Thursday, December 17, 2015

🌻🍀🌻🍀🌻ओ३म्🌻🍀🌻🍀 भूपेश आर्य 🌻स्वास्थय व स्नान🌻 प्रतिदिन स्नान करना भी वैदिक दिनचर्या का एक आवश्यक...

🌻🍀🌻🍀🌻ओ३म्🌻🍀🌻🍀

भूपेश आर्य

🌻स्वास्थय व स्नान🌻

प्रतिदिन स्नान करना भी वैदिक दिनचर्या का एक आवश्यक अंग है।स्नान करने से शरीर शुद्ध हो जाता है,पाचन शक्ति त्रीव होकर बल और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

वेद में जल को जीवन और अमृत का नाम दिया है-
आप इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः ।
आपः सर्वस्व भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम् ।।-(ऋ० १०/१३७/६)
जल ही ओषधि है,जल रोगों का शत्रु है।यह सभी रोगों का नाश करता है।अतः तुम्हारे रोगों को भी यह नष्ट करेगा।

अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्यते ।
देवा भवत वाजिनः ।। -(ऋ० 1/23/19)
जलों में अमृत (आरोग्यता) प्रदान करने की शक्ति है।जलों में हर प्रकार के रोगों को दूर करने की शक्ति है।जल कल्याण करने वाले हैं।जल का ठीक प्रयोग करके अर्थात् इसके उचित पान से और इसमें स्नान से बलवान् बनो।

वेद में एक स्थान पर यहां तक कहा है–
भिषग्भ्यो भिषक्तरा आपः । -(अथर्व० 19/2/3)
जल ओषधियों की भी परम ओषधि है।

इन मन्त्रों में जल चिकित्सा का बीज विद्यमान है।जल के इस महत्व को समझकर ही आज जल-चिकित्सा के द्वारा भी रोगों की चिकित्सा की जाने लगी है।अब पाश्चात्य विद्वान भी जल के महत्व को अनुभव करने लगे हैं।

महर्षि चरक ने स्नान के निम्न लाभ बतलाये हैं-
पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम् ।
शरीरबलसंधानं स्नानमोजस्करं परम् ।।-(चरक सूत्र० 5/92)
स्नान करना शरीर को पवित्र करता है,आयु को बढ़ाता है,थकावट तथा पसीने और मैल को दूर करता है,शारिरिक बल को बढ़ाता है और ओज उत्पन्न करता है।

किसी अनुभवी विद्वान ने स्नान के गुणों का वर्णन करते हुए ठीक ही लिखा है–

गुणा दश स्नानपरस्य साधो,
रुप च तेजस्च बलं च शौचम् ।
आयुष्यमारोग्यमलोलुपत्वं ,दुःस्वप्ननाशश्च यशश्च मेधा ।।
अर्थात् ! स्नान करने से निम्न दस लाभ होते हैं–
शरीर का सौन्दर्य निखरता है,तेज और बल की प्राप्ति होती है,पवित्रता आती है,आयु बढ़ती है,आरोग्यता प्राप्त होती है,चन्चलता का नाश होता है,दुःस्वप्न नहीं आते,यश फैलता है और मेधा बुद्धि की प्राप्ति होती है।

स्नान सदैव ठंड़े जल से ही करना चाहिये।बहुत विवश होने पर ही गर्म जल का प्रयोग करना चाहिये।सिर पर तो प्रत्येक दशा में शीतल जल ही डालना चाहिये।
महर्षि बाग्भट्ट ने स्पष्ट बताया है कि–
“ गर्म जल से सिर धोने से नेत्रों की ज्योति कम हो जाती है,केश निर्बल हो जाते हैं और मष्तिष्क को बहुत हानि पहुंचती है।”

अब शीतल जल की उपयोगिता यूरोप जैसे स्थान के रहने वाले डाक्टरों ने भी स्वीकार की है।डाँ० निकोलस लिखते हैं–
“ठण्ड़े पानी से मत डरो।मैंने ठण्ड़ी हवा लगने से लोगों को बिमार सोते देखा है,परन्तु ठण्ड़े पानी से नहाने पर किसी को बीमार होते नहीं देखा।मैं ४० वर्षों से निरन्तर ठण्ड़े जल से स्नान करता हूं।जब हवा का तापमान थर्मामीटर में शून्य से भी १० डिग्री नीचे हो गया था और पानी की एक बूंद फर्श पर पड़कर ही जमकर बर्फ बन जाती थी,उस समय भी मैनें ठण्ड़े जल से स्नान किया है।ठण्ड़े जल के स्नान से मैंने सदा बल और आरोग्य प्राप्त किया है।”

स्नान की विधि इस प्रकार है–
सर्वप्रथम सिर नीचा करके दो-तीन लोटे पानी सिर पर डालिये।सिर पर पानी डालने से मष्तिष्क की गर्मी पांव के मार्ग से निकलकर शांत हो जाती है।इसके विपरित पहले पांव धोने से शरीर की गर्मी सिर में समा जाती है और मष्तिष्क में नाना रोग तथा व्याधियां होने लगती हैं।सिर को भिगोने के पश्चात् फिर शरीर के तमाम अंगों पर पानी ड़ालें।

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