🌻🌷ओ३म्🌷🌻
भूपेश आर्य
🌻ईश्वर जगत कर्ता है🌻
आस्तिक नास्तिक संवाद:-
प्रश्न:-जब बिना बनाने वाले के कोई चीज नहीं बनती तो जगत् के कर्ता ईश्वर को किसने बनाया?
उत्तर:-आप यह प्रश्न अपने मत के आधार पर कर रहे हैं या वैदिक सिद्धान्त के आधार पर !यदि अपने मत के आधार पर कर रहे हैं तो आप तो ईश्वर को मानते ही नहीं,अतः यह प्रश्न कि ईश्वर को किसने बनाया,ऐसा ही होगा,जैसा कि"मनुष्य के सींग किसने बनाये" यह प्रश्न है,और यदि हमारे माने हुए ईश्वर को लक्ष्य करके आपका यह प्रश्न है,तो हम तो हम तो ईश्वर को बना नहीं मानते ,नित्य मानते हैं और नित्य को बनाने वाले की आवश्यकता नहीं।
नियम यह नहीं है कि “कोई चीज बिना बनाये नहीं बनती” प्रत्युत यह नियम है कि “कोई भी बनी हुई चीज बिना बनाये नहीं बनती” और ईश्वर बना हुआ है नहीं,अतः उस पर यह नियम लागू नहीं होता।
प्रश्न:-जगत् को कब बनाया?
उत्तर:-एक अरब, छियानवें करोड़, आठ लाख,तरेपन हजार,एक सौ पन्द्रह वर्ष(1,96,08,53,115)बीत गये।
प्रश्न:-किससे बनाया ?
उत्तर:-यहां साधनों की आवश्यकता नहीं है।परमात्मा सम्पूर्ण प्रकृति के अन्दर व्यापक है।अतः अपनी प्रयत्न शक्ति से वह प्रत्येक अणु के अन्दर गति और परिवर्तन पैदा कर सकता है।साधनों की आवश्यकता वहां हुआ करती है जहां दूरी हो।जैसे कि हाथ से दूर पड़े अंगार को उठाने के लिए चिमटे की आवश्यकता है।और आत्मा से दूर के,चिमटे को उठाने के लिए हाथ चाहिये।परन्तु आत्मा के समीप होने वाले हाथ को उठाने के लिए किसी साधन की आवश्यकता नहीं होती।इसी प्रकार परमात्मा भी प्रकृति के अत्यन्त समीप है,अतः उसमें गति देने के लिए परमात्मा को साधन की आवश्यकता नहीं।
प्रश्न:-किस चीज से बनाया?
उत्तर:-प्रकृति से ।
प्रश्न:-निराकार से साकार जगत कैसे बन गया ?
उत्तर:- ईश्वर जगत् का उपादान कारण नहीं,निमित्त कारण है।जगत् का उपादान कारण प्रकृति है।और प्रकृति साकार है,निराकार नहीं।अतः साकार से ही साकार बना है निराकार नहीं।बनने वाली चीज निमित्त कारण के आकार को ग्रहण नहीं किया करती प्रत्युत उसमें उपादान कारण का स्वरुप आया करता है।
जैसे कि बने हुए मकान में राज का रंग रुप नहीं आता क्योंकि वह उसका निमित्त कारण है,उपादान होने से ईटें और चूने का ही रंग रुप उसमें आता है।
प्रश्न:-परमाणु किस अवस्था में थे और कहां थे ?
उत्तर:- प्रकृति के रुप में थे और प्रकृति सूक्ष्म रुप में सर्वत्र फैली हुई थी।
प्रश्न:-परमाणु जड़ थे या चैतन्य! एक जैसे रुप वाले थे या पृथक् पृथक् ।
उत्तर:-प्रकृति का ही नाम परम सूक्ष्म होने से परमाणु है और प्रकृति सत्व,रज और तम इन तीनों गुणों की सम अवस्था का नाम है।अनेक गुण सूक्ष्म रुप से इन तीनों के अन्दर ही समाये हुए हैं।प्रकृति के अन्दर चैतन्य गुण नहीं है।
प्रश्न:-चैतन्य सुख की अवस्था में था या दुःख की ?
उत्तर:-चैतन्य दो प्रकार के हैं।एक जीव और दूसरा ईश्वर ।इनमें से ईश्वर तो सदा एकरस है। और जीव प्रलय के समय सुषुप्ति जैसी अवस्था में थे।
प्रश्न:/सब जीवों की दशा एक सी थी या पृथक्-२। उनमें और मुक्त जीवों में क्या भेद था ?
