Wednesday, September 12, 2018

यह ई पुस्तकालय है, जिसमें दर्जनों अमूल्य ग्रंथों के PDF सहेजे गए हैं, ताकि यह अधिक से अधिक लोगों के...

यह ई पुस्तकालय है, जिसमें दर्जनों अमूल्य ग्रंथों के PDF सहेजे गए हैं, ताकि यह अधिक से अधिक लोगों के काम आ सकें, धर्म और राष्ट्र संबंधी विषय पर PDF में अमूल्य पुस्तकें इन लिंक में संग्रहित हैं, आप विषय देखकर लिंक खोलें तो बहुत सी पुस्तकें मिलेंगी, सभी पुस्तकें आप निशुल्क download कर सकते हैं, इन लिंक्स में सैकड़ों किताबें हैं, जो कई पीढ़ियों की मेहनत का फल हैं:

*Swami Dayananda - स्वामी दयानंद रचित :-*

https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRZnUxOEpPSVBHVzQ/edit

*Aadi Shankaracharya - आद्य शंकराचार्य :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRallkZ0VIWnRPVjA

*Sri Aurobindo - श्री अरविंदो :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRSWktaVFPa2tSa2s

*Swami Vivekanand - स्वामी विवेकानन्द :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRMFAtTi1yUFAzdW8

*Swami Ramteerth - स्वामी रामतीर्थ :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRNGlYZzhqTEQtcU0

*Sitaram Goel - सीताराम गोयल :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRT19aT3pnZ0tvODA

*Veer Savarkar -*

*वीर सावरकर :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRbE0wQng5YVZmb1E

*Swami Shivanand - स्वामी शिवानंद :-* 

https://drive.google.com/open? id=0B1giLrdkKjfRYXJDclQwYTBfWFk

*हिन्दू, राष्ट्र व हिन्दुराष्ट्र :-*

https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRNW1scHdGMHQzZ0U/edit

*Basic Hinduism -* 

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRTXdpN29OTUQ0Q3c

*Hindutva and India :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRNzh0MXhyRVpiVEE

*Autobiography -* *आत्मकथाएं :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRbEpPUGcydTZlWDQ

*धर्म एवं आध्यात्म -* 

https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRRzViUEdGMnI2Smc/edit

*यज्ञ Yajna -* 

https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRUThPYWlldEd6NVE/edit

*Brahmcharya - ब्रह्मचर्य :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRNzJmbWpSYmg5bjQ

*Yog - योग :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRcWZ1NzBoWER2Tkk

*Upanishad - उपनिषद :- *

https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRNDJiQVFDbVFjbGc/edit

*Shrimad Bhagvad Geeta -* *श्रीमद्भगवद्गीता :-*

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRWk9KVno2V3NNLXM

Manu and pure Manusmriti - महर्षि मनु व शुद्ध मनुस्मृति :-

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRTXlYQUJhUXNWM00

Valmeeki and Kamba Ramayan - वाल्मीकि व कम्ब रामायण :-

https://drive.google.com/open?id=0B1giLrdkKjfRa18yTE5EM1Z3Zk0

*Books on Vedas -* *वेदों पर किताबें :-*

https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRSU9OVzBfbENTcDg/edit

Maharshi Dayananda - महर्षि दयानंद समग्र :-

https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRN2RzYVdFZWI1a0U/edit

————-Complete commentaries on Veda - सम्पूर्ण वेद भाष्य ——–

Introduction to the Commentary on the 4 Vedas - ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका :-

https://drive.google.com/folder/d/0B1giLrdkKjfRejNEaUo1RERJdFE/edit

RigVeda - ऋग्वेद सम्पूर्ण - 


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Tuesday, September 11, 2018

🌺🌼 *।।ओ३म्।।* 🌼🌺ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।यद् भद्रं तन्न आसुव।।1।।*तू सर्वेश सकल...

🌺🌼 *।।ओ३म्।।* 🌼🌺

ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।

यद् भद्रं तन्न आसुव।।1।।

*तू सर्वेश सकल सुखदाता शुद्धस्वरूप विधाता है।*

*उसके कष्ट नष्ट हो जाते जो तेरे निज आता है।।*

*सारे दुर्गुण, दुर्व्यसनों से हमको नाथ बचा लीजै।*

*मंगलमय गुण कर्म पदार्थ प्रेम सिन्धु हमको दीजै।।*

ओ३म् हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।2।।

*तू ही स्वयं प्रकाशक, सुचेतन, सुखस्वरूप शुभ त्राता है।*

*सूर्य-चन्द्र लोकादिक को तो तू रचता और टिकाता है।।*

*पहिले था अब भी तू ही है घट-घट में व्यापक स्वामी।*

*योग, भक्ति, तप द्वारा तुझको, पावें हम अन्तर्यामी।।*

ओ३म् य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः।

यस्यच्छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।3।।

*तू ही आत्मज्ञान बल दाता, सुयश विज्ञजन गाते हैं।*

*तेरी चरण-शरण में आकर, भवसागर तर जाते हैं।।*

*तुझको ही जपना जीवन है, मरण तुझे विशराने में।*

*मेरी सारी शक्ति लगे प्रभु, तुझसे लगन लगाने में।।*

ओ३म् यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव।

य ईशेSअस्य द्विपदश्चतुश्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।4।।

