🌻🍀ओ३म्🌻🍀
भूपेश आर्य
🌻मांसाहार:-
महर्षि दयानन्द कहते हैं कि-वृक्षों के अत्यन्त अन्धकार(तमोगुणी) महा सुषुप्ति,महान नशे में होने से भक्ष्या-भक्ष्य,पाप-पुण्य,हिंसा-अहिंसा से होने वाली पीड़ा उन्हें नहीं होती इसलिए उन्हें काटने से हिंसा नहीं होती,वेद ने वृक्षों के फलों को तथा साग-भाजी,कन्द-मूल आदि को भक्ष्य बताया है अतः उनके खाने में कोई पाप नहीं।
क्या वृक्ष वनस्पतियों में जीव है?परमात्मा की निर्माण की हुई वनस्पतियों में जीव तो है परन्तु वह सुषुप्ति अवस्था में है।कहा भी जाता है कि घोर अत्याचारी,दुराचारी,व्यभिचारियों को परमात्मा जो उनके कर्मों का फल देता है,वह फल उन्हें सुषुप्ति अवस्था में भोगनि पड़ता है।यह योनिया़ अन्धकारमय हैं।
जीव सृष्टि के देखने से पता चलता है कि जीव अपने शरीर को भीतर से बढ़ाता है और मनुष्य की कृतियां बाहर से बढ़ती हैं।अतः वृक्ष-वनस्पतियां जो भीतर से बढ़ती हैं,वे जीव तो धारण करती हैं किन्तु इन योनियों के जीवों को सुख-दुःख की अनुभूति नहीं होती।वनस्पति को शरीर नहीं होता।
शरीर उसे कहते हैं जिससू जीव इन्द्रियों की चेष्टा करता है जैसा कि गौतम ऋषि के न्यायदर्शन १/१/११ में लिखा है।
जीव के लक्षण इस प्रकार हैं-इच्छा,द्वेष,सुख-दुःख,ज्ञान व परिवर्तन।शरीर में बधिरता करने से शस्त्रक्रिया(आपरेशन) का कष्ट मालूम नहीं होता,इसी प्रकार वृक्ष-वनस्पति को पीड़ा नहीं होती।
जैसे -घर को आग लगी तो दरवाजे,खिड़कियों को पीड़ा नहीं होती।
ध्यान रहे अपने शरीर में बाह्यवाहक (Efferent nerves) स्नायु भीतर से बाहर वृत्ति वाले होते हैं और ज्ञानवाहक स्नायु Sensory nerves हैं।यह दोनों वृक्षों में नहीं होते।
इसी प्रकार गेहूं,सब्जियां,घास-पात को लेंवे।इनके सेवन से कोई पाप नहीं लगता।
प्राणियों को काटे बिना मांस मिलता नहीं।पशु-पक्षियों को काटते समय वह छटपटाता है,आर्त (करुणात्मक)आवाज करता है,उसका रक्त विषाक्त हो जाता है।मांस में एसिड और तेजाब अधिक है,जै उत्तेजना देता है,शक्ति,ताकत नहीं।
उत्तेजना से स्नायु कमजोर अर्थात् दुर्बल होते हैं।
डॉ० हेम,लंदन कहते हैं कि मांस में यूरिक एसिड है।मांस अधिक तेजाब और विष उत्पन्न कर देता है।मांस खाना आदत है,फैशन है,बहुत से शासनकर्त्ताओं का एक प्रकार से अन्धानुकरण है,केवल जुबां अर्थात् जिव्हा का चस्का है,आत्मबल न होने से वह छूटता नहीं।
मांस से 8 गुना शक्ति उड़द में है,32 गुना शक्ति बादाम में है।
इस सृष्टि में परमात्मा के तीन सफाई कामगार हैं,-वराह,मीन व मुर्गी।इन्हें इनका कार्य नहीं करने देने से या उन्हें काटकर खाने से रोगोत्पत्ति होना स्वाभाविक ही है,इसलिए कवि कहता है–
दुर्बल को न सताइये,जाकी मोटी हाय ।
बिना सांस की धोकनी,,शलोह भस्म हो जाय।।
मनुष्यों की श्रेष्ठता इसमें नहीं कि वह पशुओं को मारकर खा जावे अपितु मनुष्य की श्रेष्ठता तो मानवीय गुणों को धारण करने में है।
🌻शाकाहारी अधिक आयु वाला व बलशाली होता है:-
एक बार ६० मील चलने की प्रतियोगिता हुई थी जिसमें १४ मांसाहारी और ८ शाकाहारी सम्मिलित हुवे थे।वे आठों शाकाहारी प्रतियोगिता जीत गये और मांसाहारी चलने में पिछड़ गये,हांपते रहे।
प्रो० राममूर्ति जो शुद्ध शाकाहारी थे,मोटर वाहनादि अपने प्राणायाम के बल से रोकते थे।वीर हनुमान जी जो शुद्ध शाकाहारी थे,उनमें कितना बल और शक्ति थी जिसकी कोई मिसाल नहीं।
पहलवान भारत केसरी मास्टर चंदगीराम शाकाहारी थे ,पांच किलो बादाम का नाश्ता करते थे,उन्होंने पहलवान मेहरूद्दीन जो मांसाहारी था,उसे कुश्ती में पछाड़ दिया था।
बुद्धि की तीव्रता,तीक्ष्णता केवल शाकाहार से उपजती है मांसाहार से नहीं।
