Wednesday, September 30, 2015

।।ओ३म्।। श्राद्ध किसका व कैसे करें:- ‘पितर’ शब्द का अर्थ- “अपनी सन्तति की रक्षा...

।।ओ३म्।। श्राद्ध किसका व कैसे करें:- ‘पितर’ शब्द का अर्थ- “अपनी सन्तति की रक्षा करने वाला” ही पितर कहलाता है।संतान की रक्षा जीवित ही कर सकता है।अत: पितर शब्द जीवित माता-पिता आदि के लिए आया है। श्राद्ध शब्द का अर्थ-श्राद्ध श्रद्धा धातु से बना है।श्रद्धा भी जीवित के साथ होती है।अत: जीवित माता-पिता के प्रति श्रद्धा रखना ही श्राद्ध कहलाता है। मरने के बाद शरीर में से आत्मा निकल जाने के कारण उनके लिए कुछ भी क्रिया करना व्यर्थ है। तर्पण का अर्थ-तर्पण उसे कहते हैं कि माता पिता या बडों की इतनी सेवा करो कि वें त्रप्त हो जायें।वे अपने बच्चों से पूर्णतया संतुष्ट रहें। श्राद्ध और तर्पण जीवित के साथ ही होता है। जीवित माता-पिता की सेवा करना ही धर्म है। पौराणिक पंडों के अनुसार मृत्योपरांत कर्मकांड जैसे श्राद्ध आदि जीव मुक्ति के लिये किये जाते हैं।अब सोचने की बात ये है कि यदि जीव मुक्त हो गया,तो श्राद्ध किसका ?यदि जीव मुक्त हो चुका है,तो पितर पक्ष में आवाहन किसका होता है ? जो है ही नहीं उसको कैसे बुलाया जा सकता है,कैसे उसे भोजन कराया जा सकता है? शरीर छोड़ते ही आत्मा अपने कर्मानुसार दो गतियों में से एक गति को प्राप्त करती है या तो मोक्ष अथवा पुनर्जन्म,तो फिर मरने के बाद इन डकोतों को खिला कर क्या लाभ? पौराणिकों में भ्रान्ति है कि श्राद्ध के दिनों में हमारा खाया हुआ मरों हुओं के पास पहुंच जायेगा।यह बात नितान्त असत्य है। •••••••••••••••••••••••••••••••• जिसे सही समय पर सही मार्गदर्शन मिल गया या जिनकी तार्किक व चिंतनशील प्रवृत्ति है या जो कोई भी वेदोक्त ग्रन्थ पढते हैं,वो तो इन पंडों से बचे हुए है,अन्यथा आम आदमी के लिये बचने का इन ढोंगियों ने कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा है। इसलिए हमें लाश पर बैठकर भी खाना खा जाने वाले पौराणिक पंडों को कुछ भी व कभी भी नहीं देना चहिये।क्योंकि इन्हें खिलाने-पिलाने से ये और ज्यादा बढेंगे।जिससे ज्यादा पंडे पाप को और ज्यादा फैलायेंगे।पापियों को बढाने में सहयोग करने के कारण हम भी पाप के भागी बनेंगे। इसलिए हमें पशु-पक्षी,पेड-पौधों,मनुष्यों(जिनमे चेतना हो) आदि की,जो भी परस्पर उपयोगी व हानि न पहुंचाने की स्थिति में हो,सेवा करनी चहिये,अन्य की कभी नहीं। पशुओं की सेवा इस प्रकार की जा सकती है,जैसे कोई पशु प्यासा है,तो उसे पानी पिलायें,भूखा है उसे चारा खिलायें,अगर पीड़ित है,उसे चोट लगी है,तो उसकी मरहम पट्टी करायें। पक्षियों के लिये छत पर पानी व किसी अन्न के दाने रखकर पक्षियों की सेवा की जा सकती है। ऐसा सभी करें,तो चारों तरफ पशु-पक्षी की खुशनुमा आवाजें आने से वातावरण सकारात्मक होगा।जिससे हमें सकारात्मक ऊर्जा मिलने से खुशी प्राप्त होगी। सोचें कि अगर घरों में चिडिया न चहचाये,तो घरों में कितना कम मन लगेगा,घर में टुकडा लेने कुत्ता न आये,तो कैसे शान्ति मिलेगी?दुधारू पशु न हो,तो हमारे जीवन पे ही संकट खडा हो जायेगा। अपने से बडे मनुष्यों की सेवा उनका कहा मानने व सम्मान करने,उनके स्वास्थ्य व खानपान की देखभाल करके की जा सकती है। इस प्रकार अगर अपने-अपने घर में सभी अपने से बडों की सेवा करेंगे,तो बच्चे भी हमसे प्रेरणा प्राप्त करके अपनों से बडों का सम्मान व सेवा करेंगे।अन्यथा वृद्धाश्रम में जाना पडेगा। पेड-पौधों की सेवा उनमें पानी व जरूरी खाद या दवाई डालकर की जा सकती है।उनके फूल,पत्तों व टहनियों को नुकसान न पहुंचाकर की जा सकती है। ऐसे करने से चारों तरफ हरियाली बढेगी,जिस कारण हम पेड-पौधों का महत्व समझने के कारण और ज्यादा पेड-पौधे लगायेंगे। अन्यथा प्रदूषण बढता जायेगा,बरसात कम होने से पानी का संकट खडा हो जायेगा। इस प्रकार बाकि बची जड चीजों का यथायोग्य प्रयोग करने से उन चीज़ों की सेवा की जा सकती है।जैसे-खाने के लिये इतनी ही चीजें बनायें,जितनी आवश्यक हो,अन्यथा फालतू चीजें बेकार जाने के कारण हम खाने के प्रति लापरवाह होने के कारण घाटे में जाते रहते हैं।यही आदत अन्य खर्चों में भी बढ जाती है।जिस कारण कहा जाता है कि चीजों का सम्मान न करने के कारण घर से लक्ष्मी चली जाती है।हम कर्ज में डब जाते हैं।बहुत से घरों में कर्जों के कईं कारणों में एक कारण ये भी है। कोई भी चीज हो,चाहे वो किसी भी प्रयोग में आती हो,उतना ही प्रयोग करें,जितनी उसकी जरूरत हो।जैसे पानी,बिजली,हीटर आदि का प्रयोग ध्यान पूर्वक करें।यही उनकी सेवा है। सेवा चाहे चेतन की हो या जड की सम्मानपूर्वक की जानी चहिये। जो चीजें मनुष्यों या पशु-पक्षियों,पेड पौधों आदि को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में हो या ये परस्पर हानि पहुंचाने की स्थिति में हो,तो उन हानिकारक चीजों की सेवा नहीं,बल्कि उसका निपटारा जरूरी होता है,अगर वो ज्यादा हानि पहुंचाने की स्थिति में हो,तो उसे हमेशा के लिये समाप्त कर दें।जैसे डेंगू मच्छर व पाखंडी पंडा आदि। इस प्रकार सभी खुशहाल होंगे व आगे बढने के लिए प्रेरित होंगे।पाखंडियों की बातों पर चलकर पाखंड के कारण सारा समाज दिशाहीन होकर समाप्त हो जायेगा।अगर हमें समाप्त होना है,तो पौराणिक पाखंड को पकडे रखें।अन्यथा वेदमत की ओर लौटें। वेदमत समझने के लिए सत्यार्थ प्रकाश पढें।।


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(प्रश्न)जैसे मनुष्यादि के माँ बाप साकार हैं उनका सन्तान भी साकार होता है । जो ये निराकार होते तो इन...

(प्रश्न)जैसे मनुष्यादि के माँ बाप साकार हैं उनका सन्तान भी साकार होता है । जो ये निराकार होते तो इन के लड़के भी निराकार होते ।वैसे परमेश्वर निराकार हो तो उसका बनाया जगत् भी निराकार होना चाहिए । (उत्तर )यह तुम्हारा प्रश्न लड़के के समान है ।क्योंकि हम अभी कह चुके हैं कि परमेश्वर जगत् का उपादान कारण नहीं किन्तु निमित्त कारण है और जो स्थूल होता है वह प्रकृति और परमाणु जगत् का उपादान कारण है ।और वे सर्वथा निराकार नहीं किन्तु परमेश्वर से स्थूल और अन्य कार्य से सूक्ष्म आकार रखते हैं । सत्यार्थ प्रकाश , अष्टम समुल्लास


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👉 एक दोस्त हलवाई की दुकान पर मिल गया । मुझसे कहा- ‘आज माँ का श्राद्ध है, माँ को लड्डू बहुत पसन्द...

👉 एक दोस्त हलवाई की दुकान पर मिल गया । मुझसे कहा- ‘आज माँ का श्राद्ध है, माँ को लड्डू बहुत पसन्द है, इसलिए लड्डू लेने आया हूँ ’ मैं आश्चर्य में पड़ गया । अभी पाँच मिनिट पहले तो मैं उसकी माँ से सब्जी मंडी में मिला था । मैं कुछ और कहता उससे पहले ही खुद उसकी माँ हाथ में झोला लिए वहाँ आ पहुँची । मैंने दोस्त की पीठ पर मारते हुए कहा- ‘भले आदमी ये क्या मजाक है ? माँजी तो यह रही तेरे पास ! दोस्त अपनी माँ के दोनों कंधों पर हाथ रखकर हँसकर बोला, ‍'भई, बात यूँ है कि मृत्यु के बाद गाय-कौवे की थाली में लड्डू रखने से अच्छा है कि माँ की थाली में लड्डू परोसकर उसे जीते-जी तृप्त करूँ । मैं मानता हूँ कि जीते जी माता-पिता को हर हाल में खुश रखना ही सच्चा श्राद्ध है । आगे उसने कहा, 'माँ को मिठाई, सफेद जामुन, आम आदि पसंद है । मैं वह सब उन्हें खिलाता हूँ । श्रद्धालु मंदिर में जाकर अगरबत्ती जलाते हैं । मैं मंदिर नहीं जाता हूँ, पर माँ के सोने के कमरे में कछुआ छाप अगरबत्ती लगा देता हूँ । सुबह जब माँ गीता पढ़ने बैठती है तो माँ का चश्मा साफ कर के देता हूँ । मुझे लगता है कि ईश्वर के फोटो व मूर्ति आदि साफ करने से ज्यादा पुण्य माँ का चश्मा साफ करके मिलता है । यह बात श्रद्धालुओं को चुभ सकती है पर बात खरी है । हम बुजुर्गों के मरने के बाद उनका श्राद्ध करते हैं । पंडितों को खीर-पुरी खिलाते हैं । रस्मों के चलते हम यह सब कर लेते है, पर याद रखिए कि गाय-कौए को खिलाया ऊपर पहुँचता है या नहीं, यह किसे पता । अमेरिका या जापान में भी अभी तक स्वर्ग के लिए कोई टिफिन सेवा शुरू नही हुई है । माता-पिता को जीते-जी ही सारे सुख देना वास्तविक श्राद्ध है ॥ 👏👋👏 मन को छुये तो आगे भेज देना , वर्ना कचरे में पटक देना ! आपकी मर्जी ……


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यजुर्वेद 8-17 (८-१७) धा॒ता रा॒तिः स॑वि॒तेदञ्जु॑षन्ताम्प्र॒जाप॑तिर्निधि॒पा दे॒वो अ॒ग्निः । त्वष्टा॒...

यजुर्वेद 8-17 (८-१७) धा॒ता रा॒तिः स॑वि॒तेदञ्जु॑षन्ताम्प्र॒जाप॑तिर्निधि॒पा दे॒वो अ॒ग्निः । त्वष्टा॒ विष्णुः॑ प्र॒जया॑ सररा॒णा यज॑मानाय॒ द्रवि॑णन्दधात॒ स्वाहा॑ ॥ भावार्थ:- गृहस्थों को उचित है कि यथायोग्य रीति से निरन्तर गृहाश्रम में रह के अच्छे गुण कर्मो का धारण, ऐश्वर्य की उन्नति तथा रक्षा, प्रजापालन, योग्य पुरूषों को दान, दुःखियों को दुःख छुड़ाना, शत्रुओं को जीतने और शरीरात्मबल में प्रवृत्ति आदि गुण धारण करें।। पंडित लेखराम वैदिक मिशन www.aryamantavya.in www.onlineved.com http://ift.tt/18FvwLS subscribe you tube channel “pandit lekhram vedic mission”


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🙏 नमस्ते मित्रों इस संसार में सभी सुख चाहते है सभी प्राणी मात्र सुख से रहना चाहते  है । दुःख से...

🙏 नमस्ते मित्रों इस संसार में सभी सुख चाहते है सभी प्राणी मात्र सुख से रहना चाहते  है । दुःख से दूर रहना चाहते है। प्रश्न :- सुख कैसे मिलता है ? उत्तर :- ज्ञान से, विद्या से ।। लेकिन दुर्भाग्य तो यह है कि इस राष्ट्र के युवा मैकाले की शिक्षा को ही ज्ञान समझ बैठे हैं । मैकाले शिक्षा पद्धति से पढ़ कर युवक डॉo , इंजीनियर , वकील आदि तो बन जाता है । लेकिन जीवन पर्यन्त सत्य असत्य का निर्णय नही कर पाता । धर्म क्या होता है ? मोक्ष क्या होता है ? सुख कैसे प्राप्त होता है ? आदि आदि प्रश्नों से अनभिज्ञ रह जाता है।। हमारे श्रेष्ठ पूर्वजों, ऋषियों  ने ऐसा कोई विषय नही छोड़ा जिस पर चिन्तन ना किया हो । वास्तव में विद्या किसे कहते है ? सा विद्या या विमुक्तये विद्या वह होती है जो हमे मुक्त कर दे। किससे ?? सब प्रकार के दुखों से ।। जहाँ किञ्चित मात्र भी दुःख ना हो । युवाओं । आओ इसी विद्या को हम ग्रहण करें। राष्ट्रिय आर्य निर्मात्री सभा इस विद्या को जन जन तक पहुंचाने के लिए संकल्पित है । आओ लौट चले वेदों की और पुन: हम अपनी गुरुकुल की विद्या को जानें और जीवन से अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश करें।। आर्य निर्मात्री सभा द्वारा लगाये जाने वाले 2 दिवसीय सत्रों की सूचना : महिला सत्र :👇 हरियाणा : 👇 3-4 अक्टूबर आर्य समाज सैक्टर -11/12, हुड्डा, पानीपत आर्य रवि गोयल - 9896000406 👉14-15 नवम्बर आर्य सदन कृष्णा कॉलोनी -भिवानी आर्य भूपेन्दर- 9991106631 उत्तर प्रदेश 👇 👉 24-25 अक्टूबर टटीरी- बागपत आर्य अविनाश जी- 9868301236 👉 24-25 अक्टूबर ढाकी - हुसैनपुर बिजनौर आर्य राजेन्द्र जी- 9837317062 पुरुष सत्र :👇 उत्तर प्रदेश : 👇 👉 3-4 अक्टूबर सरदार वल्लब भाई पटेल इण्टर कॉलेज बलीमेवला – बागपत आर्य अजीत जी- 8938047216 👉 3-4 अक्टूबर अभय बैंकट हाल जानसठ- मुज्ज़फरनगर आर्य जगमोहन जी - 9411812945 👉 9-10 अक्टूबर गाँव बावली महावतपुर – बागपत आर्य सुरेन्द्र जी - 9811817474 👉 10-11 अक्टूबर प्राथमिक पाठशाला नंबर 01 भभीशा- शामली आर्य कृष्णपाल जी- 9719421139 👉 17-18 अक्टूबर आचार्य गुरुकुल महाविद्यालय चितौडाझाल - मुज्ज़फरनगर आर्य नरेन्द्र जी - 9719940999 👉 24-25 अक्टूबर ढाकी - हुसैनपुर बिजनौर आर्य राजेन्द्र जी- 9837317062 दिल्ली : 👇 10-11 अक्टूबर गाँव कराला बाज़ार पन्ना वाली चौपाल नज़दीक स्टेट बैंक ऑफ़ पटियाला -दिल्ली आर्य प्रदीप जी - 8800227233 हरियाणा : 👇 10-11अक्टूबर गुडगाँव आर्य रामवीर जी- 8010202003 👉 31Oct-1Nov गाँव पुन्हाना मेवात - हरियाणा आर्य मुकेश जी - 9068394106 मध्य प्रदेश 👇 24-25 अक्टूबर पाटीदार धर्मशाला गाँव जसमत सिहौर - मध्य प्रदेश आर्य वेद प्रकाश जी- 7581023076 विशेष : किसी भी सत्र के स्थान इत्यादि की जानकारी के लिए वँहा के दिए गए स्थनीय सम्पर्क सूत्र पर सम्पर्क करें । राजेश आर्यावर्त +16475752747 सभी से 🙏 विनम्र विनती की सभी तक सूचना पंहुचाने के लिए इस सन्देश को अपने समूहों में व् अपने मित्रों को भेजें।


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अगले सफर की तैयारी :- एक राज्य का क़ानून था कि वो एक साल बाद अपना राजा बदल लेते थे। उस दिन जो भी...

अगले सफर की तैयारी :- एक राज्य का क़ानून था कि वो एक साल बाद अपना राजा बदल लेते थे। उस दिन जो भी सब से पहले शहर में आता था तो उसे राजा घोषित कर लेते थे, और इससे पहले वाले राजा को एक बहुत ही खतरनाक और मीलों मॆं फैले जंगल के बीचो बीच छोड़कर आते जहां बेचारा अगर खूँखार जानवरों से किसी तरह अपने आप को बचा लेता तो भूख- प्यास से मर जाता। ना जाने कितने ही राजा ऐसे ही एक साल की राजगद्दी के बाद जंगल में जा कर मर गए। एक बार राज्य में एक नौजवान किसी दूसरे राज्य से आया और इस राज्य के कानून से अनजान था, तब सब लोगों ने आगे बढ़कर उसे बधाईयाँ दी और उसे बताया कि उसको इस राज्य का राजा चुन लिया गया है और उसे बड़े मान- शान के साथ राजमहल में ले गए। वो हैरान भी हुआ और बहुत ख़ुश भी। राजगद्दी पर बैठते ही उसने पूछा कि मुझ से पहले जो राजा था, वो कहाँ है? तो दरबारियों ने उसे इस राज्य का क़ानून बताया कि हर राजा को एक साल बाद जंगल में छोड़ दिया जाता है और नया राजा चुन लिया जाता है। ये बात सुनते ही वो एक बार तो परेशान हुआ लेकिन फिर उसने अपनी दिमाग का इस्तेमाल करते हुए कहा कि मुझे उस जगह लेकर चलो जहाँ तुम अपने पहले के राजाओं को छोड़कर आते हो। दरबारियों ने सिपाहियों को साथ लिया और नये नियुक्त राजा को वो जगह दिखाने जंगल में ले गए, राजा ने अच्छी तरह उस जगह को देख लिया और वापस आ गया अगले दिन उसने सबसे पहला आदेश ये दिया कि मेरे राजमहल से जंगल तक एक सड़क बनाई जाये और जंगल के बीचों बीच एक खूबसूरत राजमहल बनाया जाये जहां पर हर तरह की सुविधा मौजूद हों और राजमहल के बाहर खूबसूरत बाग़ बनाया जाएं। राजा के आदेश का पालन किया गया, जंगल मे सड़क और राजमहल बनकर तैयार हो गया। एक साल के पूरे होते ही राजा ने दरबारियों से कहा कि आप अपने कानून का पालन करो और मुझे वहां छोड़ आओ जहां मुझ से पहले राजाओं को छोड़ के आते थे। दरबारियों ने कहा कि महाराज आज से ये कानून खत्म हो गया क्योंकि हमें एक अक़लमंद राजा मिल गया है ,, वहाँ तो हम उन बेवकूफ राजाओं को छोड़कर आते थे जो एक साल की राजशाही के मज़े में बाक़ी की ज़िंदगी को भूल जाते और अपने लिए कोई बंदोबस्त ना करते थे, लेकिन आप ने अपने दिमाग का इस्तेमाल किया और आगे का बंदोबस्त कर लिया। हमें ऐसे ही होशियार राजा की ज़रूरत थी अब आप आराम से सारी ज़िंदगी हमारे राज्य पर राज करें ।। अब हम लोग भी यह सोचें कि कुछ दिन बाद हमें भी ये दुनिया वाले एक दिन ऐसी जगह छोड़कर आयेंगे जहां से कोई वापस नहीं आता तो क्यों ना हम भी वक्त रहते हुए नेक कर्म और ईश्वर की बदंगी करके अपने अगले सफर की तैयारी कर लें या बेवकूफ बन कर कुछ दिनों की ज़िंदगी के मज़ों में लगे रहें। और ये जन्म बर्बाद कर लें। शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।


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- હંમેશાં આ ચાર પર વિશ્વાસ રાખજો. માતા, પિતા, સાચા ગુરુ અને ઇશ્વર. એ ક્યારેય દગો નહીં આપે. જે એમની...

