्रवाह है जिस में मैं दिन-रात डूबा रहता हूँ । मेरा प्रत्येक कार्य ईश्वर के समर्पण है । ऐसी अवस्था में पाप को उदित होने का अवसर कहाँ है ? सोम-रस के पहिले ही घूँट के साथ मैं पाप के बीज को नष्ट कर चुका हूँ ।
प्रभो ! फिर बात क्या है ? मस्ती के इस अटूट प्रवाह में कभी-कभी अहंकार की , अभिमान की , और इन के साथ-साथ कभी-कभी काम की , क्रोध की झाँकी-सी आ जाती है । मैं जैसे अपने आपे से बाहर हो जाता हूँ । ऐसा प्रतीत होने लगता है कि वह मस्ती कृत्रिम थी , धर्म का एक अस्थिर आवरण-सा था जो मेरे हृदय में बैठे “अदेव” को – राक्षस को – कुछ देर के लिए आवृत कर रहा था – ओट-सी दे रहा था । वास्तव में मैं “अदेवयु” – पापी ही हूँ ।
तो क्या तुम इस पाप की प्रवृत्ति को मिटा नहीं सकते ?
या ये उस की – विनाश पा रहे पाप की – अन्तिम झलकियाँ ही हैं ? नष्ट हो रहे संस्कार अपनी मोहिनी का क्षणिक म्रियमाण रूप दिखा-दिखा कर विदा हो रहे हैं ।
मैं अपने पुराने “ अदेवयु” स्वभाव का आखिरी दर्शन कर रहा हूँ । अहा ! कैसा प्यारा रूप है । मन मोहित होने लगा । मेरे सोम-रस वाले प्रभो ! अब तुम्हारा ही आसरा है । इस वृत्र का संहार कीजिये । मेरे संयम का , तप का इस परीक्षा की घड़ी में तुम्हारे सिवा और कौन रक्षक हो सकता है ? तुम्हारे सोम-रस की लाज ! उसे कहीं निष्फल न होने देना । 
तुम्हारा भक्त होकर मैं “अदेवयु” रहूँ ? 
मुझे प्रेरित कीजिये – पुण्य की ओर , अपने पवित्र मार्ग की ओर प्रेरित कीजिये ॥

पण्डित चमूपति जी
“सोम सरोवर”


from Tumblr http://ift.tt/1LSf0bL
via IFTTT

पशु पक्षी कीट पतंग आदि को नहीं मालूम है कि उनके जीवन का क्या लक्ष्य है? पशु पक्षी सवेरे उठते ही खाने...

पशु पक्षी कीट पतंग आदि को नहीं मालूम है कि उनके जीवन का क्या लक्ष्य है? पशु पक्षी सवेरे उठते ही खाने लगते हैं या खाने की जुगाड में लग जाते हैं ।यदि इन्सान भी सवेरे उठते ही खाने पीने और भोग विलास की बातों में लग गया तो मनुष्य और पशु में क्या अंतर रहा? यदि हमने श्रेष्ठ मानव जीवन पाने के बाद भी पशुवत जीवन जिया तो हम से बडा अज्ञानी एवं अभागा कोई न होगा ।


from Tumblr http://ift.tt/1S8UmnA
via IFTTT

 –ऐ मानव ! क्या तू अपने हर कार्य को गम्भीरता पूर्वक [ विचार पूर्वक ] करता है ? हाँ कहना सबके...

 –ऐ मानव ! क्या तू अपने हर कार्य को गम्भीरता पूर्वक [ विचार पूर्वक ] करता है ? हाँ कहना सबके लिए बहुत ही कठिन होगा |नहीं करते तो सोचो कि आपका हर कार्य आपके स्वयं के जीवन को , आपके परिवार को तथा समाज व राष्ट्र को अवश्य ही प्रभावित करता है |ऐसे में क्या आपको अपना हर कार्य गम्भीरता पूर्वक नहीं करना चाहिए ?क्या आप अपने जीवन के प्रति ,अपने परिवार ,समाज व राष्ट्र के प्रति भी गम्भीर नहीं रहना चाहते ?अगर नहीं रह सकते तो क्याआप अपने आपको मनुष्य कह सकते हो ?हमारे शास्त्र विचारशील [मननशील ]को ही मनुष्य कहते हैं – “ यो मननात स मनुष्यः ”


from Tumblr http://ift.tt/1eG69wP
via IFTTT

Tuesday, July 7, 2015

सत्यार्थ प्रकाश : क्या और क्यों महर्षि दयानन्द ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में अपना कालजयी...

सत्यार्थ प्रकाश : क्या और क्यों
महर्षि दयानन्द ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में अपना कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश रचकर धार्मिक जगत में एक क्रांति कर दी . यह ग्रन्थ वैचारिक क्रान्ति का एक शंखनाद है . इस ग्रन्थ का जन साधारण पर और विचारशील दोनों प्रकार के लोगों पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा . देवनागरी भाषा में प्रकाशित होनेवाले किसी दुसरे ग्रन्थ का एक शताब्दी से भी कम समय में इतना प्रसार नहीं हुआ जितना की इस ग्रन्थ का अर्धशताब्दी में प्रचार प्रसार हुआ . हिन्दी में छपा कोई अन्य ग्रन्थ एक शताब्दी के भीतर देश व विदेश की इतनी भाषाओँ में अनुदित नहीं हुआ जितनी भाषाओं में इसका अनुवाद हो गया है. हिन्दी में तो कवियों ने इसका पद्यानुवाद भी कर दिया .
सार्वभौमिक नित्य सत्य : इस ग्रन्थ का लेखक ईश्वर जीव प्रकृति इन तीन पदार्थों को अनादि मानता है .ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव भी अनादि व नित्य हैं . सृष्टि नियमों को भी ग्रन्थ करता अनादि व नित्य तथा सार्वभौमिक मानता हिया . विज्ञान का भी यही मत है की सृष्टि नियम Laws of Nature अटल अटूट सार्वभौमिक हैं . इन नियमों का नियंता परमात्मा है . परमात्मा की सृष्टि नियम न तो बदलते हैं न टूटते हैं न घटते हिएँ न बढते हैं और न ही घिसते हैं इसलिए चमत्कार की बातें करना एक अन्धविश्वास है . किसी भी मत का व्यक्ति चमत्कार में आस्था रखता है तो यह अन्धविश्वास है.
सबसे पहला ग्रन्थ विश्व में इस युग में चमत्कारों को चुनौती देने वाला सबसे पहला ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश है. जिस मनीषि ने चमत्कारों को तर्क तुला पर तोलकर मत पंथों को अपनों व परायों को झक्खोरा विश्व का वह पहला विचारक महर्षि दयानन्द सरस्वती है. सत्यार्थ प्रकाश के प्रणेता तत्ववेत्ता ऋषि दयानन्द को न तो पुराणों के चमत्कार मान्य हैं और न ही बाइबल व कुरान के . हनुमान के सूर्य को मुख में ले लिया यह भी सत्य नहीं है और हजरत ईसा ने रोगियों को चंगा कर दिया , मृतकों को जीवित कर दिया तथा हजरत मुहम्मद साहेब ने चाँद के दो टुकडे कर दिए – ये भी ऐतिहासिक तथ्य नहीं है . हजरत मुसा हों अथवा इब्राहीम सृष्टि नियम तोड़ने में कोई भी सक्षम नहीं हो सकता . दयानन्द जी के इस घोष का कड़ा विरोध हुआ . आर्य विद्वानों ने इस विषय मरण सैकड़ों शाश्त्रार्थ किये. पंडित लेखराम जी आर्य पथिक को इसी कारण बलिदान तक देना पड़ा . ख्वाजा हसन निजामी को सन १९२५ में एक आर्य विचारक प्रो हासानन्द ने चमत्कार दिखाने की चुनौती दी और कहा की में आपसे बढकर जादूगरी से चमत्कार दिखाऊंगा . ख्वाजा साहेब को आगे बढकर चमत्कार दिखाने का साहस ही नहीं हुआ . (दृष्टव्य : दैनिक तेज उर्दू दिनांक ३०.१०.१९२५ पृष्ठ ५ ) सत्य साईं बाबा भी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की चुनौती को स्वीकार करके कोई चमत्कार न दिखा सका.
अब तो विरोधी भी मन रहे हैं : ईश्वर की कृपा हुयी . ऋषि की पुण्य प्रताप व अनेक बलिदानों की फलस्वरूप अब विरोधी भी सत्यार्थ प्रकाश के प्रभाव को स्वीकार करके इस अन्धविश्वास से मुक्ति पा रहे हैं . हाँ ऐसे लोगों की अब भी कमी नहीं है जो सत्यार्थ प्रकाश से प्रकाश भी पा रहे हैं और इसे कोष भी रहे हैं . गुड का स्वाद भी लेते हैं और गन्ने को गालीयाँ भी देते हैं . पुराण बाइबिल व कुरान के ऐसे प्रसंगों की व्याख्याएं ही बदल गयीं हैं . अब रोगियों को चंगा करने का अर्थ मानसिक और आध्यात्मिक रोगों को दूर करना हो गया है . मृतकों को जिलाने का अर्थ नैतिक मृत्यु से बचाना किया जाने लगा है . यह व्याख्या कैसे सूझी ? इन धर्म ग्रंथों के भाष्य व तफ्सीरें बदल गयीं हैं .
सत्य असत्य की कसौटी : आज से कई वर्ष पहले तक धर्म की सच्चाई की कसौटी चमत्कारों को माना जाता था . आज है कोई जो कुमारी मरियम से ईसा की उत्पत्ति को इसाई मत की सचाई का प्रबल प्रमाण मानता हो ? कौन है जो पुराणों की असंभव बातों को संभव व सत्य मानता हो ? कौन है जो बुराक पर सवार होकर पैगम्बर मुहम्मद की आसमानी यात्रा को सत्य मानता हो ? मुसलमानों के नेता सर सैयद अहमद खां ने बड़ी निर्भीकता से इन गप्पों को झुठलाया है ( दृष्टव्य “ हयाते जावेद लेखक मौलाना हाली – पानीपत ). यह सब सत्यार्थ प्रकाश का ही प्रभाव है .
लोगों का ध्यान नहीं गया : सत्यार्थ प्रकाश ने भारतीय जनमानस में मातृभूमि का प्यार जगाया . जन्म भूमि व पूर्वजों के प्रति आस्था पैदा की . जातीय स्वाभिमान को पैदा किया . एकादश समुल्लास की अनुभुमिका ने भारतीयों की हीन भावना को भगाया. यह इसी अनुभुमिका ने भारतीयों की हीन भावना को भगाया . यह इसी अनुभुमिका का प्रभाव था की गर्ज -२ कर आर्य्य लोग गाया करते थे :
कभी हम बुलन्द इकबाल थे तुम्हें याद हो कि न याद हो
हर फन में रखते कमाल थे तुम्हें याद हो य न याद हो .
सत्यार्थ प्रकाश ने देशवासियों को स्वराज्य का मंत्र दिया . इनके अतिरिक्त सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित कुछ वाक्यों व विचारों की मौलिकता व महत्व्य को विचारकों ने जाना व माना परन्तु उनका व्यापक प्रचार नहीं किया गया .इन्हें हम संक्षेप में यहाँ देते हैं :
ऋषि दयानन्द आधुनिक विश्व के प्रथम विचारक हैं जिन्होंने इस ग्रन्थ में सबके लिए अनिवार्य व निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा का सिद्धांत रखा . उनके एक प्रमुख शिष्य स्वामी दर्शनानंद जी ने भारत में सबसे पहले निःशुल्क शिक्षा प्रणाली का प्रयोग किया .
ऋषि ने अपने इस ग्रन्थ में लिखा है कृषक व श्रमिक आदि राजाओं के राजा हैं . कृषकों व श्रमिकों का समाज में सम्मान का स्थान है . इस युग में ऐसी घोषणा करने वाले पहले धर्म गुरु ऋषि दयानन्द ही थे
ऋषि ने अपने इस ग्रन्थ के १३ वे समुल्लास में लिखा है की यदि कोई गोरा किसी काले को मार देता है तो भी पक्षपात करते हुए न्यायालय उसे दोषमुक्त करके छोड़ देता है . इसाई मत की समीक्षा करते हुए ऐसा लिखा गया है . यह महर्षि की निर्भीकता व सत्य वादिता एवं प्रखर देशभक्ति का एक प्रमाण है . बीसवीं शताब्दी में आरंभिक वर्षों में मद्रास कोलकाता व रावलपिंडी आदि नगरों में ऐसे घटनाएं घटती रहती थें . मरने वालों के लिए कोई बोलता ही नहीं था .
प्रथम विश्व युद्ध तक गांधी जी भी अंग्रेज जाति की न्याय प्रियता में अडिग आस्था रखते हुए अंग्रेजी न्याय पालिका का गुणगान करते थे
महर्षि दयानन्द प्रथम भारतीय महापुरुष हैं जिन्होंने विदेशी शासकों की न्याय पालिका का खुलकर अपमान किया . ऋषि ने विदेशियों की लूट खसोट व देश की कंगाली पर तो इस ग्रन्थ में कई बार खून के आंसू बहाये हैं
तेरहवें समुल्लास में ही इसाई मत की समीक्षा करते हुए लिखा है कि तभी तो ये इसाई लोग दूसरों के धन पर ऐसे टूटते हैं जैसे प्यासा जल पर व भूखा अन्न पर . ऐसी निर्भीकता का हमारे देश के आधुनिक इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।