*तूने अपनी अनुपम माया से जग की ज्योति जगाई है।*

*मनुज और पशुओं को रचकर निज महिमा प्रगटाई है।।*

*अपने हिय-सिंहासन पर श्रद्धा से तुझे बिठाते हैं।*

*भक्ति-भाव से भेंटें लेकर शरण तुम्हारी आते हैं।।*

ओ३म् येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः।।

योSअन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।5।।

*तारे, रवि, चन्द्रादि बनाकर निज प्रकाश चमकाया है।*

*धरणी को धारण कर तूने कौशल अलख लखाया है।।*

*तू ही विश्व-विधाता, पोषक, तेरा ही हम ध्यान धरें।*

*शुद्ध भाव से भगवन्, तेरे भजनामृत का पान करें।।*

ओ३म् प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव।

यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोSअस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्।।6।।

*तूझसे बडा न कोई जग में, सबमें तू ही समाया है।*

*जड चेतन सब तेरी रचना, तुझमें आश्रय पाया है।।*

*हे सर्वोपरि विभो, विश्व का तूने साज सजाया है।*

*धन दौलत भरपूर दूजिए यही भक्त को भाया है।।*

ओ३म् स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।

यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त।।7।।

*तू गुरु है, प्रजेश भी तू है, पाप-पुण्य फलदाता है।*

*तू ही सखा-बन्धु मम तू ही, तुझसे ही सब नाता है।।*

*भक्तोंको इस भव-बन्धन से, तू ही मुक्त कराता है।*

*तू है अज, अद्वैत, महाप्रभु सर्वकाल का ज्ञाता है।।*

ओ३म् अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठान्ते नम उक्तिं विधेम ।।8।।

*तू है स्वयं प्रकाश रूप प्रभु, सबका सिरजनहार तू है।*

*रसना निशि-दिन रटे तुम्हीं को, मन में बसता सदा तू ही।।*

*कुटिल पाप से हमें बचाते रहना, हरदम दयानिधान।*

*अपने भक्त जनों को भगवन्, दीजै यहीं विशद वरदान।।*

_*इतीश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाप्रकरणम्*_

ओ३म्!!


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नमस्ते,महर्षि कणाद ने वैशेषिक में 13 गुणों को विशेष स्वीकार किया है- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या,...

नमस्ते,

महर्षि कणाद ने वैशेषिक में 13 गुणों को विशेष स्वीकार किया है- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथकत्व,संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व और संस्कार।

👆🏻क्या ये सही है?


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Friday, September 7, 2018

नमस्ते जीआज हम द्रव्य के पश्चात गुण के लक्षण सूत्र के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।जिसे गुण का...


नमस्ते जी

आज हम द्रव्य के पश्चात गुण के लक्षण सूत्र के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।

जिसे गुण का गुणों से साधर्म्य और द्रव्य गुण से वैधर्म्य भी कह सकते है। अर्थात समानता और विशेषता।

*द्रव्याश्रय्यगुणवान् संयोग विभागेष्वकारणमनपेक्ष इति गुणलक्षणम्।।१६।।(१-१)*

सूत्र में जो पदों को समास में बताया गया है,उन्हें समास से पदों में विच्छेद करके देखेंगे तो सूत्र इसप्रकार बनेगा।

*द्रव्याश्रयी, अगुणवान, संयोगविभागेषु,अकारणम् अनपेक्ष: इति गुणलक्षणम्।।*

सूत्र ऐसे विचित्र होते है, की उनको समझने के लिए पुर्णतः एकाग्रता बनानी पड़े।

हमने गत पाठ में देखा कि, किसी भी पदार्थ के लक्षण को किस प्रकार से निर्दुष्ट लक्षित किया जाता है।

हमने देखा कि यदी चिह्नित किया गया लक्षण; अव्याप्त,अतिव्याप्ति और असम्भव दोषों से रहित हो तो वह उद्देशित पदार्थ ही होगा।