- હંમેશાં આ ચાર પર વિશ્વાસ રાખજો. માતા, પિતા, સાચા ગુરુ અને ઇશ્વર. એ ક્યારેય દગો નહીં આપે. જે એમની વાત નહીં માને તેઓ જરૂર દુ:ખી થશે. - બીજાના ગુણ જુઓ. જો તમે દરેક વ્યક્તિમાં દોષ જોશો તો કોઇની સાથે રહી નહીં શકો. જેની સાથે રહો છો તેના ગુણ જોવા, દોષ નહીં. - જેને તમે પ્રેમ કરો છો તેને દુ:ખ ન દેશો, દુ:ખ દેવામાં તો થોડીક ક્ષણ લાગશે, પરંતુ તેનો પ્રેમ પાછો મેળવવામાં કેટલાંય વર્ષો લાગી જશે. - ભૂતકાળની દુ:ખદાયક વાતો યાદ કરવાથી દુ:ખ વધશે. તેને યાદ ન કરો. ભૂતકાળની સારી ઘટનાઓને યાદ કરી, તેમાંથી પ્રેરણા લઇ ઉત્સાહી બનો.


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गृहस्थ होने पर घर का होना स्वाभाविक है.. पर सवाल ये है कि उसका सेवन आसक्ति पूर्वक किया जा रहा है या...

गृहस्थ होने पर घर का होना स्वाभाविक है.. पर सवाल ये है कि उसका सेवन आसक्ति पूर्वक किया जा रहा है या अनासक्त होकर..??


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आज का सुविचार (30 सितम्बर 2015, बुधवार, आश्विन कृष्ण तृतीया) नौकरी की दुनिया का एक अनवीनीकरण...

आज का सुविचार (30 सितम्बर 2015, बुधवार, आश्विन कृष्ण तृतीया) नौकरी की दुनिया का एक अनवीनीकरण उदाहरण- मैं भिलाई इस्पात संयन्त्र अस्पताल में पैदा हुआ। बिस्तर कारखाने में उत्पन्न लोहे का था। घर में जिस पालने झूला झूला वह भी कारखाने के लोहे का था। कारखाने के लोहे से बने रेठे के सहारे मैं डुगुर-डुगुर चला। कारखाने के फार्म़ों में उगी सब्जियां अनाज ने मेरा तन बनाया। कारखाने के विद्यालय में पढ़ा। कारखाने के लोहे इस्पात से बने साइकिल स्कूटर चलाए। कारखाने के स्टेनलेस स्टील बर्तनों मे खाना खाया। कारखाने के लोहे से बने घर में रहा। कारखाने में ही नौकरी लगी। उसका धूल प्रदूषण खाया। बच्चों को भी वही सब दिया जो मुझे मिला। या खुदा.. इससे पहले कि इसी कारखाने के लोहे से बने मरघट में दफन जाऊं मुझसे कारखाना छुड़ा। जो नया कदम नहीं उठाते हैं वे मृतवत जीते हैं। नवीयो पदम् अक्रमुः। (~स्व.डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय)


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Tuesday, September 29, 2015

गीता का आदेश ज्ञानी कथाकार पण्डित सामान्य जन की वुद्धि में भृम उत्नपत्र नही करे !! सर्व कर्माणि...

गीता का आदेश ज्ञानी कथाकार पण्डित सामान्य जन की वुद्धि में भृम उत्नपत्र नही करे !! सर्व कर्माणि समाचरण यानि अच्छी तरह सकाम भाव की जगह निष्काम भाव से करवाये !!!3/25-26 ——————————————————— इस वेद मंत्रानुसार गीता में श्री कृष्ण के भाव स्वामी राम सुखदास जी के शव्दों में समझे ! हे!भरतवंशोद्भव अर्जुन !?!कर्म से आसक्त अज्ञानी जन जिस प्रकार कर्म करते हे -आसक्ति रहित तत्वज्ञ महापुरुष लोक संग्रह करना चाहते हुए सावधानी से कर्म करे ।तत्वज्ञ महापुरुष कर्मो में आसक्तिवाले (सतकार्यो को करने वाले “सकाम "कर्मियो)अज्ञानी मनुष्यो की वुद्धि में भरम न उतपन्न करे -प्रत्युत -स्वयं समस्त कर्मो को अच्छी तरह करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये !!! मूल तत्व को भांडगिरि में तिरोहित करते हमारे कथाकार प्रवचन कर्ता भव सागर पार उतरने के सही मार्ग पर कितना ध्यान देते हे ?? कृष्ण 2 चिल्लाने या उसके स्वरूप को विकृत करना अपराध नही ?? संततियों को विकृत कर अधर्म नही कर रहे ???? सामान्य जन को सेवा भाव में युक्त रखते हुए उनमे आसक्ति या सकामता के भाव से वचाने के लिए प्रयास हो -कथित विद्वान् कथाकार स्वयं का चरित्र पहले निष्काम भाव युक्त हो ???


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Monday, September 28, 2015

मुस्लिम एक पशु को काटते है और कहते है की हमन अल्लाह को क़ुरबानी दी है। आइये जरा क़ुरबानी के बारे में...

मुस्लिम एक पशु को काटते है और कहते है की हमन अल्लाह को क़ुरबानी दी है। आइये जरा क़ुरबानी के बारे में बात करते है। क़ुरबानी का मतलब होता है अपनी इच्छा से किसी उद्देश्य के लिए अपने प्राणों का त्याग करना… हमारे देश भक्तो ने देश प्रेम के कारण अपने जीवन का बलिदान किया। कुर्बानी के लिये दो बातो का होना जरूरी है, आपकी भावनाये और आपकी खुद की इच्छा… मुस्लिम बकरे या पशु को जबरदस्ती काट देते है और कहते है कुर्बानी हो गई… क्या वो पशु अपनी इच्छा से कटा है या पशु की किसी उद्देश्य के लिए कटने की भावना थी … नही फिर इसे कुर्बानी कैसे कह सकते है???? अगर एक मुस्लिम अपनी इच्छा से और अल्लाह के प्रेम की भावना से खुद के गले पर छुरी चलाये तो ये कहा जायेगा की ये कुर्बानी है… पर मुस्लिम अल्लाह को भी बेवकूफ बना रहे है…


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भाग्य और कर्म धरती की सैर कर रहे थे। घूमते-घूमते उनकी नजर एक भिखारी पर पड़ी। भाग्य के मन में दया...

भाग्य और कर्म धरती की सैर कर रहे थे। घूमते-घूमते उनकी नजर एक भिखारी पर पड़ी। भाग्य के मन में दया उपजी और उसने अपनी उंगली से उतारकर सोने की अंगूठी उसे दे दी। अंगूठी बेचकर भिखारी ने कुछ दिन सुख से बिताए। अगली बार जब कर्म और भाग्य दोबारा उधर से गुजरे तो भिखारी को फिर भीख मांगते देखा। इस बार भाग्य ने अपने गले से उतारकर सोने का हार उसे दे दिया। भिखारी के थोड़े दिन और सुख से बीत गए। कर्म और भाग्य तीसरी बार आए तो उन्होंने भिखारी को फिर भीख मांगते देखा। भाग्य को बड़ा क्रोध आया। बोला, कितना भी भला कर लो, यह दरिद्र का दरिद्र ही रहेगा! लेकिन इस बार कर्म के मन में दया आ गई। वह भिखारी से बोला-‘हट्टे-कट्टे हो, तुम कोई काम क्यों नहीं करते? भीख मांगकर कब तक गुजारा चलेगा?’ भिखारी बोला-'काम-धंधे के लिए पास में कुछ पैसे भी तो हों!’ कर्म ने कहा-'देखो, मैं तुम्हें एक ठेली फल देता हूं। तुम इन्हें बेच कर धंधा करो।’ भिखारी खुश हो गया। बहुत दिनों के बाद जब कर्म और भाग्य घूमते-घूमते फिर उस नगर में आए तो उन्होंने खूब ढूंढा, पर उस भिखारी के दर्शन नहीं हुए। अंत में जब वे मुख्य बाजार से गुजरे तो देखा भिखारी तो अब फलों का बड़ा व्यापारी बन चुका था। भाग्य उसे देखता रह गया। कर्म ने मुस्कराते हुए कहा, 'देखा, तुमने इसे भीख में सोना दिया और मैंने इसे श्रम की गरिमा से परिचित कराया। सोना पाकर तो यह निठल्ला बना रहा, लेकिन श्रम का महत्व समझते ही काम में मन लगाकर फलों का इतना बड़ा व्यापारी बन गया।’ भाग्य उसकी बात का मर्म समझ गया। ====================================         ॐ वन्दे मातरम !ॐ    चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे जो वादी हो । नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।‍‍ ====================================


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-~~**★ मानव जीवन का उद्देश्य ★**~~- संसार में बहुत से बहुमूल्य पदार्थ हैं, उनमें से मानव-जन्म...

-~~**★ मानव जीवन का उद्देश्य ★**~~- संसार में बहुत से बहुमूल्य पदार्थ हैं, उनमें से मानव-जन्म सबसे बढकर है। मनुष्य-जीवन की तुलना में दुनिया की सभी सम्पदाएँ तुच्छ हैं । मनुष्य-जन्म परमात्मा की सर्वोत्तम रचना है। यह नर-तन जीवात्मा के रहने का मकान है । अनेक जन्मों के पुण्य कर्मों के फल स्वरूप मानव-जन्म पाने का सौभाग्य मिलता है। यह जन्म प्रभु की अनमोल देन है। संसार में नर-तन से बढ़ कर कोई ऊँची पदवी नहीं है। यह देह ईश्वरीय रचना का अद्भुत नमूना है। परमात्मा ने शरीर के रुप में हमें करोड़ों की सम्पत्ति दे दी है इसका एक-एक अंग अपने में अमूल्य है। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है; त्यों-त्यों शरीर की कीमत का पता चलता जाता है । ईश्वर ने इतनी अमूल्य दौलत देने के बदले में हमसे कोई कीमत नहीं ली है। इतना बड़ा उपकार और कोई नहीं कर सकता। यह शरीर प्रभु का मन्दिर और देवों की नगरी है और परमेश्वर तक पहुँचाने वाली सीढी है। अनेक योनियों में भटकने और चक्कर काटने के बाद यह नर-तन मिला है। सज्जनों वास्तविक रुप से मानव जीवन का परम लक्ष्य है :- ॥★ धर्म ★ अर्थ ★ काम ★ मोक्ष ★॥ इनको अपने जीवन में अपनाना व इनकों सिद्ध करना तथा ईश्वर के सच्चे स्वरूप को पहचान कर उसी की उपासना करनी चाहिये। —~~~***★१०८★***~~~—


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|| एक किताब जो बदल देगी जीवन! || 1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला क्रांतिकारी मंगल पांडे स्वामी...

|| एक किताब जो बदल देगी जीवन! || 1. देश के लिए बलिदान होने वाला पहला क्रांतिकारी मंगल पांडे स्वामी दयानंद का शिष्य था। मंगल पांडे को चर्बी वाले कारतूस प्रयोग करने के कारण पानी न पिलाने वाले स्वामी दयानंद ही थे। प्रमाण: महान स्वतंत्रता सेनानी आचार्य दीपांकर की पुस्तक पढे: 1857 की क्रांति और मेरठ 2. सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने मरने से पहले गीता और सत्यार्थ प्रकाश के दर्शन किए, जब जेलर ने पूछा इन किताब में क्या है, उसने बताया, गीता मुझे दोबारा जन्म लेने की प्रेरणा देती है और सत्यार्थ प्रकाश स्वदेशी राज्य की प्राप्ति का मार्ग सुझाती है। इसलिए मैं जन्म लेकर दोबारा आउंगा और आजादी प्राप्त करूंगा। प्रमाण: खुदीराम की जीवनी तेजपाल आर्य की लिखी पढ़े। और देश के सबसे वृद्ध क्रांतिकारी लाला लाजपत राय पर जब लाठियां बरस रही थी, उनके हाथ में तब भी सत्यार्थ प्रकाश था। 3. पं. मदनमोहन मालवीय जी ने आर्यसमाज का यहां तक विरोध किया कि सनातन धर्म सभा तक बना डाली, लेकिन जब मरने लगे तो काशी के सब पंडित उनके दर्शन करने आए और बोले, महामना जी हमारा मार्गदर्शन अब कौन करेगा? तो मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें सत्यार्थप्रकाश देते हुए कहा, ‘‘सत्यार्थ प्रकाश आपका मार्गदर्शन करेगा।’’ प्रमाण: घोर पौराणिक लेखक अवधेश जी की पुस्तक महामना मालवीय पढ़े, जो हिन्द पॉकेट बुक्स से छपी है। 4. सत्यार्थप्रकाश पढकर एक तांगा चलाने वाला दुनिया में मशालों का शहंशाह बन गया: एमडीएच मशाले और सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर एक पिंक्चर लगानेवाला हीरो ग्रुप का अध्यक्ष बन गया: ओमप्रकाश मूंजाल 5. सत्यार्थ प्रकाश पढकर होमी भाभा ने भारत में परमाणु युग की शुरूआत की और डॉक्टर कलाम ने गीता के साथ-साथ सत्यार्थप्रकाश भी अनेक बार पढा है। गॉड पार्टिकल और हिग्स बोसोन की खोज के कारण जिन विदेशियों को नोबेल पुरस्कार मिला, जानते हो मेरे पास 1966 की एक हिन्दी पत्रिका नवनीत है, उसमें ये सिद्धांत तब के ही लिखे हैं और वह लेख लिखा हुआ है सत्येंद्रनाथ बोस का, जो आर्य समाज के सदस्य थे और वैज्ञानिक भी, अब इतने दिन बाद पुरस्कार कोई और ले गया। चलो फिर भी विज्ञान में न सही अभी समाज सेवा में कैलासजी को नोबेल मिला, वे भी सत्यार्थ प्रकाश पढने वाले ही हैं और जनज्ञान प्रकाशन की पंडिता राकेश रानी के दामाद हैं। जनज्ञान प्रकाशन ने कभी सबसे सस्ते वेद प्रकाशित किए थे। 6. सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर फीजी, गुयाना, मोरीशस में कई व्यक्ति राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन गए। 7. सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने वाले लाल बहादुर शास्त्री और चौधरी चरण सिंह देश के सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री कहलाए। चरणसिंह की राजनीति कैसी भी रही हो, लेकिन जमींदारी उन्मूलन के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। नेहरूजी सहकारिता के नाम पर हिन्दुस्तान की सारी जमीन रूस को देने वाले थे, ऐसे ही जैसे उन्होंने आजाद भारत में माउंटबेटन को गवर्नर बना दिया। यदि सत्यार्थप्रकाश पढने वाले चरणसिंह न होते तो आज हमारे किसानो के आका रूस के लोग होते और देश रूस का गुलाम होता। प्रमाण: कमलेश्वर की इंदिरा की जीवनी अंतिम सफर (संपूर्ण मूल संस्करण, क्योंकि यह संक्षिप्त भी है) पुस्तक पढे, कमलेश्वर इंदिरा जी के चहेते थेे, उनकी मौत पर दूरदर्शन से कमेंटरी उन्होंने ही की थी। 8. सत्यार्थप्रकाश जिसने भी पढा, वह शेर बन गया, रामप्रसाद बिस्लिम, श्याम कृष्णवर्मा, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉक्टर हेडेगेवार के पिताश्री बलिराम पंत हेडगेवार जो आर्य समाज के पुरोहित थे आदि और आज के युग में भी शेर ही होते हैं। सुनो कहानी: सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर साहित्यकार तेजपाल सिंह धामा ने भारत माता का नग्न चित्र बनानेवाले एमएफ हुसैन को 15 वर्ष पहले हैदराबाद में पत्रकार सम्मेलन में सबके सामने जोरदार चांटा जडा, अपमानित होकर बेचारे हुसैन देश ही छोड गए और हैदराबाद जैसे मुस्लिम शहर में रंगीला रसूल का पुनः प्रकाशन भी किया और सौ से अधिक पुस्तके आर्य समाज से संबंधित लिखी। 9. सत्यार्थ प्रकाश पर 2008 में प्रतिबंध के लिए जब भारत भर के मुल्ला-मौलवी एकत्र हुए और अदालत में पहुंचे तो फैसला सुनाने वाले जज ने न केवल सत्यार्थ प्रकाश के पक्ष में फैसला दिया वरन स्वयं आर्य समाजी हो गया और मुसलमानो का एक मुस्लिम वकील भी आर्य समाजी बन गया, बेचारे ने भूल से सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन किया था ताकि गलत तथ्य निकाल सके। आर्यसमाज की ओर से यह मुकदमा विमल वधावनजी ने लडा था, विमलजी भी सत्यार्थ प्रकाश पढनेवाले ही हैं। 10. सत्यार्थप्रकाश पढकर ही मुंशी प्रेमचंद भारत के सबसे लोकप्रिय लेfdखक बने, उनकी धर्मपत्नी ने ही ऐसा लिखा है। सत्यार्थ प्रकाश से प्रेरणा लो और वेदो की ओर लोटे |


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आज का सुविचार (29 सितम्बर 2015, मंगलवार, आश्विन कृष्ण द्वितीया) नवीयो पदम् अक्रमुः - लकीर क्रम तोड़...

आज का सुविचार (29 सितम्बर 2015, मंगलवार, आश्विन कृष्ण द्वितीया) नवीयो पदम् अक्रमुः - लकीर क्रम तोड़ नया कदम बढाओ, नया सूर्य गढ़ो। लकीर फकीरों ने जब-जब नया कदम बढ़ाया, नया सूर्य गढ़ा। स्वयं को नया करने के दो तरीके हैं (1) स्वयं नवीनीकृत होना। (2) नया कदम बढ़ाना प्रथम चरण अप्रयास भी होता है, सप्रयास भी होता है। अप्रयास नवीनीकृत होना भौतिकी संकल्पना है। सप्रयास नवीनीकृत होना भौतिकी तथा वैचारिकी प्रकल्पना है। आदमी की कोषिकाओं में परिवर्तन, उम्र में परिवर्तन भौतिकी नवीनीकरण है। मननात मंत्र नव विचार तथा विचार धारण अनुपालन भौतिकी तथा वैचारिकी संकल्पना है। मानव कोषिकाओं के परिवर्तन को औषधिजा या शुभम् द्वारा सुपरिवर्तित कर सकता है। जो यह परिवर्तन स्वयं नहीं करता चिकित्सक उसे यह परिवर्तन करने बाध्य कर देता है। (~स्व.डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय)


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Saturday, September 26, 2015

ओउम विषय: गीता में वर्णित सर्वोत्कृस्ट तत्व (कर्मयोग) (भाग-37) लेखक: राजिंदर...

ओउम विषय: गीता में वर्णित सर्वोत्कृस्ट तत्व (कर्मयोग) (भाग-37) लेखक: राजिंदर वैदिक —————————– (गीता.अ.6 /45 )उस परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त करने के लिए दृढ़ कठोर अभ्यास करता है. इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक उधोग करते-करते पापों से शुद्ध होता हुआ कर्मयोगी अनेक जन्मो के अनन्तर सिद्धि पाकर अंत में उत्तम गति को पा लेता है. मोक्ष प्राप्त कर लेता है.(गीता.अ.6 /46 ) श्री कृष्ण जी यहाँ स्पस्ट कर रहे है की सिर्फ तप करने वाले लोगो की अपेक्षा कर्मयोगी श्रेष्ठ है, और जो केवल तर्क-वितर्क करने वाले तोतारटन्त विद्वान है, उनकी अपेक्षा भी कर्मयोगी श्रेष्ठ है. और जो कर्म-कांड वाले, बाहरी यज्ञो को पूर्ण करने वाले है, उनकी अपेक्षा भी कर्मयोगी श्रेष्ठ है. इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन. अर्थार्त कर्मयोगी हो , अर्थार्त अपनी आत्मा प्राप्ति (जानने) का अभ्यास करो, जिससे तुम्हारी बुद्धि सम हो जाये. अपनी आत्मा को अभ्यास द्वारा जानकर फिर तू सब प्राणियों में उसी एक “आत्मा” के दर्शन कर और फिर उस सब जगह फैले हुए परमात्मा का सम बुद्धि से भजन कर, (गीता.अ.6/47) क्योकि हे अर्जुन! सब कर्मयोगियों में भी उसे ही सबसे उत्तम सिद्ध कर्मयोगी समझता हु, की जो परमात्मा में अंतःकरण रखकर श्रद्धा से परमात्मा को भजता है. अर्थार्त जो परमात्मा का ज्ञान पाकर कृतार्थ हो जाने से आगे कुछ प्राप्त न करना हो, तो भी निष्काम बुद्धि से भक्ति करता है. वह परमात्मा को अत्यंत प्रिय होता है. फिर उसका जन्म-मरण अर्थार्त पुनर्जन्म छूट जाता है. वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है.