from Tumblr http://ift.tt/1HKzVxG
via IFTTT

/ मूलभूत लेख / मनुष्य किन घटकों से बना है ? (शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा) १. मनुष्य देह के घटक कौन से...

/ मूलभूत लेख / मनुष्य किन घटकों से बना है ?
(शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा)
१. मनुष्य देह के घटक कौन से हैं ? एक प्रस्तावना
इस लेख में हमने मनुष्य देह की रचना और उसके
विविध सूक्ष्म देहों का विवरण दिया है । आधुनिक विज्ञान ने
मनुष्य के स्थूल शरीर का कुछ गहराई तक अध्ययन
किया है; किंतु मनुष्य के अस्तित्व के अन्य अंगों के संदर्भ में
आधुनिक विज्ञान की समझ आज भी
अत्यंत सीमित है । उदा. मनुष्य के मन एवं बुद्धि के
संदर्भ में ज्ञान अब भी उनके स्थूल अंगों तक
सीमित है । इसकी तुलना में
अध्यात्मशास्त्र ने मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व का विस्तृतरूप से
अध्ययन किया है ।
२. अध्यात्मशास्त्र के अनुसार मनुष्य किन घटकों से बना
है ?
जीवित मनुष्य आगे दिए अनुसार विविध देहों से बना है

१. स्थूल शरीर अथवा स्थूलदेह
२. चेतना (ऊर्जा) अथवा प्राणदेह
३. मन अथवा मनोदेह
४. बुद्धि अथवा कारणदेह
५. सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह
६. आत्मा अथवा हम सभी में विद्यमान
ईश्वरीय तत्त्व
आगे के भागों में हम हम इन विविध देहों का विस्तृत विवरण
प्रस्तुत करेंगे ।
३. स्थूलदेह
आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से यह देह सर्वाधिक
परिचित है । यह देह अस्थि-ढांचा, स्नायु, ऊतक, अवयव, रक्त,
पंच ज्ञानेंद्रिय आदि से बनी है ।
४. चेतनामय अथवा प्राणदेह
यह देह प्राणदेह के नाम से परिचित है । इस देह द्वारा स्थूल
तथा मनोदेह के सभी कार्यों के लिए आवश्यक
चेतनाशक्ति की (ऊर्जा की) आपूर्ति
की जाती है । यह चेतनाशक्ति अथवा
प्राण पांच प्रकार के होते हैं :
प्राण : श्वास के लिए आवश्यक ऊर्जा
उदान : उच्छवास तथा बोलने के लिए आवश्यक ऊर्जा
समान : जठर एवं आंतों के कार्य के लिए आवश्यक ऊर्जा
व्यान : शरीर की ऐच्छिक तथा अनैच्छिक
गतिविधियों के लिए आवश्यक ऊर्जा
अपान : मल-मूत्र विसर्जन, वीर्यपतन, प्रसव आदि
के लिए आवश्यक ऊर्जा
मृत्यु के समय यह ऊर्जा पुनश्च ब्रह्मांड में विलीन
होती है और साथ ही सूक्ष्मदेह
की यात्रामें गति प्रदान करने में सहायक
होती है । .
५. मनोदेह अथवा मन
मनोदेह अथवा मन हमारी संवेदनाएं, भावनाएं और
इच्छाआें का स्थान है । इस पर हमारे वर्तमान तथा पूर्वजन्म के
अनंत संस्कार होते हैं । इसके तीन भाग हैं :
बाह्य (चेतन) मन : मन के इस भाग में
हमारी वे संवेदनाएं तथा विचार होते हैं, जिनका
हमें भान रहता है ।
अंतर्मन (अवचेतन मन) : इसमें वे संस्कार होते हैं,
जिन्हें हमें इस जन्म में प्रारब्ध के रूप में भोगकर पूरा
करना आवश्यक है । अंतर्मन के विचार
किसी बाह्य संवेदना के कारण, तो
कभी-कभी बिना किसी
कारण भी बाह्यमन में समय-समय पर
उभरते हैं । उदा. कभी-कभी
किसी के मन में अचानक ही
बचपन की किसी संदिग्ध घटना के
विषय में निरर्थक एवं असम्बंधित विचार उभर आते हैं ।
सुप्त (अचेतन) मन : मन के इस भाग के संदर्भ में
हम पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं । इसमें हमारे संचित से
संबंधित सर्व संस्कार होते हैं ।
अंतर्मन तथा सुप्त मन , दोनों मिलकर चित्त बनता है ।
कभी-कभी मनोदेह के एक भाग को हम
वासनादेह भी कहते हैं । मन के इस भाग में
हमारी सर्व वासनाएं संस्कारूप में होती हैं

कृपया संदर्भ के लिए पढें, लेख : ‘हम जो कुछ करते हैं, उसका
क्या कारण है ?’ साथ ही मन की
कार्यकारी रचना समझने के लिए इसी
शीर्षक का ‘इ-ट्यूटोरियल (उप शैक्षणिक वर्ग)’ पढें ।
मनोदेह से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है ।
६. बुद्धि
कारणदेह अथवा बुद्धि का कार्य है – निर्णय प्रक्रिया एवं
तर्कक्षमता ।
बुद्धि से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है ।
७. सूक्ष्म अहं
सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह मनुष्य की
अज्ञानता का अंतिम शेष भाग (अवशेष) है । मैं ईश्वर से अलग
हूं, यह भावना ही अज्ञानता है ।
८. आत्मा
आत्मा हमारे भीतर का ईश्वरीय तत्त्व है
और हमारा वास्तविक स्वरूप है । सूक्ष्मदेह का यह मुख्य घटक
है, जो कि परमेश्वरीय तत्त्व का अंश है । इस अंश
के गुण हैं – सत, चित्त और आनंद (शाश्वत सुख) । आत्मा पर
जीवन के किसी सुख-दुःख का प्रभाव
नहीं पडता और वह निरंतर आनंदावस्था में
रहती है । वह जीवन के सुख-दुःखों
की ओर साक्षीभाव से (तटस्थता से)
देखती है। आत्मा तीन मूल सूक्ष्म-घटकों
के परे है; तथापि हमारा शेष अस्तित्व स्थूलदेह एवं मनोदेह से बना
होता है ।
९. सूक्ष्मदेह
हमारे अस्तित्व का जो भाग मृत्यु के समय हमारे स्थूल
शरीर को छोड जाता है, उसे सूक्ष्मदेह कहते हैं ।
इसके घटक हैं – मनोदेह, कारणदेह अथवा बुद्धि, महाकारण देह
अथवा सूक्ष्म अहं और आत्मा । मृत्यु के समय केवल
स्थूलदेह पीछे रह जाती है । प्राणशक्ति
पुनश्च ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है ।
सूक्ष्मदेह के कुछ अंग निम्नानुसार हैं ।
सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय : सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय अर्थात हमारे
पंचज्ञानेंद्रियों का वह सूक्ष्म भाग जिसके द्वारा हमें
सूक्ष्म विश्व का बोध होता है । उदा. कोई उत्तेजक न
होते हुए भी हम चमेली के
फूल जैसी सूक्ष्म सुगंध अनुभव कर सकते
हैं । यह भी संभव है कि एक
ही कक्ष में किसी एक को इस
सूक्ष्म सुगंध की अनुभूति हो और अन्य
किसी को न हो । इसका विस्तृत विवरण दिया है
। हमारा यह लेख भी पढें –
छठवीं ज्ञानेंद्रिय क्या है ?
सूक्ष्म कर्मेंद्रिय : सूक्ष्म कर्मेंद्रिय अर्थात , हमारे
हाथ , जिह्वा ( जीभ ) इ . स्थूल कर्मेंद्रियों का
सूक्ष्म भाग । सर्व क्रियाआें का प्रारंभ सूक्ष्म
कर्मेंद्रियों में होता है और तदुपरांत ये क्रियाएं स्थूल स्तर
पर व्यक्ति की स्थूल कर्मेंद्रियों द्वारा
की जाती हैं ।
१०. अज्ञान (अविद्या)
आत्मा के अतिरिक्त हमारे अस्तित्व के सभी अंग माया
का ही भाग हैं । इसे अज्ञान अथवा अविद्या कहते
हैं, जिसका शब्दशः अर्थ है (सत्य) ज्ञान का अभाव । अविद्या
अथवा अज्ञान शब्द का उगम इस तथ्य से है कि हम अपने
अस्तित्व को केवल स्थूल शरीर, मन एवं बुद्धि तक
ही सीमित समझते हैं । हमारा तादात्म्य
हमारे सत्य स्वरूप (आत्मा अथवा स्वयंमें विद्यमान
ईश्वरीय तत्त्व) के साथ नहीं होता ।
अज्ञान (अविद्या) ही दुःख का मूल कारण है ।
मनुष्य धनसंपत्ति, अपना घर, परिवार, नगर, देश आदि के प्रति
आसक्त होता है । किसी व्यक्ति से अथवा वस्तु से
आसक्ति जितनी अधिक होती है,
उतनी ही इस आसक्ति से दुःख निर्मिति
की संभावना अधिक होती है । एक आदर्श
समाज सेवक अथवा संतके भी क्रमशः समाज तथा
भक्तों के प्रति आसक्त होने की संभावना
रहती है । मनुष्य की सबसे अधिक
आसक्ति स्वयं के प्रति अर्थात अपने ही
शरीर एवं मन के प्रति होती है । अल्पसा
कष्ट अथवा रोग मनुष्य को दुःखी कर सकता है ।
इसलिए मनुष्य को स्वयं से धीर-धीरे
अनासक्त होकर अपने जीवन में आनेवाले दुःख तथा
व्याधियों को स्वीकार करना चाहिए, इस आंतरिक बोध के
साथ कि जीवन में सुख-दुःख प्रमुखतः हमारे प्रारब्ध
के कारण ही हैं (हमारे ही पिछले कर्मों
का फल हैं ।) आत्मा से तादात्म्य होने पर ही हम
शाश्वत (चिरस्थायी) आनंद प्राप्त कर सकते हैं ।
आत्मा और अविद्या मिलकर जीवात्मा बनती
है । जीवित मनुष्य में अविद्या के कुल
बीस घटक होते हैं – स्थूल शरीर,
पंचसूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय, पंचसूक्ष्म कर्मेंद्रिय, पंचप्राण,
बाह्यमन, अंतर्मन, बुद्धि और अहं । सूक्ष्म देह के घटकों का
कार्य निरंतर होता है, जीवात्मा का ध्यान आत्मा
की अपेक्षा इन घटकों की ओर आकर्षित
होता है; अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान की अपेक्षा
अविद्या की ओर जाता है ।