उत्तर:-बद्ध जीवों की सबकी दशा एक सी थी।मुक्त जीव आनन्द का उपभोग करते थे और बद्ध जीव सुषुप्ति जैसी अवस्था में,इसलिये भोग के संबंध में सब बद्ध जीव एक जैसे थे।परन्तु संस्कार भेद से उनका भेद उस समय भी ऐसा था जैसा कि अब है परन्तु सुषुप्ति के कारण वह प्रकट न था।जैसे इस समय की सुषुप्ति में।
प्रश्न:-प्रलय के बाद ईश्वर ने जीवों को कैसी शक्ल दी और किस तरह दी। हाथ पैर आदि इन्द्रियों से बढ़ई की तरह बनाया,या जिह्वा से “बन जाओ” बगैरह शब्द कह दिया और सब चीजें बन गयी ?
उत्तर:- पृथ्वी आदि ,भूत बन जाने के बाद परमात्मा ने वृक्षों और वनस्पतियों के बीज रुप में परिवर्तन होने वाले परमाणुओं को अपनी शक्ति से जोड़ दिया और उनसे वृक्ष वनस्पति पैदा हो गये।इसके बाद मनुष्य,पशु,पक्षी आदि उपादान कारण अर्थात बीज की शक्ति रखने वाले अणुओं को जोड़ दिया।और उन बीजों में से मनुष्य,पशु,पक्षी आदि की युवा अवस्था में उत्पत्ति हुई।भेद इतना ही है कि अब वही बीज माता और पिता के शरीर में पैदा होता है और फिर इकट्ठा होकर माता के गर्भाशय में पलता है और आरम्भ काल में वही शक्ति किसी और प्रकार से पृथ्वी माता के उदर में पलकर मनुष्य,पशु,पक्षी रुप बनी।इसलिये प्रलय के बाद ईश्वर ने जीवों को ऐसी ही शक्ल दी जैसी कि अब है।उसी तरह दी,जैसा ऊपर लिखा है।हाथ-पैर आदि इन्द्रियों से घड़कर बढ़ई की तरह नहीं बनाये।और न ही अपनी वाणी से बन जाओ मात्र कहा(क्योंकि ईश्वर निराकार है)।
प्रश्न:-इतनी बड़ी विशाल सृष्टि का सूक्ष्म परमाणु के रुप में चला जाना और उसका फिर बिना सहस्त्रों इंजीनियरों और मजदूरों के,बन कर तैयार हो जाना नितांत असंभव प्रमाण बाधित और साइन्स के विरुद्ध है।
उत्तर:-इस विशाल सृष्टि की रचना और इसका संहार आपको असम्भव और निष्प्रमाण जैसे प्रतीत हो यह स्वाभाविक ही बात है।कारण यह कि मनुष्य की बहुत थोड़ी शक्ति है और उसका बहुत थोड़ा ज्ञान है।एक चींटी कब स्वीकार करेगी कि १० मन भार के गठ्ठे को कोई उठाकर भी ले जा सकता है।हेतु इसका भी यही होगा कि हम सहस्रों भी इसे उठाकर नहीं ले जा सकती तो अकेला इसे कोन उठा सकेगा।परन्तु हाथी के लिए ये बाय हाथ का खेल है।आपको और भी अधिक आश्चर्य होगा जब आप इस रचित संसार की नियम श्रृंखला पर ध्यान देंगे।
देखिये इतनी बड़ी हमारी पृथ्वी और उससे भी सैंकड़ों गुणा बड़ा सूर्य आकाश में कैसे लटक रहा है।लाखों क्रेनें भी लगें तब भी इन्हें ठहरा नहीं सकती।पृथ्वी कितने ही ग्रहों के साथ इसके चारों और कैसी तीव्र गति से चक्कर काट रही है।लाखों इंजन भी इनको चलाने में समर्थ न होंगे।ध्रुव के चारों और तीव्र गति से घूमते हुए सप्त ऋषियों को देखकर और ध्रुव को उसी स्थान पर खड़ा देखकर आपका आश्चर्य सीमा से बाहर हो जायेगा।यदि आपके पास आंखें और ज्योतिष शास्त्र न होते तो आप इन सब यथार्थ बातों को असम्भव,प्रमाण बाधित कहने में कुछ भी देर न लगाते।हां तो इस ग्रह चक्र की नियम श्रृंखला का संयोजक कौन है?
क्या स्वभाव से ही!
