।।ओउम्।।
धर्म/अधर्म-
धर्म की परिभाषा को स्वार्थी,अधर्मी लोगों द्वारा बदल जाता रहा है।ज्ञानवान लोगों की नज़रों में धर्म एक है,एक ही रहेगा।क्योंकि प्रत्येक चीज अपने आप में अद्वितीय होती है।इस प्रकार धर्म भी अद्वितीय है।
धर्म का नाम धर्म ही होता है।उसे विभिन्न प्रकार के विशेषण स्वार्थी,वाममार्गी लोगों ने ही दिए हैं।
सत्य को विज्ञान कहते हैं।सत्य के अनुसार चलने को धर्म कहते हैं।जैसे अग्नि जलाती है।सूर्य हमें रोशनी देता है,पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है,परमात्मा एक है आदि।ये सब सत्य हैं और यही विज्ञान हैं।जो जैसा है उसे ठीक ऐसा ही मानने को धर्म कहते हैं।
सत्य के विरुद्ध चलने को अधर्म कहते हैं।
विज्ञान के अनेक भेद हैं जैसे-भौतिक विज्ञान,रसायन विज्ञान,जीव विज्ञान,वनस्पति विज्ञान,शरीर विज्ञान,सामाजिक विज्ञान,अध्यात्म विज्ञान आदि।
इन सबमें सबसे ऊपर अध्यात्म विज्ञान है।यह शब्द,अनुमान व प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों पर आधारित है।इसके जो विषय दृष्टि में नहीं आते।उन विषयों के बारे में स्वार्थी व दुष्ट लोग बिना प्रमाणों के अपनी अलग-अलग बात बताते हैं।बिना प्रमाणों के अपनी बात कहकर लोगों को अज्ञानता में धकेल रहे हैं और अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।बस यही है सारे मत/मजहब व धर्म की कहानी।सारे लड़ाई-झगड़े,अंधविश्वास,जातिवाद,दहेज़,हत्या,चोरी,अपहरण,दूसरों की बुराई,चापलूसी आदि तमाम तरह की जितनी भी बुराइयां हैं उनकी बुनियाद झूठ है,अधर्म है।जितने भी सत्य हैं,वो सब धर्म के अंतर्गत व जितने भी झूठ हैं,वो सब अधर्म के अंतर्गत आते हैं।
संक्षेप में,
सत्य=विज्ञान,
सत्याचरण=धर्म,
असत्य=अज्ञान,
असत्याचरण=अधर्म।।
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