from Tumblr http://ift.tt/1S6oHTy
via IFTTT

ऋषि दयानन्द के कार्य - 1. पाखण्ड खण्डन 2. वेदों के गौरव को पुनर्स्थापित करना 3. गुरुकुलों की...

ऋषि दयानन्द के कार्य -

1. पाखण्ड खण्डन

2. वेदों के गौरव को पुनर्स्थापित करना

3. गुरुकुलों की स्थापना

4. यज्ञ विधि में संसोधन वेदानुसार

5. स्त्री शिक्षा को बढ़ावा

6. जातिवाद की समाप्ति

7. वर्ण व्यवस्था की महत्ता को उजागर करना

8. वेदों व् अन्य ग्रन्थों पर लगे आक्षेपों की समाप्ति

9. प्रक्षेपित ग्रन्थों में से केवल वेद आधारित बातें ही स्वीकार करना

10. विधर्मियों को मुँह तोड़ जवाब

11. आर्ष ग्रन्थ लेखन

अब आप ही बताइये की क्या किसी पौराणिक पण्डे ने ऐसा साहस किया है


from Tumblr http://ift.tt/1HKzUd8
via IFTTT

नास्तिक नही “आर्य समाजी” थे भगतसिंह | भगत सिंह का जन्म २८ सितंबर, १९०७ में हुआ था,उनके...

नास्तिक नही “आर्य समाजी” थे भगतसिंह |

भगत सिंह का जन्म २८ सितंबर, १९०७ में हुआ था,उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था,यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। उनके परिवार पर आर्य समाज व महर्षि दयानन्द की विचारधारा का गहरा प्रभाव था !

भगत सिंह दादा सरदार अर्जुन सिंह “महर्षि दयानन्द” के सम्पर्क मे आऐ तब ऋषि ने उपदेश मे कहा की सिंख कौम की स्थापना मुगलो से युद्ध के लिए हुई थी,अब आपको पुन: वैदिक धर्म की ओर लोट अाना चाहिए तभी से यह परिवार आर्य समाज के वैदिक विचारो की ओर लोट आया ।

अधिकांश क्रांतिकारियों को देश प्रेम की प्रेरणा महर्षि दयानन्द के साहित्य व आर्य समाज से मिली ! जब भगतसिंह के पिता जेल मे थे तब उनके दादाजी ने उनकी माॅ को ऋषि दयानन्द द्वारा रचित “संस्कार चंद्रिका” (१६ संस्कार पर आधारित) वृहद पुस्तक दी उसी के अध्ययन के बाद भगतसिंह का जन्म हुवा ।

हम आभारी है,
“दी लेजेंड आफ भगतसिंह” बनाने वाली शोधार्थी दल के, जिन्होने भगत सिंह के आर्य समाजी परिवार से जुडे होने के प्रमाणो को एकत्रित करके चलचित(फिल्म) के माध्यम से सारी दुनिया को बताया।

चलचित्र मे १४:१० मिनट पर महर्षि दयानंद का चित्र दिखाया गया व ३५:५७ मिनट पर भगत सिंह का जनेऊ संस्कार हुआ था ये भी स्पष्ट किया गया,सब जानते है सिखो मे जनेऊ संस्कार नहीं होता,वैसे तो लगभग सभी क्रांतिवीर जनेऊधारी थे,क्योंकि उनके मूल मे आर्य समाज व ऋषि दयाननद के क्रांतिकारी विचार थे |

अगर भगतसिंह कम्युनिष्ट होते तो क्याॅ ???

🌑 लाला लाजपत राय जेसे प्रखर आर्य समाजी जिन्होने ऋषि दयानन्द के साथ मिलकर के सम्पुर्ण पंजाब मे 
“आर्य समाज” की स्थापना की व ऋषि की मृत्यु के उपरांत “महात्मा हंसराज स्वामी” के साथ मिलकर के डी.ए.वी स्कुल व कालेज की स्थापना की तो क्यॉ वो उन्ही के कालेज मे पढकर के लाला जी हत्या की बदला लेते.?जब फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास आया तब वो आर्य समाज के रत्न

“पंण्डित राम प्रसाद बिस्मिल” 
( जिन्हे एक बार पिता ने क्रोध मे आकर के कहा या तो घर छोड दे या आर्य समाज मे आना-जाना तब उन्होने अपने पिता की आज्ञा से घर छोड दिया लेकिन अपनी वैदिक विचारधारा नही ) की जीवनी पढ रहे थे !(कुछ लोगों का मानना है कि वो लेनिन की जीवनी पढ रहे थे)!!
उन्होंने बिना सिर उठाए हुए उससे कहा ‘ठहरो भाई, मैं पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी पढ़ रहा हूं !! एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है !! थोड़ा रुको !!’ ऐसा इंसान जिसे कुछ पलों के बाद फांसी होने वाली है उसके बावजूद वो किताबें पढ़ रहा है, ये कल्पना कर पाना भी बेहद
मुश्किल है !!

अंततः फांसी के निर्धारित समय से १ दिन पहले २३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई !!

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -

मेरा रँग दे बसन्ती चोला,मेरा रँग दे !! मेरा रँग दे बसन्ती चोला !! माय रँग दे बसन्ती चोला !!

अगर कोई लेनिन व कार्ल माकर्स को पड करके वामपंथी हो सकता है,तो क्यॉ आप मुझ जैसे से आर्य समाजी जो की 'खंडन-मंडन’ व “शास्त्रार्थ” के लिऐ “कुरान” व “बाईबल” पडते है, को भी आप मुसलमान व ईसाई कहोगे ???

भगतसिंह के वंशज आज भी “आर्य समाज” के वैदिक विचारो के अनुरूप ही रहते है,ना की सिंख सम्प्रदाय की तरह


from Tumblr http://ift.tt/1S6oHD8
via IFTTT

:ॐ:: एक सार्वभौम शक्ति ======================  ब्रह्माण्ड में ग्रह-नक्षत्रो-सौर मंडलों-आकाशगंगाओं की...

:ॐ:: एक सार्वभौम शक्ति
====================== 
ब्रह्माण्ड में ग्रह-नक्षत्रो-सौर मंडलों-आकाशगंगाओं की गतिशीलता के बीच एक दिव्य ध्वनि और तरंग की गूँज है जिसे ॐ कहते हैं ,किन्तु सभी इसे सदैव नहीं सुन सकते ,इस ध्वनि को हमारे तपस्वी और ऋषि - महर्षियों ने अपनी ध्यानावस्था में सुना। जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है | उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ब्रह्मनाद अथवा ॐ कहा । यानी अंतरिक्ष में होने वाला मधुर गीत ‘ओ३म्‌’ ही अनादिकाल से अनन्त काल तक ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। ओ३म्‌ की ध्वनि या नाद ब्रह्माण्ड में प्राकृतिक ऊर्जा के रूप में फैला हुआ है| यह ईश्वरीय ऊर्जा है ,सर्वत्र फैला ,कण कण में व्याप्त सार्वभौम ऊर्जा ,जो तरंगो के रूप में सर्वत्र विकरित है |इसीलिए इसे प्रणव भी कहा जाता है ,यह सब जगह सम्पूर्णता देने में सक्षम है |अकेले हो या किसी शक्ति के साथ सर्वत्र ऊर्जा स्वरुप है |
इस ध्वनि के उच्चारण से मानव शरीर को अनेक लाभ होते हैं और वह असीम सुख, शांति व आनन्द की अनुभूति करता है क्योकि उसका संपर्क ब्रह्मांडीय उर्जा तरंगों से होता है | वैज्ञानिक प्रयोग इस सार्वभौम ध्वनि की शक्ति को प्रमाणित करते हैं ,रोगियों के रोग बहुत कम होते पाया गया यद्यपि इनके प्रतिशत भिन्न रहे पर लाभ लगभग सबको होता है |