जैसे गाय के लक्षण में बताया कि, सिंग वाली हो वह गाय होती है,ऐसा लक्षण बताने से अतिव्याप्ति हो रही थी,क्योंकि सिंग तो भैंस और बकरी के भी होते है,तो यहां लक्षण दूषित हुआ।

फिर कहा स्वर्ण वर्ण की हो वह गाय है,तो यंहा अव्याप्त दोष हुआ क्योंकि गाय तो काली और सफेद (धोली ) भी होती है। फिर कहा एक्शफ वाली हो अर्थात बीच में से खुर फटा हुआ न हो तो यंहा असम्भव दोष हुआ।

कुल मिलाकर सार यह निकला कि उक्त तीनों दोषों से रहित असाधारण धर्म का नाम *लक्षण* है।

अब विषय के साथ जुड़तें हुए, जो जो लक्षण गुण के लिए चिह्नित किये गए उन्हें एक एक करके देखते चले।

प्रथम लक्षण बताया कि १)द्रव्याश्रयी= अर्थात जो द्रव्य के आश्रित हो और द्रव्य जिनका आधार हो वह गुण है।

ऐसा कहने से अतिव्याप्ति दोष आता है,क्योंकि कार्यद्रव्य,और कर्म भी तो द्रव्याश्रित रहते है।

तब ऐसा लक्षण क्यों कहा ? तो यंहा कारणद्रव्य को कार्यद्रव्य, गुण, और कर्म से हटाने के लिए कहा कि *द्रव्याश्रयी* अर्थात कारणद्रव्य किसी अन्य द्रव्य के आश्रित नही रहता;प्रत्युत अन्य कार्यद्रव्य,गुण,कर्मादि का आधार है।

यह चाहे हम वैशेषिक की मान्यता के आधार पर परमाणु में देखें या सांख्य की दृष्टि से सत्व,रजस,तम पर्यन्त देखें।

केवल द्रव्याश्रयी इतना कहने पर गुण का लक्षण नही होगा क्योंकि द्रव्य में तो कार्यद्रव्य,और कर्म भी रहते है। तो अतिव्याप्ति अब भी बनी हुई है उसे हटाने के लिए दूसरा लक्षण कहा *अगुणवान*=गुण में गुण नही रहता ऐसा कहकर कार्यद्रव्य को भी हटा दिया। क्योंकि कार्यद्रव्य में गुण रहते है,प्रत्युत गुण में गुण न रहने से कार्यद्रव्य जो द्रव्यआश्रित होते हुए अतिव्याप्ति दोष में आता था, वंहा से अगुणवान कहकर हटा दिया।

कोई भी कार्यद्रव्य में जो गुण कारण द्रव्य में होते है, वही गुण व अन्य गुण कार्यद्रव्य में होने से वह गुणवान है अर्थात गुणवाला है,जबकि गुण में गुण नही रहते इसलिए वंहा लक्षण किया अगुणवान।

अब कारणद्रव्य और कार्यद्रव्य दोनों हट गए,द्रव्याश्रयी से कारणद्रव्य हट गया कारणद्रव्य आश्रित नही होता अपितु आधार होता है। और अगुणवान कहकर कार्यद्रव्य को भी हटा दिया। अर्थात समवाय सम्बन्ध से गुण न रहते हो, वह गुण होता है। गुण में समवाय से गुण नही रहता;अपितु कार्यद्रव्य में गुण रहता है; अतः कार्यद्रव्य द्रव्याश्रयी होता हुआ भी अगुणवान् अर्थात गुणों का अनाश्रय नही है,प्रत्युत गुणों का आश्रय है।

जैसे तन्तु में स्थित रूपगुण वस्त्र के रूपगुण का कार्य है,न कि रूपका आश्रय क्योंकि गुण में गुण नही रहता।

इसप्रकार द्रव्याश्रयी,अगुणवान कहकर कारण,और कार्यद्रव्य को तो हटाया, तब भी कर्म से तो अतिव्याप्ति बनी हुई है।

क्योंकि कर्म भी द्रव्याश्रयी होता है,और कर्म में भी गुण नही रहते।

क्रमशः


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Thursday, September 6, 2018

*BARIA TREKKING FESTIVAL2018* Save forests save Wildlife.Beat Plastic Pollution.Baria Forest...


*BARIA TREKKING FESTIVAL2018*

Save forests save Wildlife.

Beat Plastic Pollution.


Baria Forest division with JFMC welcomes its participants and nature lovers to take part in trekking festival 2018.


