🌻बढिया उत्तर🌻
लुधियाना(पंजाब) में पौराणिक पंड़ितों ने कहा कि स्वामी दयानन्द से शास्त्रार्थ तो क्या,हम उनकी शक्ल भी नहीं देखना चाहते।स्वामी दयानन्द ने कहा, ‘मेरी शक्ल देखना यदि तुम्हें स्वीकार न हो तो न देखो,परन्तु मेरे और अपने मध्य में पर्दा ड़ालकर ही शास्त्रार्थ करो।’
एक बार पौराणिक ब्राह्मणों ने स्वामी दयानन्द जी को निरुत्तर करने की योजना बनायी।उन्होंने सोचा कि स्वामी दयानन्द जी से यह पूछा जाये कि आप विद्वान् हैं कि अविद्वान्।यदि कहें विद्वान् हैं तो उनसे गृहस्थ-प्रकरण और सांसारिकता की बात पूछी जाये।यदि कहें अविद्वान हैं तो उनसे कहा जाये कि जब आप स्वयं ही अविद्वान हैं तो हमें क्या सिखायेंगे ?
यह विचार करके वे स्वामी दयानन्द जी महाराज के समक्ष उपस्थित हुए और स्वामी जी से पूछने लगे कि आप विद्वान् हैं कि अविद्वान्?
स्वामी जी महाराज कहने लगे कि वेदादि शास्त्रों का विद्वान् हूं,परन्तु सांसारिक विषयों का अविद्वान् हूं।
यह सुनकर पौराणिक पण्ड़ित अवाक् रह गये और निरुत्तर होकर वापस लौट आये।
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