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Rajinder Kumar Vedic महाभारत : शान्तिपर्वणि : मोक्षधर्मपर्व:दो सौ उन्यासीवा अध्याय : संग्रह कर्ता:...

Rajinder Kumar Vedic महाभारत : शान्तिपर्वणि : मोक्षधर्मपर्व:दो सौ उन्यासीवा अध्याय : संग्रह कर्ता: राजिंदर वैदिक (इस वैदिक ज्ञान का फैलाव करो) ——————————— यह जीवात्मा तमोमय अज्ञान से आवर्त और कर्मफल से रंजित हो व्ही वर्ण ग्रहण कर अर्थार्त विभिन्न शरीरो के धर्मो को स्वीकार करके समस्त प्राणियों के शरीरो में घूमता रहता है. (9 -10 ) जब जीव तत्वज्ञान द्वारा अज्ञानजनित अंधकार को दूर कर देता है, तब उसके ह्रदय में सनातन ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है. (11 ) ऋषि-मुनि कहते है की ब्रह्म की प्राप्ति किसी किर्यात्म्क यंत्र से साध्य नही है. इसके लिए तो देवताओ सहित सम्पूर्ण जगत की और तुमको उन पुरषो की उपासना करनी चाहिए, जो जीवन्मुक्त है, अतएवं मै महृषीयो के समुदाय को नमस्कार करता हु. (12 ) पूर्वकाल की बात है की वत्रासुर को ऐस्वर्य भृष्ट हुआ देख शुक्राचार्य ने उससे पूछा,“ दानवराज”! तुम्हे देवताओ ने पराजित कर दिया है तो भी आजकल तुम्हारे चित्त मै किसी प्रकार की व्यथा नही है. इसका क्या कारण है? वत्रासुर ने कहा,“ ब्रह्मण! मैने सत्य और तप के प्रभाव से जीवो के आवागमन का रहस्य निश्चित रूप से जान लिया है, इसलिए मै उसके विषय मै हर्ष और शोक नही करता हु. (16 ) काल से प्रेरित हुए जीव अपने पापकर्मों के फलस्वरूप विवश होकर नरक मै डूबते है और पुण्य के फल से वे सबके सब स्वर्गलोग मै जाकर वहाँ आनंद भोगते है. ऐसा मनीषी पुरषो का कथन है. (17 ) इस प्रकार स्वर्ग अथवा नरक मै कर्मफल भोग द्वारा निश्चित समय व्यतीत करके भोगने से बचे हुए कर्म सहित काल की प्रेरणा से वे बारम्बार इस संसार में जन्म लेते रहते है. (18 ) इस प्रकार मैने सभी जीवो को जन्म-मरण के चककर मै पड़ा हुआ देखा है. शास्त्रो का भी ऐसा सिद्धांत है की "जैसा कर्म होता है, वैसा ही फल मिलता है. (20 ) प्राणी पहले ही सुख-दुःख तथा प्रिय और अप्रिय विषयो से विचरण करके कर्म के अनुसार मनुष्य योनि और देव योनि मै जाते है. (21 ) समस्त जीव-जगत विधाता से ही परिचालित हो सुख-दुःख पाता यही और समस्त प्राणी सदा चले हुए मार्ग पर ही चलते है. (२२) वत्रासुर ने कहा, मैने तपस्या के प्रभाव से जो ऐस्वर्य प्राप्त किया था, वह मेरे अपने ही कर्मो से नष्ट हो गया. तथापि मै धैर्य धारण करके उसके लिए शोक नही करता हु.(२३) –क्रमश. राजिंदर वैदिक


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अब्बा…!!! कुर्बानी तो हमने दी ना… फिर ये बकरे को दर्द क्यो हो रहा है.? सहमी हुई निगाहो...

अब्बा…!!! कुर्बानी तो हमने दी ना… फिर ये बकरे को दर्द क्यो हो रहा है.? सहमी हुई निगाहो से ये मासूम सवाल पूछने वाला नन्हा अली.. अपने बाप के हाथो मे खून से लाल छुरी देख रहा था कुछ देर पहले हुई वीभत्सता उसके दिलो दिमाग मे घूम रही रही थी… जब उसके बाप ने तेज धार की हुई छुरी थोडा नाप तौल कर बकरे की गर्दन पर फिराई थी और खून का पनियाला फुट पड़ा था सामने पडा बकरा गर्दन उतारे जाने के बाद भी हल्की हल्की जुम्बिश ले रहा था… जिसे देख मासूम अली को खौफ से झुरझुरी आ रही थी “ऐसा रिवाज है बेटा”.. अली के बाप ने जवाब दिया.. “एक बार इब्राहीम ने अल्लाह के लिए अपने सच्चे ईमान की तौल के लिए अपने बच्चे की कुर्बानी देनी चाही थी… जिससे अल्लाह ने खुश हो के बच्चे की जगह "दुम्बा” रख दिया था “तो अब्बा !! आप भी मेरी कुर्बानी दे दो… अल्लाह मेरी जगह भी दुम्बा रख देंगे”… मासूम अली ने कहा और अली के जवाब से लाजवाब अली का बाप मन ही मन अल्लाह पर अपने ईमान की तौल करता रहा शाम हो चुकी है अली के सवाल मटन की खुशबु से उल्लास मे बदल गए है बकरो की मिमियाहट शांत हो चुकी है पीछे रह गई… एक अजीब सी खामोशी..और दरवाजो पे खडे बकरो की खाल के लिए मोल भाव करते कसाई हवा मे ताजे गोश्त की दुर्गन्ध और नालो मे बहता बकरो का खून… और शायद किसी बकरे की “आह” “ऐ इन्सान…!!! गर्दन मेरी कटी खून मेरा बहा… दर्द मुझे हुआ और… कुर्बानी, शबाब और सारा पुण्य तेरा?” पीछे सवाल कई छूट गए है अल्लाह ने तो कुरान मे फरमाया नही की मुसलमान इब्राहीम की तर्ज पर कुर्बानी दे… तो कही जीभ पर लगे मटन के स्वाद ने तो इस रिवाज को पक्का करने मे भूमिका नही निभाई? मांसाहार का विरोध जायज नही… पर जानवरो का कत्ल सिर्फ कसाईखानो मे होना चाहिए… सडक पर बच्चो के हाथ मे छुरी थमा के उनसे जानवर जिबह कराना सामाजिक अपराध है कही ये रिवाज “दुनिया को दारुल ऐ इस्लाम” बनाने की कवायद मे जुटे जिहादियो द्वारा… बच्चो को “सर कलम” करने की ट्रेनिंग का प्रथम पाठ तो नही.? क्या अली के बाप को अल्लाह पर उसके ईमान की तौल मिल गई? बाकी सवालो का पता नही पर… एक जवाब हमे जरुर मिल गया है.. ●आज एक बाप… और एक रिवाज…. ने मिल कर एक बच्चे के अन्दर के इन्सान का कत्ल कर दिया है●


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१० आश्विन 26 सितम्बर 2015 😶 “ सत्पात्र में दान की महती महिमा ! ”...

१० आश्विन 26 सितम्बर 2015 😶 “ सत्पात्र में दान की महती महिमा ! ” 🌞 🔥🔥ओ३म् शतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त सं किर । 🔥🔥 🍃🍂 कृतस्य कार्यस्यि चेह स्फातिं समावह ।। 🍂🍃 अथर्व० ३ । २४ । ५ ऋषि:- भृगु: ।। देवता- वनस्पति: ।। छन्द:- अनुष्टुप् ।। शब्दार्थ- हे सौ हाथों वाले मनुष्य! तू इकट्ठा कर और हे हज़ार हाथों वाले! तू दान कर, बिखेर। (सौ-सौ सत्कार्यों से कमा और हज़ार-हज़ार हाथों से बाँट!) इस तरह अपने किये हुए की और किये जाने वाले की बढ़ती को, फसल को तू इस संसार में ठीक प्रकार से प्राप्त कर। विनय:- हे दो हाथों वाले मनुष्य! तू सौ हाथों वाला होकर धन संग्रह कर, सौ गुनी शक्ति से धन-धान्यादि ऐश्वर्यों को इकट्ठा कर, परन्तु इस उपार्जन किये हुए अपने धन को हज़ार हाथों वाला होकर सत्पात्र में दान कर दें। धन-संग्रह करने के लिए यदि तू सौ हाथों वाला हुआ है तो धन को दूर-दूर बाँट देने के लिए, दान कर देने के लिए तू हज़ार हाथों वाला हो जा। इससे निःसन्देह तेरी बढ़ती होगी, तेरी उन्नति होगी, तेरा बड़ा भारी कल्याण होगा। तू अपनी ‘कृत’ और 'कार्य’ कमाई को देख। तूने जो कमाया है वह तो कमाया ही है, वह तेरी 'कृत’-कमाई है; परन्तु जो तूने हज़ार हाथों से दूर-दूर अपने दान को फैलाया है वह भी तेरी कमाई है। वही कमाई वस्तुतः 'कार्य’ है जो भविष्य में अपना फल दिखलाएगी। वास्तव में, जैसे समाहत किये धान्य को सत्क्षेत्र में संकिरण कर देने से उसका एक-एक दाना हज़ारों दानों को देने वाले पौधे के रूप में पुष्पित और फलित हो जाता है, उसी प्रकार किसी यज्ञिय कार्य में दिया हुआ धन अनन्त गुणा होकर फलित हुआ करता है। इस प्रकार हे मनुष्य! तू देख की तू कितनी बड़ी भारी फसल का स्वामी हो जाता है, तू कितनी बड़ी भारी 'स्फाति’ को प्राप्त हो जाता है। यह बढ़ती 'शतहस्त से लेने और सहस्त्रहस्त से देने’ के सिद्धांत का फल है। हे मनुष्य! तू इस सिद्धांत का पालन करता हुआ अपनी इस बढ़ती को सदा ठीक प्रकार से प्राप्त करता रह। 🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂 ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 ……………..ऊँचा रहे 🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚


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ओ३म । 🌹 वैदिक विनय–37 ...

ओ३म । 🌹 वैदिक विनय–37 🌹 —————————————— 👉ऋग्वेद:10/57/6; ऋषि: बन्धु: सुबन्धु आदय: । देवता विश्वे देवा: । छंद: निचरद गायत्री । ——————————————— 👉हिंदी अर्थ,“ हे परमेस्वर! सोम को अपने शरीरों में मन शक्ति से धारण किये हुए हम लोग तुंहारे व्रत में है। तुमहारे व्रत का पालन करते है और प्रजा सहित हम लोग तुम्हरी सेवा करते रहें।” ———————————————- 👉सरल रहस्य विनय:- लेखक:- राजिंदर वैदिक। 👏 इस मन्त्र का ऋषि आप सब को बता रहा है की आपको अपना जीवन सहज, सरल तरीके से किस प्रकार जीना चाहिए। मनुष्य को चाहिए की परमेस्वर की समीपता पाने के लिए अपने शरीर के अंदर उपासना योग यज्ञ का अभ्यास करके मस्तिस्क के आकाश में “सोम” को धारण करना चाहिए। यह सोम क्या है? और इसको किस प्रकार मस्तिस्क के आकाश में धारण करना चाहिए।। मनुष्य जो भी खाता-पित है; अंत में वह सप्तम सार पदार्थ (वीर्य) जल- रस-समूह का रूप लेकर शरीर में रहता है। उपासना योग यज्ञ अभ्यास का साधक अपने मस्तिस्क की।ध्यान एकाग्रता नीचे पृथिवी तत्व (गुदा द्वार से थोडा ऊपर) पर लगाता है; फिर पेड़ू व् नाभि में। इस प्रकार नीचे-ऊपर वह विलोडन यहाँ पर करता रहता है। इस किर्या के परिणामस्वरूप यहाँ इस पदार्थ से ऊर्जा-शक्ति कण बनने लगते है; जो यहाँ नाभि से नीचे रहने वाले “अपान प्राण” के साथ मिल कर रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ मार्ग से होते हुए मस्तिस्क केआकाश में पहुँच जाते है और यहाँ पर रहने वाले “प्राण” और नीचे से आने वाले “अपान प्राण” के आपस में टकराने से यहाँ विधुत चमकती है; जैसे बाहर बादलो में बिजुली चमकती है। ऐसे ही मस्तिस्क के आकाश में ये ऊर्जा-शक्ति-कण बिजुली की तरह; चमकीले सितारों की तरह चमकते है। ये ही “सोम-रस” का पीना है। ये इतने शीतल है की सारे शरीर को रोमांचित, आनन्दित व् रुई की तरह हल्का कर देते है। यह सब मन-शक्ति का उपासना योग यज्ञ अभ्यास में प्रयोग करने से ही सम्भव होता है इस किर्या से साधक की साधारण बुद्धि विकास होकर “सरस्वती, ऋतम्भरा, प्रज्ञा, विवेक आदि का नाम ले लेती है और सूक्ष्म ज्ञान, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान धारण करने की क्षमता प्राप्त हो जाती है और अनेक प्रकार की शक्तियाँ मिल जाती है ।। फिर भी ऋषि इस उपासना योग यज्ञ अभ्यास के व्रत से हटता नही है।। बिना नागा किये दिन- रात में कई-कई बार करता है और अपने शरीर रूपी राज्य की प्रजा (अंग-प्रत्यंग, इन्द्रिया आदि) से आप परमेस्वर की सेवा करता रहता है।। हे परमेस्वर! उपासना योग यज्ञ अभ्यास में "सोम” को धारण करते हुए भी हम आपके व्रत में रहे; नियमो में रहे। हमारा शरीर, इन्द्रिया, प्राण, मन, बुद्धि आदि सब अंग-प्रत्यंग उपासना योग यज्ञ अभ्यास द्वारा आप में रमण करते रहे; गोता लगाते रहे।। शांत रहे; आनन्दित रहें। ——-राजिंदर वैदिक । 👏


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यजुर्वेद 8-14 (८-१४) सँवर्च॑सा॒ पय॑सा॒ सन्त॒नूभि॒रग॑न्महि॒ मन॑सा॒ स शि॒वेन॑ । त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ वि...

यजुर्वेद 8-14 (८-१४) सँवर्च॑सा॒ पय॑सा॒ सन्त॒नूभि॒रग॑न्महि॒ मन॑सा॒ स शि॒वेन॑ । त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ वि द॑धातु॒ रायो नु॑ मार्ष्टु त॒न्वो॒ यद्विलि॑ष्टम् ॥ भावार्थ:- मनुष्यों को चाहिये कि पुरूषार्थ से विघया का सम्पादन, विधिपूर्वक अन्न और जल का सेवन, शरीरों को नीरोग और मन को धर्म में निवेश करके सदा सुख की उन्नति करें और कुछ न्यूनता हो, उस को परिपूर्ण करें, तथा जैसे कोई मित्र तुम्हारे सुख के लिये वत्र्ताव वर्ते, वैसे उसके सुख के लिये आप भी वर्तो।। पंडित लेखराम वैदिक मिशन www.aryamantavya.in www.onlineved.com http://ift.tt/18FvwLS subscribe you tube channel “pandit lekhram”


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ओउम प्रकीर्ति पुरष नम: सामवेद संहिता : प्रथम अध्याय: प्रथम दशति: अथ आग्नेयं पर्व काण्ड अग्न...

ओउम प्रकीर्ति पुरष नम: सामवेद संहिता : प्रथम अध्याय: प्रथम दशति: अथ आग्नेयं पर्व काण्ड अग्न आयाहित्यस्या भारद्धाज ऋषि: —————————————— मंत्र:9 भावार्थ: राजिंदर वैदिक हे ज्ञानप्रद प्रकाशमान परमात्मा! आपको उपासना योग यज्ञ अभ्यास का ज्ञानी पुरुष मस्तिस्क के मूर्धन्य में, मस्तिष्क के हृदयाकाश में आविर्भूत प्रत्यक्ष करता है. प्रकाशित करता है. ———————- मंत्र:10 भावार्थ: राजिंदर वैदिक हे प्रकाशमान परमात्मा! पूर्ण रक्षा के लिए, सुख में बसाने वाले उपासनायोग यज्ञ अभ्यास कर्म को हमारे लिए पूर्ण कीजिये. क्योकि आप ही हमारे देखने के लिए प्रकाशक है. ——यह प्रथम दशति पूर्ण हुई —


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📢📢आर्य सत्र सूचना कराला गाँव📢📢 ओ३म् भूर्भुवः स्वः ।तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।धियो यो...

📢📢आर्य सत्र सूचना कराला गाँव📢📢 ओ३म् भूर्भुवः स्वः ।तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।धियो यो नःप्रचोदयात् ॥ राष्ट्रीय आर्य निर्मात्री सभा द्वारा संचालित वेद ज्ञान का दो दिवसीय लघु गुरुकुल ……. दो दिनों के इस लघु गुरुकुल में आने से आपको मिलेगा आत्मबल, ज्ञान, वीरता ,विवेक के साथ साथ आपके हजारों प्रश्नों के सटीक उत्तर भी | 1.महाभारत के बाद से लेकर आज तक सत्य सनातन वैदिक धर्म क्युं घटता जा रहा है ? 2.कौन कौन मत, पन्थ, सम्प्रदाय इसे हानि पहुँचा रहे हैं? 3.मुगलों ने इस धर्म मे क्या मिलावट की ? 4.परमात्मा, आत्मा और प्रकृति क्या है? और कैसे काम करती है ? 5.राष्ट्र पहले या धर्म ? 6.उपासना क्या है? और कैसे करते हैं? 7.ईश्वर का वस्त्विक नाम क्या है ? 8.हमारा आदि पवित्र ग्रंथ कौनसा है ? 9.परमात्मा के गुण, कर्म, स्वभाव क्या है ? 10.राष्ट्र की स्थिति और हमारा कर्तव्य क्या है ? 11.धर्म मे अर्थ का क्या महत्व है ? 12.भक्ति, उपासना, पूजा,भूत, प्रेत,श्राद्ध, तर्पण, शिव, जगदंबा, रुद्र शब्दो के अर्थ क्या है ? ये सब हम सनातनियों को जानना आवश्यक है| युवाओं व बच्चों में अच्छे संस्कारो के लिए देश और धर्म के लिये अपने प्रियजनों मित्रो के साथ कक्षा में बैठाकर केवल दो दिन का समय देकर अपने व अपनों के जीवन को धन्य बनायें… समय: दिनाँक 10-11 अक्टूबर दिन - शनिवार ,रविवार स्थान: बाजार पान्ना वाली चौपाल(नजदीक स्टेट बैंक ऑफ पटियाला) गाँव कराला दिल्ली 110081 यह दो दिवसीय आर्य प्रशिक्षण सत्र निःशुल्क है। परन्तु इससे प्राप्त होने वाला ज्ञान अमूल्य का है। भोजन व पेय आदि की उचित व्यवस्था रहेगी। निवेदक: आर्य समाज कराला सम्पर्क सूत्र: आर्य प्रदीप 8800227233 आर्य प्रदीप 9650791855 आर्य वरुण 9818979812


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Friday, September 25, 2015

“नम: शिवाय च शिवतराय च” - यजुर्वेद १६.४१ “शिव का सम्मान जितना मैं करता हूँ, उतना...