_Trekking trails are located near the Ratanmahal Wildlife sanctuary._

Kindly fill below form to participate:

https://goo.gl/forms/tDtebDYtAWMUOOS42


TrekDetails:

Trek 1.“ Beauty of Satmatar Waterfall ” Date : 02-09-2018 GPS 22.57817 , 73.98876

https://goo.gl/maps/RgHRSZJPH7G2


Trek 2.“ Feel The WoodLand ” Date: 16-09-2018 GPS 22.57817 , 73.98876

https://goo.gl/maps/LzgnDdJZH9F2


Note : Registration will be closed before 24 hours of trekking date.


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बच्चों के मन में डालने वाली जरूरी बातें।*बच्चों को स्मरण करवाने योग्य वाक्य -**( क ) ईश्वर के गुण...

बच्चों के मन में डालने वाली जरूरी बातें।

*बच्चों को स्मरण करवाने योग्य वाक्य -*

*( क ) ईश्वर के गुण -*

१.सच्चिदानंदस्वरुप, २. निराकार ३.सर्वशक्तिमान, ४. न्यायकारी ,५. दयालु ६.अजन्मा ७.अनन्त |

*ईश्वर का मुख्य नाम ओ३म् है,*

( नोट:-बडे बच्चों को कुछ अन्य गुणवाचक नाम भी स्मरण करवाये जा सकते हैं- ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, सृष्टि-कर्ता, सृष्टिहर्ता और मोक्ष दाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, महादेव, विराट, अग्नि, विश्व, हिरण्यगर्भ, वायु, तैजस, ईश्वर, आदित्य, प्राज्ञ, परम पुरुष, मनु, प्रजापति, इन्द्र, प्राण, ब्रह्म, रूद्र, कालाग्नि, दिव्य, सुपर्ण, गुरुत्मान्, मातरिश्वा, भूमि, आदि सब उसी एक ही ईश्वर के नाम हैं )

*( ख ) -ईश्वर के कार्य -*

१. ईश्वर सृष्टि की रचना करते हैं।

२. ईश्वर सृष्टि का पालन करते हैं|

३. ईश्वर सृष्टि का संहार करते हैं

४. ईश्वर वेदों का ज्ञान देते हैं।

५. ईश्वर अच्छे-बुरे कर्मों का फल देते हैं |

६. ईश्वर योगियों को मोक्ष प्रदान करते हैं |

*( ग ) ईश्वर के उपदेश -*

१. वेद पढो, वेद पढ़ाओ ।

२. सन्ध्या करो, हवन करो ।

३. सदा सच बोलो, मीठा बोलो ।

४. झूठ बोलना पाप है ।

५ . मांस अंडा खाना पाप है ।

६. पशुबलि पाषाण पूजा पाप है ।

*( घ ) ईश्वर से हमारा सम्बन्ध-*

१. ईश्वर हमारी माता है हम उसके पुत्र हैं।

२. ईश्वर हमारा पिता है हम उसके पुत्र हैं।

३. ईश्वर हमारा गुरू है हम उसके शिष्य हैं।

४. ईश्वर हमारा राजा है हम उसकी प्रजा हैं।

५. ईश्वर उपास्य है हम उसके उपासक हैं।

६. ईश्वर व्यापक है हम व्याप्य हैं।

*( ङ ) ईश्वर से प्रार्थना -*

१. हे ईश्वर ! हमें सद्बुद्धि दो।

२. हे ईश्वर हमारे सब दु:ख दुर्गुण दूर कर दो।

३. हे ईश्वर ! हमें सब बन्धनों से मुक्त कर दो।

४. हे ईश्वर ! सब सुखी हों, सबका मंगल हो।

५. हे ईश्वर ! सब ओर शान्ति ही शान्ति हो।

६. ओ३म् असतो मा सदगमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्मा अमृतंगमय

••••••••••••••••••••••••••

( च ) -साधारण ज्ञान-

१.अनादि वस्तुएं - ईश्वर, जीव और प्रकृति। ( God ,Soul,Matter )

२. सृष्टि काल- चार अरब बतीस करोड़ वर्ष।

३. प्रलय काल- चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष।

४. मोक्ष काल- ३१ नील, १० खरब, ४० अरब वर्ष।

५. हमारे देश का मूल नाम – आर्यावर्त्त

६. अनादि का अर्थ- नित्य, शाश्वत ( eternal )

७.वेद संस्कृत में ही क्यों- क्योंकि संस्कृत को सीखने के लिये सबको एक जैसी मेहनत करनी पडती है और यह सबसे समृद्ध व वैज्ञानिक दैवी भाषा है।

•••••••••••••••••••••••••••••••

*माता पिता और गुरु जन अपने बच्चों को उपरोक्त वाक्य स्मरण करवाएं, बहुत अच्छे संस्कार पडेंगे |*


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Wednesday, September 5, 2018

नमस्ते जीगत पाठ में हम द्रव्य का गुण- कर्म से वैधर्म्य अर्थात विशेषता को जानने-समझने का प्रयत्न कर...

