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भूपेश आर्य~8954572491
कर्मफल के विषय में मनु महाराज कहते हैं-
जो मनुष्य शरीर से चोरी,परस्त्रीगमन,श्रेष्ठों को मारना आदि दुष्कर्म करता है,उसको व्रक्ष आदि स्थावर का जन्म,वाणी से किये गये पाप कर्मों से पक्षी और मृगादि,तथा मन से किये गये दुष्ट कर्मों से चाण्डालादि का शरीर मिलता है।
शुभकर्मों से देवभाव,शुभाशुभ मिश्रितों से मनुष्य भाव की प्राप्ति,और केवल अशुभ कर्मों से नीच योनियों में जन्म पाता है।
दुष्ट कर्म करने वाले मनुष्य का मरकर पंचतन्मात्रा से दु:ख सहन करने के लिए दूसरा शरीर अवश्य उत्पन्न होता है।
वह जीव यदि धर्म-कर्म अधिक करता है और अधर्म न्यून,तो उन्हीं उत्तम पंचभूतों से युक्त स्वर्ग में सुख भोगता है।
और यदि वह जीव पाप अधिक और पुण्य थोडा करे तो उन उत्तम भूतों से व्यक्त हुआ यम(न्यायकारी ईश्वर) द्वारा निर्दिष्ट यातनाओं को प्राप्त होता है।
उन यम की यातनाओं को प्राप्त को प्राप्त होकर वह जीव (भोग से) पाप रहित होने पर उन्हीं उत्तम पंचभूतों को क्रम से प्राप्त हो जाता है।
अत: इस जीव की धर्म और अधर्म से इन गतियों को अपने मन से ही देखकर सर्वथा मन को धर्म में लगावें।
कठोर स्वभाव वाले,चुगलखोर,अभिमानी,झूठ बोलने वाले,बिना सिर पैर की बातें करने वाले मनुष्य नरक(दु:ख विषेश) में जाते हैं।
कूप,तालाब,बावलियों और गलियों को तोडने वाले मनुष्य नरक में जाते हैं।
यतियों को दोष लगाने वाले,सती स्त्रियों पर कलंक लगाने वाले और वेदों के निन्दक पुरुष अवश्य ही नरक को जाते हैं।
परमात्मा का जो चिंतन नहीं करते,वे लोग नरक में जाते हैं।
लकडियों,तारों,काँटों अथवा ईंटों से जो लोग मार्ग बन्द कर देते हैं,वे नरक में जाते हैं।
भूख,प्यास,थकावट से दु:खी जो पवित्रात्मा अतिथि घर के द्वार पर किसी आशा से युक्त होकर आते हैं और जो गृहस्थ उनका अपमान करते हैं,वे नरक में जाते हैं।
जो मनुष्य सदा अशुभ कर्मों में लगे रहते हैं तथा शुभ कर्मों से दूर रहते हैं,वे एक दु:ख से दूसरे दु:ख को और एक भय से दूसरे भय को प्राप्त होते हैं।
अथर्ववेद में कहा है-
न किल्विषमत्र नाधारो अस्ति न यन्भित्रै समममान एति।
अनूनं पात्रं निहितं न एतत् पक्तारं पक्वं पुनराविशति।।-अथर्व० १२/३/४८
अर्थात्-परमेश्वर के राज्य में कोई अन्याय नहीं है।
न देर है,न अन्धेर है।कोई अकारण पीडित भी नहीं ।
वहाँ न किसी की सिफारिश चलती है और न किसी से रियायत ही होती है;न कोई मित्र सहायक हो सकता है।
वहाँ तो पूरा-पूरा न्याय होता है।
जो जैसा कर्म करेगा,उसको वैसा ही फल मिलेगा।
यस्तिष्ठति चरति यश्च वञ्चति यो निलायं चरति य: प्रतक्ङम्।
द्वौ सन्निषद्य यन्मन्येते राजा तद्वेद वरुणस्तृतीय:।।
-अथर्व० ४/१६/२।
