Monday, December 21, 2015

🌷निर्भय वक्ता आर्य पथिक 🌷 :::– 19 मार्च 1896 को दिल्ली में ‘वैदिक धर्म की...

🌷निर्भय वक्ता आर्य पथिक 🌷
:::–
19 मार्च 1896 को दिल्ली में ‘वैदिक धर्म की श्रेष्ठता’
पर व्याख्यान देकर पण्डित लेखराम
वहाँ से सीधे अजमेर के वार्षिकोत्सव
में सम्मिलित हुए।।
वहां नगर कीर्तन में एक ऐसी घटना हुई जिसे आर्य समाज अजमेर के वृद्ध
सभासद् अभी तक नही भूले हैं ।

आर्यपथिक भजन मण्डली के साथ झूमते हुए जा रहे थे, और बीच में कहीं कहीं पर व्याख्यान भी देते हुए जा रहे थे ।
मार्ग में कुछ मुसलमान भाइयों से बातचीत होने लगी।
पण्डित लेखराम के उत्तर सुनकर कुछ मुसलमान भड़क उठे।

ख्वाजा चिश्ती की दरगाह पास थी ,
इसलिए तथाकथित आर्य समाजी डर कर भाग गए ।

अकेला लेखराम न यार , न मददगार।
परन्तु क्या लेखराम ने अपना धर्म प्रचार बन्द कर दिया ??

नही।

कहीं सुना था कि विधर्मी के धर्म मन्दिर से 30 कदम की दुरी पर प्रत्येक
धर्म प्रचारक को अपने मत को समर्थन करने का अधिकार है।

आर्यपथिक दरगाह के द्वार पर पहुंचे।
मुसलमान आश्चर्य से इनकी क्रिया को देख रहे थे ।

लेखराम ने दरगाह के द्वार से उच्च स्वर में कदम गिनने आरम्भ कर दिए
और तीसवें कदम पर पहुंच कर,
एक छोटे से पुल पर आकर खड़े हो गए ।

और धर्म प्रचार शुरू कर दिया

“ कबरपरस्ती” और “मर्दुमपरस्ती”

का जबरदस्त खण्डन होने लगा ।
मुल्लों ने बहुत भड़काया
परन्तु मुसलमान सर्व साधारण जनता ने
जो कि एक हजार से भी अधिक हो गयी थी ।
वह दानियत ( एक ब्राह्वाद ) की एक एक चोट पर वक्ता के साथ सहानुभूति प्रकट की ।

“ उस समय तक आर्य समाजियो को भी होश आ चूका था ”
चुपके से देखने गए कि लेखराम पर कैसी बीती , क्या मारा गया वा कहीं भाग कर बच गया ??

किंतु आश्चर्य की सीमा नही रही जब उन्होंने प्रचारक के व्याख्यान का प्रभाव अपनी आँखों से देखा
और मुसलमान जनता को वक्ता के वशीभूत पाया ।

ऐसी निर्भयता एक सच्चे आर्य में ही हो सकती है।।

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