नमस्ते जी

गत पाठ में हम द्रव्य का गुण- कर्म से वैधर्म्य अर्थात विशेषता को जानने-समझने का प्रयत्न कर रहे थे; की द्रव्य न तो कारण का वध करता है,और न कार्य का। और न गुण का और न ही अपने समवायिकारण और असमवायिकारण का।

द्रव्यपदवाच्यं वस्तु ( कार्य कारणं च न वधति ) स्वीकार्य स्वान्वयि द्रव्यं कार्यभूतम्।

अर्थात जो भी वाच्य कारण द्रव्य अपने कार्य द्रव्य अर्थात जिन अवयवों से अवयवी कार्य है, उनका और अवयवों का नाश नही करता। तथानुगतगुणं और उनमे स्थित गुण को भी नष्ट नही करता।

अब गुणों का द्रव्य- कर्म से वैधर्म्य अर्थात विशेषता बताते है।

*उभयथा गुणा:।।१३।। ( १-१ )*

गुण में दोनों प्रकार देखे जाते है, अर्थात गुण अपने कार्य और कारण दोनों का नाश कर भी देते है,और नही भी करते। द्रव्य तो कार्य - कारण को नष्ट नही करता यदि गुण भी वैसे होता तो १२ सूत्र में समाविष्ठ कर देते।

यह गुणों में परस्पर साधर्म्य और द्रव्य गुण से वैधर्म्य है।

१) अब हम दृष्टान्त से देखें तो हल्दी और चुना पित, और श्वेत रूप के होते है उनसे जो भी कार्य गुण उत्पन्न होगा वह अपने कारण गुण पित और श्वेत को नष्ट कर देता है।

अब नही करता का देखें।

२) श्वेत तन्तु से वस्त्र बना; इसमें तन्तु में स्थित श्वेत रूप कारण गुण और उन तन्तु से बना वस्त्र में श्वेत रूप कार्यगुण।

अब यह वस्त्र में स्थित कार्यगुण अपने कार्यगुण को नाश नही करता।

तो यंहा कार्य से कारण का नष्ट होते हुए भी देखा गया और न होते हुए भी देखा।

अब कार्यगुण अपने कारण गुण का वध करते हुए देखेंगे।

१) आद्य: शब्द: कारणभूत: स्वानन्तरं कार्य न हन्ति, संयोगाजजायमान: शब्द: स्वकारणास्य संयोगस्य स्थितत्वान्नश्यति हि।।

अर्थात जो आरम्भ का शब्द संयोग आदि से उत्पन्न होकर आगे उत्पन्न होने वाले शब्द का कारण होता है, इसी प्रकार कारणभूत प्रथम शब्द, कार्यभूत अपने अनन्तर उत्पन्न हुए शब्द को नष्ट नही करता। किन्तु संयोग से उत्पन्न होने वाला कार्यरूप शब्द जब शब्द सन्तति से उत्पन्न होते होते जो अन्तिम शब्द होता है वह उपान्त्य अर्थात अन्तिम से पहले शब्द का नाश कर देता है। अर्थात दोनों एक दूसरे का नाश कर देते है।

इससे ज्ञात होता है,की गुण दोनों प्रकार के है, कार्यगुण अपने कारण का वध करता भी है,और नही भी करता; कारण गुण अपने कार्य का वध करता भी है,और नही भी करता।


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नमस्ते जीयंहा हमने ऋषि कणाद के सूत्रों के माध्यम से जाना कि, जो गुण जिस द्रव्य का हो, उसी द्रव्य के...

नमस्ते जी

यंहा हमने ऋषि कणाद के सूत्रों के माध्यम से जाना कि, जो गुण जिस द्रव्य का हो, उसी द्रव्य के आश्रित रहता है; अर्थात जो गुण समवायिकारण से जिस द्रव्य में होगा, उस गुण को जो साधन से ग्रहण किया जाता होगा उसी से ग्रहण होगा और उनके माध्यम से आत्मा अनुभूति कर सकती है, वंहा तक ठीक है, किन्तु *शब्द* को आत्मा के गुण में आरोपित करना व कहना दोष है।

अर्थात यह विपर्यय ज्ञान होने से, हमारा व्यवहार समीचीन न होकर अनुचित होगा जिसका विपाक दुःखों से युक्त होगा।

अतः हमें यथार्थज्ञान प्राप्त करवाने हेतु सूत्रकार महर्षि कणाद ने सूत्र के माध्यम से बताया कि :- *परत्र समवायत् प्रत्यक्षत्वाच्च नात्मगुणों न मनो गुण:।। २६ ।। ( २ - १ )*