थोड़ी प्रार्थना और ॐ शब्द के उच्चारण से जानलेवा बीमारी एड्‌स के लक्षणों से राहत मिलती है तथा बांझपन के उपचार में दवा का काम करता है। इसके जप से सभी रोगों में लाभ होता है। अतः ॐ की चमत्कारिक ध्वनि का उच्चारण यदि मनुष्य अटूट श्रद्धा व पूर्ण विश्वास के साथ करे तो अपने लक्ष्य को प्राप्त कर जीवन को सार्थक कर सकता है।इसके जप से दुस्कर्मो और पापों के परिणाम से भी मुक्ति संभव है बशर्ते प्रायश्चित की भावना के साथ शरणागति अपने ईष्ट में आये |नशे से मुक्ति भी ‘ॐ’ के जप से प्राप्त की जा सकती है| 
ऊँ की ध्वनि मानव शरीर के लिये प्रतिकुल सभी ध्वनियों को वातावरण से निष्प्रभावी बना देती है।विभिन्न ग्रहों से आने वाली अत्यंत घातक अल्ट्रावायलेट किरणों का प्रभाव ओम की ध्वनि की गुंज से समाप्त हो जाता है।मतलब बिना किसी विशेष उपाय के भी सिर्फ ओम् के जप से भी अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
ऊँ का उच्चारण करने वाले के शरीर का विद्युत प्रवाह आदर्श स्तर पर पहुंच जाता है। नींद गहरी आने लगती है। साथ ही अनिद्रा की बीमारी से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है।मन शांत होने के साथ ही दिमाग तनाव मुक्त हो जाता है.अनेक बार ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।.अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं। यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है। यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है। इससे पाचन शक्ति तेज़ होती है। .इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है। .थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।.नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी। .कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है। ॐ का उच्चारण करने से से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है। ॐ का उच्चारण करने से विभिन्न अन्तःश्रावी ग्रंथियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उनसे स्रावित होने वाले हारमोंस ,पाचक अथवा नियामक पदार्थों का स्राव नियमित होता है |यह सभी लाभ ॐ की ऊर्जा का ०.००१ % भी नहीं है ,यह वह शक्ति है जो भुक्ति-मुक्ति सब कुछ प्रदान कर सकती है ,इसकी शक्ति-क्षमता की कोई सीमा नहीं ,मनुष्य की कल्पनाओं से भी परे है |
पूर्ण एकाग्रता के साथ ॐ का जप त्रिकाल दर्शिता प्रदान करता है |यह आज्ञाचक्र की शक्ति को इतना बढ़ा देता है की व्यक्ति भूत-भविष्य-वर्त्तमान में झाँक सकता है |यह निर्विकार अथव यह आज्ञाचक्र की शक्ति को इतना बढ़ा देता है की व्यक्ति भूत-भविष्य-वर्त्तमान में झाँक सकता है |यह निर्विकार अथवा साकार ईष्ट का साक्षात्कार कराता है |बिना किसी अन्य मंत्र के केवल ॐ का जप और किसी भी ईष्ट का भाव उस ईष्ट को साधक की और आकर्षित कर साक्षात्कार करा सकता है |यह वह सार्वभौम ऊर्जा है जो सबकुछ करने में सक्षम हैं ।


from Tumblr http://ift.tt/1gm1qBl
via IFTTT

आर्यो को ही हिन्दु सम्बोधित किया जाता है भारतवर्ष मे जो निवास करते थे वे आर्य ही कहलाते हैं ।  आर्य...

आर्यो को ही हिन्दु सम्बोधित किया जाता है
भारतवर्ष मे जो निवास करते थे वे आर्य ही कहलाते हैं । 
आर्य कोई जाती या धर्म नही बल्की आर्यावर्त मे रहने वाले लोगो को कहते थे । हम सब आर्यो की हि सन्तान हैं देखो
वेद के प्रमाण देता हू।
भगवान ने स्वयं वेद में आर्य कौन है
और आर्य बनाने का उपाय प्रश्नोत्तर के रूप मे दे दिया है
“ सम्पूर्ण जगत को आर्य बनाओ ”
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वार्यम ।
अपघ्रन्तो अराव्णः ॥ ऋग्वेद ९/६३/५
अर्थात - हे परम ऐश्वर्ययुक्त आत्मज्ञानी ! तुम आत्म शक्ति का विकास करते हुए गतिशील , प्रमादरहित होकर कृपणता , अदानशीलता , अनुदारता , ईर्ष्या , आदि
का विनाश करते हुए आर्य बनो और सारे संसार को आर्य बनाओ ।
प्रमाण न>२
निरूक्त अ. ६ खण्ड २६ से————————–
आर्य ईश्वरपुत्रः ।
अर्थात आर्य ईश्वर के पुत्र हैं ।
प्रमाण >३
ऋग्वेद से———————————
अहं भूमिमददामार्य । ४।२६।२
अर्थात ईश्वर आदेश करता है कि मै इस भूमि का राज्य आर्यो के लिए प्रदान करता हूं ।
प्रमाण >४
मनुस्मृति से—————————————–
मन्त्र २।१७।२२ का अर्थ
अर्थ है–


from Tumblr http://ift.tt/1S6k7Vj
via IFTTT

केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर के लिए अपने आप को समर्पित करो. जो भगवान का सहारा लेगा, उसे हमेशा भय, चिंता...

केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर के लिए अपने आप को समर्पित करो.
जो भगवान का सहारा लेगा,
उसे हमेशा भय,
चिंता और निराशा से मुक्ति मिलेगी


from Tumblr http://ift.tt/1gm1ocU
via IFTTT

प्रश्न- आनंद में सदा कौन रहता है? उत्तर-जो पुरुष विद्वान, ज्ञानी, धार्मिक, सत्पुरुषों का संगी,...

प्रश्न- आनंद में सदा कौन रहता है?

उत्तर-जो पुरुष विद्वान, ज्ञानी, धार्मिक, सत्पुरुषों का संगी, योगी, पुरुषार्थी, जितेन्द्रिय, सुशील होता है, वही धर्मार्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त होकर इस जन्म और परजन्म में सदा आनंद में रहता है। 
–स्वामी दयानंद सरसवती


from Tumblr http://ift.tt/1S6k9fT
via IFTTT

Monday, July 6, 2015

फिर ऐसा विद्रोह जगा है कि आग ही आग लगा दू मै। कोई तरीका बतलाओ कैसे सोये हिंदू जगा दू मैं || ये...

फिर ऐसा विद्रोह जगा है
कि आग ही आग लगा दू
मै।

कोई तरीका बतलाओ
कैसे सोये हिंदू जगा दू मैं
||

ये परशुराम के वंशज अब,
बकरी का जीवन जीते है।

और राम के वंशज अब
अपमान की मदिरा पीते है |।

भूल चुके है कृष्ण आज के ।
शिशुपाल है चौखट पार कर चुका।

भूल गयी है आज की शबरी
आया कोई राम भूखा |।

फिर से कंस आतंकी है ।
फिर ताड़का हाहाकार मचाऐ ।

और पड़ा चुपचाप है हिन्दू
कुम्भकर्ण सा पाँव फैलाऐ |।

अब नही जन्मते चंद्रगुप्त
अब नही जन्मते पृथ्वीराज

ये वीणा कब से चुप बैठी है।
भूल गये तानसेन भी देना साज

एक बार जो हिंदू जग जाऐ 
हर कदम पे लाश बिछा दू मै।

दुनिया को आग लगा दू मै
बस हिंदू आज जगा लू मै।

दिनेश आर्य

🚩🚩🚩🚩🚩🚩


from Tumblr http://ift.tt/1eyvlVW
via IFTTT

Sunday, July 5, 2015

है,मतमतान्तरों ने ही धर्म की रीढ की हड्डी को तोडा है यज्ञ ईश्वर प्रदत्त एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है...

है,मतमतान्तरों ने ही धर्म की रीढ की हड्डी को तोडा है

यज्ञ ईश्वर प्रदत्त एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जो शरीर मन आत्मा व वातावरण की शुद्धि व ध्यान समाधि में बहुत सहायक है| यज्ञ में डाले पदार्थ कभी नष्ट नहीं होते अपितु अति सूक्ष्मरुपों में परिवर्तित होकर दूर तक वायु को शुद्ध करते हैं और कई प्रकार के रोगों के कीटाणुओं का नाश कर हमारी रक्षा करते हैं |

अष्टांग योग का धैर्यपूर्वक निरन्तर अभ्यास करने से समाधि रुपी फल की प्राप्ति है यही सब वेदों उपनिषदों का सार है |

सब अपनी अपनी डफली बजा रहे हैं-किसकी मानें किसकी न मानें ?

वेद सृष्टि के आदि में ईश्वर द्वारा प्रदत्त विधि विधान है-इसमें सब मनुष्यों के लिये धर्म अधर्म,उचित अनुचित,कर्तव्य अकर्तव्य,भक्ष्य अभक्ष्य,न्याय अन्याय आदि सब आवश्यक बातों पर प्रकाश डाला गया है | यह दुर्भाग्य ही है कि कुछ लोग ईश्वरीय वाणी वेद की उपेक्षा करके अपनेी ही सुविधा व अल्प बुद्धि अनुसार नये नये सिद्धान्त व मत मजहव बना कर उस अनुसार चलने में ही बुद्धिमता समझते हैं |
वेदरुपी संविधान में उस विभु परमेश्वर ने पशुबलि,पाषाण पूजा,मांस भक्षण,अवतारवाद आदि का स्पष्ट निषेध किया है और शुद्ध ज्ञान कर्म उपासना का उपदेश किया है | जो जो मनुष्य व ग्रन्थ इन वेद विरुद्ध बातों का प्रचार करते हैं अथवा वेद मंत्रों के अर्थ का अनर्थ करते हैं ..वे सर्वथा निन्दनीय व दण्ड के पात्र हैं |


from Tumblr http://ift.tt/1Tf4IVh
via IFTTT

सीता की उत्पत्ति - मिथक से सत्य की और  जनक के हल जोतने पर भूमि के अन्दर फाल का टकराना तथा उससे एक...

सीता की उत्पत्ति - मिथक से सत्य की और 

जनक के हल जोतने पर भूमि के अन्दर फाल का टकराना तथा उससे एक कन्या का पैदा होना और फिर उसी का नाम सीता रखना आदि असंभव होने से प्रक्षिप्त है । इस विषय में प्रसिध्द पौराणिक विद्वान स्वामी करपात्री जी ने स्वरचित “रामायण मीमांसा’ में लिखा है - "पुराणकार किसी व्यक्ति का नाम समझाने के लिए कथा गढ़ लेते है। जनक पुत्री सीता के नाम को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने वैदिक सीता ( = हलकृष्ट भूमि) से सम्बन्ध जोड़कर उसका जन्म ही भूमि से हुआ
बता दिया” ( पृ ० 89 ) अथवा यह हो सकता है कि किसी ने कारणवश यह कन्या खेत में फेक दी हो और संयोगवश वह जनक को मिल गई हो अथवा किसी ने ‘खेत में पडी लावारिस कन्या मिली है’ यह कहकर जनक को सौप दी हो फिर उन्होंने उसे पाल लिया हो । महर्षि कण्व को शकुन्तला इसी प्रकार मिली थी। और प्राप्ति के समय पक्षियों द्वारा संरक्षित एवं पालित (न कि प्रसूत) होने से उसका नाम शकुन्तला रख दिया था ।

धरती को फोड़कर निकलने बालों की “उद्भिज्ज” संज्ञा है। तृण, औषधि, तरु, लता आदि उद्भिज्ज कहलाते हैं । मनुष्य, पश्वादि, जरायुज, अण्डज और स्वेदज प्राणियों के अन्तर्गत है । मनुष्य वर्ग में होने के कारण सीता की उत्पत्ति पृथिवी से होना प्रकृति विरुध्द होने से असंभव है।

सीता की उत्पति पृथिवी से कैसे मानी जा सकती है, जबकि बाल्मीकि रामायण में अनेक स्थलों में उसे जनक की आत्मजा एवं औरस पुत्री तथा उर्मिला की सहोदरा कहा गया है - 