“नम: शिवाय च शिवतराय च” - यजुर्वेद १६.४१ “शिव का सम्मान जितना मैं करता हूँ, उतना कोई क्या करेगा ?” - महर्षि दयानन्द ————— स्थान : लाहौर वर्ष : १८७७ ई० पण्डित सोहनलाल जी ने स्वामी दयानन्द से आक्षेप करते हुए कहा - “आप संन्यास धर्म में होकर उसके विरुद्ध काम करते हैं ।” स्वामी जी ने पूछा कि - “मैं कौन-सा काम संन्यास के विरुद्ध करता हूँ ?” कहा कि - “आप शिव जी की निन्दा करते हैं ।” स्वामी जी ने उत्तर दिया कि - “मैं शिव की निन्दा नहीं करता हूँ । प्रत्युत जितना सम्मान शिव का मेरे मन में है, अन्य किसी के मन में क्या होगा ? उस कल्याण-स्वरूप शिव का तो सब सम्मान करते हैं । हाँ, तुम्हारा पथ्थर का शिव, जो जड़ अथवा मृत और मन्दिर के भीतर बन्द है, मैं उसको नहीं मानता और न उसका सम्मान करता हूँ, न वह सम्मान के योग्य है ।” इस पर वह निरुत्तर होकर चले गए । [सन्दर्भ ग्रन्थ : पण्डित लेखराम आर्यपथिक संगृहीत “महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन-चरित्र”, पृष्ठ ३१९-३२०, २००७ ई० संस्करण] टिप्पणी : ध्यातव्य है कि सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में स्वामी जी ने ‘शिव’ नाम के सम्बन्ध में लिखा है - “शिवु कल्याणे - इस धातु से 'शिव’ शब्द सिद्ध होता है । 'बहुलमेतन्निदर्शनम्’ (धातुपाठे चुरादिगणे) - इससे शिवु धातु माना जाता है । जो कल्याण-स्वरूप और कल्याण का करनेहारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम 'शिव’ है ।” संकलन : भावेश मेरजा


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हमारे धर्म के लोग अपने अपने अलग समप्रदाय चलाते हे उस सम्प्रदाय के लोग उस सम्प्रदाय बनाने वाले को...

हमारे धर्म के लोग अपने अपने अलग समप्रदाय चलाते हे उस सम्प्रदाय के लोग उस सम्प्रदाय बनाने वाले को पूजने लग जाते हे उसी नश्वर जीने मरने सुखी दुखी होने बीमार पड़ने वाले व्यक्ति का नाम जपने लग जाते हे और अविनाशी अखण्ड परमात्मा ईश्वर को भूल जाते हे अरे रामजी ने कृष्णजी ने कोण सा सम्प्रदाय चलाया था वो धर्म क्या हे जो रामजी और कृष्णजी मानते थे जानते थे व् पालन करते थे ??? क्या रामजी शेव शाक्त जेन वैश्णव स्वाध्याय परिवारी स्वामिनारायण राधास्वामी धननिरंकार सम्परदाय के थे??? दिखावो पर मत जाओ अपनी अक्ल लगाओ वेद मत एक मत


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Thursday, September 24, 2015

🌹🌹🌹ओउम्🌷🌷🌷 भूपेश आर्य~8954572491 🌻आर्य शब्द तर्क की कसोटी पर:-🌻 हमारा सबसे पुराना व गौणिक नाम आर्य...

🌹🌹🌹ओउम्🌷🌷🌷 भूपेश आर्य~8954572491 🌻आर्य शब्द तर्क की कसोटी पर:-🌻 हमारा सबसे पुराना व गौणिक नाम आर्य है।जिसका अर्थ है श्रेष्ठ,सभ्य,भला,साधु,सज्जन,विद्वान,धार्मिक,कर्तव्यपरायण,शान्त चित्त,उदार चित्त,परोपकारी,सर्व हितकारी,न्याय मार्गावलम्बी,सत्यधर्म प्रचारक,चरित्रवान,एक निराकार न्यायकारी,सर्व शक्तिमान,ईश्वर का उपासक,सन्मार्गी आदि । ये लक्षण जिस व्यक्ति में पाये जायें वह व्यक्ति विश्व के किसी भी भू-खण्ड में रहता हो वह व्यक्ति आर्य है। लेकिन दु:ख है कि जनमानस में कुछ अल्पज्ञ व तथाकथित पढे लिखे लोग भी आर्य शब्द सुनकर भडककर चौंक व चिढ पडते हैं और असंगत ज्ञान,बुद्धि तर्क की दीवार खडी करने का प्रयास करने लगते हैं।राम ने रामायण में अपने को आर्य कहा व श्रीक्रष्ण जी ने अपने को महाभारत में आर्य कहा,हिन्दू नहीं। आर्य नाम मानव के लिए सर्वश्रेष्ठ,गौरवपूर्ण उपाधि व कर्मों की उत्क्रष्टता का परिचायक है। 🌹अब देखिये आर्य शब्द के प्रमाण स्रष्टि की समकालीन पुस्तक ऋग्वेद में- 👏१.क्रणवन्तो विश्वमार्यम। अर्थ-सारे संसार को आर्य बनाओ। मनुस्म्रति में- 👏२.मद्द मांसा पराधेषु गाम्या पौरा: न लिप्तका:। आर्या ते च निमद्दन्ते सदार्यावर्त्त वासिन:।। अर्थ-वे ग्राम व नगरवासी जो मद्द,मांस और अपराधों में लिप्त न हो तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं वे ‘आर्य’ कहे जाते हैं। बाल्मीकि रामायण में- 👏३.सर्वदा मिगत: सदिश: समुद्र इव सिन्धुभि:। आर्य सर्व समश्चैव व सदैव प्रिय दर्शन:।। अर्थ-जिस तरह नदियां समुद्र के पास जाती हैं उसी तरह जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं वें आर्य हैं जो सब पर समद्रष्टि रखते हैं हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं। महाभारत में- 👏४.न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त।न दर्पयासे हति नास्तिमेति। न दुगेतोपीति करोव्य कार्य।तमार्य शीलं परमाहुरार्या।।(उद्दोग पर्व) अर्थ-जो अकारण किसी से वैर नहीं रखते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते उन शील पुरुषों को 'आर्य’ कहते हैं। वशिष्ठ स्म्रति में- कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्य माचरन। तिष्ठति प्रक्रताचारे य: स आर्यं स्म्रत:।। अर्थ-जो रंग,रुप,स्वभाव,शिष्टता,धर्म,कर्म,ज्ञान और आचार-विचार तथा शील स्वभाव में श्रेष्ठ हो उसे 'आर्य’ कहते हैं। निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं- 👏६.आर्य ईश्वर पुत्र हैं। विदुर नीति में- 👏७.आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते। हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ।।। अर्थ-भरत कुल भूषण! पण्डित जन्य जो श्रेष्ठ कर्म कर्मों मे रुचि रखते हैं,उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं वही 'आर्य’ हैं। गीता में- 👏८.अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्तिं करमर्जुन।(अध्याय २ श्लोक २) अर्थ-हे अर्जुन तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है। नीतिकार के शब्दों में- 👏१०.प्राय: कन्दुपातेनोत्पतत्यार्य: पतन्नपि। तथा त्वनार्ष पतति म्रत्पिण्ड पतनं यथा।। अर्थ-आर्य पाप से च्युत होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है अर्थात् पतन से अपने आपको बचा लेता है, अनार्य पतित होता है तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता। धम्म पद में- 👏१२.अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमती पण्डितो। अर्थ-पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है। पाणिनि सूत्र में- 👏१३.आर्यो ब्राह्मण कुमारयो:। ब्राह्मणों में 'आर्य’ ही श्रेष्ठ है। काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर- 👏१४.आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्ध:। अर्थ-आर्य धर्म से इतर(अलग) लोगों का प्रवेश वर्जित है। आर्यों के सम्वत् में- 👏१५.जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते। ऐसा वाक्य बोलकर हमारे पौराणिक भाई भी संकल्प पढते हैं अर्थात् यह आर्यों का देश 'आर्यावर्त’ है। राष्ट्र कवि “मैथिलीशरण गुप्त” जी अपनी पुस्तक भारत भारती में लिखते हैं- 👏यह पुण्य भूमि प्रसिद्ध है, इसके निवासी आर्य हैं। विद्दा,कला,कौशल में, सबके प्रथम आचार्य हैं।। आभाष ईश्वर जीव का, केवल्य तक किसने किया। सुन लो प्रति ध्वनि हो रही, यह कार्य आर्यों ने किया।। कवि “नरदेव” जी के शब्दों में देखिये- 👏उदय अस्त लौ राज्य किया था,आर्य वीर नरेशों ने। कन्याओं का दान किया था,आकर यहां भुवनेशों ने।। सेल्यूकस की हेलन लाली,चन्द्र गुप्त की थी घर वाली। अमरीका ईरान काँपते,ऐसे थे क्षत्रीय बलशाली।। इसलिये- अब तो जाग मेरी आर्य जाति,बीता बहुत जमाना। अगर आंख नहीं खोली तो,लुट जाये सभी खजाना।। अरबों वर्ष सकल धरती पर,ध्वज तेरा लहराया। चक्रवर्ती उदय अस्त लौ,राज्य तेरा कहलाया।। अमरीका,ईरान,चीन को,तूने कभी पाठ पढाया। कर दी कन्या दान तुझे,अपना दामाद बनाया।। आज वही चाहते हैं तेरा,नामो निशां मिटाना। अब तो जाग मेरी आर्य जाति,बीता बहुत जमाना।। ~~~~~इति ओउम्~~~~~~


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🌹🌹🌹ओउम्🌷🌷🌷 भूपेश आर्य~8954572491 🌻आर्य शब्द तर्क की कसोटी पर:-🌻 हमारा सबसे पुराना व गौणिक नाम आर्य...

🌹🌹🌹ओउम्🌷🌷🌷 भूपेश आर्य~8954572491 🌻आर्य शब्द तर्क की कसोटी पर:-🌻 हमारा सबसे पुराना व गौणिक नाम आर्य है।जिसका अर्थ है श्रेष्ठ,सभ्य,भला,साधु,सज्जन,विद्वान,धार्मिक,कर्तव्यपरायण,शान्त चित्त,उदार चित्त,परोपकारी,सर्व हितकारी,न्याय मार्गावलम्बी,सत्यधर्म प्रचारक,चरित्रवान,एक निराकार न्यायकारी,सर्व शक्तिमान,ईश्वर का उपासक,सन्मार्गी आदि । ये लक्षण जिस व्यक्ति में पाये जायें वह व्यक्ति विश्व के किसी भी भू-खण्ड में रहता हो वह व्यक्ति आर्य है। लेकिन दु:ख है कि जनमानस में कुछ अल्पज्ञ व तथाकथित पढे लिखे लोग भी आर्य शब्द सुनकर भडककर चौंक व चिढ पडते हैं और असंगत ज्ञान,बुद्धि तर्क की दीवार खडी करने का प्रयास करने लगते हैं।राम ने रामायण में अपने को आर्य कहा व श्रीक्रष्ण जी ने अपने को महाभारत में आर्य कहा,हिन्दू नहीं। आर्य नाम मानव के लिए सर्वश्रेष्ठ,गौरवपूर्ण उपाधि व कर्मों की उत्क्रष्टता का परिचायक है। 🌹अब देखिये आर्य शब्द के प्रमाण स्रष्टि की समकालीन पुस्तक ऋग्वेद में- 👏१.क्रणवन्तो विश्वमार्यम। अर्थ-सारे संसार को आर्य बनाओ। मनुस्म्रति में- 👏२.मद्द मांसा पराधेषु गाम्या पौरा: न लिप्तका:। आर्या ते च निमद्दन्ते सदार्यावर्त्त वासिन:।। अर्थ-वे ग्राम व नगरवासी जो मद्द,मांस और अपराधों में लिप्त न हो तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं वे ‘आर्य’ कहे जाते हैं। बाल्मीकि रामायण में- 👏३.सर्वदा मिगत: सदिश: समुद्र इव सिन्धुभि:। आर्य सर्व समश्चैव व सदैव प्रिय दर्शन:।। अर्थ-जिस तरह नदियां समुद्र के पास जाती हैं उसी तरह जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं वें आर्य हैं जो सब पर समद्रष्टि रखते हैं हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं। महाभारत में- 👏४.न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त।न दर्पयासे हति नास्तिमेति। न दुगेतोपीति करोव्य कार्य।तमार्य शीलं परमाहुरार्या।।(उद्दोग पर्व) अर्थ-जो अकारण किसी से वैर नहीं रखते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते उन शील पुरुषों को 'आर्य’ कहते हैं। वशिष्ठ स्म्रति में- कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्य माचरन। तिष्ठति प्रक्रताचारे य: स आर्यं स्म्रत:।। अर्थ-जो रंग,रुप,स्वभाव,शिष्टता,धर्म,कर्म,ज्ञान और आचार-विचार तथा शील स्वभाव में श्रेष्ठ हो उसे 'आर्य’ कहते हैं। निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं- 👏६.आर्य ईश्वर पुत्र हैं। विदुर नीति में- 👏७.आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते। हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ।।। अर्थ-भरत कुल भूषण! पण्डित जन्य जो श्रेष्ठ कर्म कर्मों मे रुचि रखते हैं,उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं वही 'आर्य’ हैं। गीता में- 👏८.अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्तिं करमर्जुन।(अध्याय २ श्लोक २) अर्थ-हे अर्जुन तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है। नीतिकार के शब्दों में- 👏१०.प्राय: कन्दुपातेनोत्पतत्यार्य: पतन्नपि। तथा त्वनार्ष पतति म्रत्पिण्ड पतनं यथा।। अर्थ-आर्य पाप से च्युत होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है अर्थात् पतन से अपने आपको बचा लेता है, अनार्य पतित होता है तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता। धम्म पद में- 👏१२.अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमती पण्डितो। अर्थ-पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है। पाणिनि सूत्र में- 👏१३.आर्यो ब्राह्मण कुमारयो:। ब्राह्मणों में 'आर्य’ ही श्रेष्ठ है। काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर- 👏१४.आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्ध:। अर्थ-आर्य धर्म से इतर(अलग) लोगों का प्रवेश वर्जित है। आर्यों के सम्वत् में- 👏१५.जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते। ऐसा वाक्य बोलकर हमारे पौराणिक भाई भी संकल्प पढते हैं अर्थात् यह आर्यों का देश 'आर्यावर्त’ है। राष्ट्र कवि “मैथिलीशरण गुप्त” जी अपनी पुस्तक भारत भारती में लिखते हैं- 👏यह पुण्य भूमि प्रसिद्ध है, इसके निवासी आर्य हैं। विद्दा,कला,कौशल में, सबके प्रथम आचार्य हैं।। आभाष ईश्वर जीव का, केवल्य तक किसने किया। सुन लो प्रति ध्वनि हो रही, यह कार्य आर्यों ने किया।। कवि “नरदेव” जी के शब्दों में देखिये- 👏उदय अस्त लौ राज्य किया था,आर्य वीर नरेशों ने। कन्याओं का दान किया था,आकर यहां भुवनेशों ने।। सेल्यूकस की हेलन लाली,चन्द्र गुप्त की थी घर वाली। अमरीका ईरान काँपते,ऐसे थे क्षत्रीय बलशाली।। इसलिये- अब तो जाग मेरी आर्य जाति,बीता बहुत जमाना। अगर आंख नहीं खोली तो,लुट जाये सभी खजाना।। अरबों वर्ष सकल धरती पर,ध्वज तेरा लहराया। चक्रवर्ती उदय अस्त लौ,राज्य तेरा कहलाया।। अमरीका,ईरान,चीन को,तूने कभी पाठ पढाया। कर दी कन्या दान तुझे,अपना दामाद बनाया।। आज वही चाहते हैं तेरा,नामो निशां मिटाना। अब तो जाग मेरी आर्य जाति,बीता बहुत जमाना।। ~~~~~इति ओउम्~~~~~~


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🅿🅿✅अति विशिष्ट व्यक्ति / V I P कौन है? 🙏 क्या आप को जानकारी है...

🅿🅿✅अति विशिष्ट व्यक्ति / V I P कौन है? 🙏 क्या आप को जानकारी है कि………… 💥1)अमेरिका में सिर्फ दो तरह के लोगों को वी आई पी मानते हैं : वैज्ञानिक और शिक्षक । 💥2) फ्रांस के न्यायालय में सिर्फ शिक्षकों को ही कुर्सी पर बैठने का अधिकार है। 💥3) जापान में पुलिस सरकार से अनुमति लेने के बाद ही किसी शिक्षक को गिरफ्तार कर सकती है। 💥4) कोरिया में हर शिक्षक को वे सारे अधिकार प्राप्त हैं, जो भारत के मंत्री को प्राप्त हैं, सिर्फ अपना आय कार्ड दिखा कर । 💥5) अमेरिकन तथा यूरोपीय देशों में प्राथमिक अध्यापक को सर्वाधिक वेतन मिलता है, क्योंकि कच्ची मिट्टी को वे ही पक्का करते हैं । 🔴और भारत में यदि शिक्षक यदि अपने वेतन के लिए या छात्रों की उन्नति के लिए किसी गलत नियम के विर्रुद्ध कोई आवाज़ उठाये या आंदोलन करे तो भारतीय पुलिस उन्हें डंडे मारती है । 🚷एक ऐसा समाज, जहाँ शिक्षकों का अपमान होता रहेगा, वहाँ सिर्फ चोर, डाकू, लुटेरे और भ्रष्टाचारी लोग ही पनपते है। 🇮🇳🚩शिक्षक बचाओ, देश बचेगा🚩🇮🇳


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८ आश्विन 24 सितम्बर 2015 😶 “ विविध पताकाएँ ! ” 🌞 🔥🔥ओ३म् गायन्ति त्वा...

८ आश्विन 24 सितम्बर 2015 😶 “ विविध पताकाएँ ! ” 🌞 🔥🔥ओ३म् गायन्ति त्वा गायत्रिणोSर्चन्त्यर्कमर्किण: । 🔥🔥 🍃🍂 ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ।। 🍂🍃 ऋ० १ । १० । १ ऋषि:- मधुच्छन्दा: ।। देवता- इन्द्र: ।। छन्द:- विराडनुष्टुप् ।। शब्दार्थ- साम-गान करनेवाले तेरे ही गीत गाते हैं मन्त्रों, ऋचाओं से स्तुति करने वाले तुझ देव का ही पूजन करते हैं, एवं, सब ज्ञानी लोग हे असंख्य प्रकार की प्रज्ञा व कर्मवाले! तुझे ही, तेरी महिमा को ही ध्वजादण्ड की तरह ऊँचा उठाते हैं। विनय:- हे भगवन्! जिसने जिस रूप में तुम्हारी महिमा का अनुभव किया होता है वह उसी रूप में तुम्हारा वर्णन करता है और उसी रूप में तुम्हें देखता है। तुम तो शतक्रतु हो, तुम्हारा अनन्त ज्ञान, कर्म और गुण संसार में सैंकड़ों प्रकार से प्रकट हो रहा है, अनुभूत हो रहा है, अतः प्रत्येक मनुष्य तेरा भजन अपने-अपने अनुभव के अनुसार भित्र-भित्र तरीके से कर रहा है। भित्र-भित्र प्रकार से तुझे अनुभव कर भित्र-भित्र प्रकार से ही सब कोई तुझसे मिलने का-तेरी ओर पहुँचने का-यत्न कर रहा है। कोई गा-गाकर तुझसे अपनी समीपता करना चाहता है, तो कोई इसके लिए स्तुति-पाठ करता है, या ध्यान करता है। यह सब शतक्रतो! अपने-अपने तरीके से तेरी ही अनुभूति का प्रकाशन करना है, अपने-अपने तरीके से तेरे ही झण्डे को ऊँचा करना है। अरे, ये नाना मत-मतान्तरवाले, ये नाना तरह से उपासना करनेवाले इन सब तरीकों में तेरी ही महिमा को, तेरे ही प्रचार को क्यों नहीं अनुभव करते? ओह, तू तो इन सबमें है। सचमुच, मुग्ध करनेवाले साम के दिव्य गायनों में तू है, गन्धर्वों की वाणी में तू है और मस्ती से गाई जाती हुई भक्त की सुरीली तानों में तू है। उपासक के अनवरत जप में तू है, सच्चे व्याख्याता के व्याख्यान में तू है और अडोल आसन लगाकर बैठे योगी के एकतान ध्यान में तू है। सब मन्त्रों में, सब सन्तों की वाणी में, सब प्रकार के भजनों में तू है, क्योंकि इन सभी साधनों से तेरा ही भक्तवंश बढ़ता है, जगत् में तेरी भक्ति का प्रसार होता है। ये सब भजन-साधन और कुछ नहीं हैं, ये सब नाना प्रकार से उठाये गये तेरी महिमा के रंग-बिरंगे झण्डे हैं। अहा! देखने योग्य दृश्य है। संसार के सब ज्ञानी पुरुष तेरे सम्मान के लिए, तेरी महिमा को ऊँचा उठाने के लिए इन अपनी विविध प्रकार की भजनरूपी तरह-तरह की ध्वजाओं को ऊँचे उठाये हुए चल रहे हैं; सभी ज्ञानी पुरुष तेरे सम्मान में अपने-अपने ध्वजादण्ड उठाये चले जा रहे हैं। आहा, यह क्या ही दर्शनीय दृश्य है। 🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂 ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 ……………..ऊँचा रहे 🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚


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जरूर पढ़ें 🎯 ========= एक नगर के राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला...