अर्थात अन्यत्र समवेत ( एकत्र, संचित ) होने से और प्रत्यक्ष होने से शब्द न तो आत्मा का गुण है; न ही मन का गुण है।

यदि शब्द आत्मा का गुण होता, तो “ मैं सुखी हूँ”, ’ मैं दुःखी हूँ,’ इत्यादि अनुभूतियों के समान ‘मैं बज रहा हूँ,’ 'मैं शब्द वाला हूँ’ इत्यादि अनुभव होता। परन्तु ऐसा अनुभव नही होता; अपितु बाजा बज रहा है, घंटी बज रही है, रेडियो बज रहा है, व्हिसल बज रही है, इत्यादि अनुभव होता है।

यदि शब्द और आत्मा में समवाय होता तो आत्मा की अनुभूति उक्त प्रकार नही होती।

अतः शब्द आत्मा से अन्य द्रव्य में समवेत रहने से आत्मा का गुण नही मानना चाहिए।

यदि शब्द आत्मा का गुण हो, तो बधिर अर्थात जिसकी श्रोत्रन्द्रिय नष्ट हो गई हो ऐसे व्यक्तियों को भी शब्द उपलब्ध होना चाहिए जैसे सुख - दुःख की अनुभूति आत्मा को होती है।

यदि शब्द मन का गुण होता तो उसका प्रत्यक्ष न होता, क्योंकि मन का कोई गुण मन के महत् परिमाण वाला न होने से प्रत्यक्ष नही होता। जबकि *शब्द बाह्यकरण अर्थात बाह्य साधन श्रोत्रन्द्रिय से गृहीत होता है।

सूत्र में महर्षि ने *नात्ममनसोर्गुण:* समासयुक्त पाठ न करके अलग अलग पढ़ने से प्रत्यक्षत्वात् इस तुल्य हेतु से *दिशा* और *काल* में भी शब्द गुण के समवायिकारण का *निषेध* समझना चाहिए।


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नमस्ते जीउक्त आशंका का समाधान के लिए महर्षि भूमिका बांधते है; क्योंकि उक्त द्रव्यों में...

नमस्ते जी

उक्त आशंका का समाधान के लिए महर्षि भूमिका बांधते है; क्योंकि उक्त द्रव्यों में व्याप्य-व्यापक प्रत्यक्षपूर्वक है, इसलिए उन्ही सिद्धान्त से अप्रत्यक्ष गुणी के गुण को जान सकते है।

जो सूत्र के माध्यम से सूत्रकार महर्षि कणाद सिद्धान्त स्वरूप भूमिका में बताते है कि :- *कारणगुणपूर्वक: कार्यगुणो दृष्ट:

अर्थात कारण के गुण के अनुसार कार्य में गुण देखा गया है।

अर्थात कार्यद्रव्य में जो गुण होता है, वह कारण के गुणों के अनुसार होता है। जैसा तंतुओं का होगा, तदनुरूप वस्त्र का वैसा ही होगा। अर्थात वस्त्र के सफेदरूप का समवायिकारण वस्त्र है, असमवायिकारण तन्तुओं का सफेदरूप है।

अर्थात जिस अवयव से अवयवी के रूप में आता है तब अवयवीकार्य का समवायिकारण उनका अवयव और उन अवयवों का संयोग असमवायिकारण होता है शेष सब निमित्तकारण जानना चाहिए।

अर्थात तन्तुकारणगत सफेदरूप कार्य वस्त्र में अपने समानजातीय सफेदरूप का आरम्भक होता है।

यह स्थिति कार्यगुण कारण गुणपूर्वक होती है।

इसव्यवस्था के अनुसार इसके अनुरूप यदि वीणा आदि में श्रुयमाण शब्द ( सुनाई देता हुआ ) कारणगुणपूर्वक माना जाय, तो वीणा आदि के कारण-अवयवों में उसीका समानजातीय शब्द अभिव्यक्त होना चाहिये। पर उन अवयवों में ऐसा शब्द अभिव्यक्त किया जाता अनुभव में नही आता। तात्पर्य यह यदि रूपादि गुणों के समान शब्द पृथिवी आदि चार द्रव्यों में से किसी का गुण होता, तो जैसे कार्यगत रूपादि गुणों के समान कारण में गुण उपलब्ध होते है; वैसे ही वीणा आदि कार्यो में उपलब्ध शब्दगुण के समान ही शब्द वीणा आदि के कारण अवयवों में उपलब्ध होता; अपितु ऐसा नही होता, इसलिए शब्द को स्पर्शवाले पृथिवी आदि चार द्रव्यों में से किसीका गुण नही माना जासक्ता। यह स्पष्ट है वीणा आदि के कारण अवयव शब्द रहित होते हुए वीणा आदि कार्यों के आरम्भक होते है। तब कार्यगुण के कारणगुणपूर्वक होने के नियमानुसार पृथिवी आदि के चार द्रव्यों का लिङ्ग शब्द को नही कहा जासकता।