अर्थात्- पापवासना से प्रेरित होकर मनुष्य नानाविध पाप करता है।कोई कहीं जाकर और कोई कहीं जाकर पाप करता है।कोई ठगी करता है,कोई लोगों में भय आतंक का संचार करता है।
कहीं दो जने गुप्त स्थान में बैठकर गुप्त मन्त्रणा कर रहे होते हैं और समझते हैं कि हमें कोई नहीं देख रहा है परन्तु तथ्य यह है कि भगवान् उनके बीच तीसरा होकर उन्हें जान रहा होता है।
जीव जगत में जन्म लेकर अपने ही पूर्वकृत कर्मों का फल भोगता है।पूर्वजन्म में किये बिना यहाँ कोई भी किसी इष्ट या अनिष्ट फल को नहीं पाता है।
मनु जी ने कहा है-
नाधर्मश्चरितो लोके सद्य: फलति गौरि व।
शनैरार्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ।। (अ० ४/७२)
अर्थात्-किया हुआ पाप पृथ्वी में बोए हुए बीज के समान तत्काल ही फल नहीं देता,किन्तु उसके फलीभूत होने का समय धीरे धीरे ही आता है। तब वह पाप-कर्ता का जड मूल से नाश कर देता है।
जो रोग इस शरीर में मनुष्य जान-बूझकर अपनी दुर्बुद्धि और अज्ञान से,अभोज्य पदार्थ आदि के द्वारा उत्पन्न कर लेता है,उसके आधुनिक तथा नवीन होने के कारण उसका अन्त भी साधारण व्यय या प्रायश्चित्त से है जाता है।
परन्तु जो रोग वा दोष मनुष्य के बिना जाने बुझे और बिना किसी विचार वा अभिलाषा के स्वयमेव ही इस शरीर में उत्पन्न हो जाते हैं ,वे अवश्य किसी पिछले जन्म से सम्बन्ध रखते हैं और ऐसे हैं जिनका प्रायश्चित भगवान् की और से बार बार चेतावनियाँ होने पर भी उसने नहीं किया,वरन उनकी और से सदैव ही उपराम रहा।
अब वही दुष्कर्म एक बडे वृक्ष के समान बनकर फल ले आये और उनका इस प्रकार फलीभूत होना तभी बन्द है सकता हैजब उनका नियत ऋतु समाप्त हो जाये।
जैसे आम के वृक्ष पर इतने असंख्य फल लगते हैं कि उनके बराबर उतारने पर भी भाद्रपद या असोज तक यदि तुम उस वृक्ष के फल न भी उतारो तो वह स्वयं पककर झडते और नष्ट होते जायेंगे और फल ऋतु के अन्त तक कोई एक फल भी उसमें दिखायी नहीं देगा।
या इनके फल नष्ट करने की दूसरी सूरत यह हो सकती है कि वृक्ष को ही काट दिया जाये।
परन्तु यदि वृक्ष काट डालने पर भी उसकी जड शेष यह गयी,तो एक न एक दिन वह फिर वृक्ष का रूप धारण करके फल ले आयेगी,किन्तु यदि उसे समूल ही नष्ट कर दिया जाये तभी उसमें फल लगना असम्भव हो जायेगा।
रोग भी वृक्ष रुप धारण किये हुए हैं।
यदि एकदम ही उसके सब फल उतार लिये जायें अर्थात् शुभ कर्म व गायत्री मन्त्र द्वारा उसका प्रायश्चित कर दिया जाये और उस साधना द्वारा शरीर में उचित शक्ति पैदा कर दी जाये तो यह भी सम्भव है कि उस समय तुम्हारा रोग दूर हो जाये,परन्तु सर्वथा मूल सहित न जाये।
कारण? पूर्वले जन्म का बीज अब भी विद्यमान है,जो फिर उग कर कभी तुम्हें रोग शय्या पर गिरा दे।
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