Saturday, August 20, 2016

🌅 कोई भी वर्तमान कानून सत्य हो अथवा न हो, किन्तु सत्य ही कानून का आधार होना चाहिए। क्या सत्य के...

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कोई भी वर्तमान कानून सत्य हो अथवा न हो, किन्तु सत्य ही कानून का आधार होना चाहिए।

क्या सत्य के बिना कोई कानून हो सकता है..?

किसी भी कानून के निर्माण के लिए एक सुप्रामाणिक विज्ञानपूर्ण दार्शनिक “सत्य” की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
यदि हम सत्य को पूर्ण निष्ठा से अपना सकें और सभी कानून के निर्माता उस शास्वत सत्य पर अमल कर सकें तो कोई कानून अन्यायकारी नहीं सिद्ध हो पायेगा। जैसे सूरज के होते हुए उसके समक्ष कोई भी अँधेरा नहीं टिक पाता।
किसी प्रकाशमान वस्तु में तमस नहीं रहता।

सत्य ही विधेय है।
सत्य के बिना कोई भी कानून न्यायशील नहीं हो सकता।

सत्य एक वैज्ञानिक दर्शन है।
जिसके अनुसार यह सम्पूर्ण संसार एक ही मूल तत्त्व से बना है।
जगत में सब कुछ एक ही ईश्वरीय ऊर्जा का सघन रूप है।

तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए मौलिक समानता का व्यवहार सिद्ध होता है।
यही सत्य का व्यवहार है जो न्याय का मूल है।

इसके साथ ही प्राकृतिक औचित्य का भी समावेश न्याय की परिभाषा में होता है।

सभी मनुष्यों में मौलिक आत्मा के साथ प्राकृतिक गुणों का भी समावेश है।
अतः मानवीय पारस्परिक व्यवहार में आत्मिक समता के साथ प्राकृतिक औचित्यता का भी समावेश होता है।

तदनुसार “समुचित” व्यवहार ही न्याय है। मनुष्यों के बीच परस्पर “समुचित” हिताधिकारिता ही न्याय है।
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-(NDS हरिद्वार)
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