Monday, December 21, 2015

💥अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधामम् ।। - ऋ.1/1/1 ...

💥अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ।
होतारं रत्नधामम् ।।
- ऋ.1/1/1

जिससे ज्ञानसृष्टि और परमाणु सृष्टि उत्पन्न होती है, जो आकाश के समान व्यापक, वायु के समान अतिबलवान, सूर्य के समान प्रकाशमान तथा चंद्र के समान आह्लादक है । वह परम चेतन तत्व समस्तब्रह्मांड को आच्छादित करके प्राणि अप्राणिरूप जगत के आत्मा में सूक्ष्मरूप से नित्य वर्तमान है । वही उपासना करनेयोग्य है ।

🌿 वह वरणीय प्रभु का कोई आकार, प्रकार, भार, छाया आदि नहीं है । सभी में निवास करता हुआ भी पंचभूत तथा जीवात्माओ से वह अछूता-पृथक है । वह न दीर्घ है, न ह्रस्व है, न प्लुट । न उसकी कोई परिधि है, न कोई केन्द्रबिन्दु । कोई परिमाण से उसे नापा नहीं जाता । वह सर्वत्र परिपूर्ण है । हमारी सोच से बहुत ही दूर है । वह ब्रह्म निराकार, सर्वव्यापक, निर्वचनीय, अद्भुत तथा अद्वितिय है । किसी भी अवस्था या काल में उसको कोई पूर्णतः देख-सुन नहीं सकता, जान नहीं सकता, पा नहीं सकता । सभी पर उसका पूर्णतः एकचक्री शासन है ।

🍇अग्निम्= सभी का अग्रणीय नेता, ज्ञानस्वरूप, सर्वव्यापक और अपने दिव्य गुणों से विशेषरूप से विद्वानों के बीच में वह पूजनीय बना हुआ है ।

💧ईडे= उस परमात्मा की मैं स्तुति- उपासना - भक्ति करता हूँ ।

🎉पुरोहितम्= सबके सामने पूर्व से वह विद्यमान है । चराचर जगत कितनी भी दौड़ लगा दे, वह पहले से उपस्थित मिलता है । उत्पति से पूर्व परमाणु तथा ज्ञान जगत आदि को धारण करनेवाला वह है ।

🌷यज्ञस्य देवम्= हिंसारहित यज्ञादि उत्तम कर्मो का प्रकाशक तथा उपदेशक है ।

🍀ऋत्विजम्= वसन्त आदि सब ऋतुओं का उत्पादक तथा सब ऋतुओ में वह पूजनीय है ।

🎄होतारम्=भौतिक- आध्यात्मिक- मोक्षादि सुखो का दाता और प्रलयकाल में अत्ता बनकर सब पदार्थो का ग्रहण करनेवाला है ।

🌺रत्नधातमम्= हर मूल्यवान वस्तु को रत्न कहा जाता है । सूर्य, चन्द्रमा आदि रमणीय पदार्थो का वह कर्ता, धर्ता और हर्ता है । सूंदर मोती, हीरा, सुवर्ण-रजत आदि पदार्थो को अपने उपासको को देनेवाला है ।

एसे महत् परमीय देवाधिदेव की ही योगानुष्ठानपूर्वक उपासना मनुष्य को करनी चाहिये, अन्य तथाकथित देवो की कभी नहि ।


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