जरूर पढ़ें 🎯 ========= एक नगर के राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा, तब जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु को हाथ लगा दिया वह वस्तु उसकी हो जाएगी ! इस घोषणा को सुनकर सभी नगर-वासी रात को ही नगर के दरवाज़े पर बैठ गए और सुबह होने का इंतजार करने लगे ! सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं अमुक वस्तु को हाथ लगाऊंगा ! कुछ लोग कहने लगे मैं तो स्वर्ण को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग कहने लगे कि मैं कीमती जेवरात को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग घोड़ों के शौक़ीन थे और कहने लगे कि मैं तो घोड़ों को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग हाथीयों को हाथ लगाने की बात कर रहे थे, कुछ लोग कह रहे थे कि मैं दुधारू गौओं को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग कह रहे थे कि राजा की रानियाँ बहुत सुन्दर है मैं राजा की रानीयों को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग राजकुमारी को हाथ लगाने की बात कर रहे थे ! कल्पना कीजिये कैसा अद्भुत दृश्य होगा वह !! उसी वक्त महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगाने दौड़े ! सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगा दूँ ताकि वह वस्तु हमेशा के लिए मेरी हो जाएँ और सबके मन में यह डर भी था कि कहीं मुझ से पहले कोई दूसरा मेरी मनपसंद वस्तु को हाथ ना लगा दे ! राजा अपने सिंघासन पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था ! कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था और कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था ! उसी समय उस भीड़ में से एक छोटी सी लड़की आई और राजा की तरफ बढ़ने लगी ! राजा उस लड़की को देखकर सोच में पढ़ गया और फिर विचार करने लगा कि यह लड़की बहुत छोटी है शायद यह मुझसे कुछ पूछने आ रही है ! वह लड़की धीरे धीरे चलती हुई राजा के पास पहुंची और उसने अपने नन्हे हाथों से राजा को हाथ लगा दिया ! राजा को हाथ लगाते ही राजा उस लड़की का हो गया और राजा की प्रत्येक वस्तु भी उस लड़की की हो गयी ! जिस प्रकार उन लोगों को राजा ने मौका दिया था और उन लोगों ने गलती की; ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमे हर रोज मौका देता है और हम हर रोज गलती करते है ! हम ईश्वर को हाथ लगाने अथवा पाने की बजाएँ ईश्वर की बनाई हुई संसारी वस्तुओं की कामना करते है और उन्हें प्राप्त करने के लिए यत्न करते है पर हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि यदि ईश्वर हमारे हो गए तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु भी हमारी हो जाएगी ! सच कहूँ तो : “ ईश्वर को चाहना और ईश्वर से चाहना दोनों में बहुत अंतर है।”


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🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 —~~~***★॥ओ३म्॥★***~~~ ★प्रिय बन्धुओं★ क्या आप मानते हैं ★ ★Prevention is better than...

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 —~~~***★॥ओ३म्॥★***~~~ ★प्रिय बन्धुओं★ क्या आप मानते हैं ★ ★Prevention is better than cure. इसलिये [ आपका यह मित्र आपके लिये बनाता है ] —~~***★जीवन रक्षक ★***~~— First product “रामबाण चूर्ण"“ के बाद हमारा Second product :— ★ Super Health Preventor ★ यह चूर्ण ऊर्जा, स्फूर्ति, ताजगी व जीवटता प्रदान करता है। तनाव के क्षणों में शांत व स्थिर बनाए रखने में सहायक है। कैंसररोधी हार्मोन्स की सक्रियता बढ़ाता है। रक्त में शर्करा तथा कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करता है व रक्त को पतला करता है। जोड़ों का कड़ापन कम करता है। प्राकृतिक रेचक गुण होने से पेट साफ रखता है। हृदय संबंधी रोगों के खतरे को कम करता है। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है। त्वचा को स्वस्थ रखता है एवं सूखापन दूर कर एग्जिमा आदि से बचाता है। बालों व नाखून की वृद्धि कर उन्हें स्वस्थ व चमकदार बनाता है। इसका नियमित सेवन रजोनिवृत्ति संबंधी परेशानियों से राहत प्रदान करता है। ऐंठन को कम कर गर्भाशय को स्वस्थ रखता है। इसका सेवन त्वचा पर बढ़ती उम्र के असर को कम करता है। इसका सेवन भोजन के पहले या भोजन के साथ करने से पेट भरने का अनुभव होने से भूख कम लगती है। इसके रेशे पाचन को सुगम बनाते हैं, इस कारण वजन नियंत्रण करने में सहायक है। चयापचय की दर को बढ़ाता है एवं यकृत को स्वस्थ रखता है। प्राकृतिक रेचक गुण होने से पेट साफ रख कब्ज से मुक्ति दिलाता है। यह मातृशक्ति के लिये उत्साह, बांझपन, गर्भपात, दुग्धअल्पता की महान औषधि है व सभी यौन समस्याओं के सारे उपचारों से सर्वश्रेष्ठ और सुरक्षित है। यह ओषधी डोपामीन, नाइट्रिक ऑक्साइड, नोरइपिनेफ्रीन, ऑक्सिटोसिन, सीरोटोनिन, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स का जबरदस्त आयुर्वेदिक विकल्प है। इसमें शुगर, प्रोटिन, कैल्शियम, जिंक फास्फोरस, पोटेशियम, आयरन, केरोटिन, थायमिन, राइबोफ्लेविन और नियासिन है। यह गनोरिया, नेफ्राइटिस, अस्थमा, सिस्टाइटिस, कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, कब्ज, बवासीर, एक्जिमा, अस्थमा, सर्दी-जुकाम, खांसी के उपचार में बहूत उपयोगी है। इसमें ओमेगा-3 और ओमेगा-6 नाम के अम्ल होते हैं जो आपके शरीर के कोलोस्ट्रोल को संतुलित करतें है। वात, पित्त और कफ को संतुलित करता है। इसमें मुख्य रूप से ग्लिसराइड्स व अनेक महत्वपूर्ण वसीय अम्ल जैसे लिनोलिक व लिनोलेनिक एसिड, पामिटिक, स्टियरिक, ओलिक एसिड के अलावा आमेगा 3 फेटी एसिड है जो हृदय को स्वस्थ रखते हैं। इसमें कोलेस्ट्रॉल व सोडियम की मात्रा अत्यंत कम तथा रेशे की मात्रा प्रचुर है। कैंसररोधी हार्मोन्स को प्रभावी बनाता हैं, विशेषकर पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर व महिलाओं में स्तन कैंसर की रोकथाम में इसका सेवन कारगर है। इसमें प्लांट हार्मोन लिगनन्म की मात्रा प्रचुर है। जो कैंसर से बचाव व हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक होता है। यह ओषधी आपकी त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनायेगी। आपके केश काले, घने, मजबूत, चमकदार और रेशमी हो जायेंगे। यह आपकी देह को ऊर्जावान और मांसल बना देगा। शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी रहेगी, न क्रोध आयेगा और न कभी थकावट होगी। मन सकारात्मक, शांत और दिव्य हो जायेगा। इसमें ओमेगा-3 फैट, आर्जिनीन, लिगनेन, सेलेनियम, जिंक और मेगनीशियम होते हैं जो कि मातृशक्ति के लिये हार्मोन्स, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स (आकर्षण के हार्मोन) के निर्माण के मूलभूत घटक हैं। टेस्टोस्टिरोन ईच्छा को चरम स्तर पर रखता है। इसमें विद्यमान ओमेगा-3 फैट और लिगनेन इन्द्रियों में रक्त के प्रवाह को बढ़ाता हैं, जिससे कार्यक्षमता बढ़ता है। इसके अलावा ये शिथिल पड़ी क्षतिग्रस्त नाड़ियों का कायाकल्प करता हैं जिससे मस्तिष्क और कर्मेन्द्रियों के बीच सूचनाओं एवं संवेदनाओं का प्रवाह दुरुस्त हो जाता है। नाड़ियों को स्वस्थ रखने में यह विद्यमान लेसीथिन, विटामिन बी ग्रुप, बीटा केरोटीन, फोलेट, कॉपर आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके सेवन से देह के सारे चक्र खुल जाते हैं, पूरे शरीर में दैविय ऊर्जा का प्रवाह होता है। —~~***★ सेवन विधि ★***~~— यह औषधी दिन में दो बार सुबह-शाम एक चम्मच पावडर (पाँच ग्राम) एक गिलास गुन-गुनें दूध, पानी या ताजा जूस के साथ लेना है। सुबह नाश्ते के साथ व शाम को भोजन से 10 मिनिट पहले लें। —~~~***★॥ मूल्य ॥★***~~~— ★ प्रति पैकेट (250ग्राम) = 200 रूपये [ प्रचारार्थ दिवाली तक मूल्य 150 रू० है ] ★ कोरियर/वी.पी.पी. शुल्क अतिरिक्त ★ धनराशि अग्रिम (advance) देनी है। ★ Axis Bank a/c no. ★ Omprakash singh ★ Karkardooma (Delhi) ★ IFSC– UTIB0000372 ★ A/C-913010027880698 –~***★निर्माता सम्पर्क सूत्र★***~– ★ मोबाइल व वाट्सेप नम्बर ★ 09711046874 ★ 09711617591 –~~~***★To Order★***~~~– ★ अोषधि मंगाने के लिये चाहिये :- ★ नाम ——- s/o श्री —– ★ पूरा पता —————- ★ पिन कोड़ न० ————- ★ मोबाइल न० ————– —~~~***★॥ओ३म्॥★***~~~— ★॥ जीवन के रंग जीवन-रक्षक के संग ॥ –~~**★॥एक नम्र निवेदन॥★**~~– ॥ कृपया यह संदेश सभी मित्रों को भेजें ॥ ॥ आप सुखी है तो अन्य को भी सुखी करें॥ [Please do'nt ignore your health] —~~~***★॥ १०८ ॥★***~~~— 💓💪🏃💃🙏💃🏃💪💓


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🌺गृहस्थ जीवन व्यवहार विचार 🌺 👉संग्रह कर्ता :- राजिंदर...

🌺गृहस्थ जीवन व्यवहार विचार 🌺 👉संग्रह कर्ता :- राजिंदर वैदिक —————————————- 👉दूसरों की भलाई करो। परोपकारी से मित्रता करो। दया, स्नेह और करुणा अपनाओ। स्नेहपूर्ण ह्रदय सबसे बड़ा धन है। दुर्गुण बुरी चीज़ है; उसे पनपने न दो। अपने दुर्गुण दूर करो। अपने को सागर की तरह गम्भीर बनाओ। अच्छे विचारों को रत्न बनाओ। मन को जल के समान स्वच्छ रखो। 🌺 स्वास्थ्य से बड़ा कोई लाभ नही। सन्तोष से बड़ा कोई धन नही। प्रेम से बड़ी कोई प्राप्ति नही है। द्वेष के समान कोई अपराध नही। जाति- पाती का भेदभाव कदापि ठीक नही। ———-राजिंदर वैदिक


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🌺गृहस्थ जीवन व्यवहार विचार 🌺 👉जो मनुष्य नियमो को उत्तम ढंग से पालन करता हुआ श्रेष्ठ कर्मो को करता...

🌺गृहस्थ जीवन व्यवहार विचार 🌺 👉जो मनुष्य नियमो को उत्तम ढंग से पालन करता हुआ श्रेष्ठ कर्मो को करता है; वो जनता का नेतृत्व करता है; और उनकी रक्षा व् पालन का विचार करता है। अतः सत्य का पालन करते हुए श्रेष्ठ कर्मो को करना चाहिए; ऐसा करने पर उच्च अधिकार प्राप्त होते है। 👉जीवन में किसी बात की अति न करो। संतुलित जीवन जिओ। अहिंसा का पालन करो। किसी को सताओ नही। हत्या न करो। पशुओं की बलि देना ठीक नही है। भाई-चारे का जीवन अपनाओ। प्रेम का व्यवहार करो। पवित्रता से जीवन बिताओ। सत्य का पालन करो। घृणा को घृणा से नही ; बल्कि प्रेम से जीतों। प्रेम से घृणा समाप्त हो जाती है। दुसरों के दुःख को देखकर प्रसन्न होना अच्छा काम नही है। ——-राजिंदर वैदिक


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Wednesday, September 23, 2015

भाद्रपद शुक्ल एकादशी वि.सं२०७२ २४ सितम्बर २०१५ 😶 “ मधु-शास्त्र विद्या की...

भाद्रपद शुक्ल एकादशी वि.सं२०७२ २४ सितम्बर २०१५ 😶 “ मधु-शास्त्र विद्या की महिमा ! ” 🌞 🔥🔥 ओ३म् जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम् । 🔥🔥 🍃🍂 ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि ।। 🍂🍃 अथर्व० १ । ३४ । २ ऋषि:- अथर्वा ।। देवता- मधुवनस्पति: ।। छन्द:- अनुष्टुप् ।। शब्दार्थ- मेरी जिह्वा के अग्रभाग में मिठास हो और जिह्वा के मूल में और भी अधिक मिठास, मिठास का झरना हो। हे मधो! तू अवश्य ही मेरे प्रत्येक कर्म में, प्रत्येक बुद्धि में विद्यमान रह और तू मेरे अन्त:करण के चित्तप्रदेश तक पहुँच जा, व्याप्त हो जा। विनय:- मैं माधुर्य-प्राप्ति की साधना में लगा हूँ। संसार की प्रत्येक वस्तु के सेवन द्वारा मैं अपने में मधुरता बसाना चाहता हूँ। हे माधुर्य! तुम मेरे सम्पूर्ण जीवन में घुल जाओ और मेरे सम्पूर्ण जीवन को माधुर्यमय कर दो। मैं वाणी से मीठा ही बोलूँ। मेरी जीभ के अग्रभाग में मधु हो और मेरे जीभ का मूल और भी अधिक मधु से भरा हो। हे मधुमय प्रभो! माधुर्य को न समझनेवाले मनुष्य केवल काम निकालने के लिए भी मधुरता का आश्रय लेते हैं, अतः वे ऊपर के व्यवहार में, दिखावट में, मधुरता ले आना काफी समझते हैं। वे जिह्वा-मूल में, अन्दर-अन्दर रखते हुए भी जिह्वाग्र में प्रेम और माधुर्य ही प्रकट करते हैं, पर उन्हें मालुम नहीं कि ऐसे धोखे के माधुर्य से कटुता ही लाख दर्जे अच्छी है। ऐसे झूठे माधुर्य से वास्तव में कोई भी काम सिद्ध नहीं होता। वे बेचारे माधुर्य की असली अपार शक्ति को, मैत्री के महाबल को नहीं समझते, अतः मेरी वाणी से तो जो प्रेममय मधु झरा करता है वह सदा मेरी वाणी-मूल से, मेरे ह्रदय से, मेरे प्रेमभरे मानसस्त्रोत से ही आकर झरता है। मेरा एक-एक कर्म भी मधुमय पुष्पों को बरसाता है। हे माधुर्य! तुम मेरी प्रत्येक चेष्टा में, प्रत्येक गति में, प्रत्येक व्यवहार में न केवल समाये हुए रहो, अपितु मेरी प्रत्येक सोच में, प्रत्येक विचार में, प्रत्येक निश्चय में तुम्हारा वास हो। मेरे अहर्निश का एक-एक संकल्प भी मधुमय हो। हे मधो! तुम मेरे सम्पूर्ण अन्तःकरण में ऐसे रम जाओ कि मेरा चित्तप्रदेश भी इससे अव्याप्त न रहे, अर्थात् मेरी एक-एक वासना भी माधुर्य से वासित हो जाए और मैं अपनी स्मृति व् स्वप्न में भी कभी कोई द्वेष, अमैत्री व कटुता का स्वप्न तक न ले सकूँ। हे मेरे प्रेम व ज्ञानस्वरूप प्रभो! मैं तुम्हारे मधुरूप का उपासक हुआ हूँ। 🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂 ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 ……………..ऊँचा रहे 🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚


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कंद-मूल खाने वालों से मांसाहारी डरते थे।। पोरस जैसे शूर-वीर को नमन ‘सिकंदर’ करते...

कंद-मूल खाने वालों से मांसाहारी डरते थे।। पोरस जैसे शूर-वीर को नमन ‘सिकंदर’ करते थे॥ चौदह वर्षों तक खूंखारी वन में जिसका धाम था।। मन-मन्दिर में बसने वाला शाकाहारी राम था।। चाहते तो खा सकते थे वो मांस पशु के ढेरो में।। लेकिन उनको प्यार मिला ’ शबरी’ के जूठे बेरो में॥ चक्र सुदर्शन धारी थे गोवर्धन पर भारी थे॥ मुरली से वश करने वाले 'गिरधर’ शाकाहारी थे॥ पर-सेवा, पर-प्रेम का परचम चोटी पर फहराया था।। निर्धन की कुटिया में जाकर जिसने मान बढाया था॥ सपने जिसने देखे थे मानवता के विस्तार के।। नानक जैसे महा-संत थे वाचक शाकाहार के॥ उठो जरा तुम पढ़ कर देखो गौरवमय इतिहास को।। आदम से गाँधी तक फैले इस नीले आकाश को॥ दया की आँखे खोल देख लो पशु के करुण क्रंदन को।। इंसानों का जिस्म बना है शाकाहारी भोजन को॥ अंग लाश के खा जाए क्या फ़िर भी वो इंसान है? पेट तुम्हारा मुर्दाघर है या कोई कब्रिस्तान है? आँखे कितना रोती हैं जब उंगली अपनी जलती है।। सोचो उस तड़पन की हद जब जिस्म पे आरी चलती है॥ बेबसता तुम पशु की देखो बचने के आसार नही।। जीते जी तन काटा जाए, उस पीडा का पार नही॥ खाने से पहले बिरयानी, चीख जीव की सुन लेते।। करुणा के वश होकर तुम भी गिरी गिरनार को चुन लेते॥ शाकाहारी बनो…! ।।.शाकाहार-अभियान.।।


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गणेश जी की आरती जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महा देवा ।। एक दन्त दयावंत चार...

गणेश जी की आरती जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महा देवा ।। एक दन्त दयावंत चार भुजा धारी माथे सिन्दूर सोहे मूस की सवारी ।। अन्धन को आँख देत कोढ़िन को काया बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया ।। हार चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा लड्डूअन का भोग लगे संत करे सेवा ।। दीनन की लाज रखो शम्भू पुत्र वारी मनोरथ को पूरा करो जाय बलिहारी ।। जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा माता जाकी पार्वती पिता महा देवा ।।


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मनुष्य के पतन का मुख्य कारण है ~कुसंग इससे बचो।। राजेश आर्य


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7 लोक ऊपर के 7 लोक नीचे के कहे जाते हैं। चतुर्दश भुवन ऊपर के लोक बता चुका। नीचे के 7...

7 लोक ऊपर के 7 लोक नीचे के कहे जाते हैं। चतुर्दश भुवन ऊपर के लोक बता चुका। नीचे के 7 लोक: अतल वितल सुतल तलातल महातल रसातल पाताल भूलोक के 7 भाग: जम्बू (Asia) प्लक्ष शाल्मलि कुश क्रौंच शाक पुष्कर जम्बूद्वीप के 9 खण्ड: इलावृत्तवर्ष रम्यकवर्ष हिरण्यवर्ष कुरुवर्ष हरिवर्ष किन्नरवर्ष भारतवर्ष भद्राश्ववर्ष केतुमालवर्ष


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एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोज़ाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहाँ से गुजरने वाले किसी भी...

एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोज़ाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहाँ से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी..। वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी, जिसे कोई भी ले सकता था..। एक कुबड़ा व्यक्ति रोज़ उस रोटी को ले जाता और बजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बड़बड़ाता- “जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा..।” दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा.. वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बड़बड़ाता- “जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा.।” वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी की- “कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है, और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका.।” एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली- “मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी.।” और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में ज़हर मिला दिया जो वो रोज़ उसके लिए बनाती थी, और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश की, कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली- “हे भगवन, मैं ये क्या करने जा रही थी.?” और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दिया..। एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी..। हर रोज़ कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी ले के: “जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा” बड़बड़ाता हुआ चला गया..। इस बात से बिलकुल बेख़बर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है..। हर रोज़ जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी, जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था..। महीनों से उसकी कोई ख़बर नहीं थी..। ठीक उसी शाम को उसके दरवाज़े पर एक दस्तक होती है.. वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है.. अपने बेटे को अपने सामने खड़ा देखती है..। वह पतला और दुबला हो गया था.. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था, भूख से वह कमज़ोर हो गया था..। जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा- “माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ.. आज जब मैं घर से एक मील दूर था, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर गया.. मैं मर गया होता..। लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था.. उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया.. भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे.. मैंने उससे खाने को कुछ माँगा.. उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि- "मैं हर रोज़ यही खाता हूँ, लेकिन आज मुझसे ज़्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है.. सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो.।” जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी, माँ का चेहरा पीला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाज़े का सहारा लीया..। उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था, अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत..? और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था- “जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा.।। 🍁” निष्कर्ष “🍁 ========== हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको, फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या ना हो..। ========== अगर आपको ये कहानी पसंद आई हो तो इसे दूसरों के साथ ज़रूर शेयर करें.. मैं आपसे दावे के साथ कह सकता हूँ कि ये बहुत से लोगों के जीवन को छुएगी व बदलेगी.।


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वेद सन्देश : : : : 152(परम पिता परमात्मा सर्वत्र व्यापन शील होने से विष्णु कहलाते हैं उनका पद ही...

वेद सन्देश : : : : 152(परम पिता परमात्मा सर्वत्र व्यापन शील होने से विष्णु कहलाते हैं उनका पद ही सर्वश्रेष्ठ है , जितेन्द्रिय धर्मात्मा विद्वान जन ईश्वर के परम पद की अनुभूति करते हैं )


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आज का विचार: कोई व्यक्ति कितना धार्मिक है यह इससे नहीं पता चलता कि वह कितनी पाठ पूजा करता है बल्कि...

आज का विचार: कोई व्यक्ति कितना धार्मिक है यह इससे नहीं पता चलता कि वह कितनी पाठ पूजा करता है बल्कि इससे पता चलता है कि वह दूसरों से कैसा व्यवहार करता है ।


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दीपक बोलता नहीं उसका प्रकाश अपना परिचय देता है… ठीक उसी प्रकार, आप अपने बारे में कुछ न बोले,...

दीपक बोलता नहीं उसका प्रकाश अपना परिचय देता है… ठीक उसी प्रकार, आप अपने बारे में कुछ न बोले, बढ़िया कर्म और अच्छा कार्य करें, वही आपका परिचय देगा… सुप्रभात 🙏


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बहुत सुँदर पंक्तियाँ- “संयुक्त परिवार” वो पंगत में बैठ के निवालों का तोड़ना, वो अपनों...

बहुत सुँदर पंक्तियाँ- “संयुक्त परिवार” वो पंगत में बैठ के निवालों का तोड़ना, वो अपनों की संगत में रिश्तों का जोडना, वो दादा की लाठी पकड़ गलियों में घूमना, वो दादी का बलैया लेना और माथे को चूमना, सोते वक्त दादी पुराने किस्से कहानी कहती थीं, आंख खुलते ही माँ की आरती सुनाई देती थी, इंसान खुद से दूर अब होता जा रहा है, वो संयुक्त परिवार का दौर अब खोता जा रहा है। माली अपने हाथ से हर बीज बोता था, घर ही अपने आप में पाठशाला होता था, संस्कार और संस्कृति रग रग में बसते थे, उस दौर में हम मुस्कुराते नहीं खुल कर हंसते थे। मनोरंजन के कई साधन आज हमारे पास है, पर ये निर्जीव है इनमें नहीं साँस है, आज गरमी में एसी और जाड़े में हीटर है, और रिश्तों को मापने के लिये स्वार्थ का मीटर है। वो समृद्ध नहीं थे फिर भी दस दस को पालते थे, खुद ठिठुरते रहते और कम्बल बच्चों पर डालते थे। मंदिर में हाथ जोड़ तो रोज सर झुकाते हैं, पर माता-पिता के धोक खाने होली दीवाली जाते हैं। मैं आज की युवा पीढी को इक बात बताना चाहूँगा, उनके अंत:मन में एक दीप जलाना चाहूँगा ईश्वर ने जिसे जोड़ा है उसे तोड़ना ठीक नहीं, ये रिश्ते हमारी जागीर हैं ये कोई भीख नहीं। अपनों के बीच की दूरी अब सारी मिटा लो, रिश्तों की दरार अब भर लो उन्हें फिर से गले लगा लो। अपने आप से सारी उम्र नज़रें चुराओगे, अपनों के ना हुए तो किसी के ना हो पाओगे सब कुछ भले ही मिल जाए पर अपना अस्तित्व गँवाओगे बुजुर्गों की छत्र छाया में ही महफूज रह पाओगे। होली बेमानी होगी दीपावली झूठी होगी, अगर पिता दुखी होगा और माँ रूठी होगी।। अन्तःकरण को छूने वाली है ये कविता जिसने भी लिखी है उसको प्रणाम। आपको लगे की हमारा कोइ भाइ भटक गया है तो कृपया भेज सकें तो आपकी बहुत मेहरबानी होगी ।


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गणपति ईश्वर का ही एक नाम है जो सर्वव्यापक अजन्मा अजर अमर है और सबका स्वामी है

गणपति ईश्वर का ही एक नाम है जो सर्वव्यापक अजन्मा अजर अमर है और सबका स्वामी है


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💎🙏💎 जीवन एक अभिव्यक्ति है | जीवन को अभिव्यक्ति की जरूरत है | यदि तुम जीवन को रास्ता नहीं देते हो, तो...

💎🙏💎 जीवन एक अभिव्यक्ति है | जीवन को अभिव्यक्ति की जरूरत है | यदि तुम जीवन को रास्ता नहीं देते हो, तो तुम विस्फोटक ऊर्जाओं को निर्मित कर रहे हो, इकट्ठी कर रहे हो | एक दिन उसका विस्फोट होगा और तुम चूर - चूर हो जाओगे | ~ओशो~ (मैडिटेशन: दि आर्ट अॉफ एक्सटेंसी)


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Tuesday, September 22, 2015

Naresh Khare: स्वामी जी नवम समुल्लास मे लिखते है कि जब जीव शरीर छोडता है तब ‘यमालय'अर्थात...

Naresh Khare: स्वामी जी नवम समुल्लास मे लिखते है कि जब जीव शरीर छोडता है तब ‘यमालय'अर्थात आकाशस्थ वायु मे रहता है l कयोकि 'यमेन(ऋ.10/14/8)वायुना’(अथर्व.20/141/2)वेद मे लिखा है कि 'यम’ नाम वायु का है ,पश्चात 'धर्मराज'अर्थात परमेश्वर उस जीव के पाप-पुण्यानुसार जन्म देता हैl जीव वायु,अन्न,जल अथवा शरीर के छिद्र द्वारा दूसरे के शरीर मे ईश्वर की प्रेरणा से प्रविष्ट होता है lजो प्रविष्ट होकर क्रमश:वीर्य मे जा,गर्भ मे स्थित हो,शरीर धारण कर,बाहर निकलता हैl -:शंका:- जीव शरीर छोडने के बाद १२ दिन आकाशस्थ वायु मे विचरण कर,१३वे दिन मनुष्य के वीर्य मे आता है,तत्पश्चात गर्भ मे जाता हैlतो जो मनुष्य के वीर्य मे पहले से ही अनेक जीव शुक्राणुओं मे मौजूद है,तो यह कैसे सुनिश्चित किया जाये कि किस जीव ने १३वे दिन शरीर धारण किया है और कया १२ दिन आकाशस्थ वायु मे विचरण कर १३वे दिन जीव मनुष्य के वीर्य मे आता है तो कया वीर्य स्थल ही अनेक जीवो का निवास स्थान है शरीर धारण से पहले कया यह समझना चाहिए ? कृप्या शंका समाधान करे जी🙏 Pritesh Arya: कल हो न हो, अतः आज ही उत्तर दे रहा हूँ । 1) परमात्मा की अपेक्षा से जीवात्माओं की संख्या सान्त है जबकि जीवात्मा की अपेक्षा से जीवात्माओं की संख्या अनन्त है। 2) मृत्यु पश्चात् 7वें दिन जीवात्मा मनुष्यादि शरीर में भी वास करता है। 3) वायु जिसे हम श्वास में लेते हैं, जल जो हम पीते हैं, उसमें अनेक जीवात्माएं होती हैं। जो भोजन हम करते हैं उसमें भी जीवात्माएं होती हैं। उसी प्रकार हमारे शरीर के अन्दर अनेक जीवात्माएं होती हैं, जीवाणु, विषाणु, जोंक आदि के रूप में । अतः ये सोचना की केवल वीर्य में ही जीव रहता है, गलत होगा। कौन सा जीवात्मा मनुष्य शरीर धारण करेगा ये उस जीवात्मा के कर्मफल पर निर्भर करता है। अनेक जीवात्माओं के शरीर में रहने के बावजूद एक शरीर पर एक ही जीवात्मा का अधिकार रहता है, जिसे अभिमानी जीव कहते हैं शेष सभी जीव अनुशयी कहलाते हैं। अनुशयी जीव केवल भोग कर पाते हैं। अभिमानी जीव ही मनुष्य शरीर में, कर्म करके उन्नति को प्राप्त होते हैं। परमात्मा सर्वव्यापक, सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान होने से सारी कर्मफल व्यवस्था को चलाता है। Naresh Khare: जी स्वामी जी तो यही लिख रहे है कि जीव आकाशस्थ वायु मे विचरण कर अन्न जल वायु आदि से वीर्य मेआता है पश्चात गर्भ मे तो इसका कया अर्थ हुआ Naresh Khare: यदि वह वीर्य मे आकर गर्व मे जा शरीर धारण कर लेता है तो फिर एक ही जीव का,एक ही शरीर मे आकर तुरन्त जन्म कयो न माने ? Naresh Khare: क्रम न.२ भी समझ नही आया जी Pritesh Arya: क्रम 2 : यजुर्वेद अध्याय-39, मन्त्र-6 के अनुसार है। मनुष्य आदि किसी प्राणी के शरीर में जीवात्मा मृत्यु उपरान्त 7वां दिन रहता है। Pritesh Arya: मनन करने से ही समझ में आता है, अन्य शरीर की बात हो रही है। मनुष्य या पशु-पक्षी के शरीर में 7वें दिन वास करता है। Naresh Khare: ठीक है १२ दिन बाहर और ७ दिन अन्दर विचरण कर जीव शरीर धारण करता है तो कुल दिन १९ हुए फिर १३वे दिन जीव का शरीर धारण करने का कया अर्थ हुआ और १३वे दिन कि जगह २०वे दिन जीव का शरीर धारण कयो नही लिखा गया ? और वेद मे या ऋषि ने शरीर मे एक जीव कि जगह अनेको जीव होने का प्रमाण कहां दिया है कृप्या इसका भी प्रमाण देवे जी


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ईश न्याय द्रढ खरा अटल,वहां न रिश्वत घूस सफल।जिसने बेच दिया ईमान,करो नहीं उसका गुणगान।अनाचार बढता है...

ईश न्याय द्रढ खरा अटल,वहां न रिश्वत घूस सफल।जिसने बेच दिया ईमान,करो नहीं उसका गुणगान।अनाचार बढता है कब,सदाचार चुप रहता जब।अधिकारों का वह हकदार,जिसको कर्तव्यों से प्यार।अपना अपना करो सुधार,तभी मिटेगा भ्रष्टाचार।जब तक नहीं चरित्र विकास,तब तब कर्मकाण्ड उपहास।व्यसनों की लत जिसने डारी,अपने पैर कुल्हाडी मारी।पाण्डव पांच हमें स्वीकार,सौ कौरव धरती के भार।गंदे फूहड चित्र हटाओ,मां-बहनों की लाज बचाओ।शुभ अवसर का भोजन ठीक,म्रतक भोज है अशुभ अलीक।ईश्वर ने इंसान बनाया,ऊंच-नीच किसने उपजाया।शासक जहां चरित्र हीन,वहीं आपदा नित्य नवीन।शिक्षा समझा वही सफल,जो कर दे आचार विमल।ईश्वर तो है केवल एक,लेकिन उसके नाम अनेक।वही दिखाते सच्ची राह,जिन्हें न पद-पैसे की चाह।अपनी गलती आप सुधारे,अपनी प्रतिभा आप निखारें।अधिक कमायें अधिक उगायें,लेकिन बांट बांट कर खाएं।सही धर्म का सच्चा नारा,प्रेम एकता भाई-चारा।परहित सबसे ऊंचा कर्म,ममता समता मानव धर्म।संभाषण के गुण है तीन,वाणी सत्य,सरल,शालीन।सतयुग आयेगा कब,बहुमत चाहेगा जब।संकट हो या दु:ख महान,हर क्षण होठों पे मुस्कान।सुधरे व्यक्ति और परिवार,होगा तभी समाज सुधार।अहं प्रदर्शन झूठी शान,ये सब बचकाने अरमान।धन बल जन बल बुद्धि अपार,सदाचार बिन सब बेकार।यही सिद्धि का सच्चा मर्म,भाग्यवाद तज,करो सुकर्म।करो नही ऐसा व्यवहार,जो न स्वयंको हो स्वीकार।मदिरा-मांस तामसी भोजन,दूषित करते तन मन जीवन।नारी का असली श्रंगार,सादा जीवन उच्च विचार।नारी का सम्मान जहां है,संस्क्रति का उत्थान वहां हैं।सदगुण हैं सच्ची सम्पत्ति,दुर्गुण सबसे बडी विपत्ति।कथनी करनी भिन्न जहां है,धर्म नहीं पाखण्ड वहां है। व्रक्ष प्रदूषण-विष पी जाते,पर्यावरण पवित्र बनाते।लघु सेवा तरु हमसे लेते,अमित लाभ जीवन भर देते।जीव और वन से जीवन है,बस्ती का जीवन उपवन है।व्रक्ष और हितकारी सन्त,है इनके उपकार अनन्त।सात्विक भोजन जो करते हैं,रोग सदा उनसे डरते हैं।धन बल जन बल बुद्धि अपार,सदाचार बिन सब बेकार।धर्म क्षेत्र में पूज्य वही नर,त्यागे लोभ स्वार्थ आडम्बर।अगर रोकनी है बरबादी,बंद करो खर्चीली शादी।घर में टंगे हुए जो चित्र,घोषित करते व्यक्ति चरित्र।गंदे फूहड गीत न गाओ,मर्यादा समझो,शरमाओ।चाटुकार को जिसने पाला,उस नेता का पिटा दिवाला।जो उपहास विरोध पचाते,वे ही नया कार्य कर पाते।बनें युवक सज्जन,शालीन,दें समाज को दिशा नवीन।ईश्वर बंद नही है मठ में,वह तो व्यापक है घट घट में।खोजें सभी जगह अच्छाई,ऐसी द्रष्टि सदा सुखदाई।जैसी करनी वैसा फल,आज नहीं तो निश्चय कल।जो करता है आत्मसुधार,मिलता उसको ही प्रभु प्यार।जुआ खेलने का यह फल,रोते फिरें युधिष्ठिर नल।जो न कर सके जन कल्याण,उस नर से अच्छा पाषाण।पशु बलि,झाड फूंक जंजाल,इनसे बचे वही खुशहाल।


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साम वन्दना : सुरूप रक्षा ViewEdit Submitted by Rajendra P.Arya on Mon, 2011-05-30 17:24. साम...

साम वन्दना : सुरूप रक्षा ViewEdit Submitted by Rajendra P.Arya on Mon, 2011-05-30 17:24. साम वन्दना सुरूपकृलुमूतये सुदुधामिव गोदुहे| जुहूमसि द्दवि द्दवि ||साम १६० || हम प्रतिदिन तुम्हें पुकार रहे, प्रभु आ जाओ, प्रिय आ जाओ| ये शत्रु न कर दें नष्ट हमें, तुम आकर हमें बचा जाओ|| यह रूप सरूप किया तुमने, आकर्ष अनूप दिया तुमने, सुकुमार कली सी कोमलता रस रंग स्वरूप दिया तुमने| ललचाये खड़े लुटेरे हैं, प्रभु इनसे हमें बचा जाओ| ये शत्रु न कर दें नष्ट हमें, तुम आकर हमें बचा जाओ|| अति उत्तम दुग्धदायिनी गौ, पय सहज दुहाती अपना गौ, वह दुहने वाला गोपालक संरक्षित रखता अपनी गौ|| प्रभुवर हम गाय तुम्हारी हैं, तुम गोपालक बनकर आओ| ये शत्रु न कर दें नष्ट हमें, तुम आकर हमें बचा जाओ|| सुन्दर शरीर आकर्षक हो, यह हृदय स्नेह सुख वर्षक हो, न्याय नियम सम्पन्न बुद्धि से, यह रूप शान्ति का वर्धक हो| यह रूप सुरूप सुरक्षित हो, हे नाथ सूत्र वह बतलाओ| ये शत्रु न कर दें नष्ट हमें, तुम आकर हमें बचा जाओ|| *** *** *** *** *** *** *** गोपय दुहने वाले के लिए गौ के सम सुन्दर रूपों को, निर्मित करता जो प्रभु उसको, हम नमन करें शुचि रूपों को||


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ईश्वर को कहां खोजे? एक प्रसिद्द संत थे। उनके सदाचारी जीवन और आचरण से सामान्य जन अत्यंत प्रभावित होते...

ईश्वर को कहां खोजे? एक प्रसिद्द संत थे। उनके सदाचारी जीवन और आचरण से सामान्य जन अत्यंत प्रभावित होते और उनके सत्संग से अनेक सांसारिक प्राणियों को प्रेरणा मिलती। सृष्टि का अटल नियम है। जिसका जन्म हुआ उसकी मृत्यु भी होगी। वृद्ध होने पर संत जी का भी अंतिम समय आ गया। उन्हें मृत शैया पर देखकर उनके भक्त विलाप करने लगे। उन्होंने विलाप करते हुए शिष्यों को अंदर बुलाकर उनसे रोने का कारण पूछा। शिष्य बोले आप नहीं रहेंगे तो हमें ज्ञान का प्रकाश कौन दिखलायेगा। संत जी ने उत्तर दिया, “ प्यारे शिष्यों प्रकाश तो आपके भीतर ही हैं। उसे केवल खोजने की आवश्यकता हैं। जो अज्ञानी है वे उसे संसार में तीर्थों, नदियों, मंदिरों, मस्जिदों आदि में खोजते हैं। अंत में वे सभी निराश होते है। इसके विपरीत मन, वाणी और कर्म से एकनिष्ठ होकर निरंतर तप और साधना करने वाले का अन्तकरण दीप्त हो उठता है। इसलिए ज्ञान चाहते हो तो ज्ञान देने वाले को अपने भीतर ही खोजो। वह परमात्मा हमारे अंदर जीवात्मा में ही विराजमान हैं। केवल उसे खोजने का पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है। वेद में इस सुन्दर सन्देश को हमारे शरीर के अलंकृत वर्णन के माध्यम से बताया गया है। अथर्ववेद के 10/2/31 मंत्र में इस शरीर को 8 चक्रों से रक्षा करने वाला (यम, नियम से समाधी तक) और 9 द्वार (दो आँख, दो नाक, दो कान, एक मुख, एक मूत्र और एक गुदा) से आवागमन करने वाला कहा गया हैं। इस शरीर के भीतर सुवर्णमय कोष में अनेक बलों से युक्त तीन प्रकार की गति (ज्ञान, कर्म और उपासना ) करने वाली चेतन आत्मा हैं। इस जीवात्मा के भीतर और बाहर परमात्मा है और उसी परमात्मा को योगी जन साक्षात करते है। वेद दीर्घ जीवन प्राप्त करके सुखपूर्वक रहने की प्रेरणा देते हैं। वेद शरीर के माध्यम से अभुय्दय (लोक व्यवहार) एवं नि:श्रेयस (परलौकिक सुख) की प्राप्ति के लिए अंतर्मन में स्थित ईश्वर का ध्यान करने की प्रेरणा देते


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ओउम् भूपेश आर्य~8954572491 अवतारवाद:- प्रश्न१-गीता अध्याय ४ श्लोक ८ में लिखा है कि अवतार तीन काम...