वर्धमानां ममात्मजाम् (बाल० 66/15) ; 

जानकात्मजे (युद्ध० 115/18) ; 

जनकात्मजा (रघुवंश 13/78)

महाभारत में लिखा है - 
विदेहराजो जनक: सीता तस्यात्मजा विभो
(3/274/9)

अमरकोश (2/6/27) में 'आत्मज’ शब्द का अर्थ इम प्रकार लिखा है -

आत्मनो देहाज्जातः = आत्मजः अर्थात जो अपने शरीर से पैदा हो, वह आत्मज कहाता है। आत्मा क्षेत्र (स्त्री) का पर्यायवाची है ; क्षेत्र और शरीर पर्यायवाची है। 

क्षीयते अनेन क्षेत्रम 

स्त्री को क्षेत्र इसलिए कहते हैं की वह संतान को जनने से क्षीण हो जाती है। पुरुष बीजरूप होने से क्षीण नहीं होता । 

रघुवंश सर्ग 5, श्लोक 36 में लिखा है -

ब्राह्मे मुहूर्ते किल तस्य देबी कुमारकल्पं सुषुवे कुमारम् ।
अत: पिता ब्रह्मण एव नाम्ना तमात्मजन्मानमजं चकार ।।

महामना पं ० मदनमोहन मालवीय की प्रेरणा से संवत 2000 में विक्रमद्विसहस्राब्दी के अवसर पर संस्थापित अखिल भारतीय विक्रम परिषद द्वारा नियुक्त कालिदास ग्रंथावली के संपादक मण्डल के प्रमुख साहित्याचार्य पं ० सीताराम
चतुर्वेदी ने उक्त श्लोक में आये “आत्मजन्मान्म” का अर्थ रघु की रानी की कोख से जन्मा किया हैं । तव जनक की 'आत्मजा’ का अर्थ पृथिवी से उत्पन्न कैसे हो सकता है ? ब्रह्म मुहुर्त में जन्य लेने के कारण रघु ने अपने पुत्र का नाम अज
(अज ब्रह्मा का पर्यायवाची है, क्योंकि ब्रह्मा का भी जन्म नहीं होता) रखा। अज का अर्थ जन्म न लेने वाला होता है। कोई मूर्ख ही कह सकता है कि अज का यह नाम इसलिए रखा गया था, क्योंकि वह पैदा नहीं हुआ था।
आत्मज या आत्मजा उसी को कह सकते हैं जो स्त्री - पुरुष के रज-वीर्य से स्त्री के गर्म से उत्पन्न हो, इसमें सामवेद ब्राह्मण प्रमाण है-

अंगदङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायते ……. आत्मासि पुत्र। 
(1.5.17)

है पुत्र ! तू अंग-अंग से उत्पन्न हुए मेरे वीर्य से और हदय से पैदा हुआ है, इसीलिए तू मेरा आत्मा है । खेत से उत्पन्न होने से तो तृण, औषधि, वनस्पति, वृक्ष, लता आदि सभी आत्मज और आत्मजा हो जाएँगे और बाप-दादा की सम्पत्ति में भागीदार हो जाएंगे। 

'जनी प्रादुर्भावे’ से जननी शब्द निष्पन्न होता है। इससे जन्म देने वाली को ही जननी कहते है। पालन-पोषण करने वाली यशोदा माता कहलाती थीं, परन्तु जन्म न देने के कारण जननी देवकी ही कहलाती थी। बनवास काल में अत्रि मुनि
के आश्रम में अनसूया से हुई बातचीत में सीता ने कहा था -

पाणिप्रदानकाले च यत्पुरा तवाग्निसन्निधौ।
अनुशिष्टं जनन्या में वाक्यं तदपि में घृतम् ।।
अयो० 118/8-9

विवाह के समय मेरी जननी ने अग्नि के सामने मुझे जो उपदेश दिया था, उसे मैं किंचित भूली नहीं हूँ । उन उपदेशों को मैंने हृदयंगम किया है ।

क्या यहाँ विवाह के समय उपदेश देने वाली यह 'जननी’ पृथिवी हो सकती है ? और क्या बेटी को विदा करते समय बिलख बिलख कर रोने वाली पृथिवी थी ? यहाँ माता को ही जननी कहकर स्मरण किया है, पृथिवी को जननी नहीं कहा।

तुलसीदास जी ने तो माता = जननी का नाम भी इस चौपाई
में लिख दिया है :-

जनक वाम दिसि सोह सुनयना ।
हिमगिरि संग बनी जिमि मैना ।।
(रामचरितमानस बालकाण्ड 356/2)

(विवाह वेदी पर) सुनयना (महारानी) महाराजा जनक की बाई और ऐसी शोभायमान थी, मानो हिमाचल के साथ मैना (पार्वती की माता) विराजमान हो। 

पाणिग्रहण संस्कार के समय जिस प्रकार रामचन्द्र जी की पीढियों का वर्णन किया गया था उसी प्रकार सीता की भी 22 पीढियों का वर्णन किया गया। यदि सीता की उत्पत्ति पृथिवी ये हुई होती तो पृथ्वी से पहले की पीढ़िया कैसे बनती ? इसे शाखोच्चार कहते है । राजस्थान में विवाह के अवसर पर दोनो पक्षों के पुरोहित आज भी 22 के ही नहीं, 30-40 पीढ़ियों तक के नामो का उल्लेख करते हैं । साधारणतया सौ वर्ष में चार पुरुष समझे जा सकते हैं। इस प्रकार 40 पीढियों में लगभग एक हजार वर्ष बनते है। अर्थात् सर्वसाधारण लोग भी मुहांमुही सैकडों वर्षो के पारिवारिक इतिहास का ज्ञान रख सकते थे। जिसका 22 पीढ़ियों का क्रमिक इतिहास ज्ञात है उसे कीड़े-मकौडों या पेड़-पौधों की तरह पृथिवी से उत्पन्न हुआ नहीं माना जा सकता। वस्तुतस्तु सीता के पृथिवी से उत्पन्न होने
सम्बन्धी गप्प का स्रोत विष्णु पुराण, अंश 4, अध्याय 4, वाक्य 27-28 है जिसका वाल्मीकि रामायण में प्रक्षेप कर दिया गया है। जन्म को पृथ्वी से मानकर सीता का अंत भी पृथ्वी में समाने की कल्पना करके ही किया गया है ।

अयोनिजा - सीता को अनेक स्थलों में अयोनिजा कहा गया है । पृथिवी से उत्पन्न होने का अर्थ माता-पिता के बिना अर्थात स्त्री-पुरुष के संयोग के बिना उत्पन्न होना है। इसी को अयोनिज सृष्टि कहते है, क्योंकि इसमें गर्भाशय से
बाहर निकलने में योनि नामक मार्ग का प्रयोग नहीं होता । सृष्टि के आदि काल में समस्त सृष्टि अमैथुनी होती हैं - 

अमैथुनी सृष्टि से सम्बंधित पोस्ट का लिंक - यहाँ से पढ़े 

http://ift.tt/1ffo9yJ

यहाँ यह तथ्य जरूर जोड़ा जाता है की सृष्टि चाहे मैथुनी हो अथवा अमैथुनी - प्राणियों के शरीरो की रचना परमेश्वर सदा माता पिता के संयोग से ही करता है। पर दोनों में अंतर केवल इतना है की आदि सृष्टि में माता (जननी) पृथ्वी होती है और वीर्य संस्थापक सूर्य (ऋग्वेद 1.164.3) में कहा है -

“द्यौर्मे पिता जनिता माता पृथ्वी महीयम”

अर्थात सृष्टि के आदि काल में प्राणियों के शरीरो का उत्पादक पिता रूप में सूर्य था और माता रूप में यह पृथ्वी। परमात्मा ने सूर्य और पृथ्वी - दोनों के रज वीर्य के संमिश्रण से प्राणियों के शरीरो को बनाया। जैसे इस समय बालक माता के गर्भ में जरायु में पड़ा माता के शरीर में रस लेकर बनता और विकसित होता है, वैसे ही आदि सृष्टि में पृथ्वी रुपी माता के गर्भ में बनता रहता है। इसी शरीर को साँचा रुपी शरीर भी कहा जाता है जिससे हमारे जैसे मैथुनी मनुष्य उत्पन्न होते रहते हैं। 

सीता का जन्म सृष्टिक्रम चालु होने और साँचे तैयार होने के बाद त्रेता युग में हुआ था, अतः सीता के अयोनिजा होने का प्रश्न ही नहीं उठता। जनक उनके पिता थे और रामचरितमानस के अनुसार सुनयना उनकी माता का नाम था। 

मेरी सभी बंधुओ से विनती है, कृपया लोकरीति, मिथक, दंतकथाओं आदि पर आंखमूंदकर विश्वास करने से अच्छा है - खुद अपनी धार्मिक पुस्तको और सत्य इतिहास को पढ़ कर बुद्धि को स्वयं जागृत करते हुए दूसरे हिन्दू भाइयो को भी जगाये - ताकि कोई विधर्मी हमारे सत्य इतिहास और महापुरषो महा विदुषियों पर दोषारोपण न कर सके 

आओ लौटे ज्ञान और विज्ञानं की और -

आओ लौट चले वेदो की और 

नमस्ते


from Tumblr http://ift.tt/1M5vPhj
via IFTTT

मित्रो !विचार करो हमारे लिए व्यक्ति महत्वपूर्ण है या विचार ?व्यक्ति पूजा से ऊपर उठ कर विचारों के...

मित्रो !विचार करो हमारे लिए व्यक्ति महत्वपूर्ण है या विचार ?व्यक्ति पूजा से ऊपर उठ कर विचारों के प्रति श्रद्धा रखो |व्यक्ति [गुरु ,अवतार आदि ]से जुड़ने वाले उनकी अच्छाई /बुराई सबको स्वीकार लेते हैं ,जबकि विचारों से जुड़ने वाले अच्छे विचार दूसरों से भी ले लेते हैं और बुराई चाहे अपनों की भी हों उससे भी बचे रहते हैं |वे जानते हैं–“शत्रोरपि गुणावाचा दोषावाचा गुरोरपि ’‘अर्थात सद्गुण शत्रु के और दोष गुरु के भी हैं तो खुले मन से स्वीकार करो ,यही गुणग्राहकताहै यही मानवता है |धन्यवाद ||


from Tumblr http://ift.tt/1M5vP0X
via IFTTT

😶 “ पृथिवी-धारक। ” 🌞 ओ३म् सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथिवीं धारयन्ति...