इसके अतिरिक्त पृथिवी आदि के रूपादि गुण से जब तक कार्यद्रव्य बना रहता है तब तक एक समान उपलब्ध होते है।

जैसे वस्त्र का सफेदरूप जब तक वस्त्र बना रहता है; तब तक एक- सा प्रतीत होते रहता है; उसमें तारतम्य ( विचित्रता ) प्रतीत नही होता। किन्तु वीणा आदि के द्वारा अभिव्यक्त शब्द मन्द, मन्दतर,म मन्दतम तथा तार, तारतर, तारतमरूप में उपलब्ध होता है; यद्यपि वीणागत रूप सदा समान बना रहता है। इससे स्पष्ट होता है, जैसे वीणा आदि का रूप गुण उसका अपना है, ऐसे शब्द गुण उसका अपना नही है।

तब शब्द किसका गुण होसक्ता है, यह अन्वेषण करना चाहिए।


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नमस्ते जीयंहा हम आकाश में निष्क्रमण प्रवेशन लिङ्ग आकाश के समवायिकारण व असमवायिकारण को लेकर आशंका कर...

नमस्ते जी

यंहा हम आकाश में निष्क्रमण प्रवेशन लिङ्ग आकाश के समवायिकारण व असमवायिकारण को लेकर आशंका कर रहे थे; तो यंहा हमने गत सूत्रों के माध्यम से जाना था कि विभु द्रव्यों में क्रिया नही होती और चेतन आत्मा में की भी अपनी स्वयं की क्रिया नही है तो फिर हम उसे द्रव्य कैसे जाने ?

तो क्रियावान में एक तो जिसकी क्रिया हो वह क्रियावान है, और जिसमें क्रिया हो वह भी क्रियावान है इस नियम से आकाश भी क्रियावान है।

जैसे मोटरगाड़ी की अपनी स्वयं की क्रिया नही किन्तु उनमें क्रिया है, परमात्मा में क्रिया नही किन्तु परमात्मा की क्रिया है, अथवा ऐसे जाने परमात्मा क्रिया होना सम्भव नही क्योंकि परमात्मा विभु होने से न तो वह स्वयं क्रिया कर सकता है, और न उसमें क्रिया करवाई जा सकती है, क्योंकि जिस किसी द्रव्य में क्रिया होती तब वह द्रव्य देशान्तर को प्राप्त होता है, अर्थात किसी एक निश्चिन्त स्थान से दूसरे निश्चिन्त स्थान पर गमन होने को क्रिया कहते है, चाहे स्थान की दूरी शर के बाल की नोक के बराबर हो।

किन्तु परमात्मा में वह भी सम्भव नही क्योंकि वह सर्वत्र व्यापक होने से परमात्मा में क्रिया न होकर परमात्मा की प्रेरणा से अन्य द्रव्यों को क्रिया कराने में समर्थ है।

वैसे ही आकाश, काल, और दिशा *में* क्रिया होती है, न कि आकाश, दिक्, काल *की* क्रिया ऐसा जानना चाहिए।

अब जब *में* क्रिया हो तो अन्य द्रव्य *की* क्रिया है, जिसका जितना सामर्थ्य होगा उतने काल तक क्रिया होगी तद्पश्चात; अर्थात जब तक कोई अवरोधक सामने नही आता, वंहा कारणों की अक्षमता क्रिया की समाप्ति का हेतु होता है।

हाथ से या बन्दूक से फेंके जाने की क्षमता सीमित होती है। उसके रहने तक क्रिया होती रहेगी न रहने पर समाप्त हो जाती है।

कार्य के अनेक कारणों में से जिस कारण के भाव का प्रभाव, व संयोग नही रहता अर्थात अक्षम हो जाता है, तो वह कार्य नही रहता।

आकाश या कोई अन्य असमग्र कारण न तो कार्य के आरम्भक है, और न ही उसे सुरक्षित रखने के आश्रय है।

अर्थात आकाश न तो कार्य को उत्पन करता है, और न ही सुरक्षित रख सकता है।

तो यंहा केवल आकाश को लेकर यह आशंका उठाई जाती है, की उसके कारण मानने पर अर्थात आकाश के रहने पर क्रियानिरन्तर बनी रहनी चाहिए; पर जिस द्रव्य में क्रिया समवेत है, उसके बने रहने पर जब तक वह बना रहे; क्रिया निरन्तर क्यों नही होती रहती ?