ओउम् भूपेश आर्य~8954572491 अवतारवाद:- प्रश्न१-गीता अध्याय ४ श्लोक ८ में लिखा है कि अवतार तीन काम करने के लिए होते हैं- (1) सज्जनों की रक्षा । (2) दुष्टों का विनाश । (3) धर्म की स्थापना । इसका अर्थ स्पष्टतया यह हुआ कि कौन व्यक्ति अवतार है और कौन नहीं? यह जांचने की कसौटी गीता में पेश की गयी है कि जो व्यक्ति इन तीन कर्मों को करे वही अवतार होगा और जो इन तीन कर्तव्यों का पालन न करे , वह मनुष्य होगा।यह तीन ही कर्म अवतारों के प्रधान कार्य होते हैं,जिनके लिए वह अवतरित होते है। तब सप्रमाण बतायें कि पौराणिकों के अन्य चौबीस अवतारों में से अब तट किस किस अवतार ने उपरोक्त तीनों कर्तव्यों का पालन करके दिखाया है? पौराणिक साहित्य से तो ऐसा सिद्ध है कि अभी तक तो एक भी अवतार माने जाने वाले व्यक्ति ने गीता की इन तीनों शर्तों को पूरा नहीं किया है इसलिए उनमें से एक भी अवतार माना नहीं जा सकता है। प्रश्न २- ईश्वर का कार्यक्षेत्र सारा भूमण्डल व सारा विश्व होता है।उसके सारे कार्य संसार भर के हित के लिए होते हैं। तब माने हुए २४ अवतारों का कार्य क्षेत्र केवल भारतवर्ष और उसमें से भी कुछ थोडा सा क्षेत्र क्यों रहा? जबकि मनुष्य की आबादी तो सारी प्रथ्वी पर थी। प्रश्न ३. विष्णु ने भागवत पुराण के स्कन्द ४ ,अध्याय १८ में स्वयं स्वीकार किया है कि मैने रामावतार में महान दु:ख उठाये थे।पराधीन होने से ही मुझे राम का अवतार लेना पडा था।ये सब बातें राम की लोक कल्याण भावना से स्वेच्छया ईश्वरावतार लेना सिद्ध नहीं करती हैं। प्रश्न ४. देवी भागवत पुराण के स्कन्ध १, अध्याय ४,श्लोक ४६ से ६१ तक तथा स्कन्द ५ ,अध्याय १, श्लोक ४७ से ५० तक के अन्दर स्पष्ट शब्दों में घोषणा की गयी है कि विष्णु का कोई अवतार स्वेच्छा से लोक कल्याण के लिए नहीं होता है तथा स्वेच्छा से अवतार मानने वालों को मूर्ख बतलाया गया है।तब क्या पौराणिक विद्वान देवी भागवत को झूठा ग्रन्थ मानते हैं। प्रश्न५. गीता की कसौटी पर श्रीक्रष्ण जी भी अवतार सिद्ध नहीं होते हैं क्योंकि उनके कार्य भी पारिवारिक शत्रुता का बदला कंस से लेना और कौरव पाण्डवों से सम्पत्ति के बटवारे में हुये घरेलु झगडों में अपने बहनोई अर्जुन की मदद करना मात्र था।अत: गीता की कसौटी पर श्रीक्रष्ण जी को अवतार सिद्ध करें। प्रश्न६. श्री क्रष्ण ने पौराणिक मान्यतानुसार गीता में अर्जुन से कहा है कि - “हे अर्जुन! युद्ध क्षेत्र में तेरे सभी शत्रु काल द्वारा मारे जा चुके हैं तू इन मरे हुए लोगों को मारकर निमित्त मात्र बनकर यश प्राप्त कर कर ले।जो जन्मा है,उसकी म्रत्यु तो अनिवार्य होनी ही है"।(गीता अध्याय ११ श्लोक ३२ व ३३) इससे सिद्ध है कोई भी प्राणी अपनी निश्चित आयु के समाप्त होने पर ही म्रत्यु को प्राप्त होता है उससे पूर्व नहीं। राम रावण, क्रष्ण कंस आदि सभी अपने निश्चित आयु के समाप्त होने तक ही जीवित रहे थे उसकी समाप्ति पर राम ने सरयु नदी में डूबकर,रावण ने युद्ध में मरकर,क्रष्ण के पैर में बहेलिया ने बाण मारकर, व क्रष्ण ने कंस की आयु समाप्त होने तक, सभी ने अपनी पूर्ण आयु भोगकर म्रत्यु प्राप्त की थी। अब भी रोजाना लाखों जीव आयु की समाप्ति पर मरते है।तब ईश्वरावतार की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती है।क्योंकि समय से पूर्व कोई किसी को नहीं मार सकता है यह गीता का सिद्धान्त है।तब ईश्वरावतार को दुष्टों के नाशार्थ आवश्यकता सिद्ध करें। प्रश्न६. बतावें कि राम व क्रष्ण आदि किसी भी अवतार ने ऐसा कौन सा कार्य किया जो मनुष्य नहीं कर सकता था। जिसके लिए उन्हें ईश्वरावतार माना जा सके। प्रश्न ७. महाभारत सभा पर्व अध्याय १४, श्लोक ६७ में श्रीक्रष्ण जी ने कहा है कि,हम जरासन्ध के भय के मारे मथुरा छोडकर द्वारिका को भाग गये थे। क्या प्रबल शत्रु से डरकर भाग जाना क्रष्ण के ईश्वरत्व का खुला उपहास नहीं है? प्रश्न ९. श्रीक्रष्ण के सोलह हजार एक सौ आठ रानियां होना क्या श्रीक्रष्ण को ‘योगेश्वर’ के स्थान पर 'भोगेश्वर’ सिद्ध नहीं करता? प्रश्न १०. नरसिंह अवतार का वध करने और उसका सर काटने व उसकी देह की खाल उतारने की घटना लिंग पुराण पूर्वार्ध अध्याय ९६, में दी गयी है,तो जिसकी इस प्रकार दुर्गति हो तब वह ईश्वरावतार कैसे माना जा सकता है? प्रश्न ११. मत्स्य,कूर्म,वाराह,न्रसिंह,हयग्रीव आदि अवतार रुपी पशुओं व जीवों को ईश्वरावतार कैसे माना जा सकता है? जबकि इन्होने सज्जनों की रक्षा तथा दुष्टों का विनाश व धर्म का प्रचार कभी नहीं किया था तथा ये जीव जन्तु बिल्कुल बे पढे लिखे व मूक एवं मूर्ख अर्थात निरे पशु थे। प्रश्न १२. भागवत पुराण स्कन्ध १३,अध्याय ३१, श्लोक २ ज्वाला प्रसाद की टीका बम्ब्ई छापा में गोपियों ने श्री क्रष्ण जी को सम्भोग का पति बताया है।श्री क्रष्ण जी को भागवतकार ने सम्भोग का पति बताकर उनके ईश्वरत्व में कौन से चार चांद लगाये हैं यह बतावें? प्रश्न१४. सती तुलसी व सती व्रन्दा के साथ उनके पतियों का रुप बनाकर उनको धोखा देकर व्यभिचार करने पर उन सतियों के श्रापों के कारण विष्णु जी को दण्ड भुगतने के लिए अवतार लेने पडे थे।यह विवरण शिवपुराण में दिये गये हैं।तब लोक कल्याण के लिये विष्णु के स्वेच्छया से अवतार लेने की बात स्वयं गलत हो जाती है।क्या पौराणिक विष्णु उपरोक्त घटनाओं से परनारी लम्पट सिद्ध नहीं होता है? प्रश्न १५. धर्म संहिता अध्याय १०, में लिखा है कि विष्णु अवतार लेने का उद्देश्य व्यभिचार की अत्रप्त वासनाओं की पूर्ति करना मात्र था।अपने शास्त्र की इस बात को आप गलत क्यों मानते हैं? प्रश्न १६. भागवत पुराण के स्कन्ध ८, श्लोक २४ में लिखा है कि- मत्स्यावतार के शरीर की लम्बाई एक लाख योजन अर्थात आठ लाख मील थी।तो हिसाब लगाकर बतायें कि हमारी प्रथ्वी पर वह कहां और किस प्रकार रहता होगा? जबकि प्रथ्वी की परिधि तो केवल २४ हजार मील ही है। प्रश्न१६. चौबीस अवतारों की सूची पेश करें और बतावें कि भागवत पुराण स्कन्ध १ व ३ में जो अधूरी सूचियां अवतारों की दी गयी हैं उनमें परस्पर विरोध क्यों है? क्या व्यास अवतार को २४ अवतारों के नाम भी ठीक ठाक याद नहीं थे? प्रश्न १८. जब अवतारों का उद्देश्य ही अत्याचारों व पापों का विनाश एवं धर्म की स्थापना होती है तो तब जिन युगों में धर्म अधिक होता है तब अधिक अवतार क्यों होते हैं ? तथा जब कलयुग में तीन चरण अधर्म के होते हैं, तब केवल एक ही अवतार क्यों होता है,जबकि सबसे अधिक अवतार कलयुग में होने चाहियें। प्रश्न १८. पदमपुराण पाताल खण्ड अध्याय ७५ में लिखा है। कि श्री क्रष्ण ने नारद को नारदी अर्थात औरत बनाकर उसके साथ रमण किया।तो क्या अवतार का अवतार के साथ ऐसा कुकर्म करना अवतारपन का सबूत है? प्रश्न १९. महाभारत उद्दोग पर्व अध्याय ४९ में लिखा है कि नर और नारायण नाम के दो ऋषि गन्धमादन पर्वत पर तपस्या किया करते थे।जब कहीं युद्ध के अवसर आते थे,तो ये दोनों ही ऋषि वहां अवतार लेकर युद्ध किया करते थे।अर्जुन व क्रष्ण दोनों इन्ही नर व नारायण ऋषियों के अवतार थे।इस प्रमाण में स्पष्ट है कि श्री क्रष्ण ईश्वरावतार न होकर नारायण नाम के किसी ऋषि के अवतार थे अर्थात उक्त ऋषि ने युद्ध करने को क्रष्ण का जन्म लिया था। अब पौराणिक विद्वान बतावें कि महाभारत में उनके अवतार व्यास जी ने उपरोक्त बात लिखकर ईश्वर के क्रष्णावतार लेने का खण्डन क्यों किया है? प्रश्न २०. राम के काल में राम व परशुराम दोनों अवतार एक ही समय में हुए व दोनों आपस में लड पडे।एक दूसरे को पहचान भी न सके। क्या यह अवतारवाद का मजाक नहीं है? प्रश्न २१. महाभारत काल में व्यास जी,क्रष्ण व बलराम जी तीन अवतार क्यों एक साथ पैदा हो गये? एक ही अवतार से सारा काम क्यों नहीं पूरा कराया गया? क्या अवतार भी घटिया व बढिया किस्म के होते हैं? साथ ही यह भी बतावें कि एक विष्णु के एक साथ तीन अवतार कैसे बन गये? प्रश्न २३. पौराणिक धर्म के सारे अवतार उत्तर प्रदेश में ही क्यों पैदा हुए? भारत के अन्य भागों में व प्रथ्वी के अन्य देशों में क्यों नही पैदा हुए? प्रश्न २४. सारे अवतार क्षत्रिय वंश में ही क्यों पैदा हुुए? अन्य जातियों में क्यों नहीं जन्में? केवल एक अवतार परशुराम जो ब्राह्मणों में पैदा हुए सो उनको भी रामावतार अर्थात ठाकुर अवतार ने परास्त करके निस्तेज कर दिया।उसे कोई पूछता भी नहीं है? प्रश्न २५. शिवपुराण शतरुद्र संहिता अध्याय ११ व १२ ,में लिखा है कि शिवजी ने वाराह अवतार को मारकर उसका दांत तोड दिया तथा कूर्म अर्थात कछुआ अवतार की खोपडी उखाड दी तब ऐसों को कैसे अवतार माना जा सकता है ? जिसकी दुर्गति व वध शिवजी ने कर डाला हो। प्रश्न २६. यदि रामचन्द्र जी ईश्वर के अवतार होते तो उनको सन्ध्या करने की आवश्यकता ही क्यों होती? यदि सन्ध्या की तो किसकी की? क्या कोई अपनी ही सन्ध्या कर सकता है? यह तो भूल है।यदि राम ने सन्ध्या की तो क्या उनको अवतार होने का ध्यान ही नहीं था ,या वे भूल गये थे। यह सब भोलेपन की बातें हैं। पीछे से लोगों ने उनके विषय में बहुत सी झूठी बातें जोड ली हैं। अवतार मानने से जीवन पर प्रभाव- राम क्रष्ण आदि को ईश्वर मानने से हिन्दू जाति के आचार व्यवहार पर बुरा प्रभाव पडा है।प्रथम तो वह ईश्वर की उपासना न करके मूर्तिपूजक हो गये हैं।केवल राम-राम,सीता-राम,राधाक्रष्ण जपने को ही ईश्वर पूजा समझते हैं। दूसरे वह राम और क्रष्ण के जीवन का अनुकरण नहीं करते।वह समझते है कि रा क्रष्ण तो ईश्वर थे ,उनके जैसे आचरण हम साधारण मनुष्य नहीं कर सकते। यही कारण है कि हिन्दू जाति पतन की और गिरती जाती है। हिन्दुओं में इतनी निर्बलता आ गयी है कि वह अपने दु:खों को दूर करने का उपाय न करके ईश्वर अवतार का इंतजार करते हैं।वह समझते हैं कि जब ईश्वर अवतार लेगा तो हमारे कष्टों को दूर करेगा। उनको यह विश्वास नहीं रहा कि अब भी यदि वह परिश्रम करें तो ईश्वर उनकी सहायता कर सकता है।


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————–: ओ३म् :————- —: धर्म और...

————–: ओ३म् :————- —: धर्म और मजहब(सम्प्रदाय) में अंतर :— १.धर्म का आधार ईश्वर और मजहब का आधार मनुष्य है,धर्म उस ज्ञान का नाम है जिसे मनुष्यों और प्राणिमात्र के कल्याण के लिए परमात्मा ने आदि स्रष्टि में प्रदान किया, मजहब वह है जिसे मनुष्यों ने समय समय पर अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए स्वीकार किया और पुन: स्वार्थ सिद्धि के लिए उसका विस्तार किया। २.धर्म ईश्वर प्रदत्त है इसलिए एक है इसमें हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, यहूदी, पारसी किसी के लिए भी भेद भाव नहीं, इसके विपरित मत मतान्तर अनेक मनुष्यों के बनाये होने के कारण अनेक हैं और अपने अनुयायियों के पक्षपात से भरे पडे हैं। इसलिए मुहम्मद अली ने सन् १९२४ में कहा था कि बुरे से बुरा मुसलमान गांधी जी से अच्छा है क्योंकि वह पैगम्बर पर ईमान लाया है, गांधी जी ईमान नहीं लाये इसलिए स्वर्ग का दरवाजा उनके लिए बन्द है। ३.धर्म सबका साझा है क्योंकि ईश्वर की देंन है। मजहब अपना अपना है सबका समान नहीं। ४.धर्म सदा से है नित्य है इसलिए उसका नाश नहीं, मत मतान्तर नवीन हैं, मनुष्यों द्वारा बनाये हुए हैं, इसलिए उनका नाश अवश्यभावी है। ५.धर्म बुद्धि, तर्क और विज्ञान का उपासक है, धर्म से कोई इन्कार नहीं कर सकता। मजहब या मत बुद्धि, तर्क और विज्ञान का विरोधी है, इसका मानना न मानना इच्छा पर आधारित है, आवश्यक नहीं। ६.धर्म कर्मानुसार फल की प्राप्ति मानता है। मजहब या सम्प्रदाय सिफारिश और शफाइत पर अवलम्बित है। मजहब में जब तक हजरत मुहम्मद ईसा मसीह या कोई अवतार माना जाने वाला सिफारिश न करे, स्वर्ग का द्वार बन्द रहेगा और सिफारिश होने पर पापी से पापी भी स्वर्ग में प्रवेश पायेगा। ७. धर्म ईश्वर से मनुष्यों का सीधा सम्बन्ध बताता है, वह आत्मा और परमात्मा के मध्य मे किसी पीर,पैगम्बर, गुरु, ऋषि, मुनि, अवतार आदि की आवश्यकता नहीं समझता। मजहब या सम्प्रदाय ईश्वर और मनुष्यों के बीच में अपने अपने एजन्टों को ला खडा करता है। ८.धर्म प्राणिमात्र के सुख के लिए है और मत मतान्तर या सम्प्रदाय केवल अपने अनुयायियों के सुख की जिम्मेदारी लेता है क्योंकि मजहब के मानने वाले मोमीन और शेष सब काफिर हैं ऐसा उनका द्रष्टिकोण है। धर्म का आधार केवल ईमान है। मजहब पर ईमान लाओ और सब प्रकार की मौज उडाओ। फिर कोई रोकने वाला नहीं। मुहम्मद और ईसा मसीह पर विश्वास करो, बस बेडा पार है। ९.धर्म मनुष्य के पूर्ण जीवन का पुरोगम बताता है,और वर्णाश्रम प्रणाली द्वारा उसको उन्नत बनाता है परन्तु मजहब में ऐसा कोई पुरोगम नहीं वह केवल मनुष्यों को पशु जीवन बिताना सिखाता है। १०.धर्म में स्रष्टि के नियम के विरुद्ध कुछ नहीं। मजहब स्रष्टि नियमों से विरुद्ध भरे पडे हैं जैसे-एक स्त्री पुरुष से सारी स्रष्टि का बनना मानना, मुर्दों का जीवित हो जाना, ईसा का कुवांरी मरियम के पेट से पैदा हो जाना, हनुमान का सूर्य को मुंह में डाल लेना,पत्थर पर मूसा के डण्डा मारने से सात चश्मों का बह निकलना आदि। ११. धर्म स्त्री पुरुष को समान अधिकार देता है। मजहब स्त्रियों को नरक का द्वार, शैतान की रस्सियां, पापयोनि, दीन, हीन, नीच निर्जीव बता कर के उनके अधिकारों का संहार करता है। १२.धर्म में सत्य, सरलता, संतोष, स्नेह, सदाचार और चरित्र आवश्यक हैं, मजहब इन गुणों की उपेक्षा कर वाह्य चिन्हों को महत्व देता है यथा तिलक लगाना, स्लेब लगाना, दाढी केस रखना आदि। अत: धर्म और मजहब को एक समझना भारी भूल है और यह धर्म विरोध का बडा कारण है। —– भूपेश आर्य~८९५४५७२४९१—-


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🌻🌻🌻ओउम्🌻🌻🌻 ——-भूपेश आर्य——– वेद में भी ईश्वर को निराकार बताया...

🌻🌻🌻ओउम्🌻🌻🌻 ——-भूपेश आर्य——– वेद में भी ईश्वर को निराकार बताया है।देखिये- प्रमाण- स: पर्यगाच्छुक्रम कायम्।(यजुर्वेद अ. ४०। मं. ८) अर्थात वह ईश्वर,सर्वव्यापक,अत्यन्त बलवान,(अकायम) शरीर रहित है अर्थात निराकार है। २. अज एकपात्(यजुर्वेद ३४/५३) अर्थात ईश्वर सदा ही अजन्मा रहता है। ३.अजंनक्षां दाधार प्रथ्वी तस्तम्भद्दां मन्त्रेभि: सत्यै।(ऋग्वेद १/६७/३) अर्थात अजन्मा ईश्वर प्रथ्वी को धारण करता है।विस्त्रत अन्तरिक्ष तथा द्दोलोक को गिरने से रोकता है। ४.ब्रह्म वा अज (शतपथ ब्राह्मण ६/४/४/१५) अर्थात निश्चय ही ब्रह्म अजन्मा है। ६.अजं ध्रुवं (श्वेता० उपनि० २/१५) अर्थात ईश्वर अजन्मा अचल है। ७.सम्बन्धानुपपत्तेश्च (वेदान्त २/२/३८) अर्थात यदि ईश्वर को शरीरधारी माना जाए तो एकदेशी होने से सम्पूर्ण जगत के साथ उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता। ८.विप्रतिषेधाच्य ( वेदान्त २/२/४५) अर्थात साकार और निराकार का परस्पर में विरोध होने से निराकार ईश्वर साकार नहीं हो सकता। ९.क्लेश कर्म विपाकाशयैरपराम्यष्ट: पुरुष विषेश ईश्वर: । अर्थात क्लेश,कर्म,कर्मफल और कर्मफलों की वासना से रहित है,वह ईश्वर है।


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ओउम् भूपेश आर्य जिस जीवन में प्रभु के लिए प्यार नहीं,वह जीवन तो व्यर्थ ही है- यस्तन्न वेद किम्रचा...

