🎯होली ‘होलका’ शब्द से प्रवर्तित हुआ है जिसका मतलब नए पके हुए अन्न(चना, मटर,गेहू…) का छिलका है।
महाभारत काल के 1500वर्ष तक इस दिन सामूहिक वृहद् यज्ञ का विधान था जिसमे नयी फसल के अन्न की कुछ आहुति डाली जाती थी, तत्पश्चात फूलो और पत्तो के सुगन्धित रस को एक दूसरे पर छिड़क कर वातावरण को सुगन्धित और पवित्रमय बनाया जाता था।
जिस प्रकार हम होलक को आग में भून के छिलके को अलग कर पके अन्न को खाते है उसी प्रकार आग की लपटो में होलिका को जला प्रह्लाद को पाते है।
ये वैदिक विधान मुग़ल काल से भी पहले प्रक्षिप्त हुआ था जिसका परिवर्तित रूप आज हमें होलिका और प्रह्लाद की पौराणिक मनघडंत कहानी के रूप में मिलता है। प्राकृतिक सुगन्धित और हानिरहित द्रव्यों की जगह आज हानिकारक और विषैले रंगो ने ले ली। जितना पक्का रंग होगा होली उतनी ही अच्छी मनेगी की मान्यता हो गया है। पर स्त्री को कोई दूसरा पुरुष और कोई स्त्री किसी पर पुरुष को रंग लगा संस्कार की भी इति श्री कर रहे है।
कृपया होली(वास्तविक-यज्ञ कर्म) और रंग से रंगने(वास्तविक-सुगन्धित और पवित्र करने की प्रथा) की वर्तमान मूर्खतापूर्ण क्रियाकलापो को वैदिक(यज्ञ और पवित्रता) रूप में मना आर्य जन और श्रेष्ठ बनेे।
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