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महर्षि दयानन्द जी महाराज
के
लोकोपकार —— वेद - प्रचार के उदगार !!!
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🌹🌹 महर्षि दयानन्द के जीवन की एक - एक घटना तथा उनकी सतत साधना उनके अटल और अडिग ईश्वर विश्वास का परिचय देती है । उनके लिए ईश्वर की वाणी वेद का प्रचार तथा लोकोपकार ही उनका सर्वस्व था । वे किसी तात्कालिक लाभ के लिए अपने सिद्धांतों का – मान्यताओं का समझौता करने को तैयार नहीं थे । साधु टी. एल. वासवानी ने लिखा है —- “He cannot barter convenience for conviction.” अर्थात स्वामी दयानन्द तात्कालिक लाभ के लिए सिद्धांतो की अदला - बदली नहीं कर सकते थे । उनके उर में लोकोपकार, सद्ज्ञान वेद के प्रसार और अन्धकार का नाश करने के लिए अदम्य उत्साह था । उनके ह्रदय में अपने इस मिशन के लिए अरमानों का तूफ़ान था । जन कल्याण व मानव निर्माण के लिए उनके मन में सर्वस्व वार देने के लिए अंगार धधक रहे थे । महर्षि स्वामी दयानन्द जी के अपने शब्दों में उनके मनोभाव यहाँ देते है ।
🌹🌹 “मुझको इतना बड़ा परिश्रम निन्दा अपमान उठाकर कौन सा स्वप्रोयाजन सिद्ध करना चाहता हूँ । यदि तुम लोग जैसा की अब उदासीनता की बातें लिखी है लिखोगे वा करोगे तो सब संसार की हानि का अपराध तुम्हारे पर होगा । और मैंने जो उपकार करना निश्चित किया है जहाँ तक बन सकेगा आमरण तक करूँगा ही पुनरजन्मान्तर में भी ।”
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