😶 “ पृथिवी-धारक। ” 🌞

ओ३म् सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथिवीं धारयन्ति ।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरूं लोकं पृथिवी न:कृणोतु।।  
अथर्व० १२। १ । १ 
ऋषि:- अथर्वा । । देवता-भूमि: ।। छन्द:-त्रिष्टुप् ।।

शब्दार्थ :- महान् सत्य, कठोर सत्याचरण, व्रतग्रहण, कष्टसहन, अनुभव-ज्ञान, नि:स्वार्थ कर्म-ये छह गुण पृथिवी को धारण कर रहे हैं। भूत और भव्य की रक्षा करनेवाली वह हमारे लिए विस्तृत लोक को, विशाल क्षेत्र को करे।

विनय :- हे प्रभो !
जिस भूमि पर हम रहते हैं वह भूमि हमें उन्नत करें, हमें विशाल बनाये। हम इसे धारण करने का पूरा यत्न कर रहे हैं। जब कभी हम मोहवश यह समझ लेते हैं कि कूटनीति अर्थात झूठ, कपट, चालाकी आदि से अपने देश, राष्ट्र व मातृभूमि की धारणा होगी तब हम भूले होते हैं। पृथिवी को धारण करनेवाले जो आवश्यक गुण हैं, उनमें तो सबसे पहला सत्य है। वह महान् सत्य, जिससे विश्व ब्रह्माञ्ड स्थित है, हमारी भूमि को भी वही धारण किये हुए है और केवल सत्य का ज्ञान ही नहीं, किन्तु उसका आचरण राष्ट्र को स्थिर रखता है। हमें कठोरता के साथ, तेजस्विता के साथ, पूरा-पूरा सत्याचरण करना चाहिए। भूमि को कोई राजा, शासन या प्रजा नहीं धारण करते, किन्तु वहाँ के वासियों में स्थित ये छह गुण ही एकमात्र भूमि के धारण करनेवाले होते हैं। यह जानकार इन गुणों को हम अपने में लाने का पूरा यत्न करते हुए ही यह प्रार्थना करते हैं कि हमारी प्यारी मातृभूमि हमें विस्तृत और विशाल बनाये। हम इन गुणों की साधना द्वारा अपनी मातृभूमि को धारण करें और यह भूमि हमारे भूत और भव्य की रक्षा करनेवाली होकर हमें उन्नत करे। राष्ट्र का व्यक्ति मातृभूमि के जीवन और मरण के साथ ही जीता या मरता है।मातृभूमि की अनन्यभाव से उपासना मनुष्य को कितनी विस्तृत आयु (जीवन) प्रदान कर देती है! तब मनुष्य क्षुद्र बातों से कितना ऊँचा हो जाता है।
आओ, हम आज से उन सत्य आदि महान् गुणों को अपने में धारण करते हुए अपनी मातृभूमि की सच्ची पूजा किया करें , जिससे यह भगवती मातृभूमि हमारे भूत के दृढ़ चट्टान पर हमारे उज्जवल भव्य की रचना को सुरक्षित करती हुई, हमारे लिए उतने विशाल क्षेत्र को खोल दे-उस भूत और भव्य को व्याप्त कर लेनेवाले विस्तृत लोक को हमारा बना दे।

ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे

 वैदिक विनय से 


from Tumblr http://ift.tt/1M5tpzo
via IFTTT

🌞 ओ३म् 🌞  नमस्ते जी, सुप्रभातम्  वेदामृतम् विभूतिरस्तु सूनृता ।(ऋग्वेद १/३०/५) हमारा ऐश्वर्य ,...

🌞 ओ३म् 🌞
 नमस्ते जी, सुप्रभातम् 

वेदामृतम्

विभूतिरस्तु सूनृता ।(ऋग्वेद १/३०/५)

हमारा ऐश्वर्य , संपत्ति मीठी हो ।

हमें ऐश्वर्य की प्राप्ति, उपयोग तथा उपभोग इस प्रकार करना चाहिए जिससे वह किसी के दु:ख का हेतु न बने ।
 सुभाषितम् 

॥ मानसिक तप ॥
मन:प्रसाद: सोम्यत्वं, मौनमात्मविनिग्रह : । भावसंशुद्धिरित्येतत् , तपो मानसमुच्यते ॥
(महाभारत भीष्मपर्व ४१/१६)

मन की प्रसन्नता, शान्तस्वभाव, उत्तम चिन्तन -मनन, मन को वश में रखना और विचारों की पवित्रता, यह सब मानसिक तप कहा जाता है ।


from Tumblr http://ift.tt/1LRyIoU
via IFTTT

 जीवन मंत्र  १) धीरे बोलिये  शांति मिलेगी २) अहम छोडिये  बड़े बनेंगे ३) भक्ति कीजिए  मुक्ति मिलेगी ४)...

 जीवन मंत्र 
१) धीरे बोलिये  शांति मिलेगी
२) अहम छोडिये  बड़े बनेंगे
३) भक्ति कीजिए  मुक्ति मिलेगी
४) विचार कीजिए  ज्ञान मिलेगा
५) सेवा कीजिए  शक्ति मिलेगी
६) सहन कीजिए  देवत्व मिलेगा
७) संतोषी बनिए  सुख मिलेगा. "इतना छोटा कद रखिए कि सभी आपके साथ बैठ सकें और इतना बडा मन रखिए कि जब आप खडे हो जाऐं तो कोई बैठा न रह सके" 


from Tumblr http://ift.tt/1M5tnaw
via IFTTT

33 करोड़ देवों का भ्रम तोड़िए, वैदिक परिभाषा को शेयर कीजिए -  जनक के दरबार में देवों की संख्या पर...

33 करोड़ देवों का भ्रम तोड़िए, वैदिक परिभाषा को शेयर कीजिए


जनक के दरबार में देवों की संख्या पर चर्चा हुई. विदग्ध मुनि ने याज्ञवल्क्य से पूछा- शास्त्र कहते हैं जो देता है वह देवता है. दिव्य शक्तियों से युक्त सभी जड़ और चेतन भी देव हैं. सूर्य, चंद्र, नक्षत्र से लेकर माता-पिता, गुरू, आचार्य और अतिथि को भी देव कहा जाता है. तो देवता हैं कितने? उनकी कोटि कितनी है?

याज्ञवल्क्य बोले- आठ वसु, 12 आदित्य, 11 रूद्र, इंद्र व प्रजापति. वेदों में इन्हीं 33 कोटि के जड़-चेतन देवताओं के बारे में कहा गया हैं.

-अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, द्युलोक, चंद्रमा और नक्षत्र- ये आठ वसु हैं.

-दस प्राण व 11वीं आत्मा- ये ही एकादश रूद्र हैं. इनके शरीर त्यागने पर शरीर व्यर्थ हो जाता है, बंधु-बांधव रोने लगते हैं.अतः इन्हें रूद्र(रोने वाला) कहा जाता है.

– साल के 12 मास ही बारह आदित्य हैं. ये मास मनुष्य की आयु कम करते हैं अतः आदित्य कहे गए हैं.

-गर्जना करने वाला बादल ही इंद्र है. अतः इंद्र को वर्षा का देवता कहा जाने लगा.

-यज्ञ को ही प्रजापति समझना चाहिए.

याज्ञवल्क्य ने आगे बताया- देवताओं की संख्या अन्य प्रकार से भी बताई गई है.

-अग्नि, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, पृथ्वी और द्युलोक को षट्देव कहा गया है.
-अन्न और प्राण दो देवता कहे गए हैं.
-प्राण रूपी परमात्मा को एकमात्र देव या परमदेव कहा जाना चाहिए.

याज्ञवल्क्य ने देवों की संख्या की वेद आधारित सरल व्याख्या की तो जनक सभा में मौजूद सभी विद्वानों से इसे स्वीकारा.

33 कोटि के देवताओं के बारे में यही सबसे प्रमाणिक व्याख्या है. कोटि के दो अर्थ होते हैं- वर्ग और करोड़. इसलिए देवताओं की 33 कोटि या प्रकार है न कि 33 करोड़ की संख्या.
(प्रश्न उपनिषद से)


from Tumblr http://ift.tt/1LRyIoS
via IFTTT

साम वन्दना सौ वर्ष जियें या अधिक जियें ओम तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताचछुक्रमुच्चरत ! पश्येम...

साम वन्दना
सौ वर्ष जियें या अधिक जियें
ओम तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताचछुक्रमुच्चरत ! पश्येम शरदः
शतं…
जीवेम शरदः शतं श्रणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः
शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात !!
(यजु. ३६.८,१०,१२,१७,२४)
प्रभु सूर्य और उसकी संसृति, कर दर्श पर्श
तल्लीन जिएं !
सौ वर्ष जिएँ या अधिक जिए, पर होकर के स्वाधीन
जिएँ !!
उदय हो रहा प्राज्ञ दिशा में
पहले से ही पूर्व दिशा में !
दी द्रष्टि इसी रवि ने सबको
द्रश्य दीखते निशा उषा में !
हे ईश सूर्य भव विश्व पूर्य, हम होकर के भय
हीन जिएँ !
सौ वर्ष जिएँ या अधिक जिएँ, पर होकर के स्वाधीन
जिएँ !!
प्रभु सूर्य विश्व प्रिय मनभावन
सौ वर्ष तक देखें पावन !
सौ वर्ष तक इनको जी लें
सौ वर्ष सुनें श्रुति का गायन !
सौ वर्ष बोल व्याख्यान करें, गुण गान ईश लबलीन
जिएँ !
सौ वर्ष जिएँ या अधिक जिएँ, पर होकर के स्वाधीन
जिएँ !!
हों नहीं दीन सौ वर्षों में
या अधिक आयु आकर्षों में !
उत्कर्ष हर्ष के साथ जिएँ
कर विजय सभी संघर्षो में !
हम जितना भी जीवन पायें , प्रभु से कर
हृदय विलीन जिएँ !
सौ वर्ष जिएँ या अधिक जिएँ , पर होकर के स्वाधीन
जिएँ !!


from Tumblr http://ift.tt/1CjN7HG
via IFTTT

Europe

quora.com

view original (slow to load)

Google detected you’re on a slow connection and optimized this page to use 80% less data  Learn more

Whats the most inexpensive way to travel across Europe if going from India?

Also please suggest when to travel, how to travel and where to stay

Also please suggest when to travel, how to travel and where to stay

Re-AskFollow478

Comments1

20 ANSWERS478 FOLLOWERS

188,824 VIEWS

EDITS

Arvind Bhatt, Nomad… Travel gives you answers

1. Travel before you are 26. Most places have student discounts, and train tickets are cheaper for 60 age group

2. If you get a eurail pass, have a friend with you. You get a 15% discount on eurail, AND 20% discount when you travel between Oct begin to March end. On the contrary to what people say, even though eurail is expensive, it gives you flexibility like no other. You can just hop into a train and travel. Yes few trains have reservations, but that takes 2 min to make, at the station vending machine. Ranges from 5-12euros.

2a. Eurail gives free ferries, bus rides etc. And a Firstclass ticket entitles you to lounges in Germany, Austria, Switzerland. Where you can take rest, have some food for free! and Internet access.

2b. Get the eurail 24 country pass, its slightly expensive than a 5 country pass but worth the extra charge. I was on a budget trip, and got it. ~600eur. Looks expensive, but with the convenience and flexibility, nothing can beat it. I spent 3 nights on trains travelling to and fro, instead of booking a hostel, just because I had the pass, and saved on the accommodation. Small things addup. And its fun!