बलिहारी आपके इस स्वभाववाद पर।तब तो आप भूमि के पेट में पले हुए लोहे को तो स्वभाव कहते ही हैं,उसे नियमित रुप देकर संचालित घड़ी को भी स्वभाव की महिमा कहा करें।भूमि से निकले हुए पत्थरों को ही उन्हें तोड़ और घड़ कर एक विषेश रुप में स्थापित मकान को भी स्वभाव की लीलि कहा करें।
आप यदि ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि संसार में जितनी मनुष्य की बनाई हुई वस्तुएं हैं वे सब क्षीणता की और जा रही हैं और यह उनका क्रम से होने वाला क्षय ही एक दिन उनके सर्वनाश में कारण बनता है।परन्तु जिस दिन ये वस्तुएं बिगड़ चुकती हैं,उसके बाद बनने की और अग्रसर होती हुई नहीं देखी जाती।चाहे एक इंजन सहस्रों वर्ष बिगड़ा पड़ा रहे परन्तु फिर भी हर समय होने वाला प्राकृतिक परिवर्तन उसे इंजन का रुप नहीं दे सकता।हां इंजन के आभ्यान्तर अणुओं के परिणाम से वह एक दिन सर्वनाश होकर मिट्टी में मिल जायेगा।और फिर कभी न पैदा होगा।
इसी प्रकार पृथ्वी के आभ्यान्तर(अंदर के) परिवर्तन से कदाचित लोहे आदि के निर्माण और क्षय को स्वभाव कहा जा सके,परन्तु क्षीण होते होते पृथ्वी सूर्य आदि गोलों का निर्माण स्वभाव से कदापि नहीं हो सकता।यह ग्रहों का निर्माण,आकर्षण में नियमपूर्वक स्थापन की व्यवस्था किसी बुद्धिमान का ही काम है।आज तक कोई नया ग्रह आकाश में घूमते हुए अणुओं से बनकर आकाश में आता हुआ नहीं देखा गया।
ग्रहों की शक्ति क्षीण हो रही है इस सिद्धांत को वैज्ञानिक संसार भी मानता है।भूमि और सूर्य की वह ऊष्मा जो इनके आरम्भ काल में थी अब नहीं है।यह क्षय का सिलसिला बन्द नहीं हो सकता।और बिगड़ते-२ जब सब भूमिएं,वृक्ष और वनस्पतियों को पैदा करने में असमर्थ हो जावेंगी,जो कि प्राणियों के उपभोग के पदार्थ हैं,सब निष्फल हो जाने के कारण परमात्मा इनका सर्वनाश कर देंगे।औय कुछ काल तक इनको उसी सूक्ष्म अवस्था में पड़े रहने देंगे कि इनमें फिर जनन शक्ति का प्रादुर्भाव हो जाये।जैसा कि किसान अपनी भूमि को एक वर्ष तक जोतता और एक वर्ष पड़ी रहने देता है।इसके अनन्तर जब वे अणु समर्थ और शक्तिशाली हो जावेंगे,परमात्मा फिर इसी रुप में इस सारे ग्रह और नक्षत्र मण्ड़ल का निर्माण कर इसे इसी प्रकार नियम में व्यवस्थित् कर देंगे।यहां इंजनों और इंजीनियरों या किसी भी प्रकार की मशीनरी की आवश्यकता नहीं।
अणु-२ के अंदर विराजमान परमात्मा ही प्रकृति के नियमित परिवर्तन के लिए पर्याप्त है।
प्रश्न:-ईश्वर ने जगत को क्यों बनाया?
उत्तर:-प्राणियों के कर्मों का न्यायानुसार फल देने के लिए।
प्रश्न:-यदि ईश्वर में इच्छा थी तो वह रागी बन गया ?
उत्तर:- ईश्वर की यह इच्छा थी कि प्राणियों का उद्धार हो ,उन्हें आनन्द की प्राप्ति हो और उनके कर्मानुसार फल मिले यह इच्छा उसमें सदा रहती है।राग का कारण स्वार्थ होता है,निष्काम परोपकार का भाव राग को पैदा नहीं कर सकता।
प्रश्न:-क्या ईश्वर नहीं जानता था कि लोग पैदा होकर बुरे कर्म करेंगे।यदि जानता था ,तो उन्हें स्वतन्त्र क्यों बनाया ?
उत्तर:-यदि आप वैदिक सिद्धान्तों का भली भांति स्वाध्याय कर लेते तो आपको ऐसे ऐसे प्रश्न करने की आवश्यकता ही न पड़ती।अस्तु ! ईश्वर ने जीवों को बनाया नहीं और न स्वयं उन्हें स्वतन्त्रता दी।जीव अनादि है और अनादि काल से कर्म करने में स्वतन्त्र है।परन्तु कर्मों का फल भोगने के लिए उन्हें न्याय के शिकंजे में जाना पड़ता है।इसी भाव से कि वे शुभ कर्म कर जन्म मरण के बन्धन से छूटें।परमात्मा उन्हें ज्ञान का उपदेश भी देते हैं और सृष्टि का निर्माण भी करते हैं।
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