तो स्पष्ट है, की अन्य किसी कारणों की अक्षमता क्रिया को समाप्त कर देती है।

अतः निष्क्रमणादि क्रियाओं का आकाश निमित्तकारण है, उसी रूप में यह आकाश के लिङ्ग है।


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नमस्ते जीपूर्वपक्ष ने निष्क्रमण और प्रवेशन का आकाश के लिङ्ग में अन्वय और व्यतिरेक व्याप्ति से निषेध...

नमस्ते जी

पूर्वपक्ष ने निष्क्रमण और प्रवेशन का आकाश के लिङ्ग में अन्वय और व्यतिरेक व्याप्ति से निषेध किया उनका सूत्रकार समाधान करते हुए बताते है कि :- *संयोगादभाव: कर्मण:।। २३ ।। ( २ - १ )*

अर्थात संयोग से कर्म का अभाव होता है।

अतः आकाश किसी मूर्त द्रव्य की निष्क्रमणादि क्रिया का निमित्तकारण ही होता है।

अर्थात किसी भी द्रव्य का एक स्थान से वियोग या विभाग होकर अन्य स्थान से संयोग हो जाना ही क्रिया है। और यह संयोग - विभाग आकाश के बिना सम्भव नहीं हो सकते, अर्थात आकाश में ही संयोग या विभाग रूप क्रिया सम्भव है।

अतः मूर्तद्रव्य, क्रिया का समवायिकारण; आघात, संयोगादि असमवायिकारण; शेष सब साधन निमित्तकारण रहते है।

इसप्रकार काल,आकाश, दिशा आदि कार्यमात्र के निमित्तकारण माने जाते है।

तो यहां शंका होती है कि यदि आकाश कार्यो का निमित्तकारण है, तो धनुष से छोड़ा हुआ बाण, बंदूक से छुटी हुई गोली हाथ से फेंका गया पत्थर इत्यादि की क्रिया आकाश के नित्य एवं व्यापक होने से कभी समाप्त नही होनी चाहिए।

तो यंहा जानना चाहिए कि,प्रत्येक कार्य के अनेक कारण होते है; कोई भी आघात व नोदन की अपनी एक सीमा होती है, और प्रतिरोधक द्रव्यों से भी क्रिया समाप्त हो जाती है।

इससे क्रिया के प्रति आकाश की निमित्तकारणता में कोई बाधा नही आती


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*ईश्वर और अल्लाह एक नहीं हैं।* १) ईश्वर सर्वव्यापक (omnipresent) है, जबकि अल्लाह सातवें आसमान पर...

*ईश्वर और अल्लाह एक नहीं हैं।*

१) ईश्वर सर्वव्यापक (omnipresent) है, जबकि अल्लाह सातवें आसमान पर रहता है.

२) ईश्वर सर्वशक्तिमान (omnipotent) है, वह कार्य करने में किसी की सहायता नहीं लेता, जबकि अल्लाह को फरिश्तों और जिन्नों की सहायता लेनी पडती है.

३) ईश्वर न्यायकारी है, वह जीवों के कर्मानुसार नित्य न्याय करता है, जबकि अल्लाह केवल क़यामत के दिन ही न्याय करता है, और वह भी उनका जो की कब्रों में दफनाये गए हैं.

४) ईश्वर क्षमाशील नहीं, वह दुष्टों को दण्ड अवश्य देता है, जबकि अल्लाह दुष्टों, बलात्कारियों के पाप क्षमा कर देता है.

५) ईश्वर कहता है, “मनुष्य बनों” *मनु॑र्भव ज॒नया॒ दैव्यं॒ जन॑म् - ऋग्वेद 10.53.6*,

जबकि अल्लाह कहता है, *मुसलमान बनों.* _सूरा-2, अलबकरा पारा-1, आयत-134,135,136_

६) *ईश्वर सर्वज्ञ है*, जीवों के कर्मों की अपेक्षा से तीनों कालों की बातों को जानता है, जबकि *अल्लाह अल्पज्ञ है*, उसे पता ही नहीं था की शैतान उसकी आज्ञा पालन नहीं करेगा, अन्यथा शैतान को पैदा क्यों करता?

७) ईश्वर निराकार होने से शरीर-रहित है, जबकि अल्लाह शरीर वाला है, एक आँख से देखता है.

_ऐसे तो अनेक प्रमाण हैं, किन्तु इतने से ही बुद्धिमान लोग समझ जायेंगे की ईश्वर और अल्लाह एक नहीं हैं._

प्रेषक-

सुमन कुमार वैदिक, आर्यावर्त केसरी (पाक्षिक)


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