2c. Golden Pass - Switzerland. One of the most beautiful picturisque routes -  2nd class ticket=79Eur, Ist Class=120 Eur. Eurail = Free.

2d. Eurail does not include city transport. Except in Germany and Austria where you can use only the s-bahn.

3. Euro-lines and flixbus.de are good bus operators. Check them out, prices workout reasonably well.

4. Hostelworld, Hostel bookers have hostels ranging from 12euro onwards per night. They are quite good for backpackers and super safe. Book a hostel nearby a railway station/old town. That way you save a lot of effort walking or travelling to there.

5. Avoid food at restaurants, eat at a take away, or buy supermarket food, and don’t buy water. Potable water is abundant everywhere.

5a. Have multiple small meals, instead of a large meal. Saves money and gives energy for walkathlons in the beautiful alleys.

5b. Eat lots of Gelato. Don’t repeat flavors.

6. Travel on night trains, it amounts to a little discomfort, but you save on a night’s accommodation.

7. Use lockers in railway stations. They are cheaper than having to get a hostel/hotel in-case you don’t need accommodation but just want to dump your bags.

8. Flight: Like, Diniel Patel said, Oman air is super reasonable, at 38-41K INR(~515eur) to Frankfurt, and is a rightly placed locale to start your journey. Their services are good too.

9. Don’t waste time in queues in Rome/Vatican/Florence/Paris. Book online. Although it costs some money, it saves a lot of time.
Update:
Vatican:  Musei Vaticani - Sito ufficiale    Book online here
Rome: Buy Rome Pass for direct entry to colloseum
Florence: David Museum Accademia Gallery
Florence Duomo: Buy it in the nearby shop. Go early in the morning
Paris: Eiffel Page on www.toureiffel.paris
Louvre museum: Louvre Museum Official Website
 
10. Have easy Sundays. Most businesses are closed on Sundays.

11. Get the book “Europe on a Shoestring”

12. The best and beautiful parts of Europe are free to see. The second best costs :-) Its a personal experience.

13. French trains are super expensive. Swiss>Austria>Netherlands>Germany>Italy>Slovenia>Czec Republic in that order.

14. Install the eurail app on your smartfone. Its useful to show train connections and timings. It works offline without a data connection.

15. ASK for student offers or discounts. Sweet talk. It works 

16. Barge into Mc.D and Starbucks. They have Internet. Get a coffee/burger/muffin. Dont freeload.

17. Some Museums have free entries on some days of a month. Find out. It will be very crowded though.

18. Low cost flights - Ryan Air, Easyjet. cheap, but there is a catch. They donot operate in the main airports, and you might have to take a taxi. That costs. Ryan Air charges money for a checkin baggage. Say, you have a swissknife in your backpack, you have no option but to checkin. There are hidden costs that way.

19. Use discover how to get anywhere[Rome 2 rio dot com] no spaces.
One beautiful website which can help you plan things a breeze. The prices mentioned there are a reference. They might not be exact. It just gives you an idea.

20. ALL trains are on time. So not much need to factor in a lot of buffer time. 

Note: There might be train strikes, but very very rare, happens mostly in Italy. So factor in that one.

21. Buy a city card, like Paris Viste, Roma Pass, Salzburg Card etc. Its worth in some places, and not worth in other. Most city card gives free public transport in the city.

22. Goto the countryside Europe. The best part of Europe lies there. Yeah don’t miss the old town parts of a city. Its quite an experience walking in the narrow alleys.

23. Museums: If you aren’t an ardent art lover, or a historian, limit your museum visits. Saves time and money.

24. Travel light. Use laundry services in cities, where you pay about 3-5 eur and get all your clothes washed and dried.

25. Carry a spoon, fork and knife. A bottle of getarode, an apple, and a pack of chips is sometimes all you need for a meal.

26. If your hostel serves breakfast for a fee, take it, and stuff yourself in the morning.

27. Most restrooms (WC) are paid. 50cents to 1Euro. Use ones in trains. Or sometimes pay. They are shiny and clean though.

28. Travel through the night, walk during the day, chillout in the evenings.

29. When to travel: Just before the season begins. cusp. Things are cheaper, less crowded, and beautiful weather.

30. Carry an Umbrella

31. Drink. Beer is insanely cheap than water. Vodka with Redbull is cheaper than Redbull. Behave responsibly though.

32. Use blah blah cars. Its car pooling, and works out very cheap. Also you get to interact with the locals.

33. Get advice of locals. No one knows places better than them.

34. Don’t invade privacy. If you want to take someone’s picture, ask. Its rude not to ask before clicking.

35. Dress well. Look like a true backpacker. Don’t be shabby and smelly. Europeans don’t like that. Also, be gentle, greet in the local language, and use generous helpings of  thank you and welcome. People appreciate that.

36. Help the elderly to get into the trains/buses etc. Its a courtesy, and you get good advice. :-)

37. Register to Buy Overseas Pay Less[backpackbang dot com] you can get some stuff while returning and they pay you.  

This much for now. I’ll update if more things crop up :-)
have a great trip.!


Updates:
38. The Julian Alps regions of Slovenia, have relatively less tourists, and unexplored. So are the Tatra mountains.

39. Poland just joined the Eurail. So that’s more power for the pass

40. Eastern Europe: Poland, Slovakia, Slovenia, Hungary, Bulgaria, Romania, Croatia, Montenegro, Bosnia etc are relatively inexpensive. The erstwhile Soviet region and Yugoslavian Slavic region are treasure troves.

41. Certain small towns like Colmar are very beautiful. (Colmar lies in eastern border of France towards Germany.

42. Find a friend in Europe and drop your baggage there. Start your backpack from that place. Saves time and effort.

43. Lot of people in Europe are very curious about India. Spread some good aura :-)

44. Get a multicurrency forex card. Use less cash. e-payments are abundant except for street shops. 

45. Appreciate street musicians. They play for joy, and play lovely, not money. Pay them a dime.

46. Attend symphonies. The ensemble is a treat to watch. They play in national theaters / concert halls. Schedules can be obtained from tourist offices. Prices vary from 5-20 Eur

47. Don’t waste time indoors. Spend less on accommodation. 

48. Farm stays are popular in Austria/Germany or any alpine regions. Live there, play with the cows, dogs and horses and pluck berries. little joys.

49. ICELAND! mmm! I need a new post for that!


50. Take river cruises. Generally city travel passes include a free or discounted river cruise. Its fun. Try the evening cruise, Lights turn on.

67,810 views • 1,793 upvotes • Updated 23 Sep, 2014

Upvote1.7k

Downvote

Comments27+

RELATED QUESTIONS

What is the cheapest way to travel from India to Europe?

What should I do to travel Europe from India at lowest cost?

How can I travel abroad to Europe most inexpensively?

What’s the most inexpensive way to travel across the USA if one is going from India?

What is the most inexpensive way to travel to the USA from India?

What are some routes to travel from India to Europe by road?

What are the cheap ways to travel across Europe?

Visiting and Travel in Europe: What is the cheapest way to get from Aveyron, France to Salzburg?

Visiting and Travel: What is the process to apply for a visa for the Bahamas from India?

What is the cheapest way to call India and USA for a Indian traveller in Europe?

What is it like to travel from India to Europe in your own car?

What is the cheapest way to travel from country to country in Europe?

What jobs would allow a person to travel across Europe, with most living expenses paid by the company? How so?

Visiting and Travel in Europe: What is the best way to get to Amsterdam from Stuttgart?

Travel Planning: Is it better to opt for a package tour from MakeMyTrip / Thomas Cook etc., or to book out own tickets and hotels for a week long trip in Europe from India?

OTHER ANSWERS

Geetanjali Tyagi Garg, co-founder @ http://www.tripfeet.com

I’ve been to Europe twice in the last two years and always on a budget. 

From my experience, the cheapest city to enter Europe from India is Prague. You can use Aeroflot ~37 - 40K. Even a multi-destination air ticket should fit into that with +/- 10%. You’ll have to try different variations.For accommodation, you can try alternative accommodation like a b&b or apartment instead of a hotel. You can try Airbnb - Vacation rentals, private rooms, sublets by the night - Accommodations on Airbnb. I’ve personally used it and my experience was quite good. The advantage of taking an apartment is that you get access to a kitchen which can be very useful. Also,take a youth hostel membership in India, it is dirt cheap and can be used internationally. It can come very handy if you need to stay in a youth hostel.Within Europe, I would recommend travelling by train unless the journey is more than 6 hours. All of Europe is very well connected by train. To save money on trains, book in advance (40-50 days) you get excellent discounts in a lot of countries like Italy, Germany and France. For example, you can get a 39 Euros ticket for 9 Euros! Don’t buy a Eurail pass. It is expensive and in many countries (Spain, Italy, France) you need to pay a surcharge on many trains. Also, don’t buy tickets on RailEurope, they are very expensive. Use the official train sites of the countries where possible. If you have to take a flight you can try a low cost airline like Ryanair.On when to travel, spring and summer are the most pleasant seasons to visit (April - September). This however will vary a bit from country to country. If you’re into skiing and winter sports you can visit from November - March as well.To get started, you can see a few itineraries for Europe here: Featured Trip Plans - All. You can compare different travel options (flights, trains etc.) and see the approx. cost of your trip as you build it.If you have any questions, I’d be happy to help!

99,395 views • 2,288 upvotes • Updated 28 May, 2013

Upvote2.2k

Downvote

Comments21+

Vikas Prakash Singh, Exchange Student, Jan-April ‘14

I was an Exchange Student at a Business School in France for a period of four months (Jan-April 2014), below is my experience, after more than 24,900 Kilometers of train travel in 14 Countries, 29 Cities in a span of 3 months(Duration of my rail pass).
 
1. Book flight tickets by yourself (online). You will mostly get a better deal and also you won’t have to shell out extra and depend on the agent for rescheduling. I booked Saudi Airlines and the fare was around INR 44,000 (Roundtrip)
 
2. Get a Eurail Pass before you leave India, as train travel is a costly affair, considering the high exchange rate.

3. Plan properly as to which EuRail pass suits you best, depending on your duration of stay and your total projected expenses. No pass is too much for a Euro Trip! Get you pass insured as well.
 
4. Pack things according to what you don’t get there, what’s very expensive and what is easily available….in that order!
 
5. Have a basic awareness about Europe as a whole and a few countries in particular by going through sources such as Wikipedia, Wikitravel. It will help you understand and appreciate the region in a better manner
 
6. Learn some basic and easy cooking recipes as you will find kitchens in almost every hostel, where you can cook for yourself.

