💥💥* परवरिश*💥💥
मणि ने कमरे में झांक कर देखा उसका बेटा संजय ऑफिस से आ चुका था।आज जल्दी आ गया, चाय दूं क्या? नहीं माँ, थक गया हूँ थोड़ी देर आराम कर लेता हूँ।
माँ के जाने के बाद आँख बंद कर पलंग पर लेट गया।ऑफिस का द्रश्य उसकी आँखों के आगे तैर गया।सब रजिस्ट्रार के पद पर काम करते हुए उसे एक ही महीना हुआ था।शाम को जब वो घर लौटने लगा तो ’ बाबू’ ने एक लिफाफा लाकर दिया।क्या है ये? सर कुछ नहीं सभी का हिस्सा है आपका भी—- ।आप नहीं लेंगे तो वापस न जायेगा।कोई और रख लेगा।अनमने मन से वो लिफाफा जेब में रख कर घर वापस आ गया।और अब घबराहट और बेचैनी में था।ऐसे उसके संस्कार न थे।
अचानक उसे अपने माथे पर किसी के हाथों का स्पर्श महसूस हुआ।माँ थी।बच्चों की तरह वो माँ की गोद में सर रख कर सुबक उठा।माँ को पूरा किस्सा बताया।और माँ की दी हुई सलाह से हल्का महसूस करते हुए वह अगले दिन वो लिफाफा वापस कर रहा था। अपनी आत्मा पर ये बोझ उसे गवारा न था।
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