ओउम् भूपेश आर्य जिस जीवन में प्रभु के लिए प्यार नहीं,वह जीवन तो व्यर्थ ही है- यस्तन्न वेद किम्रचा करिष्यति ।।-ऋग्वेद १/१६४/३९ अर्थ-जो परमात्मा को नहीं जानता वह ऋग्वेद से भी क्या फल प्राप्त करेगा?


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ओउम् भूपेश आर्य~८९५४५७२४९१ महे चन त्वामद्रिव: परा शुल्काय देयाम्। न सहस्राय नायुताये वज्रिवो न...

ओउम् भूपेश आर्य~८९५४५७२४९१ महे चन त्वामद्रिव: परा शुल्काय देयाम्। न सहस्राय नायुताये वज्रिवो न शताय शतामघ ।। ऋग्वेद ८/१/५ हे अविनाशी परमात्मन! बडे से बडे मूल्य व आर्थिक लाभ के लिए भी मैं कभी तेरा परित्याग न करुं। हे शक्तिशालिन् ! हे ऐश्वर्यों के स्वामिन्! मैं तुझे सहस्र के लिए भी न त्यागूँ,दस सहस्र के लिए भी न बेचूं और अपरिमित धन राशि के लिए भी तेरा त्याग न करुँ।


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प्राणायाम की विधि— प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य। —योगसूत्र। जैसे अत्यन्त वेग से वमन होकर...

प्राणायाम की विधि— प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य। —योगसूत्र। जैसे अत्यन्त वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे। जब बाहर निकालना चाहे तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच के वायु को बाहर फेंक दे। जब तक मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच रक्खे तब तक प्राण बाहर रहता है। इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है। जब घबराहट हो तब धीरे-धीरे भीतर वायु को ले के फिर भी वैसे ही करता जाय जितना सामर्थ्य और इच्छा हो और मन में (ओ३म्) इस का जप करता जाय इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है। एक ‘बाह्यविषय’ अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना। दूसरा ‘आभ्यन्तर’ अर्थात् भीतर जितना प्राण रोका जाय उतना रोक के। तीसरा ‘स्तम्भवृत्ति’ अर्थात् एक ही वार जहां का तहां प्राण को यथाशक्ति रोक देना। चौथा ‘बाह्याभ्यन्तराक्षेपी’ अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उससे विरुद्ध उस को न निकलने देने के लिये बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाय। ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुक कर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियाँ भी स्वाधीन होते हैं। बल पुरुषार्थ बढ़ कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। इस से मनुष्य शरीर में वीर्य वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर, बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझ कर उपस्थित कर लेगा। स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे। भोजन, छादन, बैठने, उठने, बोलने, चालने, बड़े छोटे से यथायोग्य व्यवहार करने का उपदेश करें। सन्ध्योपासन जिसको ब्रह्मयज्ञ भी कहते हैं। ‘आचमन’ उतने 


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प्राणायाम के 4 भाग बह्यांतर अभ्यान्तर स्तम्भवृत्ति और बह्यांतर अभ्यान्तर विष्याक्षेपि

प्राणायाम के 4 भाग बह्यांतर अभ्यान्तर स्तम्भवृत्ति और बह्यांतर अभ्यान्तर विष्याक्षेपि


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स्वदेशी आन्दोलन में गणेश उत्सव का महत्व 1894 मे अंग्रेज़ो ने भारत मे एक बहुत खतरनाक कानून बना दिया...

स्वदेशी आन्दोलन में गणेश उत्सव का महत्व 1894 मे अंग्रेज़ो ने भारत मे एक बहुत खतरनाक कानून बना दिया !जिसे कहते हैं धारा 144 ! ये कानून आज आजादी के 67 साल बाद देश मे वैसा का वैसा चलता है! उस कानून मे ये था कि किसी भी स्थान 5 भारतीय से अधिक भारतीय इकट्ठे नहीं हो सकते ! समूह बनाकर कहीं प्रदर्शन नहीं कर सकते ! और अगर कोई ब्रिटिश पुलिस का अधिकारी उनको कहीं इकट्ठा देख ले तो आप विश्वास नहीं कर सकते कितनी कड़ी सजा उनको दी जाती थी ! उनको कोड़े से मारा जाता था ! और हाथो से नाखूनो तक को खींच लिया जाता था ! 1882 मे भारत के क्रांतिकारी जिनका नाम था बंकिम चंद्र चटर्जी उन्होने एक गीत लिखा था जिसका नाम था वन्देमातरम ! तो इस गीत को गाने पर अंग्रेज़ो ने प्रतिबंद लगा दिया ! और गीत गाने वालों को जेल मे डालने का फरमान जारी कर दिया ! तो इन दोनों बातों के कारण लोगो मे अंग्रेज़ो के प्रति बहुत भय आ गया था !! लोगो मे अंग्रेज़ो के प्रति भय को खत्म करने के लिए और इस कानून का विरोध करने के लिए लोकमान्य तिलक ने गणपति उत्सव की स्थापना की ! और सबसे पहले पुणे के शनिवारवाडा मे गणपति उत्सव का आयोजन किया गया ! 1894 से पहले लोग अपने अपने घरो मे गणपति उत्सव मनाते थे लेकिन 1894 के बाद इसे सामूहिक तौर पर मनाने लगे ! तो पुणे के शनिवारवडा मे हजारो लोगो की भीड़ उमड़ी ! लोकमान्य तिलक ने अंग्रेज़ो को चेतावनी दी कि हम गणपति उत्सव मनाएगे अंग्रेज़ पुलिस उन्हे गिरफ्तार करके दिखाये ! कानून के हिसाब से अंग्रेज़ पुलिस किसी राजनीतिक कार्यक्रम मे उमड़ी भीड़ को ही गिरफ्तार कर सकती थी लेकिन किसी धार्मिक समारोह मे उमड़ी भीड़ को नहीं !! इस प्रकार पूरे 10 दिन तक 20 अक्तूबर 1894 से लेकर 30 अक्तूबर 1894 तक पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव मनाया गया ! हर दिन लोक मान्य तिलक वहाँ भाषण के लिए किसी बड़े व्यक्ति को आमंत्रित करते ! 20 तारीक को बंगाल के सबसे बड़े नेता बिपिन चंद्र पाल वहाँ आए !! और ऐसे ही 21 तारीक को उत्तर भारत के लाला लाजपत राय वहाँ पहुंचे ! इसी प्रकार एक ही परिवार मे पैदा हुए तीन क्रांतिकारी भाई जिनको चापेकर बंधु कहा जाता है वहाँ पहुंचे ! वहाँ 10 दिन तक इन महान नेताओ के भाषण हुआ करते थे ! और सभी भाषणो का मुख्य मुद्दा यही होता था कि गणपति जी हमको इतनी शक्ति दें कि हम भारत से अंग्रेज़ो को भगाएँ ! गणपति जी हमे इतनी शक्ति दें के हम भारत मे स्वराज्य लाएँ ! इसी तरह अगले साल 1895 मे पुणे के शनिवारवाड़ा मे 11 गणपति स्थापित किए गए और उसके अगले साल 31 !और अगले साल ये संख्या 100 को पार कर गई ! फिर धीरे -धीरे पुणे के नजदीक महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरो मे ये गणपति उत्सव अहमदनगर ,मुंबई ,नागपुर आदि तक फैलता गया !! हर वर्ष हजारो लोग इकट्ठे होते और बड़े नेता उनमे राष्ट्रीयता भरने का कार्य करते ! और इस तरह लोगो का गणपति उत्सव के प्रति उत्साह बढ़ता गया !!! और राष्ट्र के प्रति चेतना बढ़ती गई !! 1904 में लोकमान्य तिलक ने लोगो से कहा कि गणपति उत्सव का मुख्य उद्देशय स्वराज्य हासिल करना है आजादी हासिल करना है ! और अंग्रेज़ो को भारत से भगाना है ! बिना आजादी के गणेश उत्सव का कोई महत्व नहीं !! पहली बार लोगो ने लोकमान्य तिलक के इस उद्देश्य को बहुत गंभीरता से समझा ! इसके बाद एक दुर्घटना हो गई अपने देश में !! 1905 मे अंग्रेज़ो की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया एक अंग्रेज़ अधिकारी था उसका नाम था कर्ज़न ! उसने बंगाल को दो हिस्सो मे बाँट दिया !एक पूर्वी बंगाल एक पश्चमी बंगाल ! पूर्वी बंगाल था मुसलमानो के लिए पश्चमी बगाल था हिन्दुओ के लिए !! हिन्दू और मूसलमान के आधार पर यह पहला बंटवारा था ! और इसका नाम रखा division of bengal act !! बंगाल उस समय भारत का सबसे बड़ा राज्य था और इसकी कुल आबादी 7 करोड़ थी ! लोकमान्य तिलक ने इस बँटवारे के खिलाफ सबसे पहले विरोध की घोषणा की उन्होने ने लोगो से कहा अगर अंग्रेज़ भारत मे संप्रदाय के आधार पर बंटवारा करते हैं तो हम अंग्रेज़ो को भारत में रहने नहीं देंगे !! उन्होने अपने एक मित्र बंगाल के सबसे बड़े नेता बिपिन चंद्रपाल को बुलाया अरबिंदो गोश जी को बुलाया और कुछ और अन्य बड़े नेताओं को बुलाया !! और उन्हे कहा की आप बंगाल मे गणेश उत्सव का आयोजन कीजिये !! तो बिपिन चंद्र पाल जी ने कहा कि बंगाल के लोगो पर गणेश जी का प्रभाव ज्यादा नहीं है ! तो तिलक जी ने पूछा फिर किसका प्रभाव है ?? तो उन्होने के कहा नवदुर्गा एक उत्सव मनाया जाता है उसका बहुत प्रभाव है !! तो तिलक जी ने कहा ठीक है मैं यहाँ गणेश उत्सव का आयोजन करता हूँ आप वहाँ दुर्गा उत्सव का आयोजन करिए !! तो बंगाल मे समूहिक रूप से दुर्गा उत्सव मनाना शुरू हुआ जो जब तक जारी है ! तो दुर्गा उत्सव और गणेश उत्सव के आयोजनो के माध्यम से लाखो-लाखो लोग तिलक जी के संपर्क मे आए और तिलक जी ने उन्हे कहा कि आप सब इस बंगाल विभाजन का विरोध करें !! तो लोगो ने पूछा कि विरोध का तरीका क्या होगा ??? तो लोकमान्य तिलक ने कहा कि देखो भारत मे अँग्रेजी सरकार ईसट इंडिया कंपन्नी की मदद से चल रही है ! ईस्ट इंडिया कंपनी का माल जब तक भारत मे बिकेगा तब तक अंग्रेज़ो की सरकार भारत मे चलेगी !! जब माल बिकना बंद हो गया तो अंग्रेज़ो के पास धन जाना बंद हो जाएगा ! और अँग्रेज़ भारत से भाग जाएँगे !! इस तरह से लोगो ने बँटवारे का विरोध किया ! और भंग भंग के विरोध मे एक आंदोलन शुरू हुआ ! और इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे (लाला लाजपतराय) जो उत्तर भारत मे थे !(विपिन चंद्र पाल) जो बंगाल और पूर्व भारत का नेतत्व करते थे ! और लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक जो पश्चिम भारत के बड़े नेता थे ! इस तीनों नेताओ ने अंग्रेज़ो के बंगाल विभाजन का विरोध शुरू किया ! इस आंदोलन का एक हिस्सा था (अंग्रेज़ो भारत छोड़ो) (अँग्रेजी सरकार का असहयोग) करो ! (अँग्रेजी कपड़े मत पहनो) (अँग्रेजी वस्तुओ का बहिष्कार करो) ! और दूसरा हिस्सा था पोजटिव ! कि भारत मे स्वदेशी का निर्माण करो ! स्वदेशी पथ पर आगे बढ़ो ! लोकमान्य तिलक ने अपने शब्दो मे इसको स्वदेशी आंदोलन कहा ! अँग्रेजी सरकार इसको भंग भंग विरोधे आंदोलन कहती रही !लोकमान्य तिलक कहते थे यह हमारा स्वदेशी आंदोलन है ! और उस आंदोलन के ताकत इतनी बड़ी थी !कि यह तीनों नेता अंग्रेज़ो के खिलाफ जो बोल देते उसे पूरे भारत के लोग अपना लेते ! जैसे उन्होने आरके इलान किया अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद करो !करोड़ो भारत वासियो ने अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद कर दिया ! उयर उसी समय भले हिंदुतसनी कपड़ा मिले मोटा मिले पतला मिले वही पहनना है ! फिर उन्होने कहाँ अँग्रेजी बलेड का इस्तेमाल करना बंद करो ! तो भारत के हजारो नाईयो ने अँग्रेजी बलेड से दाड़ी बनाना बंद कर दिया ! और इस तरह उस्तरा भारत मे वापिस आया ! फिर लोक मान्य तिलक ने कहा अँग्रेजी चीनी खाना बंद करो ! क्यू कि चीनी उस वक्त इंग्लैंड से बन कर आती थी भारत मे गुड बनाता था ! तो हजारो लाखो हलवाइयों ने गुड दाल कर मिठाई बनाना शुरू कर दिया ! फिर उन्होने अपील लिया अँग्रेजी कपड़े और अँग्रेजी साबुन से अपने घरो को मुकत करो ! तो हजारो लाखो धोबियो ने अँग्रेजी साबुन से कपड़े धोना मुकत कर दिया !और काली मिट्टी से कपड़े धोने लगे !फिर उन्होने ने पंडितो से कहा तुम शादी करवाओ अगर ! तो उन लोगो कि मत करवाओ जो अँग्रेजी वस्त्र पहनते हो ! तो पंडितो ने सूट पैंट पहने टाई पहनने वालों का बहिष्कार कर दिया ! इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला !कि 5-6 साल मे अँग्रेजी सरकार घबरागी क्यूंकि उनका माल बिकना बंद हो गया ! ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चोपट हो गया ! तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डाला ! कि हमारा तो धंधा ही चोपट हो गया भारत मे ! भारतीयो ने हमार समान खरीदना बंद कर दिया है ! हमारे सामानो की होली जालाई जा रही हैं ! लोकमान्य तिलक के 1 करोड़ 20 लाख कार्यकर्ता ये काम कर रहे हैं !हमारे पास कोई उपाय नहीं है आप इन भारतवासियो के मांग को मंजूर करो मांग क्या थी कि यह जो बंटवारा किया है बंगाल का हिन्दू मुस्लिम से आधार पर इसको वापिस लो हमे बंगाल के विभाजन संप्रदाय के आधार पर नहीं चाहिए !! ! और आप जानते अँग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा ! और 1911 मे divison of bangal act वापिस लिया गया ! और इस तरह पूरे देश मे लोकमान्य तिलक की जय जयकार होने लगी !! तो मित्रो इतनी बड़ी होती है बहिष्कार कि ताकत ! जिसने अंग्रेज़ो को झुका दिया और मजबूर कर दिया कि वो बंगाल विभाजन वापस लें ! हमेशा याद रखें कि दुश्मन को अगर खत्म करना है तो उसकी supply line ही काट दो ! दुश्मन अपने आप खत्म हो जाएगा ! स्वदेशी और स्वराज्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ! बिना स्वदेशी के स्वराज्य कभी संभव नहीं !! भारतीयो मे स्वदेशी की अलख जगाने वाले ! स्वदेशी आंदोलन के जनक लोकमान्य तिलक को शत शत नमन !!🇮🇳🇮🇳🇮🇳


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ओउम् भूपेश आर्य~८९५४५७२४९१ पाखंडी शिरोमणी माधवाचार्य को वेद के"इन्द्र वयुमनीराधं हवामहे"...

ओउम् भूपेश आर्य~८९५४५७२४९१ पाखंडी शिरोमणी माधवाचार्य को वेद के"इन्द्र वयुमनीराधं हवामहे" इस मन्त्र भाग में क्रष्ण घुसेडकर राधा के स्वप्नन में गायका सुरैया सुन्दरी नजर आती है। हिन्दुओं के घर में ही जब वेदों के दुश्मन पौराणिक पंडित मौजूद होवें और वे जानबूझकर धूर्तता करें तो वेदों के अपौरुषेयत्व की रक्षा क्या मुसलमान करने आवेंगे? सनातनी जनता के लिए यह कलंक की बात है कि ऐसे नास्तिक पण्डितों की वह कद्र करती है। वेदों के हजारों मंत्रों में लाखों शब्दों का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ व्याकरण कि रीति से निरुक्तादि की शैली से किया जाता है। वेद ईश्वरीय ज्ञान के भण्डार हैं तथा आदि स्रष्टि में मनुष्यों को मिलने से उनमें व्यक्ति इतिहास या किसी भी स्थान का वर्णन नहीं है।पर कुछ पाखण्डियों ने यदि किसी भी नाम का शब्द वेद के किसी पद से मिलता जुलता भी दीखने लगता है,तो वह बकने लगता है कि वेद में अमुक व्यक्ति का वर्णन आया है। जैसे ये मन्त्र है- “इन्द्र वयुमनिराधं हवामहे” (अथर्ववेद १९/१५/२) इसमें अनुराधम् पद में इस अंधे को राधा दीख पडी है। सत्यार्थ यह है देखिये-(वयम्) हम लोग(आराधम्) आराधना करने योग्य या सिद्ध कराने हारे (इन्द्रम्) ऐश्वर्यशाली परमेश्वर की(हवामहे) स्तुति करते हैं। वेद मन्त्रों में राधा और क्रष्ण की गन्ध भी नहीं है। पर फिर भी इन पौराणिकों को वेद में राधा क्रष्ण नजर आ रहे हैं। इस प्रकार श्रीक्रष्ण जी महाराज को पुराणों ने कल्पित कथाओं द्वारा हर प्रकार से बदनाम करने का प्रयास किया है। राधा से नाजायज सम्बन्ध,कुब्जा से व्यभिचार,गोपियों से विषय भोग एवं काम क्रीडा करना आदि झूठी लज्जाजनक बातें हैं। किर्तन प्रणाली जिसका पौराणिकों में काफी प्रचार हो रहा है,महान क्रष्ण को बदनाम करने की द्रष्टि से अत्यधिक मूर्खतापूर्ण चीज है। ये पढिये-अपहायं निज्र कर्म क्रष्णेति यो वादिन:। ते हरेर्द्वेषिण पापा: धर्मार्थ जन्म यद् धरे।। अर्थ-जो लोग वेदोक्त धर्म को त्यागकर केवल हरे क्रष्ण जपते रहते हैं वे क्रष्ण के दुश्मन हैं,पापी हैं।क्योंकि क्रष्ण का जन्म ही वेद धर्म प्रचार के लिए हुआ था। इस प्रमाण से वर्तमान कीर्तन प्रणाली गलत सिद्ध है जाती है।जिसका पुराणों ने प्रचार करके हिन्दु जाति में घोर पाखण्ड फैला रखा है।बहुत से अज्ञानी तो क्रष्ण को भी छोडकर राधे राधे रटते हैं।मानो राधा सुन्दरी से उनका कोई निकट का रिश्ता हो। धर्म के नाम पर इस कौम को इन पापों ने किस कदर मूर्ख बनाया है यह अक्लमंद लोग देखें। पुराणों ने एक ईश्वर के स्थान पर हजारों देवी देवताओं की पूजा हिन्दू कौम में जारी करा दी। परमात्मा के स्थान पर महादेव का लिंग(मूत्रेन्द्रिय) जनता से पूजवा डाला। विष्णु ,शिव व गणेश पुराणों के अनुसार प्रथ्वी पर व्यभिचार में लगे शापों का दण्ड भुगतने ही आते हैं।इनके गन्दे चरित्रों का पुराणों में सविस्तार वर्णन है। नाम जपने के इच्छुकों को शुद्ध मन से ओउम् व गायत्री का मानसिक जप करना चाहिए। समस्त वेद और शास्त्रों में केवल ‘ओउम्’ जपने का ही विधान है। कल्पित अवतार,विष्णु तथा शिव आदि के मन्दिरों पर सर पटकने वाले अपना मनुष्य जन्म व्यर्थ खोते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम,योगेश्वर श्रीक्रष्ण महाराज हमारी आर्य जाति के निष्कलंक ईश्वर भक्त महान् पूर्वज थे। उनका नाम जपने के बजाय उनके कार्यों एवं उनके जीवनादर्शों को अपने जीवन में उतारना प्रत्येक व्यक्ति,समाज व देश के लिए उपयोगी होगा। परमात्मा सबको सदबुद्धि दें।


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