7. It is advisable to get a backpack, regular bags are not ample in size. Europe requires a lot of walking which means other types of luggage will be uncomfortable
 
8. If you smoke, get as much cigarettes as allowed (and don’t forget to ration). It’s pretty expensive here, probably due to very high taxes

9. Look for big supermarkets for regular purchase of grocery, beers etc. The bigger, the cheaper. There is no concept of MRP in Europe

10. Various free tours are offered in almost all major cities across Europe, look for the best one in a particular city.Sandemans New Europe tours (Home of the Famous Free Tour) are generally the best whichever city they have presence in. Do not forget to tip the tour guide towards the end (refer TripAdvisor for other such tours)
 
11. Refer to ‘Things to Do’ section onTripAdvisor to have an idea about activities on offer in a city
 
12. Refer to Wikitravel pages of the cities you are planning to visit, particularly the ‘Stay Safe’ and ‘Things to Do’ section. ‘Stay Safe’ will provide you with info about unsafe neighbourhoods as well as about regular scams

13. Staying in hostels is both cheapest as well as one of the best options. They are basically dormitories with a common washroom, kitchen, dining area etc. They are generally safe and one gets to interact with a lot of backpackers.
 
14. While choosing hostel, assess a hostel by assigning weights to factors such as proximity from Train Station, rating at HostelWorld (with no. of reviews), proximity from major tourist attractions (mostly old towns of the corresponding city), and obviously price. A good selection will save you on a lot of travel time as well as city public transport passes
 
15. Use HostelWorld (Online Hostel Bookings, Ratings and Reviews) for booking hostel. It is advisable to pre book as there have been instances of hostels being full. You wouldn’t want to roam around on the streets of a completely new city at midnight[TrueStory]! You may also use Airbnb but I felt that its good only if you are travelling in a group.

16. Ask the person at Hostel Reception for the best (and inexpensive) restaurants, tours etc. They generally provide an honest recommendation
 
17. Cost of travelling (Rough estimate. Among the 14 countries I visited): Switzerland>France>Germany>Austria>Spain>Italy>Portugal………Slovakia>Czech Republic>Poland>Hungary
 
18. Don’t hesitate to ask for directions from Police. They are mostly helpful and will be more than happy to help (Except in Amsterdam, where they will give you wrong directions and may even ask you to spill you beer [TrueStory]!)
 
19. Take very good care of your belongings, particularly your Rail Pass and Passport. Don’t be overconfident about your smartness, I know a lot of victims and the number is huge! One bad experience can spoil the trip!
 
20. Visit Czech Republic and Hungary in the middle of the exchange term, you will be delighted to see the Purchasing power of Euro (in local currency)!
 
21. Use Rail Planner app for finding connections. Its offline, hence can be used on the go. Also, it contains an option to look for only non-reservation trains (as far as I know, the app is not available for windows phone!)
 
22. You may also use Eurorail Website (Travel Europe with the Eurail train pass) for train information as a few trains in Spain were not visible on app (while we were travelling)
 
23. The EuRail Pass is also valid for Public Transport (mostly limited to sub-urban trains) in some cities, such as Berlin (S-Bahn), Vienna, Lisbon etc. (refer Travel Europe with the Eurail train pass)
 
24. Adventure activities (such as skydiving) have huge price differences at various locations, plan accordingly
 
25. Plan trips to expensive locations such as Switzerland, Monaco etc. in such a way that you have to stay there for least number of nights
 
26. Use non-reservation night trains as much as you can, it will help u save time wasted in travelling as well as cost of a night stay


27. Save beforehand, a part of the city map which may help you reach your booked hostel from the train station. Do not always rely on people or wifi hotspots
 
28. Go through the Directions section of the Hostel (at HostelWorld) once you have booked it

29. Do not stay at train stations during the night. One, it gets really cold. Two, its get pretty unsafe at some of the major stations. (The waiting rooms at almost all the stations close by midnight)
 
30. Watch out for international 'once-in-a-year’ events such Expos, Mobile Conferences, Motor Shows happening somewhere in Europe during that period
 
31. Get a toggle SIM (toggle mobile) if you are planning to travel a lot. It provides very cheap rates to India in 7-8 countries and free incoming while roaming in more than 20 countries. It will help you stay connected wherever you are. It is advisable to get a dual SIM phone if you are planning on using data on the go, as toggle data rates are pretty expensive
 
32. Ask for a chip based card (which also requires PIN for authorization), when you get a Travel Card from the your bank in India. Firstly, it will ensure a seamless transaction at various outlets. Secondly, It provides safety in case the card gets stolen
 
33. While in non-euro countries, be careful where you exchange your currency. Looks for the rates at several places before deciding. A crude way is to see the difference between the Buy/Sell price, it should roughly be less than 10% (the spread should be small). Hostel receptionists are generally aware of the good places
 
34. Keep your EuroRail pass away from cash (at a different place). In case you get mugged, the pass might not be of any use to someone else but it will definitely cost you a lot
 
35. Remember, if its too good to be true, its actually not true. Be careful!
 
Bon Voyage!

4,341 views • 57 upvotes • Written 26 Sep, 2014

Upvote57

Downvote

Comment

Aayush Dubey, Quora कागज था, ये मन मेरा..

The cheapest way to travel to Europe ( including London/UK) would be to:

Book a cheapest return flight to London heathrow. Heathrow is the most convenient gateway to Europe for Indians as it is in an English speaking country. Besides that it has access to a must visit beautiful city London. As Heathrow is located in West London, you get Indian food easily and the advantage of London transport which is one of the best in the world.Cheapest accomodation near heathrow will cost you anything between £30 £50 ( Holiday Inn/Travelodge/ETAP etc).To save on the travel cost in central london you can use day anytime (£17.00) or day off peak ( £8.90) travel card. You can plan visiting tourist places of your choice by using public transport ( included in your travel card). Buses would be more suitable within the city as you get to see the city and while making your journey to/from heathrow ( or your hotel). You can take the advantage of Page on londonandpartners.com map.As Windsor is near to Heathrow, you can take City Sightseeing Windsor tour. Castle ticket price is £17 which i won’t suggest for tourists on tight budget.London has lot of tourist spots ( specially museums) that are free to visit and more information could be found at Free things to see and do in LondonSince there are a lot of Indians in the UK ( specially London), you can take Europe coach tours likehttp://www.startours.co.uk/,  http://www.tajtoursuk.com/ or Sona Tours from London. Star tours have the best feedback and Sona tours have the worst. There are many advantages of booking a tour from London and not from any city in India. Tours from London are more organised and value for money while the tours from India ( like SOTC or Thomas Cook etc) are more expensive. Star tours provide the best balance of european and Indian food. For example: they providde Pizza while at Rome but they also served hot Chole Bhature or idly sambhar when you are craving for Indian food.
It could be cheaper to skip the tour operator completely and plan to visit each country on your own. But for a first time visitor ( specially a tourist) i would advice against doing that as: 
At Europe each country has different language, culture and people. So and even your best laid plans would require better contingency planning. Sometimes missing just one train by a few seconds will affect your plans for that day.Tour operators are experienced in making best use of idle time. They would be arranging for your food and site visits while you are sitting in the coach and watching movie or playing antakshari with co-passengers or simply enjoying the picturesque view outside.There is seperate entry for tour operators at various tourist spots like Eiffel towers so they save your time.Many times they get parking close to the tourist spots so that you don’t have to walk a lot.You don’t need to carry additional baggage in the city as you can keep most of the stuff in coach and just carry what you need at the tourist spot.Lastly, You can make a lot of friends :-)
Tips:

Travel insurance should cover UK as well.Avoid traveling from October begining till March end as Europe has a gloomy winter where most of the tourist attractions would be open for limited time of day. Also the day could be as short as from 8:00 am till 4:00 pm.Best time is during June till September where days are as long as from 4:00 am till 10 pm.You will need seperate visa for UK ( not part of Schengen visa). But this cost pays off as you get to visit London and save the overall cost by
So if you wish to visit most of the well travelled and advertised ( yash raj films) places, you should go via a tour operator. However if you want to go for a relaxing vacation/good family time you should choose only a few places to visit and avoid travelling most of your time and just touching each country.

1,374 views • 4 upvotes • Written 14 Oct, 2014

Upvote4

Downvote

Comment

Vamshi Muga, Passionate about people.

This answer is particularly directed towards people who go to europe for a short term visit(aka internship) for about 2 or 3 months and travel in their weekends.Although I would also suggest most of these things to full time travellers too.

1.The first question which always troubles any short term budget traveller is whether to buy eurail pass(Travel Europe with the Eurail train pass) or not.From my personal experience, I would recommend people to buy eurail pass only if you wish to travel the countries among France,Italy and Switzerland.Yes, although I accept that these are right at the top among all touristic lists but europe’s got a lot more to it(especially the eastern part of it).

2.Travelling is more about meeting people and experiencing cultures rather than aimlessly roaming from one spot to another.So the first rule would be to limit yourself to one city every weekend.This is the best way to experience the local food,local culture and the people.

3.'Couch Surfing’(http://ift.tt/wqrhQv)…this is probably the best thing that happened to me this summer.Yes, like any another first time traveller I was very apprehensive about it…seriously speaking I just thought it was another shitty website on the internet…but one experience was sufficient to completely change my view about it.People in europe are very open,accepting,trustworthy and honest(most of them).But before you start couch surfing follow these steps(this is what keeps it alive)

a.Have a complete profile describing something unique about you and your culture… and do upload some pics and give links to your facebook or google+

b.Look out for potential hosts in the website and the only way to know if they are trustworthy is through their references…so read as many references as possible and send a personalised request

c.Once you have managed a host, try to ask for their contact no and have a talk about the place to meet etc

d.Couch Surfing is all about hospitality exchange…so do not use the host’s house as a hostel…try to live with them and be a part of their life…share with them things about your culture and spend as much time as possible with them….

e.Try to attend/involve in some of the local CS meetings/CS activities within the place you live.You will be amazed to hear the stories of some full time travellers and also share your culture

f.Finally, try to be involved in some of the travel groups within the website…you will easily be able to find many travel companions in case you are afraid to travel alone

It(Couch Surfing) is free,safe and the best way to explore a city.

4.Go for a biking trip in one of the weekends….this is the best way to explore the country side in france,germany,switzerland and austria…you will be mesmerised by the beauty of the hills,valleys and rivers within these places … and also its a very good way to stay fit.

5. In case you wish not shell out euros on a eurail pass….then the best way to move around europe is through BlaBlacar(http://ift.tt/18k63Z4) or CarPooling(http://ift.tt/JmZ2HE)…these are car sharing websites that allow you to move cheaply within europe and sometimes they are even faster than the trains.

6.Spend one weekend totally away from the city..from all the buzz..in the quiet country side..this will give you a lot of 'inner peace’

To Conclude:
'Travel Alone’,'Live with the locals’ and 'Couch Surf as much as you can’ …. the best and the cheapest way to experience europe.

4,150 views • 34 upvotes • Written 28 Jul, 2014

Upvote34

Downvote

Comments2

LoginSign Up With Email

Visiting and Travel in EuropeTravel HacksEuropean UnionEuropeTourismInternational TravelVisiting and TravelIndiaEdit Topics

Stats: 6.2kB, 2.75s


from Tumblr http://ift.tt/1G1i3qW
via IFTTT