Thursday, June 18, 2015

५ आषाढ़ 19 जून 15 😶 “ हमें अनृण करो ” 🌞 🔥🔥ओ३म् अनृण अस्मित्रनृणा: परस्मिन्...

५ आषाढ़ 19 जून 15
😶 “ हमें अनृण करो ” 🌞

🔥🔥ओ३म् अनृण अस्मित्रनृणा: परस्मिन् तृतीये लोके अनृणा: स्याम ।🔥🔥
🍃🍂 ये देवयाना: पितृयाणाश्च लोका: सवीन् पथो अनृणा आ क्षियेम ।। 🍂🍃
अथर्व० ६ । ११७ ।३
शब्दार्थ :- इस लोक में हम अनृण हों,पहले लोक में अनृण हों और तीसरे लोक में भी अनृण हों ये जो देवयान या पितृयान मार्गों के लोक है उनमें सब मार्ग चलते हुए हम ऋणमुक्त होकर रहे, बसें ।

विनय :- मनुष्य तो जन्म से ही कुछ ऊँचे ऋणों से बंधा हुआ है । मनुष्य उत्पत्र होते ही ऋणी है और उन वास्तविक ऋणों से मुक्त होना ही मनुष्य-जीवन की इतिकर्तव्यता है । मनुष्य ने संसार के तीनों लोकों को भोगने के लिए जो तीन शरीर पायें हैं,उसी से वह तीन प्रकार से ऋणी है ।
हे प्रभो !
हम चाहे पितृयान मार्ग के यात्री हों या देवयान के, हम इन तीन लोकों की अनृणता करते ही रहे । हम अपनी सब शक्ति और यत्र इन ऋणों को उतारने में ही व्यय करते हुए जीवन बिताएं । इस स्थूल भूलोक का ऋण अन्यों को भौतिक सुख देंने से, तथा समाज को कोई अपने से श्रेष्ठतर भौतिक संतान दे जाने से उतरता है । इसी प्रकार मनुष्य को जगत् की प्राक्रतिक अग्रि आदि शक्तियों से तथा साथी मनुष्य को नि:स्वार्थ सेवायों से जो सुख निरन्तर मिल रहा है उसके ऋण को उतारने के लिए,इन यज्ञ-चक्रों को जारी रखने के लिए निरंतर यज्ञ-कर्म करना भी आवश्ग्क है और तीसरे ज्ञान लोक से जो ज्ञान का परम लाभ हो रहा है उसकी सन्तति भी जारी रखने के लिए स्वयं विद्या का स्वाध्याय और प्रवचन करके उससे अनृण होना चाहिए ।
ओह !
मनुष्य तो सर्वदा ऋणों से लदा हुआ है । जो जीव इस त्रिविध शरीर को पाकर भी अपने को ऋणबद्ध अनुभव नहीं करता वह कितना अज्ञानी है । हमें तो,
हे स्वामिन !
ऐसी बुद्धि और शक्ति दो कि हम चाहे देवयानी हो या पितृयानी, हम सब लोकों में रहते हुए, सब मार्गों पर चलते हुए, लगातार अनृण होते जाएँ । अगले लोक में पहुँचने से पहले पूर्वलोक के ऋण हम अवश्य पूरा कर दें । अगले मार्ग पर जाते हुए पिछले मार्ग के ऋण उतार चुकें हों । इस लगातार घोर यत्न करते हुए हम सदा, सब लोकों में अनृण होकर ही रहें ।


🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
ओ३म् का झंडा 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
……………..ऊँचा रहे

🐚🐚🐚 वैदिक विनय से 🐚🐚🐚


from Tumblr http://ift.tt/1TzamCH
via IFTTT

No comments:

Post a Comment