शाक बोने में आनन्द है,शाक उगाने में आनन्द है,शाक सब्जिया़ देखने में आनन्द है,उनके सूंघने व खाने में आनन्द है।शाकाहार में रोग का खतरा नहीं।शाकाहार स्वस्थ भी है,उसमें ताजगी व सभी विटामिन होते हैं।
शाकाहारी की आयु मांसाहारी से लम्बी होती है।
शाकाहारी के मन में कोमलता,मृदुता,शांति,जीव दया और प्रेम रहता है तथा वे शुद्ध रक्त वाले होते हैं।
अब विचार करिये जो पशु-पक्षियों को मारते हैं,कया बिना अपराध दण्ड़ देना धर्म है?न्यायाधीश भी बिना अपराध दण्ड़ नहीं दे सकता,तब वह परमात्मा जो दयालु और न्यायकारी है,सर्व प्राणी मात्र का सृष्टा है,मान्य है पिता है वह किस प्रकार ऐसे घृणित अमानवीय कार्यों पर दण्ड़ नहीं देगा?सभी प्राणी ईश्वर के पुत्रवत हैं।
🌻अब थोडा विचार अण्ड़े के संबंध में:-
समाज में कुछ भ्रान्तियां चल रही हैं कि अण्ड़ा शाकाहारी होता है।कारण बताया जाता है कि वह मुर्गी के संयोग बिना पैदा होता है।परन्तु ध्यान रहे कि मुर्गे के बिना पैदा हुआ अण्ड़ा भी सजीव होता है,शाकाहारी नहीं।
अमेरिकन वैज्ञानिक फिलिप्स जे. स्केम्बल कहते हैं कि-
(1) कोई भी अण्ड़ा निर्जीव नहीं होता।यह बात अमेरिका के मिशीगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दी है कि कोई भी अण्ड़ा चाहे वह मुर्गे के संसर्ग से हो या न भी हो तो भी वह निर्जीव नहीं है।
अण्ड़ा फलीकरण क्रिया से पैदा होता है,उसमें जीव के लक्षण होते हैं,इसलिए जिस अण्ड़े से चूजा बाहर आये वही अण्ड़ा सजीव है,यह मान्यता गलत है।जीव के लक्षण होने से अफलनशील अण्ड़ों को मृत नहीं कहा जा सकता।तब वे शाकाहारी किस प्रकार होंगे?
(2) अण्ड़ा मुर्गी का रजोधर्म है।अण्ड़ा मुर्गी का गर्भ है।गर्भ खाना मानवता से परे है।भ्रूण हत्या,गर्भपात हत्या है।अधर्म है।
(3) अण्डों में कोलेस्टरोल की मात्रा अधिक होती है,जिसको खाने से रक्त के प्रवाह में बिगाड़ होकर ह्रदय रोग पैदा होते हैं।
(4) अण्ड़ों में डी.डी.टी. की मात्रा अधिक होती है,जो स्वास्थय के लिए अत्यन्त हानिकारक है।
(5) अण्ड़े के सेवन से कफ/बलगम पैदा होता है।अण्डे के मायक्रोव बैक्टेरियों से आंतों में रोग पैदा होते हैं।
(6) प्रकृति ने अण्डा प्रजनन के लिए निर्माण किया है,यह ईश्वरीय व्यवस्था और विधान है,इसको छोड़कर मनुष्य अण्डा खाने के लिए उपयोग करता है,यह किस प्रकार उचित है?
(7) मनुष्य के भोज्य पदार्थ में कार्बोहाइड्रेटस की आवश्यकता है,जो अण्ड़ों में बिल्कुल नहीं,अतः यह मनुष्य का आहार नहीं।
अण्डों में १३.३ प्रोटीन है और १७३ डिग्री कैलोरी ऊर्जा है।मेथी में २६.२ प्रोटीन है और ३३३ डिग्री कैलोरी है और यह कोलेस्टरोल की सफाई भी करती है।मूगफली में ३१ प्रोटीन है और ४६० डिग्री कैलोरी है।साधारणतः मनुष्यों को २५०० से ३३०० पर्यन्त कैलोरी की आवश्यकता प्रतिदिन होती है।जिसमें अण्ड़ो से पूर्ति नहीं हो सकती।
(9) अण्डों की साल्मोनेला बैक्टीरियों से इंगलैंड में 1600 अंग्रेजों की मृत्यु हुई तब इंगलैंड के वेल्स क्षेत्र में ४० लाख मुर्गियां और ४० करोड़ अण्ड़े नष्ट कर दिये गये थे।ध्यान रहे सालमोनेला जीवाणु अण्ड़े उबालने पर भी जीवित रहते हैं।
(10) इथोपिया देश में देखा गया है,कि गर्भवती महिलायें अण्ड़े सेवन करें तो बच्चा गंजा पैदा होता है,और उसकी प्रजनन शक्ति कम होती है।
(11) यह वैज्ञानिक सच्चाई है कि अण्ड़ा देने के बाद मुर्गियों और अण्डों के बीच ४८ घण्टों तक बातचीत का जीवन्त सिलसिला पाया जाता है,मुर्गी क्लक,क्लक,क्लक ध्वनि करती है,तो अण्ड़ों का भ्रूण पिप,पिप,पिप संकेत करता है।
मुर्गीपालन उद्योग ने ह्रदयाघात,कैंसर,लकवा आदि असाध्य रोगों को जन्म दिया है।भारत में बिना सोचे समझे अण्ड़ा आहार को बढ़ावा देना दुर्भाग्य ही है।
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